जिस रास्ते पर आवाजाही नहीं…वहां 10 लाख से अधिक खर्च…निजी जमीन पर निर्माण के आरोप ने बढ़ाई पंचायत की मुश्किल…
न रास्ता आबाद,न जरूरत साफ…फिर भी लाखों की पुलिया! खुटरापारा में सरकारी धन के इस्तेमाल पर सवाल…
खुटरापारा में विकास’ की उलटी गंगा, निजी जमीन पर लाखों की पुलिया!पंचायत में पहले पुलिया बनी,अब जरूरत तलाश रहे सवाल! खुटरापारा का मनरेगा निर्माण घेरे में…
-रवि सिंह-
बैकुंठपुर/कोरिया,31 अगस्त 2026 (घटती-घटना)। पंचायतों में विकास कार्य इसलिए किए जाते हैं ताकि गांव की जरूरतें पूरी हों,लोगों का आवागमन आसान हो और सरकारी योजनाओं का लाभ सीधे ग्रामीणों तक पहुंचे,लेकिन जब विकास की प्राथमिकता जरूरत के बजाय निर्माण और खर्च बन जाए,तब वही निर्माण सवालों के घेरे में आ जाता है,कोरिया जिले के बैकुंठपुर विकासखंड की ग्राम पंचायत खुटरापारा में मनरेगा से कराए गए आरसीसी पुलिया निर्माण को लेकर सामने आए दस्तावेज और मौके की तस्वीरें इसी तरह के कई सवाल खड़े कर रही हैं। मामला करीब 10.07 लाख रुपये की प्रशासनिक स्वीकृति वाले आरसीसी पुलिया निर्माण से जुड़ा है,सरकारी सूचना पटल पर कार्य का विवरण,स्वीकृत राशि, मजदूरी और सामग्री मद सहित अन्य जानकारियां दर्ज हैं,लेकिन दूसरी तरफ इस निर्माण की जरूरत, उपयोगिता और निर्माण स्थल की भूमि को लेकर शिकायत सामने आ चुकी है,सबसे बड़ा सवाल यही है कि जिस रास्ते पर सामान्य ग्रामीण आवागमन ही नहीं के बराबर बताया जा रहा है,वहां लाखों रुपये खर्च कर पुलिया आखिर किस जरूरत को पूरा करने के लिए बनाई गई?
विकास के नाम पर निर्माण या निर्माण के नाम पर खर्च?…ग्रामीण विकास योजनाओं का मूल उद्देश्य स्पष्ट है-जहां सड़क की जरूरत है वहां सड़क,जहां जल निकासी की जरूरत है वहां नाली और जहां बरसात में आवागमन बाधित होता है वहां पुलिया बनाई जाए,लेकिन यदि किसी ऐसे रास्ते पर पुलिया बना दी जाए जिसका उपयोग ही सीमित हो,तो उसकी उपयोगिता पर सवाल उठना स्वाभाविक है,खुटरापारा की इस पुलिया को लेकर स्थानीय स्तर पर यही सवाल उठाया जा रहा है,बताया जा रहा है कि जिस मार्ग पर निर्माण किया गया,वहां से न तो कोई प्रमुख ग्रामीण मार्ग जुड़ता दिखाई देता है और न ही ऐसा नियमित आवागमन है,जिससे दस लाख रुपये से अधिक के निर्माण को तत्काल आवश्यक माना जा सके,ऐसे में पंचायत को यह स्पष्ट करना चाहिए कि इस पुलिया से कितने ग्रामीण परिवार लाभान्वित होंगे,यह किस आबादी को जोड़ती है और इस मार्ग की प्राथमिकता तय करने का आधार क्या था? क्योंकि सरकारी योजना में किसी कार्य का स्वीकृत हो जाना और उसका वास्तव में जनहित में जरूरी होना—दो अलग-अलग बातें हैं।
राजस्व रिकॉर्ड बनाम पंचायत की फाइल-मामले से जुड़े राजस्व दस्तावेजों में संबंधित खसरों का विवरण दिखाई देता है, दस्तावेजों में खसरा नंबर 42/4, 42/5 सहित अन्य भूमि खंडों का उल्लेख है,यहीं पर प्रशासन के सामने जांच का सबसे आसान रास्ता भी मौजूद है,राजस्व रिकॉर्ड में दर्ज भूमि की सीमा का मौके पर सीमांकन कराया जाए और यह देखा जाए कि पुलिया वास्तव में किस खसरे में बनी है,इसके बाद पंचायत की कार्य स्वीकृति और तकनीकी नक्शे से उसका मिलान किया जाए,यदि तीनों रिकॉर्ड—राजस्व नक्शा,पंचायत की स्वीकृति और मौके की वास्तविक स्थिति—एक-दूसरे से मेल खाते हैं तो विवाद काफी हद तक स्पष्ट हो सकता है, लेकिन यदि निर्माण स्थल और स्वीकृत स्थल अलग पाए जाते हैं,या निजी भूमि पर निर्माण की पुष्टि होती है,तो फिर जिम्मेदारी तय करने का प्रश्न सामने आएगा।
