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बैकुण्ठपुर@ राष्ट्रीय पर्व पर राष्ट्रीय मिठाई क्यों नहीं? चॉकलेट बनाम बूंदी से उठा सवाल, प्रशासनिक जवाब भी विवाद में

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  • 50 पैसे की चॉकलेट पर बवाल, राष्ट्रीय पर्व, राष्ट्रीय प्रतीक और प्रशासनिक सोच कटघरे में
  • क्या हर मीठी चीज मिठाई है? राष्ट्रीय पर्व पर बूंदी की मांग, जनदर्शन तक पहुँचे पालक
  • राष्ट्रीय पर्व का उत्साह या कटौती? महंगे स्कूल में चॉकलेट वितरण पर उठे सवाल
  • चॉकलेट भी तो मिठाई है’ कलेक्टर के कथित जवाब ने बढ़ाई बहस
  • क्षेत्रीय परंपराएं मुखर, राष्ट्रीय परंपरा गायब? राष्ट्रीय मिठाई की मांग ने छेड़ी बहस
  • देशभक्ति के पर्व पर 50 पैसे की मिठाई! — व्यवस्था और सोच पर सवाल
  • सेंट जोसेफ स्कूल का मामला, पालकों की शिकायत और 26 जनवरी से पहले सरकार पर टिकी निगाहें


