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रायपुर@नकली दवा कांड में बड़ा खुलासा…जिन पर शक, उन्हीं के हाथ में जांच!

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चार महीने बाद गिरफ्तारी,लेकिन सवाल बरकरार-क्या जांच निष्पक्ष होगी ?

  • नकली दवाओं से ज्यादा ‘जांच सिस्टम’ पर संकट,विभागीय गुटबाजी आई सामने….
  • कार्रवाई करने वाला निलंबित,संदिग्धों को जांच की कमान—सिस्टम पर उठे गंभीर सवाल
  • नकली दवा नेटवर्कः इंदौर से छत्तीसगढ़ तक फैला खेल,अब जांच पर ही संदेह
  • ‘राजा-वजीर’ मॉडल में फंसी जांच! विभागीय खेमेबाजी ने बढ़ाया विवाद
  • स्टोर खाली, ताले बंद और जांच शुरू—क्या पहले ही लीक हो गई थी जानकारी?
  • देर से हुई गिरफ्तारी पर उठे सवाल—क्या दबाव में आया प्रशासन?
  • जिस पर लापरवाही की कार्रवाई,वही बना जांच अधिकारी—प्रक्रिया या संरक्षण?
  • नकली दवा कांड : खुलासे से गिरफ्तारी तक,अब निष्पक्षता की परीक्षा में सिस्टम

-संवाददाता-
रायपुर,15 अप्रैल 2026 (घटती-घटना)। छत्तीसगढ़ के चर्चित नकली दवा कांड ने अब एक ऐसा मोड़ ले लिया है,जहां मामला केवल नकली दवाओं की सप्लाई,गिरफ्तारी और नेटवर्क तक सीमित नहीं रह गया है,बल्कि पूरी जांच प्रक्रिया की विश्वसनीयता ही कटघरे में खड़ी नजर आ रही है,चार महीने की लंबी देरी के बाद हुई गिरफ्तारी ने भले ही कार्रवाई का एक औपचारिक चरण पूरा किया हो,लेकिन इसके साथ ही जो नई परत सामने आई है,वह कहीं अधिक गंभीर है—इस पूरे मामले की जांच और विवेचना की जिम्मेदारी ऐसे अधिकारी को सौंप दी गई है, जिनकी भूमिका खुद संदेह के घेरे में बताई जा रही है।
सूत्रों के अनुसार, खाद्य एवं औषधि प्रशासन के भीतर कथित गुटबाजी और आंतरिक शक्ति संतुलन इस पूरे घटनाक्रम को प्रभावित कर रहा है, विभाग के भीतर ‘राजा और वजीर’जैसे समीकरणों की चर्चा ने इस मामले को और अधिक पेचीदा बना दिया है, जहां आरोप है कि कुछ अधिकारी एक संगठित तरीके से जांच की दिशा को नियंत्रित कर रहे हैं, इस संदर्भ में बेनीराम साहू का नाम केंद्र में बताया जा रहा है,जबकि नीरज साहू और ईश्वरी नारायण सिंह को उनके करीबी सहयोगी के रूप में देखा जा रहा है,सबसे बड़ा विरोधाभास यह है कि जिस अधिकारी ईश्वरी नारायण सिंह पर 11 फरवरी 2026 को लापरवाही के आरोप में विभागीय कार्रवाई की गई,वेतन वृद्धि रोकी गई,उसी अधिकारी को अब इस पूरे नकली दवा कांड का विवेचना अधिकारी बना दिया गया है,यह निर्णय अपने आप में कई सवाल खड़े करता है,क्या यह महज प्रशासनिक प्रक्रिया है या फिर इसके पीछे कोई और समीकरण काम कर रहा है? सूत्रों के मुताबिक,नकली दवा जैसा बड़ा नेटवर्क बिना संरक्षण के संभव नहीं होता,और इसी संदर्भ में जांच की दिशा को लेकर संदेह और गहराता जा रहा है,यह भी आरोप सामने आ रहे हैं कि जब ईश्वरी नारायण सिंह को प्रेम प्रकाश एजेंसी में जांच के लिए भेजा गया,तब उनके पहुंचने से पहले ही स्टोर खाली हो चुका था, दुकान पर ताले लग चुके थे और दवाओं का स्टॉक गायब हो चुका था,ऐसे में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या जांच की जानकारी पहले से लीक हुई थी? इस पूरे घटनाक्रम में एक और विवादास्पद पहलू सामने आया निरीक्षण के दौरान नीरज साहू को,जो उस समय छुट्टी पर थे,जांच में शामिल किया जाना, यह निर्णय प्रक्रियात्मक रूप से कितना उचित था,यह भी अब जांच का विषय बनता जा रहा है,इसी बीच,यह तथ्य भी चर्चा में है कि जिस अधिकारी ने 10 दिसंबर 2025 को पहली कार्रवाई कर इस पूरे नेटवर्क का खुलासा किया, उसे बाद में आरोपी से मुलाकात के आधार पर निलंबित कर दिया गया,इस पर भी सवाल उठ रहे हैं कि क्या यह सामान्य प्रक्रिया थी या कार्रवाई करने वाले अधिकारी को किनारे करने की कोशिश? अब जब गिरफ्तारी हो चुकी है, तो असली सवाल गिरफ्तारी से आगे जाकर यह है—क्या जांच निष्पक्ष होगी,या फिर यह पूरा मामला धीरे-धीरे उसी सिस्टम के भीतर समा जाएगा, जिस पर आज सवाल खड़े हो रहे हैं?
