एक ही मशीन…एक ही जांच…फिर दरों में जमीन-आसमान क्यों?

- आयुष्मान के भरोसे बीमार,बिल देखकर बेहोश…इलाज के नाम पर लूट और सरकार की चुप्पी…
- स्वास्थ्य टूरिज्म के नीचे दबती आम आदमी की सांस…इलाज एक, रेट अनेकः छत्तीसगढ़ में स्वास्थ्य सेवा या खुली लूट?
- आयुष्मान काग़जों में करोड़ों का, निजी अस्पतालों में ‘चिल्लर’
- बीमारी नहीं मार रही,इलाज की कीमत जान ले रही है…मार्बल की इमारतें,कर्ज में डूबी जिंदगियाँ स्वास्थ्य सेवा या सिंडिकेट राज?
- छत्तीसगढ़ में इलाज बना व्यापार इलाज नहीं,लूट चल रही है-छत्तीसगढ़ की स्वास्थ्य व्यवस्था पर कड़ा सवाल इलाज या लूट ?…आयुष्मान के नाम पर निजी अस्पतालों का खुला कारोबार

न्यूज डेस्क
रायपुर,02 जनवरी 2026 (घटती-घटना)। छत्तीसगढ़ में आज बीमारी सबसे बड़ी समस्या नहीं है, सबसे बड़ा संकट है इलाज की कीमत,बीमारी शरीर तोड़ती है,लेकिन इलाज आदमी की पूरी जिंदगी तोड़ देता है,सरकार की सबसे बड़ी स्वास्थ्य योजना आयुष्मान भारत जिसे गरीब की ढाल कहा गया निजी अस्पतालों में पहुँचते ही ‘चिल्लर योजना’ बन जाती है,कागज पर पाँच लाख का भरोसा, हकीकत में, जांच के नाम पर हजारों,सर्जरी के नाम पर लाखों की मांग, इमारत बड़ी,तो इलाज महंगा,यह कौन सा मेडिकल साइंस है? छत्तीसगढ़ में आज बीमारी से ज़्यादा खतरनाक हो गया है इलाज का खर्च,राज्य की स्वास्थ्य व्यवस्था एक ऐसे मोड़ पर खड़ी है,जहाँ सरकारी अस्पताल संसाधनों के बावजूद भरोसा नहीं जगा पा रहे और निजी अस्पताल इलाज के नाम पर खुली आर्थिक मनमानी कर रहे हैं,सवाल सीधा है क्या स्वास्थ्य अब सेवा नहीं,सिफऱ् मुनाफ़े का धंधा बन चुका है? छत्तीसगढ़ में स्वास्थ्य सेवाओं की बढ़ती लागत,निजी अस्पतालों के शुल्क संरचना में भारी अंतर और गरीब-मध्यम वर्ग के लिए इलाज की पहुंच को लेकर सवाल तेजी से उठ रहे हैं, मरीजों का कहना है कि बड़ी बिल्डिंग,आधुनिक मशीनें और निजी चिकित्सा सुविधाओं के आधार पर जांच,इलाज और सर्जरी के शुल्क का निर्धारण असमान और मनमाना है,जिससे आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों पर अत्यधिक बोझ पड़ता है, छत्तीसगढ़ में आयुष्मान भारत योजना ने लाखों लोगों को इलाज की राहत दी है, लेकिन निजी अस्पतालों में शुल्क समान नहीं होने और महंगी सेवाओं के कारण गरीब मरीज आर्थिक बोझ में फँसते हैं,समान दर नीति,उचित निगरानी और किफायती इलाज से ही स्वास्थ्य सेवाएँ सभी के लिए, बेहतर और न्यायपूर्ण बन सकती हैं,अगर सरकार सभी अस्पतालों के लिए मानकीकृत दर तय करेगी और भुगतान प्रणाली को सरल बनाएगी,तो छत्तीसगढ़ एक स्वास्थ्य सेवा के क्षेत्र में मिसाल बन सकता है और जनता को वास्तविक लाभ मिल सकेगा।
एक ही जांच,अलग-अलग दामः यह कैसा न्याय?