-रवि सिंह-
बैकुण्ठपुर,15 जनवरी 2026(घटती-घटना)।
भारत में जब भी क्षेत्रीय पर्व आते हैं, तो उनसे जुड़ी विशेष मिठाइयों, भोजन और परंपराओं को लेकर समाज एकजुट नजर आता है, राज्य दर राज्य लोग अपनी पहचान, परंपरा और खान-पान को लेकर अभियान तक चलाते हैं,लेकिन इसी देश में अब एक बड़ा सवाल उठ खड़ा हुआ है जब राष्ट्रीय पर्व पूरे देश के लिए एक समान हैं, तो क्या उनकी खुशियों का प्रतीक भी एक जैसा नहीं होना चाहिए? इसी सवाल ने कोरिया जिले में एक ऐसी बहस को जन्म दिया है,जो अब केवल एक विद्यालय या मिठाई तक सीमित नहीं रह गई है,बल्कि राष्ट्रीय पहचान,बच्चों की भावना और प्रशासनिक संवेदनशीलता से जुड़ गई है।
बता दे की चॉकलेट बनाम बूंदी की यह बहस दरअसल मिठाई से कहीं आगे की बात है,यह सवाल राष्ट्रीय पर्वों की गरिमा, बच्चों की भावनाओं,शैक्षणिक संस्थानों की जिम्मेदारी और प्रशासनिक संवेदनशीलता से जुड़ा है, अब यह समाज और शासन दोनों के सामने खुला प्रश्न है, क्या हम राष्ट्रीय पर्वों को सिर्फ औपचारिकता तक सीमित रखेंगे,या उन्हें साझा सांस्कृतिक पहचान और समान प्रतीकों के साथ मनाने की दिशा में आगे बढ़ेंगे?
मामला कैसे शुरू हुआ?– यह विषय किसी आंदोलन या राजनीतिक मंच से नहीं उठा, बल्कि एक मांग पत्र के माध्यम से सामने आया, मामला कोरिया जिले के जिला मुख्यालय बैकुंठपुर स्थित ख्याति प्राप्त निजी शिक्षण संस्थान सेंट जोसेफ स्कूल से जुड़ा है, विद्यालय के पालकों ने कलेक्टर जनदर्शन में आवेदन देकर शिकायत दर्ज कराई कि राष्ट्रीय पर्वों के दिन विद्यालय में मिठाई के स्थान पर चॉकलेट का वितरण किया जाता है, जबकि उनकी मांग है कि इस दिन बूंदी जैसी पारंपरिक राष्ट्रीय मिठाई वितरित की जानी चाहिए।
15 अगस्त 2025 की घटना- पालकों के आवेदन के अनुसार 15 अगस्त 2025, स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर विद्यालय द्वारा छात्र–छात्राओं को मात्र 50 पैसे मूल्य की चॉकलेट दी गई पालकों का कहना है कि उसी दिन जिले के अन्य विद्यालयों में बच्चों को बूंदी वितरित की गई थी, अन्य स्कूलों के बच्चों के हाथों में बूंदी देखकर सेंट जोसेफ स्कूल के छात्र–छात्राएं हतोत्साहित हुए और उनके मन में यह भावना बनी कि उनके विद्यालय ने राष्ट्रीय पर्व के उत्साह में कटौती की।
जनदर्शन तक क्यों पहुंचे परिजन?- सबसे अहम सवाल यही है कि आखिर पालकों को कलेक्टर जनदर्शन तक क्यों जाना पड़ा? परिजनों का कहना है कि यह विषय केवल मिठाई का नहीं, बल्कि राष्ट्रीय पर्व की गरिमा, बच्चों की समानता और मनोविज्ञान तथा संस्थान की सामाजिक जिम्मेदारी से जुड़ा है, हालांकि, इस शिकायत पर जनदर्शन की औपचारिक कार्यवाही फिलहाल सार्वजनिक नहीं हुई है, लेकिन इसने जिलेभर में चर्चा जरूर शुरू कर दी है।
कलेक्टर के कथित जवाब ने बढ़ाई बहस- इसी बीच परिजनों ने जनदर्शन को लेकर एक और बात सामने रखी है, परिजनों के अनुसार, जनदर्शन के दौरान कलेक्टर ने कथित तौर पर कहा आखिर चॉकलेट भी तो मिठाई है, अगर स्कूल दे रहा है तो क्या दिक्कत है? आपके पास पैसे हैं तो आप खुद बूंदी बंटवा दीजिए, यह बात परिजनों द्वारा बताई गई है, इसकी आधिकारिक पुष्टि नहीं की गई है, लेकिन परिजनों के बयान के आधार पर इसे खबर में दर्शाया जा रहा है, इस कथित जवाब के बाद बहस और तेज हो गई।
क्या हर मीठी चीज मिठाई होती है?- परिजनों और सामाजिक वर्गों का कहना है कि सवाल केवल स्वाद का नहीं है, यदि हर मीठी चीज को मिठाई मान लिया जाए, तो शक्कर, गुड़ या कोई भी मीठा पदार्थ भी मिठाई कहलाएगा, उनका तर्क है कि मिठाई का सांस्कृतिक और प्रतीकात्मक महत्व होता है, जिस तरह होली पर गुजिया, दीपावली पर लड्डू छठ पर ठेकुआ
का विशेष महत्व है, उसी तरह राष्ट्रीय पर्वों पर भी एक सांकेतिक ‘राष्ट्रीय मिठाई’ की अपेक्षा स्वाभाविक है।
खुद पैसे देकर बांट दीजिए,जिम्मेदारी किसकी?- परिजनों ने यह सवाल भी उठाया कि यदि कथित रूप से उनसे कहा गया कि “आप खुद बूंदी बंटवा दीजिए”, तो क्या राष्ट्रीय पर्व का आयोजन और उससे जुड़ी प्रतीकात्मक जिम्मेदारी अभिभावकों की निजी जिम्मेदारी है? उनका कहना है कि जब विद्यालय भारी–भरकम शुल्क लेता है, राष्ट्रीय पर्व का आयोजन स्वयं करता है, तो गरिमापूर्ण और समान आयोजन की जिम्मेदारी भी विद्यालय प्रबंधन की ही बनती है, न कि अलग–अलग पालकों की।
महंगा विद्यालय, फिर उत्साह में कटौती क्यों?- पालकों की नाराजगी की एक बड़ी वजह यह भी है कि सेंट जोसेफ स्कूल जिला मुख्यालय का ख्याति प्राप्त और महंगा निजी विद्यालय माना जाता है, यहां पढ़ाई का खर्च आम परिवार के लिए आसान नहीं, ऐसे में राष्ट्रीय पर्व पर 50 पैसे की चॉकलेट का वितरण उन्हें उत्सव में कटौती जैसा प्रतीत होता है।
26 जनवरी फिर सामने, निगाहें शासन पर- भले ही 15 अगस्त की घटना बीत चुकी हो, लेकिन अब 26 जनवरी (गणतंत्र दिवस) फिर से सामने है, ऐसे में सवाल उठ रहा है क्या इस बार प्रदेश सरकार या शिक्षा विभाग कोई ऐसा दिशा–निर्देश जारी करेगा जो राष्ट्रीय पर्वों पर राष्ट्रीय मिठाई वितरण जैसी परंपरा की शुरुआत करे? यदि ऐसा होता है, तो यह न केवल प्रदेश बल्कि पूरे देश के लिए एक मिसाल बन सकता है।


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