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कोरिया/सरगुजा@ सरगुजा की धरती पर राम वनवास की अमिट स्मृतियां

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  • पहाड़ों-गुफाओं में आज भी जीवंत है रामकथा….
  • राम वनवास की स्मृतियों से जुड़ा सरगुजा,आस्था के साथ इतिहास और प्रकृति का अनूठा संगम
  • गुफाएं, पहाड़ और नदियां…सरगुजा के कण-कण में रामकथा की गूंज
  • सीतामढ़ी-हरचौका से रामगढ़ तक,छत्तीसगढ़ की धरती पर राम वन गमन की अनकही गाथाएं…
  • दंडकारण्य की धरती और प्रभु श्रीराम की लोकगाथाएं, सरगुजा संभाग के 40 से अधिक स्थलों की कहानी
  • वनवास की राहों पर रामकथा के निशान! कोरिया, सूरजपुर और सरगुजा की धार्मिक विरासत
  • रामायण की लोकस्मृतियों का खजाना है सरगुजा, गुफाओं और पहाडि़यों में पीढि़यों से जीवित हैं मान्यताएं
  • कोरिया के सीतामढ़ी-हरचौका से रामगढ़ और मैनपाट तक प्रभु श्रीराम से जुड़ी लोकमान्यताओं का सफर, 40 से अधिक स्थलों में रची-बसी है आस्था,इतिहास और प्रकृति की अनूठी विरासत
  • सीतामढ़ी-हरचौका से रामाराम तकः राम वन गमन से जुड़ी मान्यताओं का सांकेतिक सफर


राजन पाण्डेय
कोरिया/सरगुजा,19 अक्टूबर 2026 (घटती-घटना)।
मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम का जीवन त्याग,तपस्या,सत्य,धर्म और आदर्शों का प्रतीक है,अयोध्या से आरंभ हुई उनकी जीवनयात्रा में वनवास का प्रसंग केवल राजमहल से वन की ओर प्रस्थान की कथा नहीं,बल्कि कठिन परिस्थितियों में मर्यादा,कर्तव्य और धर्म का पालन करने की प्रेरणा भी है,यही कारण है कि रामायण की कथा सदियों बाद भी भारतीय जनमानस में जीवित है,दशहरा आते ही श्रीराम के वनवास, रावण वध और धर्म की स्थापना का प्रसंग एक बार फिर लोगों की स्मृतियों में ताजा हो उठता है।
छत्तीसगढ़ के उत्तरी हिस्से में फैला सरगुजा अंचल इस सांस्कृतिक परंपरा की एक विशिष्ट कड़ी है,यहां की पहाडि़यों,घने जंगलों, प्राकृतिक गुफाओं,नदियों और प्राचीन मंदिरों से अनेक जनश्रुतियां जुड़ी हुई हैं,स्थानीय मान्यताओं के अनुसार,वनवास काल में भगवान श्रीराम, माता सीता और भ्राता लक्ष्मण ने दंडकारण्य क्षेत्र में प्रवास किया था,इसी विश्वास के आधार पर कोरिया-एमसीबी,सूरजपुर,बलरामपुर,सरगुजा और जशपुर के अनेक स्थलों को राम वन गमन की स्मृतियों से जोड़कर देखा जाता है,कहीं प्राकृतिक गुफा को माता सीता का आश्रय स्थल माना जाता है,कहीं चट्टानों पर बनी आकृतियों को श्रीराम,लक्ष्मण या सीता से जोड़कर देखा जाता है,तो कहीं प्राचीन शिवालयों और जलकुंडों के साथ वनवास की कथाएं सुनाई जाती हैं,इन स्थानों का महत्व केवल धार्मिक आस्था तक सीमित नहीं है,ये लोकसंस्कृति, स्थानीय इतिहास,पुरातात्विक विरासत और प्राकृतिक पर्यटन की संभावनाओं को भी सामने लाते हैं।