जिम्मेदारियों का पहाड़ या शक्ति का केंद्रीकरण?
बेनी राम साहू, सहायक औषधि नियंत्रक, एक ऐसे अधिकारी के रूप में चर्चित हैं जिनके पास जिम्मेदारियों की सूची इतनी लंबी है कि पढ़ते-पढ़ते ही थकान हो जाए,स्थापना, स्टोर, स्टेट लाइसेंस अथॉरिटी (होम्योपैथी मैन्युफैक्चरिंग), ब्लड बैंक कंट्रोलिंग अथॉरिटी, एनडीपीएस ड्रग्स,अस्पताल निरीक्षण,बलौदाबाजार लाइसेंस अथॉरिटी—और अंततः रायपुर लाइसेंस अथॉरिटी का बहुप्रतीक्षित प्रभार, प्रश्न यह है की क्या विभाग में अधिकारियों की ऐसी भारी कमी है कि एक ही अधिकारी ‘सुपर कंट्रोलर’ बन जाए? या फिर यह कुर्सियों के केंद्रीकरण की वह रणनीति है जिसमें सारी चाबियां एक ही जेब में रखी जाती हैं?
राजनीतिक पृष्ठभूमिः क्या प्रभाव पड़ा?
बेनी राम साहू की राजनीतिक पृष्ठभूमि—भाजपा के पूर्व विधायक परिवार से संबंध—भी चर्चा का विषय बनी हुई है,हालांकि इस पर कोई आधिकारिक पुष्टि नहीं है,लेकिन विभागीय गलियारों में यह सवाल उठ रहा है कि क्या निर्णयों पर राजनीतिक प्रभाव था? पर विभाग के गलियारों में यह चर्चा जोर पकड़ चुकी है कि ‘कुर्सी की जंग’ में नियमों को मोहरा बनाया गया।
जांच अधिकारी पर ही सवाल
सबसे बड़ा विरोधाभास यह सामने आता है कि ईश्वरी नारायण सिंह जिन पर पहले लापरवाही के आरोप में कार्रवाई हो चुकी थी और वेतन वृद्धि रोकी गई थी,उन्हें ही इस मामले का विवेचना अधिकारी बनाया गया, यह निर्णय जांच की निष्पक्षता पर गंभीर प्रश्न खड़ा करता है।
जब स्वास्थ्य विभाग बना ‘शतरंज का बोर्ड’
खाद्य एवं औषधि प्रशासन में सामने आया यह मामला अब सिर्फ नकली दवाइयों तक सीमित नहीं रह गया है, यह एक ऐसे जटिल तंत्र की परतें खोलता है,जहां कार्रवाई,पदस्थापन, गुटबाजी और प्रशासनिक निर्णय एक-दूसरे से टकराते हुए दिखाई देते हैं, विभाग के भीतर हालात ऐसे बताए जा रहे हैं कि यहां दवाइयों से ज्यादा ‘अधिकारियों की चालें’ चर्चा में हैं, सवाल यह उठता है कि क्या यह मामला वास्तव में जनस्वास्थ्य की रक्षा का है या फिर सत्ता संतुलन और प्रभाव विस्तार का?