सोनोग्राफी,ईसीजी,एक्स-रे,सीटी-स्कैन—इन सभी जांचों में लगने वाली मशीनें,तकनीक, बिजली, स्टाफ और मेंटेनेंस की लागत लगभग हर अस्पताल में समान होती है,फिर ऐसा कैसे है कि एक अस्पताल में सोनोग्राफी 300-500 रुपये में,और दूसरे में वही जांच 2500-3000 रुपये में? क्या रेट तय करने का पैमाना मरीज नहीं,बिल्डिंग की भव्यता है? क्या काँच की दीवारें,एसी रिसेप्शन और बड़े होर्डिंग इलाज को महँगा कर देते हैं? अगर हाँ, तो यह स्वास्थ्य नहीं,ब्रांड-बिक्री है।
सरकारी अस्पताल… मशीनें हैं,पर व्यवस्था नहीं…
राज्य के शासकीय अस्पतालों में डॉक्टर हैं,मशीनें हैं, बजट है,लेकिन फिर भी आम आदमी निजी अस्पताल जाने को मजबूर है, कारण साफ़ हैः समय पर जांच नहीं, ऑपरेशन में अनावश्यक देरी, अव्यवस्थित सिस्टम और जवाबदेही का अभाव, अगर सरकार सच में चाहती है कि गरीब और मध्यम वर्ग निजी अस्पतालों की लूट से बचे, तो सरकारी अस्पतालों में निजी जैसी सुविधा और अनुशासन लागू करना ही होगा,सिर्फ इमारत बनाने से स्वास्थ्य व्यवस्था मजबूत नहीं होती,प्रबंधन और इच्छाशक्ति से होती है।
निजी अस्पतालों की मनमानीः सरकार क्यों मौन है?
सबसे गंभीर सवाल यह है कि जब दवाइयों के अधिकतम खुदरा मूल्य तय हो सकते हैं, जब पेट्रोल-डीजल,राशन, परिवहन—सब पर सरकारी नियंत्रण हो सकता है, तो फिर जांच,ऑपरेशन,आईसीयू और बेड चार्ज पर कोई मानक दर क्यों नहीं? क्या सरकार नहीं चाहती,या फिर यह क्षेत्र किसी ऐसे बड़े सिंडिकेट के हवाले है,जहाँ से मोटा मुनाफ़ा निकलता है—और मरीज सिफऱ् शिकार बनता है?
एक राज्य-एक दर क्यों नहीं?
छत्तीसगढ़ सरकार को तुरंत यह तय करना चाहिए किः सभी निजी अस्पतालों के लिए जांच और ऑपरेशन की मानक दरें लागू हों,हर अस्पताल में रेट लिस्ट सार्वजनिक रूप से प्रदर्शित की जाए,तय दर से अधिक वसूली पर कठोर दंड और लाइसेंस कार्रवाई हो,गरीब और मध्यम वर्ग के लिए इलाज को सुलभ और समान बनाया जाए स्वास्थ्य कोई लग्जरी नहीं,मौलिक अधिकार है,बीमारी किसी की आर्थिक हैसियत देखकर नहीं आती, तो इलाज का दाम भी हैसियत देखकर तय नहीं होना चाहिए।
आखिरी सवाल-सरकार से जवाब चाहिए…
क्या छत्तीसगढ़ सरकार इस लूट पर लगाम लगाएगी? या फिर आंख मूंदकर देखती रहेगी—जहाँ मुनाफ़ा कुछ लोगों के हाथ में और कर्ज,बेबसी और मौत आम आदमी के हिस्से में आती है? अब वक्त बयानबाजी का नहीं, नीति और कार्रवाई का है, अगर आज दरें तय नहीं हुईं,तो कल इलाज सिफऱ् अमीरों का अधिकार बन जाएगा और गरीब के लिए अस्पताल नहीं, सिफऱ् प्रतीक्षा और पीड़ा बचेगी।
आयुष्मान निजी अस्पतालों में क्यों बन जाती है चिल्लर?
इलाज एक,मशीन एक… फिर रेट में आसमान-जमीन का फर्क क्यों? सरकार की सबसे बड़ी और महत्वाकांक्षी स्वास्थ्य योजना आयुष्मान भारत आज जमीन पर आते-आते निजी अस्पतालों में बेअसर काग़ज बनकर रह जाती है, योजना का उद्देश्य साफ था गरीब से अमीर तक,हर नागरिक को बिना आर्थिक बोझ के इलाज,लेकिन हकीकत यह है कि निजी अस्पतालों की चौखट पर कदम रखते ही आयुष्मान की ताकत खत्म हो जाती है।
बिल्डिंग देखकर इलाज की कीमत क्यों?-
जांच वही,मशीन वही,सर्जरी वही,डॉक्टर वही फिर सिर्फ इसलिए कि अस्पताल की इमारत बड़ी और चमकदार है, सीटी स्कैन, सोनोग्राफी, ईसीजी और सर्जरी के दाम कई गुना बढ़ जाते हैं, क्या इलाज की कीमत सेवा से तय होनी चाहिए या इमारत से?