सूचना पटल पर खर्च का हिसाब, लेकिन उपयोगिता का हिसाब कौन देगा?-मौके पर लगे नागरिक सूचना पटल पर कार्य की प्रशासनिक स्वीकृति करीब 10.07 लाख रुपये बताई गई है,इसमें मजदूरी और सामग्री मद की राशि भी दर्ज है। सूचना पटल के अनुसार कार्य प्रारंभ की तारीख 24 दिसंबर 2024 दर्ज है,यानी सरकारी रिकॉर्ड में कार्य का हिसाब मौजूद है,लेकिन सवाल यह है कि सरकारी पैसे के खर्च का हिसाब तो सूचना पटल बता रहा है,इस खर्च की उपयोगिता का हिसाब कौन देगा? यदि पुलिया जरूरी थी तो उसके उपयोग का स्पष्ट आधार होना चाहिए, यदि रास्ता ग्रामीणों की आवश्यकता के कारण चुना गया था तो कितने परिवार इससे लाभान्वित होते हैं, इसका रिकॉर्ड होना चाहिए।
मनरेगा में ‘काम दिखना’ ही पर्याप्त नहीं-मनरेगा के कार्यों में मजदूरी रोजगार के साथ स्थायी परिसंपत्ति निर्माण का उद्देश्य भी जुड़ा है,इसलिए किसी कार्य का सिर्फ जमीन पर दिखाई देना पर्याप्त नहीं है,यह भी जरूरी है कि वह टिकाऊ,उपयोगी और वास्तविक जरूरत पर आधारित हो,यदि किसी पंचायत में बजट उपलब्ध है और उसे खर्च करने के लिए ऐसे निर्माण किए जाते हैं जिनकी उपयोगिता सीमित है,तो इससे वास्तविक जरूरत वाले गांव और परिवार पीछे छूट सकते हैं,यही कारण है कि खुटरापारा की पुलिया की जांच केवल तकनीकी गुणवत्ता तक सीमित नहीं रहनी चाहिए,कार्य की आवश्यकता,स्थल चयन, भूमि स्वामित्व, ग्रामसभा की प्रक्रिया और भुगतान रिकॉर्ड सभी पहलुओं की जांच जरूरी है।
अब संयुक्त जांच ही बताएगी सच– इस पूरे मामले में सबसे उचित कदम संयुक्त स्थल जांच और दस्तावेजी मिलान होगा, राजस्व विभाग को भूमि का सीमांकन करना चाहिए,जनपद पंचायत और मनरेगा के तकनीकी अधिकारियों को कार्य की स्वीकृति और स्थल का परीक्षण करना चाहिए,पंचायत से ग्रामसभा प्रस्ताव और कार्य चयन का रिकॉर्ड लिया जाना चाहिए,इसके साथ ही कार्य की तकनीकी स्वीकृति,प्रशासकीय स्वीकृति,माप पुस्तिका,जियो-टैग तस्वीरें,मजदूरी भुगतान, सामग्री भुगतान और कार्य पूर्णता संबंधी दस्तावेज की जांच की जानी चाहिए,इससे यह साफ हो सकता है कि पुलिया वास्तव में स्वीकृत स्थान पर बनी है या नहीं और निर्माण का वास्तविक जनहित क्या था।
सवाल पुलिया से बड़ा है…
खुटरापारा की पुलिया का विवाद केवल एक निर्माण कार्य का मामला नहीं है। यह पंचायतों में विकास की प्राथमिकता पर बड़ा सवाल खड़ा करता है,क्या पहले जरूरत तय होती है और फिर निर्माण होता है,या पहले निर्माण तय होता है और बाद में जरूरत खोजी जाती है? यदि पुलिया जरूरी थी तो पंचायत को जनता के सामने उसका पूरा औचित्य रखना चाहिए,यदि निजी भूमि का आरोप गलत है तो राजस्व रिकॉर्ड और सीमांकन से स्थिति साफ की जा सकती है,और यदि शिकायत सही पाई जाती है तो यह भी तय होना चाहिए कि सरकारी योजना का स्थल चयन किस स्तर पर गलत हुआ,सबसे महत्वपूर्ण बात यह कि 10 लाख रुपये से अधिक की राशि से बनी या बनाई जा रही परिसंपत्ति का उपयोग वर्षों तक होना चाहिए,केवल सरकारी फाइल में उसका निर्माण पूरा दिखना पर्याप्त नहीं है,खुटरापारा में अब गेंद प्रशासन के पाले में है,जमीन का सीमांकन,पुलिया की उपयोगिता और मनरेगा की पूरी फाइल…इन तीनों की निष्पक्ष जांच हो जाए तो यह साफ हो जाएगा कि यहां विकास हुआ है या फिर‘निर्माण के लिए निर्माण’की कहानी लिखी गई है।
