- तीर्थदर्शन योजना में बड़ा खेल, पार्षद-कर्मचारी-ठेकेदार बने अपात्र हितग्राही
- गरीबों की योजना पर अमीरों का कब्जा, काशी-अयोध्या यात्रा में अपात्रों की भरमार
- तीर्थ के नाम पर नियमों की बलि, बैकुंठपुर में पात्रता शर्तें दरकिनार
- पार्षद और कर्मचारी कर रहे मुफ्त तीर्थयात्रा, पात्र बुजुर्ग रह गए बाहर
- तीर्थदर्शन या पर्यटन? अपात्रों की फौज से योजना की मंशा सवालों में
- 60 वर्ष से कम उम्र के पार्षद, पार्षद पति और कर्मचारी भी यात्रा में शामिल
- आयकर दाता और पहले जा चुके कर्मचारी फिर बने हितग्राही
- समाज कल्याण विभाग की भूमिका जांच के घेरे में, नियम कागजों में, यात्रा रसूखदारों की तीर्थदर्शन योजना में भ्रष्टाचार की आहट, लेनदेन के आरोप
- पात्र बाहर, अपात्र अंदर, योजना का उलटा सच
- क्या कलेक्टर लेंगी संज्ञान? जांच और कार्रवाई की मांग तेज



-संवाददाता-
बैकुंठपुर,17 जनवरी 2026(घटती-घटना)। गरीब,वंचित,जरूरतमंद और सामाजिक रूप से कमजोर वर्ग के लोगों को धार्मिक स्थलों के दर्शन का अवसर देने के उद्देश्य से शुरू की गई मुख्यमंत्री तीर्थदर्शन योजना अब अपने मूल उद्देश्य से भटकती हुई नजर आ रही है, कोरिया जिले से सामने आए ताजा घटनाक्रम ने इस हितग्राहीमूलक योजना के क्रियान्वयन पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं,आरोप है कि योजना का लाभ पात्र बुजुर्गों, विधवाओं,परित्यक्त महिलाओं और दिव्यांगजनों की बजाय प्रभावशाली, रसूखदार और संपन्न लोगों द्वारा सपरिवार उठाया जा रहा है, यह मामला भले ही कोरिया जिले से जुड़ा हो, लेकिन इसकी कडि़यां सरगुजा जिले के अम्बिकापुर से लेकर काशी और अयोध्या तक फैली हुई हैं, हाल ही में अम्बिकापुर से काशी-अयोध्या तीर्थदर्शन के लिए रवाना हुई मुख्यमंत्री तीर्थदर्शन योजना की विशेष ट्रेन में कोरिया जिले के बैकुंठपुर नगर पालिका से जुड़े कई ऐसे लोग शामिल पाए गए हैं,जो योजना की निर्धारित पात्रता शर्तों को पूरा नहीं करते।
योजना का उद्देश्य और पात्रता- मुख्यमंत्री तीर्थदर्शन योजना का उद्देश्य उन लोगों को धार्मिक यात्रा का अवसर देना है, जो आर्थिक, शारीरिक या सामाजिक कारणों से स्वयं तीर्थयात्रा करने में असमर्थ हैं, योजना के तहत 60 वर्ष या उससे अधिक आयु के महिला एवं पुरुष, 65 वर्ष से अधिक आयु के बुजुर्ग (एक सहायक के साथ), 18 वर्ष से अधिक आयु के मानसिक रूप से स्वस्थ दिव्यांगजन, विधवा एवं परित्यक्त महिलाएं को निःशुल्क तीर्थदर्शन की सुविधा प्रदान की जाती है, योजना के अंतर्गत हितग्राही को घर से नजदीकी रेलवे स्टेशन तक सड़क मार्ग से पहुंचाने से लेकर विशेष ट्रेन, भोजन, ठहराव और तीर्थस्थल दर्शन की पूरी व्यवस्था शासन द्वारा की जाती है, इसके लिए शासन प्रति हितग्राही लाखों रुपये खर्च करता है, स्पष्ट नियमों के अनुसार आयकर दाता, सक्षम एवं संपन्न व्यक्ति, शासकीय कर्मचारी और जनप्रतिनिधि इस योजना के पात्र नहीं हैं।
