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रायपुर@छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट का फैसला…कहा-ऐसे क्राइम में नाबालिगों को ऑटोमेटिक जमानत नहीं

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रायपुर,20 फरवरी 2026। छत्तीसगढ़ में नाबालिगों से जुड़े गंभीर अपराधों पर अदालत की सख्त टिप्पणी सामने आई है। हाई कोर्ट ने साफ किया है कि जुवेनाइल जस्टिस एक्ट सुधारवादी जरूर है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि हत्या जैसे जघन्य मामलों में जमानत को अधिकार मान लिया जाए। कोर्ट ने कहा कि हर मामले में अपराध की प्रकृति,परिस्थितियां और समाज पर उसके प्रभाव का आकलन अनिवार्य है। यह टिप्पणी धमतरी जिले के एक हत्या प्रकरण में आई, जहां एक नाबालिग आरोपी की बेल अपील खारिज कर दी गई। अदालत ने माना कि ऐसे मामलों में जल्दबाजी में राहत देने से न्याय का उद्देश्य प्रभावित हो सकता है और सामाजिक संतुलन बिगड़ सकता है। 13 फरवरी 2026 को दिए गए फैसले में कोर्ट ने जुवेनाइल जस्टिस बोर्ड और सेशंस कोर्ट के आदेशों को सही ठहराया। आरोपी पर 6 जून 2025 को विवाद के बाद चाकू से हमला करने का आरोप है,जिससे उसकी मौत हुई। बचाव पक्ष ने इसे आत्मरक्षा बताया और आरोपी के खिलाफ पूर्व आपराधिक रिकॉर्ड न होने की दलील दी। यह भी कहा गया कि लंबी हिरासत से वह आपराधिक प्रभाव में आ सकता है। लेकिन अदालत ने उपलब्ध साक्ष्यों और आरोप की गंभीरता को प्राथमिकता दी और स्पष्ट किया कि सुधार की अवधारणा का दुरुपयोग नहीं होना चाहिए।
धारा 12 की व्याख्या पर अदालत की स्पष्टता : फैसले में जुवेनाइल जस्टिस एक्ट 2015 की धारा 12 का विस्तार से विश्लेषण किया गया। अदालत ने कहा कि यह प्रावधान जमानत को पूर्ण अधिकार नहीं बनाता। यदि रिहाई से न्याय की प्रक्रिया प्रभावित होने,अपराध दोहराने या समाज पर प्रतिकूल असर की आशंका हो, तो बेल रोकी जा सकती है। कोर्ट ने माना कि जघन्य अपराधों में विवेकपूर्ण दृष्टिकोण जरूरी है। सामाजिक जांच रिपोर्ट आरोपी के पक्ष में सामान्य रही,लेकिन अपराध की प्रकृति ने उसे ओवरराइड कर दिया।
केवल उम्र को आधार बनाकर राहत नहीं : बचाव पक्ष ने गरीबी, कम उम्र और आत्मरक्षा का तर्क रखा। वकील ने कहा कि आरोपी का कोई आपराधिक इतिहास नहीं है और उसे सुधार का अवसर मिलना चाहिए। दूसरी ओर सरकारी पक्ष ने गवाहों के बयान और पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट का हवाला दिया। अभियोजन ने तर्क दिया कि हमला सुनियोजित और गंभीर था। अदालत ने कहा कि ऐसे मामलों में केवल उम्र को आधार बनाकर राहत नहीं दी जा सकती।
सुधार बनाम सामाजिक सुरक्षा का संतुलन
कोर्ट ने माना कि जुवेनाइल कानून का मूल उद्देश्य पुनर्वास है। लेकिन हत्या जैसे अपराध सामाजिक संरचना को तोड़ते हैं और पीडि़त पक्ष के अधिकारों को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। अदालत ने कहा कि न्याय प्रणाली को दोनों पक्षों के हितों का संतुलन साधना होगा। यह फैसला संकेत देता है कि सुधारवादी दृष्टिकोण के साथ-साथ सामाजिक सुरक्षा भी उतनी ही महत्वपूर्ण है।
व्यापक प्रभाव और कानूनी संदेश
कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि यह आदेश जुवेनाइल जस्टिस बोर्ड्स के लिए मार्गदर्शक बनेगा। इससे स्पष्ट संदेश गया है कि जघन्य अपराधों में बेल पर निर्णय करते समय सतर्कता अनिवार्य है। राज्य में बढ़ते किशोर अपराधों के संदर्भ में यह फैसला महत्वपूर्ण माना जा रहा है। साथ ही, यह भी रेखांकित किया गया कि ऑब्जर्वेशन होम्स में सुधार कार्यक्रम और मनोवैज्ञानिक सहायता मजबूत की जानी चाहिए, ताकि सुधार की अवधारणा व्यवहारिक रूप ले सके।


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