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लेख@ मैदानी सच्चाई,विकास का दावा और आक्रोश की धुआँ

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आदिवासी घर तोड़ने के आरोप से उपजा आक्रोश…पत्रकार की अकेली यात्रा… और ग्राउंड पर दिखी एक ऐसी तस्वीर…जिसे दोनों चश्मों से देखने की जरूरत है…
मंत्री के दौरे में छिपी वह कहानी जो बाहर से नहीं दिखती
मंत्री का दौरा विकास की चमक या सवालों की धुन?
पत्रकार की नज़र से उठती सच्चाई की पूरी कहानी
गृह क्षेत्र में विकास,विभाग में सवाल,मंत्री के दौरे ने खोले कई परतें
अतिक्रमण विवाद से शुरू हुई यात्रा,विकास की चमक पर जाकर रुकी, मंत्री के इलाके की जमीनी पड़ताल…


जो लेख लिख रहा हूँ, कुछ लोगों को चाटुकारिता लगेगा,कुछ को यह मंत्री-प्रशंसा सा दिखेगा, पर जो लोग दोनों चश्मे—एक लगाकर और एक हटाकर—सच्चाई देखने की हिम्मत रखते हैं,उन्हें यह कहानी वास्तविक लगेगी, क्योंकि यह कहानी मुझे समझ में आई मैदान में,धूल-धक्कड़ वाले रास्तों में, जहाँ जनता, मंत्री और सच्चाई तीनों आमने-सामने थे,यह
कहानी जादू भी लग सकती है और कड़वी हकीकत भी यह इस बात पर निर्भर है कि आप इसे किस नजरिए से पढ़ते हैं,समर्थक इसे सराहेंगे, विरोधी इसे राजनीति समझेंगे,पर जो दोनो चश्मा उतारकर और उठाकर दोनों तरह से देखने का हुनर रखते हैं उन्हें यह कहानी बिल्कुल वैसी ही दिखेगी जैसी मुझे दौरे के दौरान दिखी,मैं निकला था आक्रोश में, सूचना मिली थी कि मंत्री के गृह ग्राम में एक आदिवासी परिवार
का घर ‘अतिक्रमण’ बताकर तोड़ दिया गया,आवाज़ें थीं कि कार्रवाई मनमानी थी गांव में गुस्सा था, और एक पत्रकार के मन में भी आक्रोश होना स्वाभाविक था, मैंने तय किया, सीधे मंत्री से पूछकर ही लौटूंगा। मंत्री-विधायक के साथ तस्वीर खिंचवाने का शौक मुझे नहीं है,मेरा काम सत्ता के साथ खड़े होकर फोटो खिंचवाना नहीं, बल्कि उनके अच्छे-बुरे कार्यकाल पर रोशनी डालना है, इसलिए मैंने फोटो जरूर नहीं ली, लेकिन सवाल अपने पूरे पूछे और अपने काम को बिना किसी समझौते के पूरा किया।
दौरा शुरू…समय नहीं, सफर लंबा, और एक पत्रकार की जिद
मुझे मंत्री से 10 बजे का समय मिला था,पर मौके तक पहुंचने में देर हो गई, फिर भी यह मुलाकात ज़रूरी थी क्योंकि सवाल थे, और जवाब बिना सुने कहानी अधूरी रहती,मेरे सहयोगी व्यस्त थे, इसलिए अकेले निकल पड़ा,और मैं अकेला ही निकल पड़ा क्योंकि सवाल मेरे थे,जवाब ढूंढना भी मेरा ही काम था,मंत्री दौरे पर थे और मुझे उनके सहायक से लोकेशन लेकर आगे बढ़ना पड़ा, पर इसी दौरान उनके विधानसभा की तस्वीर मेरे सामने खुलती गई, चौड़ी सड़कें,बड़े भवन, कार्यालय,सुविधाओं का जमावड़ा,यही वो चीजें थीं जो उनके गृह क्षेत्र के आसपास होनी
चाहिए, और अब वास्तव में दिख भी रही थीं।
दौरे के बीच विकास की अनदेखी तस्वीर
निज सहायक से लोकेशन लेकर मैं मंत्री के दौरे के पीछे-पीछे चल पड़ा, रास्ते में जिस इलाके को पार किया, वह मुझे सचमुच चौंकाने वाला था,चौड़ी-चौड़ी सड़कें, बड़े-बड़े सरकारी भवन, कार्यालय,सिंचाई ढाँचे,पुल-पुलियां, सबस्टेशन यह वही क्षेत्र था जहाँ पहले भाजपा को वोट मिलना मुश्किल हुआ करता था, पर तस्वीर अब अलग थी।
पहला पड़ाव…
ग्रामीणों की भीड़, बिजली बिल का विवाद

मंत्री एक कार्यक्रम में बैठे ग्रामीणों की समस्याएं सुन रहे थे,सबसे ज्यादा शिकायत—बिजली बिल बढ़ने की,मंत्री बोले अगर सुविधाएँ बढ़ रही हैं,धान अच्छे दामों में बिक रहा है,आय बढ़ रही हैज् तो बिजली बिल में थोड़ा बहुत बढ़ना बड़ी समस्या नहीं माना जा सकता, सुविधाएँ मिलेंगी तो थोड़ा देना भी पड़ेगा,मैं भीड़ से दूर खड़ा सब देख रहा था,पर उनसे बात अभी भी नहीं हो पाई थी।
दूसरा पड़ाव
धान खरीदी केंद्र,जहाँ मंत्री खुद ‘किसान शिक्षक’ बने…