अपात्रों को मिला लाभ, पात्रों का हक मारा गया- इसके बावजूद बैकुंठपुर नगर पालिका के कई युवा पार्षद, पार्षद पति, नगर पालिका कर्मचारी, ठेकेदार और आयकर दाता इस योजना के हितग्राही बनकर काशी–अयोध्या तीर्थयात्रा पर हैं, इनमें से कई 60 वर्ष से कम आयु के हैं और कई लोग अपने परिवार के साथ यात्रा कर रहे हैं, जबकि नियमों के अनुसार 65 वर्ष से कम आयु वालों को सहायक रखने की भी अनुमति नहीं है, यात्रा पर गए लोग सोशल मीडिया पर तस्वीरें साझा कर रहे हैं और इसे उपलब्धि के रूप में प्रचारित कर रहे हैं। नियमों के जानकारों का कहना है कि यह स्थिति न केवल अनियमितता है, बल्कि वास्तविक पात्र और जरूरतमंद हितग्राहियों के अधिकारों पर सीधा डाका है।
दैनिक घटती-घटना की पड़ताल में खुलासे- दैनिक घटती-घटना की पड़ताल में यह सामने आया है कि सरगुजा से रवाना हुई मुख्यमंत्री तीर्थदर्शन योजना की इस टोली में अधिकांश हितग्राही अपात्र हैं। सूत्रों का दावा है कि इस पूरे प्रकरण में समाज कल्याण विभाग के जिला अधिकारी की भूमिका संदिग्ध है, बताया जा रहा है कि यह कोई पहली घटना नहीं, बल्कि लंबे समय से चली आ रही एक सतत प्रक्रिया है, जिसमें प्रभावशाली लोगों को नियमों को दरकिनार कर योजना का लाभ दिया जाता रहा है।
एक ही लोग बार-बार यात्रा पर- सूत्र यह भी बताते हैं कि वर्तमान यात्रा में शामिल कई नगर पालिका कर्मचारी पहले भी मुख्यमंत्री तीर्थदर्शन योजना के तहत तीर्थयात्रा कर चुके हैं, जबकि नियमों के अनुसार एक व्यक्ति को दोबारा इस योजना का लाभ नहीं दिया जा सकता, इस बार तो स्थिति यह है कि यात्रियों की तुलना में कर्मचारियों की संख्या अधिक दिखाई दे रही है, जिससे संदेह और गहराता जा रहा है।
लेनदेन और भ्रष्टाचार की चर्चाएं- मामले को लेकर लेनदेन और भ्रष्टाचार की चर्चाएं भी सामने आ रही हैं। आरोप है कि कुछ लोगों को लेनदेन के माध्यम से पात्रता दिलाई गई, ताकि वे योजना का लाभ उठा सकें। यदि यह आरोप सही साबित होते हैं, तो यह मामला केवल नियमों के उल्लंघन तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि शासकीय अमानत में खयानत और गंभीर भ्रष्टाचार की श्रेणी में आएगा।
जिम्मेदारी किसकी? इस पूरे प्रकरण ने कई अहम सवाल खड़े कर दिए हैं—
यदि जिले में पात्र हितग्राही उपलब्ध नहीं हैं तो योजना को अस्थायी रूप से बंद क्यों नहीं किया जा रहा?
अपात्रों को यात्रा पर भेजना क्या दंडनीय अपराध नहीं है?
जब विशेष ट्रेन रवाना होती है, उस समय मौजूद अधिकारी और जनप्रतिनिधि क्या अपनी जिम्मेदारी से बच सकते हैं?
कलेक्टर से कार्रवाई की उम्मीद- अब इस पूरे मामले में निगाहें कलेक्टर कोरिया पर टिकी हैं। सवाल यह है कि क्या कलेक्टर इस गंभीर मामले का संज्ञान लेंगी और अपात्रों को पात्र बनाने वाले अधिकारियों व जिम्मेदारों पर कार्रवाई होगी, जानकारों का मानना है कि यात्रा पर गए अपात्र लोग भले ही नैतिक रूप से दोषी हों, लेकिन असली जिम्मेदारी उन अधिकारियों और सिस्टम पर तय होनी चाहिए, जिन्होंने नियमों को ताक पर रखकर मुख्यमंत्री तीर्थदर्शन योजना को प्रभावशाली वर्ग की मुफ्त पारिवारिक भ्रमण योजना में बदल दिया, अब देखना यह है कि इस प्रकरण में निष्पक्ष जांच और ठोस कार्रवाई होती है या फिर यह मामला भी अन्य शिकायतों की तरह फाइलों में दबकर रह जाएगा।
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