बिल्डिंग देखकर इलाज की कीमत क्यों?
जांच वही,मशीन वही,सर्जरी वही,डॉक्टर वही फिर सिर्फ इसलिए कि अस्पताल की इमारत बड़ी और चमकदार है,सीटी स्कैन, सोनोग्राफी,ईसीजी और सर्जरी के दाम कई गुना बढ़ जाते हैं,क्या इलाज की कीमत सेवा से तय होनी चाहिए या इमारत से?
दर तय नहीं…तो लूट तय…
निजी अस्पतालों में जांच के दर्जनों नाम,हर नाम के अलग-अलग भारी रेट,सर्जरी के पैकेज ऐसे कि मध्यम वर्ग भी कांप जाए,नतीजा यह कि जमीन बिकती है,गहने गिरवी पड़ते हैं,कर्ज का पहाड़ खड़ा हो जाता है और एक समय ऐसा आता है जब मरीज बेबसी में कहता है…हे भगवान,इससे अच्छा तो उठा ही ले।’ यह सिर्फ बीमारी की पीड़ा नहीं,यह महंगे इलाज की मानसिक यातना है।
सरकार के पास अधिकार है,फिर डर क्यों?
जब दवाओं के दाम तय हो सकते हैं,पेट्रोल-डीजल के रेट नियंत्रित हो सकते हैं,अनाज की कीमत पर नीति बन सकती है तो फिर जांच,सर्जरी और इलाज की दर क्यों नहीं? आयुष्मान में जो दर तय है, वही दर सभी निजी अस्पतालों पर अनिवार्य क्यों नहीं? क्या सरकार पीछे इसलिए हटती है क्योंकि बड़े अस्पतालों का दबाव है? कोई स्वास्थ्य-सिंडिकेट नीतियां तय कर रहा है? मुनाफा, सेवा से ऊपर रखा गया है?
स्वास्थ्य टूरिज्म या स्वास्थ्य व्यापार?
छत्तीसगढ़ में अस्पतालों की इमारतें तेजी से बढ़ रही हैं,मल्टी-स्पेशलिटी नाम के बोर्ड लग रहे हैं लेकिन सवाल यह है क्या इन इमारतों के साथ सेवा-भाव भी बढ़ रहा है,या सिर्फ इलाज को व्यापार बनाया जा रहा है? महंगी इमारतें कहीं न कहीं आम आदमी को इलाज से दूर और निराशा व इच्छा-मृत्यु की सोच तक धकेल रही हैं।
अब फैसले टालने का समय नहीं…
आज जरूरत है निजी और सरकारी अस्पतालों में एक समान दर प्रणाली,आयुष्मान दर को सभी अस्पतालों पर अनिवार्य करने की बिल्डिंग नहीं, इलाज को केंद्र में रखने की,अगर आज सरकार और स्वास्थ्य मंत्री ने ठोस निर्णय नहीं लिए,तो आने वाला कल यह कहेगा—बीमारी से कम लोग मरे,इलाज की कीमत से ज़्यादा,अब सवाल सिर्फ नीति का नहीं,नियत और नीयत दोनों का है।
आयुष्मान भारत योजनाः आंकड़े और छत्तीसगढ़ की स्थिति
योजना का उद्देश्य प्रधानमंत्री जन आरोग्य योजना का लक्ष्य है, गरीबी रेखा से नीचे रहने वाले परिवारों को 5 लाख तक का कैशलेस इलाज हर साल प्रदान करना, छत्तीसगढ़ में योजना की प्रगति अब तक 78 लाख से अधिक लाभार्थियों ने निःशुल्क इलाज का लाभ उठाया है राष्ट्रीय स्तर पर भी अग्रणी राज्यों में छत्तीसगढ़ चौथे स्थान पर है,राज्य में लगभग प्रतिदिन 1,600-1,700 दावे प्रस्तुत हो रहे हैं, जिनका कुल भुगतान लगभग 4 करोड़ प्रतिदिन तक जा रहा है, वित्तीय वर्ष 2025-26 में सरकार को केंद्र से अब तक कुल 505 करोड़ राशि प्राप्त हुई है,जिससे दावों का भुगतान जारी रखा जा रहा है, पर समस्या आज भी बनी हुई हैः कई निजी अस्पताल आयुष्मान भुगतान में देरी और कम दरों को लेकर असंतुष्ट हैं,जिससे इलाज के शुल्क और सेवाओं पर विवाद कायम है।
निजी बनाम सरकारी अस्पताल…दरों में अंतर क्यों?
