
- कोरिया में प्रभारी सीईओ चला रहे व्यवस्था
- जनपद सीईओ प्रभार विवाद…हाईकोर्ट के आदेश के बाद भी क्यों जारी ‘प्रभारी राज’?
- नियुक्त सीईओ बाहर,प्रभारी अंदर—कोरिया में प्रशासनिक व्यवस्था पर सवाल
- आदेश शासन का…नियंत्रण कहीं और—जनपद सीईओ प्रभार पर उठे गंभीर सवाल
- प्रभार के पीछे क्या है खेल? जनपद सीईओ हटाने पर लेनदेन की चर्चा तेज
- जनपद सीईओ विवाद में अधिकार छिने…प्रभारी बने साहब—व्यवस्था कटघरे में…
- कोरिया में उल्टी व्यवस्था की कहानी नियुक्त सीईओ बैठे खाली…प्रभारी चला रहे काम…
- नियमों से ऊपर ‘प्रभारी व्यवस्था’? हाईकोर्ट निर्देश के बाद भी नहीं बदली तस्वीर
-रवि सिंह-
कोरिया,19 अप्रैल 2026 (घटती-घटना)। जनपद पंचायतों में सीईओ के प्रभार को लेकर कोरिया जिले में एक ऐसा प्रशासनिक विवाद सामने आया है,जिसने व्यवस्था की पारदर्शिता,अधिकारों की वैधता और निर्णय प्रक्रिया की निष्पक्षता पर कई गंभीर प्रश्न खड़े कर दिए हैं, शासन द्वारा विधिवत नियुक्त जनपद सीईओ को उनके पद से अलग कर अन्य अधिकारियों को ‘प्रभारी सीईओ’ के रूप में काम सौंपा जाना अब केवल एक प्रशासनिक व्यवस्था का मामला नहीं रह गया है,बल्कि यह संभावित अनियमितताओं और लेनदेन की आशंकाओं से भी जुड़ता जा रहा है,सबसे अहम बात यह है कि उच्च न्यायालय की स्पष्ट टिप्पणी के बावजूद भी कई स्थानों पर स्थिति में कोई बदलाव नहीं दिखाई दे रहा है,जिससे पूरे मामले की गंभीरता और बढ़ गई है।
हाईकोर्ट की टिप्पणी के बावजूद स्थिति जस की तस
जनपद सीईओ प्रभार विवाद का सबसे महत्वपूर्ण पहलू उच्च न्यायालय की वह टिप्पणी है, जिसमें यह स्पष्ट कहा गया है कि शासन द्वारा नियुक्त जनपद सीईओ को कलेक्टर किसी भी परिस्थिति में उनके प्रभार से नहीं हटा सकते। यह अधिकार केवल शासन के पास सुरक्षित है,गौरेला-पेंड्रा-मरवाही जिले में इसी तरह के एक मामले में हटाई गई सीईओ द्वारा न्यायालय का दरवाजा खटखटाने पर यह स्पष्ट निर्देश सामने आया था,इस निर्णय को प्रशासनिक व्यवस्था में एक मार्गदर्शक के रूप में देखा गया, इसके बावजूद कोरिया जिले में इस आदेश का पालन होते नहीं दिख रहा है। यहां दो विकासखंडों में अब भी प्रभारी सीईओ ही कार्यभार संभाले हुए हैं, जबकि शासन से नियुक्त वास्तविक सीईओ कार्यालयों में निष्कि्रय बैठे हैं,यह स्थिति न केवल न्यायालय के आदेश की अवहेलना का संकेत देती है, बल्कि प्रशासनिक इच्छाशक्ति पर भी सवाल खड़ा करती है।
नियुक्त सीईओ का मनोबल प्रभावित-शासन द्वारा हाल ही में पदोन्नति के माध्यम से कई अधिकारियों को जनपद सीईओ के पद पर नियुक्त किया गया था,इन अधिकारियों को नई जिम्मेदारी के साथ कार्य करने का अवसर मिला था,लेकिन वर्तमान स्थिति में उन्हें अपने अधिकारों से वंचित होना पड़ रहा है,कोरिया जिले में ऐसे कई युवा अधिकारी हैं, जो इस स्थिति से मानसिक रूप से प्रभावित हो रहे हैं,उन्हें कार्य का अवसर नहीं मिल रहा,उनके निर्णय लेने के अधिकार सीमित कर दिए गए हैं और वे केवल औपचारिक भूमिका में सिमट गए हैं,इसका सीधा असर उनके आत्मविश्वास और कार्यक्षमता पर पड़ता है,जो लंबे समय में प्रशासनिक गुणवत्ता को भी प्रभावित कर सकता है।
पुराने प्रभारी अधिकारियों की भूमिका