ये है पूरा घटना क्रम 10 दिसंबर 2025: कार्रवाई जिसने पूरे तंत्र को झकझोर दिया
इस पूरे घटनाक्रम की शुरुआत उस दिन हुई जब सहायक औषधि नियंत्रक संजय कुमार नेताम ने रायपुर में गोल्डन ट्रांसपोर्ट के गोदाम से नकली दवाइयों की बड़ी खेप बरामद की, जांच में सामने आया कि यह खेप इंदौर स्थित ‘मां बिजासन ट्रेडिंग’ से भेजी गई थी और इसका गंतव्य भाटापारा की प्रेम प्रकाश एजेंसी तथा सारंगढ़ की सरस्वती मेडिकोज थी, डिब्बों पर स्पष्ट रूप से ‘सरस्वती मेडिकोज’ अंकित था, जिससे यह मामला केवल आपूर्ति की अनियमितता नहीं बल्कि संगठित नेटवर्क की ओर संकेत करता था,यह कार्रवाई सीधे तौर पर जनस्वास्थ्य से जुड़ा मामला थी, क्योंकि नकली दवाइयां मरीजों की जान के साथ खिलवाड़ के समान होती हैं।
15 दिसंबर से 15 जनवरी तक, निरीक्षण से बाहर…फिर छुट्टी में ‘अंदर’… दोस्ती की ऐसी डोज कि नियम भी हो गए बेअसर
15 दिसंबर 2025 को प्रेम प्रकाश एजेंसी, भाटापारा के निरीक्षण में ईश्वरी नारायण सिंह, नीरज साहू और राजेश सोनी शामिल थे, सैंपल लिए गए, लेकिन कार्रवाई असरदार नहीं रही, इसके बाद नीरज साहू की भूमिका पर संदेह गहराया, 15 जनवरी 2026 को दोबारा निरीक्षण के लिए नई टीम बनी, इस बार नीरज साहू को निरीक्षण दल से हटा दिया गया, कागजों में वे बाहर थे और 15-16 जनवरी को वे पारिवारिक कार्यक्रम के लिए अवकाश पर भी थे, लेकिन तस्वीरों में वे फिर निरीक्षण स्थल पर दिखे ईश्वरी नारायण सिंह के साथ, बताया गया कि‘सहयोग’के नाम पर उन्हें जोड़ा गया, अब सवाल सीधा था की जिस अधिकारी पर संदेह था, जिसे टीम से हटाया गया,जो छुट्टी पर था तो फिर वह जांच स्थल पर कैसे पहुंच गया? और संयोग देखिए की जिस दिन टीम पहुंची,दुकान पहले से खाली मिली,क्या यह सिर्फ दोस्ती थी? या फिर नियमों को दरकिनार कर कोई‘सेटिंग’ की पटकथा लिखी जा रही थी? नकली दवा जैसे गंभीर मामले में यदि निरीक्षण दल की संरचना ही सवालों में हो, तो कार्रवाई की विश्वस नीयता खुद-ब-खुद कठघरे में खड़ी हो जाती है,निरीक्षण दल में छुट्टी के दिन एक अधिकारी को बुलाया गया,आलोचना या फिरी प्रक्रियात्मक त्रुटि थी,पर यहां भी कार्रवाई आधी-अधूरी रही,वेतन रोका गया, पर कठोर दंड नहीं,कहा जा रहा है कि‘ईश्वरी शक्ति’ कुछ लोगों को बचा रही थी और इस शक्ति का नाम फुसफुसाहटों में बेनी राम साहू बताया जा रहा है।
16 दिसंबर 2025 पहली टीम,पहला संदेह
प्रेम प्रकाश एजेंसी और सारंगढ़ की जांच के लिए टीम गठित की गई, जिसमें शामिल थे ईश्वरी नारायण सिंह,औषधि निरीक्षक, नीरज साहू, औषधि निरीक्षक,राजेश सोनी,नमूना सहायक साथ में रायगढ़ के औषधि निरीक्षक अमित राठौर और विजय राठौर,सारंगढ़ में टीम गठित हुई,जांच में लगभग 2.25 लाख रुपये की दवाइयां जब्त हुईं, पर वे वही दवाइयां नहीं थीं जो ट्रांसपोर्ट में मिली थीं, विभाग असंतुष्ट रहा, यहीं से कहानी में ‘गड़बड़ी की गंध’ आने लगी।
20 दिसंबर 2025 दूसरी रेड, 27 लाख की जब्ती
ऊपर से आदेश आया, नई टीम भेजी गई, इस बार 27 लाख रुपये की दवाइयां जब्त हुईं, मामला गंभीर हो चुका था, 23 दिसंबर को स्पष्टीकरण मांगा गया, पर यहीं पर प्रशासनिक ‘न्याय’ की परिभाषा बदलती दिखी—कुछ अधिकारियों का वेतन रोका गया, कुछ को निलंबित कर दिया गया, सवाल यह कि एक ही प्रकरण में दंड अलग-अलग क्यों? क्या गलती का वजन अलग-अलग तराजू में तोला गया?
नकली दवा से ज्यादा ‘कंट्रोल’ की चिंता?
पूरे घटनाक्रम में एक बात साफ दिखती है की नकली दवा बेचने वालों पर कार्रवाई से ज्यादा ऊर्जा विभागीय खींचतान में खर्च होती दिखी,दुकान खाली कैसे हुई? सूचना किसने दी? चेन में और कौन शामिल है? इन सवालों से ज्यादा जोर वीडियो और निलंबन पर रहा।
असली दोषी कौन?
