नियम जनता केलिए,दण्डहीनता सत्ता के लिए…
यही है व्यवस्था का नया मॉडल
‘मुक्ति’ कीयोजनाएं अब
जनता के लिए सिरदर्द,दलालों
के लिए रोजगार!
कमाने पर दायरा,लूटने पर आज़ादी
सरकार की नियत पर जनता का सवाल
वीआईपी राजनीति फूल-माला के नीचे
छिपी जनता की चीखें
जनता से कहा दायरे में रहो पर
सत्ता खुद हर दायरे के बाहर!


मौजूदा हालात यही बयान कर रहे हैं कि कमाने का दायरा है पर भ्रष्टाचार करने का कोई दायरा नहीं, सरकार ने हर काम के लिए सीमा तय कर रखी है, योजनाओं का दायरा, पात्रता का दायरा, फंड का दायरा,सुविधा का दायरा लेकिन जब बात भ्रष्टाचार की आती है,तो यह दायरा अचानक अनंत हो जाता है, सरकार कहती है “नियत साफ है।” पर जनता पूछ रही है अगर नियत सच में साफ है तो फजीहत सिर्फ जनता की ही क्यों हो रही है? जनता से कहा जाता है नियमों के दायरे में रहिए कागज़ पूरा रखिए, समय पर टैक्स दीजिए, आपत्ति है तो आवेदन दीजिए, प्रतीक्षा कीजिए, पर भ्रष्ट तंत्र से कोई नहीं पूछता तुम्हारा दायरा कहाँ है? तुम्हारी सीमा क्या है? तुम्हारी जवाबदेही कब तय होगी? राजनीति दायरे से ऊपर, अफसरशाही दायरे से बाहर, और जनता दायरे में कैद! यह व्यवस्था अगर अन्याय नहीं तो और क्या है?
मुक्ति की स्कीमें,जनता को राहत या नई मुसीबत?
योजनाओं का नाम चाहे कितना आकर्षक हो, पर जनता में सवाल है क्या यह मुक्ति योजना है या ‘मुक्ति दो और फिर लूट लो’ योजना? योजनाएँ बनती हैं, घोषणा होती है, प्रचार होता है, पर अमल के नाम पर जनता फिर उसी चक्रव्यूह में फंस जाती है फॉर्म, फीस, कमीशन, दलाल, और अंतहीन चक्कर।
राजनीति का कड़वा सच गद्दी पहले,जनता बाद में…
आज राजनीतिक माहौल का कड़वा सच यही है सरकारी गद्दी पाने के लिए देश बर्बाद हो जाए तो हो जाए, जनता परेशान हो जाए तो हो जाए, पर गद्दी चाहिए,कुर्सी चाहिए, सुरक्षा चाहिए, भीड़ चाहिए,स्वागत चाहिए,नेताओं को चाहिए फूल, माला, मंच,स्वागत करती भीड़, और सोशल मीडिया पर तैरती उनकी ‘वीआईपी छवि’, पर कभी सोचा है इस वीआईपी सुविधा का सूत्रधार कौन है? किसके टैक्स पर, किसकी मेहनत पर,किसके जीवन की कीमत पर यह वीआईपी संस्कृति चल रही है? जनता—जो हर बार आखिरी में खड़ी रहती है, जिसकी समस्या पर फाइल सरकाई जाती है, और व्यापारी की परेशानी को ‘अभी देखेंगे’ कहकर डाल दिया जाता है कोने में।
जनता पूछ रही है,दायरा किसका है? अधिकार किसका है?
सरकार कहती है दायरे में रहकर काम करो पर जनता पूछ रही जब भ्रष्टाचार दायरे से बाहर जाकर फल-फूल सकता है,तो जनता को ही दायरे में क्यों बाँधा जाता है?
सरकारी मशीनरी दायरा बनाती है, राजनीति दायरा तोड़ती है,और जनता—हर बार पिसती है।
दायरे जनता के लिए दण्डहीनता सत्ता के लिए!
देश और प्रदेश में व्यवस्था का जो नया मॉडल गढ़ा गया है, उसमें एक सच्चाई सबसे ज्यादा चुभती है कमाने का दायरा तय है, खर्च का दायरा तय है, योजनाओं का दायरा तय हैज्पर भ्रष्टाचार करने वालों के लिए कोई दायरा नहीं है,सरकार के मंत्री मंचों से घोषणा करते हैं नियत साफ है पर जनता के सामने हर रोज उठता सवाल है यदि नियत इतनी ही साफ है तो व्यवस्था इतनी गंदी क्यों है? अगर सरकार ईमानदार है, तो जनता पर यह रोज़ की फजीहत क्यों थोपी जा रही है?
मुक्ति की योजनाएं या जनता को जाल में फंसाने का नया औजार?- सरकार ने राहत के नाम पर ‘मुक्ति’ की स्कीमें दीं पर आज उन्हीं योजनाओं से जनता का सिर दर्द बढ़ गया है फॉर्म भरने में मुक्ति नहीं, चक्कर लगाने में मुक्ति नहीं, भ्रष्टाचारियों के चंगुल में मुक्ति बिल्कुल नहीं, योजनाएं कागज़ पर जनता की,और ज़मीन पर अफसरों और दलालों की कमाई का जरिया, सरकार का स्लोगन है “मुक्ति दोज्” पर जनता का अनुभव है “मुक्ति दोज् और फिर मौका मिलते ही जनता को लूट लो।
वीआईपी राजनीति,फूलों की माला के नीचे छिपी जनता की चीखें
आज राजनीति का चरित्र इतना खोखला हो चुका है कि कुर्सी बचाने के लिए देश बर्बाद करने में भी नेताओं को हिचक नहीं, फूल-माला, स्वागत, बैंड-बाजा यही राजनीति का असली एजेंडा बन गया है,नेताओं को चाहिए भीड़,फोटो,वीडियो,हैवी सुरक्षा, एयरकंडीशन लाउंज,और सोशल मीडिया पर चमकता वीआईपी दर्जा, पर कभी किसी नेता ने पूछा यह वीआईपी सुविधा किसके दम पर है? जनता की जेब पर है, जनता की मेहनत पर है, जनता की उम्मीदों पर है, जो जनता इस सुविधा की असली ‘फंडिंग एजेंसी’ है,वही आज सबसे असुरक्षित,असहाय और अपमानित है।
जनता से बड़ा सरकार का कौन-सा डर है?
सरकारें बदलती रहती हैं, पर सत्ता की भूख का मॉडल वही रहता है गद्दी बचाओ, बस जनता मत जागने दो, जनता पूछ रही है विकास का दायरा कहाँ है? ईमानदारी का दायरा कहाँ है? जवाबदेही का दायरा कहाँ है? और सबसे बड़ा सवाल क्या जनता केवल टैक्स देने और वोट डालने का साधन है?
दायरा वहां खिंचेगा जहां जनता खड़ी होगी…
जब तक जनता चुप है, तब तक दायरा जनता पर और सत्ता पर दण्डहीनता का साम्राज्य,पर जिस दिन जनता खड़ी हो गई,उस दिन सत्ता के सारे दायरे ढहेंगे, टूटेंगे और बदलेंगे,यह समय है कि जनता अपने हक की आवाज बुलंद करे, क्योंकि व्यवस्था वही सुधरती है जिसे जनता सुधारने पर अड़ जाती है।
रवि सिंह
कोरिया,छत्तीसगढ़
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