इस पूरे विवाद के पीछे एक महत्वपूर्ण कारण लंबे समय से प्रभारी के रूप में कार्य कर रहे अधिकारियों की भूमिका भी मानी जा रही है,जब शासन ने पदोन्नति के माध्यम से नए सीईओ की नियुक्ति की,तब पहले से प्रभारी के रूप में काम कर रहे अधिकारियों को अपने पद से हटना पड़ा, इससे उनमें असंतोष की स्थिति उत्पन्न हुई, सूत्रों के अनुसार, इन अधिकारियों ने अपने स्थानीय प्रभाव और अनुभव का उपयोग करते हुए नए सीईओ के लिए कार्य करना कठिन बना दिया,स्थानीय नेटवर्क का इस्तेमाल,प्रशासनिक प्रक्रियाओं में बाधाएं और कार्य निष्पादन में सहयोग की कमी इन सब कारणों से नए सीईओ को अपने दायित्व निभाने में कठिनाई हुई,जिसका परिणाम यह हुआ कि कुछ स्थानों पर पुनः प्रभारी व्यवस्था प्रभावी हो गई।
प्रभार देने की प्रक्रिया पर सवाल
प्रभारी सीईओ नियुक्त किए जाने की प्रक्रिया भी सवालों के घेरे में है, क्या यह निर्णय नियमों के अनुरूप लिया गया? क्या इसके लिए शासन की अनुमति ली गई? या यह स्थानीय स्तर पर लिया गया निर्णय है? इन सवालों के स्पष्ट जवाब सामने नहीं आ रहे हैं, जिससे संदेह की स्थिति और गहरी हो रही है।
दो विकासखंडों में समान स्थिति
कोरिया जिले के दोनों विकासखंडों में एक जैसी स्थिति सामने आई है, दोनों ही स्थानों पर शासन द्वारा नियुक्त जनपद सीईओ को उनके कार्य से अलग कर दिया गया है और उनकी जगह अन्य अधिकारियों को प्रभारी के रूप में जिम्मेदारी दे दी गई है, इस व्यवस्था के चलते वास्तविक सीईओ कार्यालय में मौजूद तो हैं, लेकिन उन्हें कोई प्रभावी कार्य नहीं दिया जा रहा, वे केवल औपचारिक उपस्थिति तक सीमित होकर रह गए हैं, यह स्थिति प्रशासनिक दृष्टि से असामान्य है, क्योंकि किसी पद पर नियुक्त अधिकारी को अधिकार से वंचित करना न केवल नियमों के विरुद्ध है, बल्कि यह कार्य प्रणाली को भी प्रभावित करता है।
लेनदेन की चर्चाएं और बढ़ता संदेह
इस पूरे घटनाक्रम के बीच सबसे संवेदनशील मुद्दा संभावित लेनदेन का है,हालांकि इस संबंध में कोई आधिकारिक पुष्टि नहीं है, लेकिन लगातार उठ रही चर्चाएं इस दिशा में इशारा करती हैं कि प्रभारी बनाए जाने के पीछे आर्थिक या अन्य प्रकार के प्रभाव की भूमिका हो सकती है,जब नियुक्त अधिकारी निष्कि्रय हों और प्रभारी अधिकारी सक्रिय रूप से कार्य कर रहे हों,तो यह स्थिति स्वाभाविक रूप से संदेह पैदा करती है,यह जरूरी है कि इन चर्चाओं की सत्यता की निष्पक्ष जांच हो,ताकि स्थिति स्पष्ट हो सके।
प्रशासनिक व्यवस्था पर व्यापक असर
इस तरह की स्थिति का असर केवल अधिकारियों तक सीमित नहीं रहता, बल्कि यह पूरे प्रशासनिक ढांचे को प्रभावित करता है, योजनाओं के क्रियान्वयन में देरी निर्णय प्रक्रिया में भ्रम और जवाबदेही की कमी जब अधिकार और जिम्मेदारी अलग-अलग लोगों के पास होती है, तो कार्य में समन्वय की कमी आना स्वाभाविक है, इसका सीधा असर आम जनता तक पहुंचने वाली सेवाओं पर पड़ता है।
न्यायालय के आदेश का पालन जरूरी
उच्च न्यायालय के आदेश केवल एक मामले तक सीमित नहीं होते, बल्कि वे प्रशासनिक व्यवस्था के लिए मार्गदर्शक होते हैं, ऐसे में यह आवश्यक है कि न्यायालय के निर्देशों का पालन सुनिश्चित किया जाए,नियुक्त अधिकारियों को उनका अधिकार वापस दिया जाए और यदि किसी स्तर पर अनियमितता है, तो उसकी जांच कर कार्रवाई की जाए।
स्पष्टता और पारदर्शिता की जरूरत
जनपद सीईओ प्रभार विवाद अब एक गंभीर प्रशासनिक मुद्दा बन चुका है,जिसमें पारदर्शिता और जवाबदेही की कमी स्पष्ट रूप से दिखाई दे रही है,जरूरत इस बात की है कि स्थिति को स्पष्ट किया जाए,सभी संबंधित पक्षों की भूमिका की जांच हो और नियमों के अनुसार निर्णय लिए जाएं जब तक यह स्पष्ट नहीं होता कि प्रभार किस आधार पर दिया गया है,तब तक यह सवाल बना रहेगा ‘क्या यह केवल प्रशासनिक निर्णय है,या इसके पीछे कोई और कारण छिपा हुआ है? ‘
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