सबरीमाला केस में सुप्रीम कोर्ट का केंद्र से सवाल… ऐसी याचिकाओं पर सुनवाई क्यों हो
नई दिल्ली,08 अप्रैल 2026। सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को केंद्र सरकार से पूछा कि जो लोग भगवान अयप्पा के भक्त नहीं हैं, वे केरल के सबरीमाला मंदिर की परंपराओं को कैसे चुनौती दे सकते हैं। सुप्रीम कोर्ट ने धार्मिक स्वतंत्रता के दायरे पर 7 सवाल तय किए हैं। इनमें से एक सवाल यह है कि क्या कोई व्यक्ति, जो किसी धार्मिक संप्रदाय या समूह से संबंधित नहीं है, उस ‘धार्मिक संप्रदाय या समूह’की किसी प्रथा को जनहित याचिका के माध्यम से चुनौती दे सकता है। जस्टिस बीवी नागरत्ना ने सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता से पूछा कि सबरीमाला मामले में याचिकाकर्ता कौन थे।‘मूल याचिकाकर्ता भक्त नहीं थे। किसी भी भक्त ने इस प्रथा को चुनौती देने के लिए अदालत का रुख नहीं किया। तो फिर ये रिट याचिकाकर्ता कौन हैं जो इसे चुनौती दे रहे हैं।’मेहता ने जवाब दिया कि मूल याचिकाकर्ता ‘इंडियन यंग लॉयर्स एसोसिएशन’नामक वकीलों का एक संगठन है। न्यायमूर्ति नागरत्ना ने कहा, ‘वे भक्त नहीं हैं। लेकिन हमें यह स्पष्ट करना होगा। क्या भगवान अयप्पा का कोई भी भक्त इस परंपरा को चुनौती देते हुए रिट याचिका दायर कर सकता है और यदि कोई गैर-भक्त,जिसका उस मंदिर से कोई संबंध नहीं है, इसे चुनौती देता है, तो क्या यह अदालत ऐसी याचिका पर सुनवाई कर सकती है।
दूसरे दिन की सुनवाई के पॉइंट्स
ठ्ठ सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा… कोई सेक्युलर अदालत किसी धार्मिक प्रथा को सिर्फ अंधविश्वास नहीं कह सकती,क्योंकि उसके पास ऐसा तय करने की विशेषज्ञता नहीं होती। उन्होंने कहा कि जो चीज नगालैंड के किसी समुदाय के लिए धार्मिक हो सकती है,वही मेरे लिए अंधविश्वास लग सकती है। हमारा समाज बहुत विविधतापूर्ण है,यहां अलग-अलग लोग, धर्म और मान्यताएं हैं। ऐसे में अदालत के लिए ऐसा फैसला देना खतरनाक हो सकता है।
– जस्टिस अमानुल्लाह ने इस पर कहा…मिस्टर मेहता,आपने बात को बहुत आसान बना दिया है। अदालत के पास न्यायिक समीक्षा का अधिकार है कि वह यह तय कर सके कि अंधविश्वास क्या है। उसके बाद उस पर कानून बनाना या कार्रवाई करना विधानमंडल (संसद-विधानसभा) का काम हो सकता है,लेकिन यह नहीं कहा जा सकता कि अंतिम फैसला सिर्फ विधायिका ही करेगा। धर्म के मामलों में तर्क उसी तरह लागू नहीं किया जा सकता।
– सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि यह मामला महिलाओं के अधिकार और धार्मिक स्वतंत्रता के बीच संतुलन से जुड़ा है। कोर्ट ने अपने तर्क को समझाने के लिए सती प्रथा,जादू-टोना और नरभझी जैसे उदाहरण भी दिए और कहा कि अगर कोई प्रथा समाज को झकझोरती है, तो अदालत हस्तक्षेप कर सकती है।
– जस्टिस बीवी नागरत्ना ने कहा कि अदालत को यह भी देखना होगा कि कोई प्रथा उस धर्म के लिए जरूरी है या नहीं। यह जांच उस धर्म की सोच और परंपरा के आधार पर ही होनी चाहिए। उन्होंने कहा कि किसी दूसरे धर्म के नजरिए से यह तय नहीं किया जा सकता कि कोई प्रथा जरूरी है या नहीं,लेकिन यह सब सार्वजनिक व्यवस्था और नैतिकता के दायरे में ही होना चाहिए।
सुप्रीम कोर्ट में 50 से
ज्यादा रिव्यू पिटीशन
धार्मिक स्थलों पर महिलाओं के साथ भेदभाव का मामला बीते 26 सालों से देश की अदालतों में हैं। 2018 में, 5 जजों की बेंच ने 4ः1 के बहुमत से मंदिर में महिलाओं के प्रवेश पर लगी रोक हटा दी थी। इसके बाद कई पुनर्विचार याचिकाएं दायर की गईं। सुप्रीम कोर्ट के 9 जजों की संविधान बेंच 7 अप्रैल से 22 अप्रैल तक 50 से ज्यादा याचिकाओं पर सुनवाई करेगी। कोर्ट में रिव्यू पिटीशनरों और उन्हें सपोर्ट करने वाले 7 अप्रैल से 9 अप्रैल तक, जबकि विरोध करने वाले 14 अप्रैल से 16 अप्रैल तक दलीलें दे सकेंगे।
न्यायिक विशेषज्ञता और धार्मिक विविधता पर सवाल
सॉलिसिटर जनरल मेहता ने यह भी तर्क दिया कि एक धर्मनिरपेक्ष अदालत यह तय नहीं कर सकती कि कोई धार्मिक प्रथा केवल अंधविश्वास है, क्योंकि अदालत के पास ऐसी विद्वत्तापूर्ण क्षमता नहीं हो सकती। उन्होंने कहा ‘आप (न्यायाधीश) कानून के क्षेत्र के विशेषज्ञ हैं, धर्म ३ नहीं।’ मेहता ने यह भी कहा कि नागालैंड के लिए जो धार्मिक हो सकता है, वह किसी और के लिए अंधविश्वास हो सकता है,क्योंकि समाज अत्यंत विविध है।
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