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लेख@ छत्तीसगढ़ में धान खरीदी: इच्छा सरकार की, ब्रेकर प्रशासन के?

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धान खरीदी नहीं, किसानों की परीक्षा ले रही है सरकार
खरीदना चाहते हैं या खरीदने का नाटक?
नीति कहती है हाँ, सिस्टम कहता है नहीं
प्रशासन ब्रेकर क्यों बना और किसके इशारे पर?
30 जनवरी 2026 के बाद जवाब मिलेगा या पर्दा गिरा दिया जाएगा?

लेख dy रवि सिंह: छत्तीसगढ़ की राजनीति इन दिनों एक अजीब विरोधाभास से जूझ रही है, सरकार कहती है हम धान खरीदना चाहते हैं, विधायक कहते हैं हम किसानों के साथ खड़े हैं, फिर भी ज़मीनी सच्चाई यह है कि किसान टोकन के लिए लाइन में अटका है, लिमिट खत्म हो चुकी है, रकबा घटा है और पोर्टल 20 जनवरी 2026  तक “फुल” दिखा रहा है, सवाल यह नहीं कि धान खरीदी हो रही है या नहीं सवाल यह है कि जहां यह सबसे सहज होनी चाहिए, वहीं क्यों अटक रही है? शिकायतें एक-दो नहीं, कई हैं, रकबा घटा है, पर जोड़ा नहीं जा रहा, टोकन की कतार इतनी लंबी कि किसान टोकन तक नहीं ले पा रहा, केंद्रों पर लिमिट खत्म, पर समाधान नहीं, विधायक खुद मंत्री को फोन कर हालात सुधारने की गुहार लगा रहे हैं, अगर सरकार सचमुच खरीदना चाहती है, तो प्रशासन ब्रेकर क्यों बन रहा है? और अगर प्रशासन ब्रेकर है, तो उसे यह ब्रेकर बनने का अधिकार किसने दिया? यह प्रशासनिक सख़्ती है, सिस्टम की नाकामी है, या कोई अदृश्य नीति-निर्देश?
कड़े सवाल, असहज सच
छत्तीसगढ़ में धान खरीदी आज नीति और नीयत के टकराव का सबसे बड़ा उदाहरण बन चुकी है, सरकार दावा करती है कि वह किसानों का एक-एक दाना खरीदना चाहती है, विधायक मंचों और बैठकों में यही रट दोहराते हैं, लेकिन ज़मीन पर तस्वीर ठीक उलट है, अगर सरकार सच में खरीदना चाहती है, तो किसान बेच क्यों नहीं पा रहा? यह सिर्फ अव्यवस्था नहीं है, यह व्यवस्थित अवरोध है, टोकन सिस्टम फुल है, पोर्टल 20 जनवरी 2026  तक बंद-सा पड़ा है, रकबा घटा दिया गया है और उसे जोड़ने की कोई तत्परता नहीं दिख रही। धान खरीदी केंद्रों पर लिमिट खत्म होने के बाद हालात ऐसे हैं कि विधायक खुद फोन घुमा-घुमाकर मंत्री और अफसरों से गुहार लगा रहे हैं, यह प्रशासनिक विफलता नहीं, प्रशासनिक जिद है, सबसे बड़ा सवाल यही है जब नीति खरीद की है, तो प्रशासन रोक क्यों रहा है? और अगर रोक रहा है, तो यह ताकत उसे किसनेदी? क्या यह अफसरशाही का स्वतंत्र प्रयोग है? या फिर ऊपर से आया कोई ऐसा निर्देश, जिसे सार्वजनिक करने का साहस सरकार नहीं कर पा रही? धान खरीदी का समय तेज़ी से निकल रहा है। अब मुश्किल से एक महीना बचा है। 30 जनवरी को केंद्र बंद होंगे और तब सरकार के पास कहने को सिर्फ आँकड़े होंगे, जवाब नहीं।
जिन किसानों को टोकन नहीं मिला, जिनका रकबा अपडेट नहीं हुआ, जिनकी लिमिट खत्म बताकर लौटा दिया गया उनका हिसाब कौन देगा?
आज जो हो रहा है, उसका सबसे खतरनाक परिणाम यह है कि किसान मजबूरी में बिचौलियों के हाथ धान बेच रहा है, यह वही बिचौलिया है, जिसके खिलाफ वर्षों से भाषण दिए जाते रहे, आज वही बिचौलिया सिस्टम की खामियों का सबसे बड़ा लाभार्थी बन गया है, यह सवाल अब सिर्फ धान खरीदी का नहीं रहा, यह सवाल है, किसान किस पर भरोसा करे? सरकार के बयान पर या प्रशासन के ब्रेकर पर? अगर 30 जनवरी 2026 के बाद यह कहा गया कि “इतना धान खरीदा गया”, तो यह भी बताया जाना चाहिए कि कितना धान खरीदा ही नहीं गया और क्यों नहीं खरीदा गया। क्यों किसान लाइन में खड़ा रहा और सिस्टम सोता रहा। क्यों सत्ता पक्ष के विधायक भी असहाय दिखे? धान खरीदी योजना अगर किसान के लिए है, तो उसे किसान तक पहुँचना चाहिए, अगर वह पोर्टल, लिमिट, रकबा और आदेशों में दम तोड़ रही है, तो यह साफ संकेत है कि समस्या किसान में नहीं, सिस्टम में है, और सिस्टम की जवाबदेही तय किए बिना यह संकट खत्म नहीं होगा, आज चुप्पी साधना आसान है, लेकिन याद रखिए किसान की पीड़ा का हिसाब चुनावी भाषणों से नहीं, ज़मीनी जवाबों से देना पड़ता है।

रवि सिंह
कोरिया,छत्तीसगढ़


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