लेख BY रवि सिंह: बिहार ने एक बार फिर वह कर दिखाया, जिसे भारतीय राजनीति में समझने की सबसे कम कोशिश की जाती है पर नीतीश कुमार को नज़रअंदाज़ करना आसान नहीं है, वह आदमी, जिसे विपक्ष ने “यू-टर्न मशीन” कहा, और जिसे भाजपा ने कई बार “वैकल्पिक” बताया, आज फिर उसी भाजपा की सरकार का केंद्रीय स्तंभ बन गया, 10वीं बार मुख्यमंत्री यह सिर्फ़ शपथ ग्रहण नहीं था, यह एक संदेश था “जहाँ तीन बड़े राज्यों में भाजपा ने अपने ही दिग्गजों को रातोंरात बदल दिया, वहीं बिहार में आते ही उसकी ‘चेहरा बदलो’ नीति ठहर क्यों गई? क्योंकि जवाब साफ़ है नीतीश को बदलने में रिस्क तीनों राज्यों के किसी भी पुराने मुख्यमंत्री को हटाने से बड़ा था।
बिहार बनाम छत्तीसगढ़–एमपी–राजस्थान: भाजपा की दोहरी राजनीति
छत्तीसगढ़ में 15 साल वाले रमन सिंह को दरकिनार करना आसान था, मध्य प्रदेश में शिवराज के 18 साल की सत्ता को साइडलाइन करना भी, राजस्थान में वसुंधरा की पूरी राजनीतिक पहचान को फ्रीज कर देना भी, इन तीनों राज्यों में भाजपा अकेली निर्णायक ताकत थी, इनमें ऐसा कोई नेता नहीं था जिसकी कुर्सी हिलाने से पूरी सरकार गिरने का डर हो, पर बिहार? बिहार पूरी तरह गठबंधन संतुलन की राजनीति पर टिका हुआ है, यहाँ हर निर्णय का असर सत्ता की स्थिरता पर सीधा पड़ता है, और सबसे बड़ा सच यह है बिहार में भाजपा समझती है कि ‘नीतीश हटाओ’ सरकार गिराओ, जहाँ छत्तीसगढ़–एमपी–राजस्थान में मुख्यमंत्री बदलने से सिर्फ़ “असंतोष” पैदा हुआ, वहीं बिहार में वही कदम सीधे सत्ता को अस्थिर कर सकता था।
क्या वाकई रमन–शिवराज–वसुंधरा, नीतीश से कमज़ोर साबित हुए?
राजनीतिक भाषा में एक सच्चाई बड़ी निर्मम है किसे पार्टी आसानी से हटा दे, और किसे हटाने से डर जाए, यही असली शक्ति संतुलन है, भाजपा ने तीनों राज्यों के बड़े चेहरों पर सर्जिकल स्ट्राइक कर दी, पर बिहार में वही पार्टी, वही नेतृत्व, वही मॉडल… नीतीश पर आते ही ठंडा हो गया, कारण? क्योंकि नीतीश सिर्फ़ मुख्यमंत्री नहीं गठबंधन की सीमेंट हैं, उन्हें हटाना सिर्फ़ चेहरा बदलना नहीं, पूरा समीकरण हिलाना था, भाजपा यह रिस्क नहीं ले सकती थी, क्योंकि 2029 का लोकसभा चुनाव पास है, और बिहार की 40 सीटें दिल्ली की नसों में खून की तरह दौड़ती हैं।
नीतीश की राजनीति की ताकत: भाजपा को भी झुकना पड़ता है
नीतीश कुमार भले कितने भी विवादों में फंसे हों, उनकी ताकत एक ही है बिना मेरे बिहार में स्थिर सरकार संभव नहीं, भाजपा यह बात समझती है, यही वजह है कि चेहरा बदलने की सुगबुगाहट आई, कैंडिडेट बदलने की अनुमानित रिपोर्टें आईं, सत्ता सूत्रों ने संकेत भी दिए पर जैसे ही फैसला आया, सब खाली, सब शांत, और मंच पर तस्वीर वही बीच में नीतीश, दोनों ओर भाजपा, इसलिए यह कहना गलत नहीं होगा: छत्तीसगढ़–एमपी–राजस्थान में भाजपा ने अपनी ताकत दिखाई, पर बिहार में नीतीश ने अपनी ताकत साबित कर दी।
इसका राजनीतिक निचोड़: भाजपा को ज़रूरत है, मजबूरी नहीं छिपती
भाजपा बिहार में आज दो कारणों से नीतीश को छोड़ नहीं सकती, बिहार की जातीय राजनीति बिना नीतीश के भाजपा के लिए सीधे पहाड़ है, 2029 का रास्ता बिहार से होकर ही निकलता है, भाजपा चाहे जितनी ताकतवर हो, कुछ राज्यों में स्थानीय नेता ही ‘कुंजी’ बन जाते हैं, और बिहार में यह कुंजी सिर्फ़ नीतीश हैं।
निष्कर्ष: तीन राज्यों के दिग्गज बदले, पर नीतीश नहीं, यही उनका कद है
राजनीतिक विश्लेषण बेहद सरल है, और उतना ही कठोर भी भाजपा ने रमन को हटाया क्योंकि वह हटाए जा सकते थे, शिवराज को हटाया क्योंकि सत्ता स्थिर रहती, वसुंधरा को दरकिनार किया क्योंकि असर सीमित था,पर नीतीश? उन्हें छेड़ना मतलब सत्ता का संतुलन बिगाड़ना, और भाजपा ने इस बार जोखिम लेने से साफ़ इनकार कर दिया। इसलिए, सच यह है की तीन राज्यों में चेहरे बदले, पर बिहार में भाजपा का पूरा मॉडल नीतीश के आगे फेल हो गया, और यही नीतीश की सबसे बड़ी राजनीतिक जीत है।

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