‘पुल किसे जोड़ता है?’ सबसे बड़ा सवाल…
मौके की स्थिति को देखकर एक और सवाल उठता है कि आखिर यह पुलिया किस गांव, किस बस्ती या किस मुख्य मार्ग को जोड़ने के लिए बनाई गई है? किसी पुलिया का निर्माण अपने आप में विकास नहीं है,उसकी उपयोगिता तभी है जब वह किसी वास्तविक आवागमन की समस्या का समाधान करे,यदि पुलिया बनने के बाद भी उसका इस्तेमाल करने वाला कोई प्रमुख मार्ग नहीं है,तो फिर यह सवाल उठेगा कि योजना तैयार करते समय आवश्यकता का आकलन किस आधार पर किया गया था,क्या ग्रामसभा में इस कार्य की आवश्यकता पर चर्चा हुई थी? क्या ग्रामीणों से प्रस्ताव लिया गया था? क्या स्थल का तकनीकी निरीक्षण हुआ था? क्या यह देखा गया कि बरसात में यहां वास्तव में आवागमन बाधित होता है? इन सवालों के जवाब कार्य की स्वीकृति फाइल से मिल सकते हैं।
निजी जमीन पर सरकारी निर्माण का आरोप…
मामले का दूसरा और अधिक गंभीर पहलू भूमि स्वामित्व से जुड़ा है, 25 मई 2026 को जनदर्शन अधिकारी के समक्ष दिए गए आवेदन में लवांगो बाई, पति हीरसाय, ग्राम खुटरापारा की ओर से शिकायत की गई है कि जिस भूमि पर ग्राम पंचायत एजेंसी द्वारा आरसीसी पुलिया निर्माण कराया जा रहा है,उस भूमि पर उनका स्वामित्व एवं आधिपत्य है,शिकायत में खसरा नंबर 42/4 एवं 42/5 सहित भूमि का उल्लेख किया गया है,शिकायतकर्ता का कहना है कि उनकी सहमति के बिना पंचायत द्वारा निर्माण कार्य कराया जा रहा है और इस कारण निर्माण रोककर मामले की जांच की जाए,यदि शिकायत में किया गया दावा सही है तो मामला केवल अनावश्यक निर्माण तक सीमित नहीं रहेगा,तब सवाल यह होगा कि निजी भूमि की स्थिति की जांच किए बिना सरकारी योजना का निर्माण स्थल कैसे निर्धारित हुआ?
शिकायतें पहले भी पहुंचीं,फिर मामला क्यों नहीं सुलझा?
इस मामले में सबसे महत्वपूर्ण बात यह भी है कि भूमि और निर्माण को लेकर शिकायत पहली बार नहीं की गई थी, शिकायतकर्ता द्वारा उपलब्ध कराए गए आवेदन में उल्लेख है कि पूर्व में भी संबंधित अधिकारियों के समक्ष आपत्ति दर्ज कराई गई थी,इसमें 6 जनवरी 2025 को जिला पंचायत के मुख्य कार्यपालन अधिकारी,22 फरवरी 2025 को तहसीलदार बैकुंठपुर तथा 15 अप्रैल 2025 को जनदर्शन में आवेदन दिए जाने का उल्लेख है,शिकायत में यह भी कहा गया है कि आपत्ति के बाद निर्माण कार्य लंबे समय तक बंद रहा,लेकिन बाद में फिर से निर्माण कार्य शुरू करने का प्रयास किया गया,यही बिंदु प्रशासनिक जांच को और जरूरी बनाता है,यदि शिकायत के बाद कार्य रोका गया था तो उस समय क्या जांच हुई? क्या भूमि विवाद का निराकरण किया गया? क्या शिकायतकर्ता की आपत्ति खारिज की गई? क्या कोई सीमांकन रिपोर्ट बनी? क्या निर्माण स्थल बदलने या काम जारी रखने का कोई आदेश दिया गया? इन सवालों का जवाब संबंधित विभागीय रिकॉर्ड से ही मिलेगा।
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