आज तक कोई समान दर नहीं भारत में आयुष्मान भारत के तहत लगभग 30,985 अस्पताल पैनल में शामिल हैं, जिनमें से लगभग 13,883 (45′) निजी अस्पताल हैं, हालांकि इनकी संख्या सरकारी अस्पतालों के मुकाबले कम है, वे कुल इलाजों का करीब 52′ हिस्सा प्रदान कर रहे हैं, इसका अर्थ यह है कि इलाज की भारी मांग निजी सेक्टर में भी है, लेकिन दरें तय करने की कवायद पारदर्शी या समान नहीं है।
खर्च का असमान अनुभव
एक ही जांच या ऑपरेशन का शुल्क बड़े शहर के निजी अस्पताल में अलग और छोटे ग्रामीण क्लिनिक में अलग होता है,इस तरह का भेदभाव दवाओं,जांच और सर्जरी के खर्चों में गरीब पर भारी बोझ डालता है,स्वास्थ्य प्रणाली में निजी अस्पताल बुनियादी ढांचे,बिल्डिंग आकार,उपकरणों की कीमत और स्थानीय बाजार के अनुसार शुल्क तय करते हैं,जिससे असमानता और बढ़ जाती है।
समस्याएँ और उनकी वजहें…
शुल्क नियंत्रण का अभाव भारत में केंद्र या राज्य सरकारों द्वारा अभी तक एक समान दरों की सार्वभौमिक नीति लागू नहीं की गई है, जिससे निजी अस्पताल स्वयं दर तय करते हैं गरीब मरीजों को इलाज से पूर्व आर्थिक बोझ उठाना पड़ता है, कुछ राज्यों जैसे राजस्थान ने Right to Health Care Act के तहत मुफ्त ह्रक्कष्ठ/ढ्ढक्कष्ठ की बात की है, लेकिन हर राज्य में लागू नहीं है।
आम जनता और विशेषज्ञ क्या कहते हैं?
मरीजों की आवाज-
– निजी अस्पतालों में महंगे शुल्क के कारण कई गरीब मरीज इलाज से बचते हैं।
– सर्जरी/विस्तृत जांच के लिए फीस अलग-अलग होने के कारण लोग आर्थिक तंगी में धराशाई हो जाते हैं।
स्वास्थ्य विशेषज्ञों का विचार-
– निजी अस्पतालों में दरों का भेदभाव सामाजिक न्याय के विपरीत है।
– सरकार को समान दर निर्धारण, पारदर्शिता और निगरानी की आवश्यकता है।
सरकार और नीति में क्या बदलाव की जरूरत?
समान दर निर्धारण छत्तीसगढ़ सरकार और केंद्र को यह देखना होगा किः
– निजी अस्पतालों में जांच,इलाज एवं सर्जरी पर बिल्डिंग/इन्फ़्रास्ट्रक्चर के आधार पर दरें भिन्न न हों
– गरीब और मध्यम वर्ग के मरीजों के लिए किफायती दर सुनिश्चित हों
आयुष्मान योजना के कार्यान्वयन में सुधार
– भुगतान प्रक्रिया को तेज करना और अस्पतालों को समय पर राशि उपलब्ध कराना
– धोखाधड़ी रोकने के लिए निगरानी और डिजिटल ट्रैकिंग
कुछ महत्वपूर्ण सवाल…
– सरकार के पास अधिकार है, फिर निजी अस्पताल बेलगाम क्यों?
– आयुष्मान दर सभी पर लागू क्यों नहीं? किसका दबाव भारी?
– क्या छत्तीसगढ़ में स्वास्थ्य नीति जनता के लिए है या निवेशकों के लिए?
– रेट तय नहीं, इसलिए लूट तय—कब जागेगा स्वास्थ्य विभाग?
क्या सरकार ऐसा कर सकती है…
– समान दर, समान इलाजः क्या छत्तीसगढ़ बना पाएगा स्वास्थ्य की मिसाल?
– आयुष्मान बनाम हकीकतः छत्तीसगढ़ की स्वास्थ्य व्यवस्था का सच
– बिल्डिंग बड़ी,बिल बड़ा—इलाज का यह कैसा गणित?
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