यह पूरा मामला अब केवल नकली दवा का नहीं रहा, यह एक ऐसा आईना बन चुका है जिसमें विभागीय व्यवस्था, प्रशासनिक निर्णय और संभावित गुटबाजी सब एक साथ दिखाई देते हैं,जब कार्रवाई करने वाला अधिकारी ही संदेह के घेरे में आ जाए,जब जांच से पहले सबूत गायब हो जाएं और जब कुर्सी के समीकरण घटनाओं के साथ बदलें तो सवाल उठना स्वाभाविक है असली दोषी कौन है? दवा माफिया, विभागीय तंत्र,या फिर वह अदृश्य शक्ति जो फैसलों की दिशा तय करती है? जब तक इन सवालों के स्पष्ट और पारदर्शी उत्तर सामने नहीं आते,यह मामला सिर्फ एक जांच नहीं बल्कि प्रणाली की विश्वसनीयता पर एक गंभीर आरोपपत्र बना रहेगा।
अनुत्तरित सवाल : जांच की असली परीक्षा
– निरीक्षण से पहले स्टोर खाली कैसे हुआ?
– अवकाश पर अधिकारी जांच में कैसे शामिल हुआ?
– अलग-अलग दंड का आधार क्या था?
– क्या संजय कुमार नेताम को उचित सुनवाई मिली?
– प्रभार परिवर्तन का समय इतना सटीक क्यों था?
– सूचना लीक की जांच क्यों नहीं हुई?
भाटापारा : निरीक्षण से पहले खाली दुकान
15 जनवरी 2026 को प्रेम प्रकाश एजेंसी की जांच होनी थी, टीम पहुंची—दुकान खाली मिली ना दवा, ना स्टॉक, क्या यह महज संयोग था? या फिर सूचना पहले ही लीक हो चुकी थी? यदि निरीक्षण से पहले दुकान खाली हो जाती है तो यह विभागीय विफलता नहीं,बल्कि आंतरिक सांठगांठ की ओर इशारा करता है, सवाल यह है कि सूचना किसने पहुंचाई? और क्यों?
28 जनवरी 2026 वीडियो और सीधा निलंबन
अब आते हैं कहानी के चरम पर, 28 जनवरी को वही अधिकारी संजय कुमार नेताम जो ट्रांसपोर्ट से नकली दवा पकड़ चुके थे,सारंगढ़ में 27 लाख की जब्ती कर चुके थे, एक सार्वजनिक स्थान पर संबंधित व्यक्ति से बातचीत करते दिखे, वीडियो वायरल हुआ,बिना लंबा स्पष्टीकरण के सीधा निलंबन की कार्यवाही और प्रश्नों की झड़ी लग गई क्या कारण बताओ नोटिस दिया गया? क्या प्राकृतिक न्याय का सिद्धांत लागू हुआ? क्या वीडियो में स्पष्ट अपराध दिखा? यदि बातचीत सार्वजनिक स्थल पर थी, मीडिया मौजूद थी, तो इसे गुप्त साठगांठ कैसे मान लिया गया?
चक्रव्यूह से बाहर कौन निकलेगा? पूरे घटनाक्रम ने कई अनुत्तरित प्रश्न छोड़ दिए हैं…
– निरीक्षण से पहले प्रेम प्रकाश एजेंसी खाली कैसे हुई?
– नीरज साहू अवकाश में रहते हुए निरीक्षण में कैसे शामिल हुए?
– अलग-अलग अधिकारियों पर अलग-अलग दंड का आधार क्या था?
– क्या संजय कुमार नेताम को प्राकृतिक न्याय के तहत पूरा अवसर दिया गया?
– प्रभार परिवर्तन का समय क्या महज प्रशासनिक संयोग था?
– सूचना लीक की जांच क्यों नहीं?
– अलग-अलग दंड का आधार क्या?
– निलंबन से पहले विस्तृत सुनवाई क्यों नहीं?
– प्रभार परिवर्तन का समय इतना सटीक कैसे?
कुर्सी का समीकरण
और ठीक इसी दौरान—रायपुर लाइसेंस अथॉरिटी का प्रभार बदल जाता है, बेनी राम साहू को वह कुर्सी मिल जाती है जिसके लिए वे लंबे समय से प्रयासरत बताए जाते थे,तो क्या यह सब घटनाएं महज संयोग थीं? या फिर यह वही चक्रव्यूह था जिसमें अभिमन्यु की तरह नेताम फंस गए?
प्रमुख पात्र और उनकी स्थिति
संजय कुमार नेताम – निलंबित
बेनी राम साहू – रायपुर लाइसेंस अथॉरिटी
दीपक कुमार अग्रवाल – नियंत्रक
ईश्वरी नारायण सिंह – वेतन रोका
नीरज साहू – वेतन रोका
अमित राठौर, विजय राठौर – निलंबित
अन्य: राजेश सोनी, सुरेश कुमार साहू, टेकचंद धीरहे


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