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मुंगेली@16वीं सदी से जारी परंपरा टूटी,दशहरा पर नहीं निकाली गई राजा की सवारी

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मुंगेली,03 अक्टूबर 2025। दशहरे का पर्व आने से कुछ दिन पहले से ही पूरे देश में जगह-जगह रावण दहन की तैयारियां शुरू हो जाती हैं,लेकिन छत्तीसगढ़ के मुंगेली जिले का एक गांव ऐसा है जहां सदियों पुरानी परंपरा आज भी जीवंत है। यहां दशहरे के दिन रावण का दहन नहीं होता,बल्कि राजा की सवारी निकाली जाती है। इस अनोखी परंपरा को देखने और इसमें शामिल होने के लिए 44 गांवों के लोग एकत्रित होते हैं । मुंगेली जिला मुख्यालय से लगभग 10 किलोमीटर दूर स्थित ग्राम कंतेली का दशहरा वहां के लोगों के लिए सिर्फ उत्सव नहीं, बल्कि सांस्कृतिक धरोहर है। जो छत्तीसगढ़ की लोक परंपराओं और अनोखी मान्यताओं की झलक प्रस्तुत करता है। ऐसी मान्यता है कि यह परंपरा 16वीं सदी से चली आ रही है। यहां दशहरे के दिन कंतेली जमींदारी परिवार की ओर से राजा की सवारी निकाली जाती है, जो राजमहल से निकलकर कुल देवी मंदिर तक जाती है, जहां राजा मां महालक्ष्मी, मां सरस्वती और मां काली की पूजा-अर्चना कर क्षेत्र की सुख-समृद्धि की कामना करते हैं। इस उत्सव में आस-पास के 44 गांवों के लोग मिलकर राजा की सवारी निकालते हैं। इस परंपरा में आसपास के 44 गांवों के लोग शामिल होते हैं। जुलूस में नाच-गाना और धार्मिक आयोजन होते हैं। कुल देवी की पूजा के बाद राजमहल में सभा लगती है, जहां ग्रामीण राजा को सोनपत्ती अर्पित कर आशीर्वाद लेते हैं।
इस अनोखी परंपरा को लोगों में उत्साह और एकजुटता का प्रतीक माना जाता है। कंली जमींदारी के प्रथम पुत्र गजराज सिंह ने कुल देवी मंदिर का निर्माण कराया था। स्वतंत्रता प्राप्ति से पहले 1944 में राजा पोखराज सिंह द्वितीय के निधन के बाद राजमाता पिनांक कुमारी देवी ने यशवंत कुमार सिंह को दत्तक पुत्र बनाया।और तब से मंदिर और परंपराओं की जिम्मेदारी उन्हीं के संरक्षण में रही। बाद में मां महामाया समिति का गठन हुआ, जो नवरात्रि और दशहरे के आयोजन संभालती रही।
इस वर्ष नहीं निकाली गई राजा की सवारी
इस वर्ष गांव की परंपरा में बदलाव देखने को मिला है। ट्रस्ट के अध्यक्ष अशोक कुमार बड्डगैया और छोटे राजा घनश्याम सिंह ने बताया कि स्वर्गीय गुनेंद कुमार सिंह, जो राजपरिवार के उत्तराधिकारी थे, उनका हाल ही में कार दुर्घटना में निधन हो गया। जिसके बाद अब तक नए उत्तराधिकारी का राजतिलक नहीं हुआ है। इस वजह से इस वर्ष राजा की सवारी नहीं निकाली जा रही है। हालांकि, दशहरे का मेला पूर्ववत ही लगाया गया है और लोग परंपरागत आयोजनों में शामिल हो रहे हैं।


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