अगला पड़ाव था धान खरीदी केंद्र का जहामंत्री किसानों से पूछते मिले की कोई दिक्कत तो नहीं? फिर उन्होंने धान से भरा हुआ बोरा उठाया, पलटा, और किसानों को सिखाने लगे कि धान का एक भी दाना कैसे न गिरे, वे खुद बोरा सिलकर दिखा रहे थे, धान का एक-एक दाना किसान की मेहनत है। इसे संभालकर रखना फर्ज है,यह दृश्य अलग था काम की बारीकियों पर मंत्री की पकड़ दिख रही थी,पर मेरे सवाल अब भी जेब में थे।
तीसरा पड़ाव
पेट्रोल पंप पर मिली सबसे बड़ा सवाल पूछने की जगह

अंततः उनका वाहन एक पेट्रोल पंप पर रुका, यह अवसर था—मैं आगे बढ़ा, मैंने सीधा प्रश्न रखा आपके गृह क्षेत्र में आदिवासी का घर टूटा, आपको जानकारी नहीं थी? मंत्री का जवाब था जानकारी नहीं थी,कार्रवाई विभागीय की थी, नियम अनुसार बताया गया, कांग्रेस इसे मुद्दा बना रही है फिर उन्होंने उल्टा सवाल किया अगर कार्रवाई गलत थी,तो इतने कांग्रेसी नेता कहाँ थे? भीड़ क्यों नहीं खड़ी हुई? जेसीबी रोकना मुश्किल था क्या? मेरे भीतर का आक्रोश पहली बार थोड़ा ठंडा हुआ, क्योंकि घटनाक्रम का दूसरा पक्ष भी सामने आ गया।
चौथा पड़ाव 16 गांवों के लिए चौथा सब-स्टेशन
अगला कार्यक्रम था चौथे सबस्टेशन का भूमि पूजन, यह जानकर मैं रुका,गृह क्षेत्र में इससे पहले तीन सबस्टेशन बन चुके हैं, और यह चौथा है,इससे बिल सम्बंधी समस्याएँ और वोल्टेज संकट काफी कम होंगे, यहीं से मैंने 20 साल के वोट प्रतिशत के रिकॉर्ड खंगाले जो चौंकाने वाले थे, बीजेपी का ग्राफ लगातार ऊपर गया है,कांग्रेस का गढ़ धीरे-धीरे ढहता दिखा, अब समझ में आया क्यों मंत्री महीने में 15 दिन इन ग्रामीण क्षेत्रों में दौरा करते हैं।
पर मंत्री का असली मूल्यांकन कहाँ होगा?
अपने क्षेत्र में मंत्री का काम दिख रहा है पर सवाल इससे बड़े हैं, क्या जिन क्षेत्रों ने उन्हें जिताया, वहाँ भी इतना ही विकास हुआ? क्या वहाँ के लोग संतुष्ट हैं? क्या उनके विभाग में पारदर्शिता है? क्या मंत्री केवल गृह क्षेत्र पर ध्यान दे रहे हैं,या पूरे जिले पर? यह सवाल आगे की रिपोर्ट का हिस्सा होंगे, क्योंकि विकास की चमक अच्छी है,पर पत्रकार को चमक के पीछे की दीवार भी देखनी होती है।
अंत…
विकास दिखा, पर सवाल भी उतने ही

मंत्रालय के काम, विभागीय खामियाँ, और अन्य क्षेत्र में विकास इन सबकी पड़ताल अभी बाकी है,पर इतना साफ है कि जहाँ कांग्रेस का किला था, वहाँ भाजपा सेंध लगा रही है, और मंत्री का लगातार दौरा इस बदलाव का बड़ा कारण है, अब देखना है कि क्या उनका विभाग भी उसी मेहनत से काम कर रहा है? और क्या जिन इलाकों ने उन्हें भारी वोट दिए,वे उतने ही खुश हैं?
अगले अंक में… कड़वे सवाल…
यह दौरा कुछ बातों को साफ करता है मंत्री के अपने क्षेत्र में विकास दिखता है,भाजपा कांग्रेस के गढ़ में सेंध लगा रही है, मंत्री की सक्रियता ग्राउंड पर दिखती है पर सवाल अभी भी कायम है की क्या उनके विभाग में व्यवस्था इतनी ही सक्रिय और पारदर्शी है? और क्या पूरे जिले में विकास का संतुलन बराबर है? इन सवालों की पड़ताल अगले अंक में करेंगे, क्योंकि पत्रकार का काम सिर्फ तारीफ लिखना नहीं, कमियों को ढूंढना भी है, अच्छाइयों का फैसला जनता करेगी पर कमी को ढूंढना हमारी जिम्मेदारी है, अगले लेख में हम यह देखेंगे की जहाँ से मंत्री जीतते हैं, वहाँ कितना विकास है? उनके विभाग में कैसी स्थिति है? और जनता असल में क्या चाहती है?

रवि सिंह
कोरिया,छत्तीसगढ़


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