राम वन गमन पथः आस्था को एक सूत्र में पिरोने की पहल-छत्तीसगढ़ में भगवान श्रीराम के वनवास से जुड़ी मान्यताओं को व्यवस्थित रूप से सामने लाने के लिए राम वन गमन पर्यटन परिपथ की परिकल्पना की गई,इसके अंतर्गत प्रदेश के नौ प्रमुख स्थलों को पहले चरण में विकसित करने के लिए चिह्नित किया गया था,इनमें सीतामढ़ी-हरचौका, रामगढ़,शिवरीनारायण-खरौद,तुरतुरिया, चंदखुरी,राजिम,सिहावा-सप्तऋषि आश्रम,जगदलपुर और रामाराम शामिल हैं,इसका उद्देश्य धार्मिक पर्यटन को बढ़ावा देने के साथ प्रदेश की सांस्कृतिक विरासत को पहचान दिलाना भी रहा है,इन नौ प्रमुख स्थलों के अतिरिक्त सरगुजा संभाग में रामायण से जुड़ी अनेक स्थानीय मान्यताएं प्रचलित हैं, विभिन्न गांवों और क्षेत्रों में मंदिरों, गुफाओं, पहाडि़यों तथा जलप्रपातों को लेकर पीढि़यों से कथाएं सुनाई जाती रही हैं, स्थानीय शोध और जनश्रुतियों के आधार पर 40 से अधिक ऐसे स्थलों का उल्लेख मिलता है, हालांकि इन सभी स्थानों का एक ही प्रमाणित ऐतिहासिक मार्ग में शामिल होना अलग विषय है, इनके संरक्षण के लिए धार्मिक परंपराओं के साथ ऐतिहासिक और पुरातात्विक तथ्यों का दस्तावेजीकरण भी आवश्यक है।
कोरिया-एमसीबीः सीतामढ़ी-हरचौका से जुड़ी प्रवेश की मान्यता


राम वन गमन की लोकमान्यताओं में सीतामढ़ी-हरचौका का विशेष स्थान है, वर्तमान में यह स्थल मनेंद्रगढ़-चिरमिरी-भरतपुर जिले के भरतपुर विकासखंड क्षेत्र में स्थित है,जिला प्रशासन के पर्यटन विवरण के अनुसार,यह जनकपुर से लगभग 25 किलोमीटर दूर है और मवई नदी के तट पर प्राकृतिक गुफाओं के लिए जाना जाता है, यहां गुफा के भीतर 17 कक्ष होने तथा 12 कक्षों में शिवलिंग स्थापित होने का उल्लेख मिलता है,स्थानीय मान्यता है कि भगवान श्रीराम, माता सीता और लक्ष्मण ने मवई नदी के रास्ते छत्तीसगढ़ की धरती पर प्रवेश किया था,इसी आधार पर सीतामढ़ी-हरचौका को उनकी वनवास यात्रा का पहला पड़ाव माना जाता है, इस क्षेत्र में नदी के नाम को लेकर भी एक लोककथा प्रचलित है, कहा जाता है कि माता सीता के आगमन से जुड़ी मान्यता के कारण इसे पहले ‘मां आई’ कहा गया,जो कालांतर में ‘मवई’ के रूप में प्रचलित हो गया, यह लोकव्युत्पत्ति स्थानीय आस्था का हिस्सा है, सीतामढ़ी-हरचौका की गुफाएं धार्मिक दृष्टि से श्रद्धालुओं को आकर्षित करती हैं,यहां प्राचीन प्राकृतिक संरचनाएं,शिवलिंग और स्थानीय परंपराएं एक साथ देखने को मिलती हैं,इस स्थल के व्यवस्थित विकास से श्रद्धालुओं को सुविधाएं उपलब्ध कराने और क्षेत्र की सांस्कृतिक पहचान को सहेजने की संभावनाएं जुड़ी हुई हैं,कोरिया और एमसीबी क्षेत्र में सीतामढ़ी-घाघरा,महादेवन खमरौध, कोटाडोल,सीतामढ़ी छतौड़ा आश्रम,सिद्ध बाबा आश्रम,देवसील और गांगी रानी जैसे स्थानों को भी राम वनवास की लोकस्मृतियों से जोड़कर देखा जाता है,अमृतधारा जलप्रपात और जटाशंकरी गुफा जैसे प्राकृतिक स्थलों के साथ भी स्थानीय जनश्रुतियां जुड़ी हैं,इन मान्यताओं का व्यवस्थित संकलन क्षेत्र की धार्मिक विरासत को समझने में मदद कर सकता है।
सूरजपुरः पहाड़ों और जलप्रपातों में सुनाई देती रामकथा
सूरजपुर जिले में भी भगवान श्रीराम, माता सीता और लक्ष्मण से जुड़ी कई लोकमान्यताएं प्रचलित हैं, यहां के जंगल, पहाड़ और प्राकृतिक संरचनाएं स्थानीय लोगों के धार्मिक विश्वासों का हिस्सा हैं। जोगीमाड़ा,चपदा की पत्थर गुफा,कुदरगढ़, सीता लेखनी पहाड़,लक्ष्मण पंजा,रक्सगंडा जलप्रपात,रामेश्वरनगर का तीर-धनुष, सरासोर,श्रीराम-लक्ष्मण पखना,मरहट्ठा के पदचिह्न,साल्हो-बेसाही पहाड़,महरमुंडा ऋषि आश्रम और पिलखा पहाड़ जैसे स्थानों का उल्लेख इसी संदर्भ में किया जाता है,ओड़गी तहसील के कैलाशनगर क्षेत्र स्थित सीता लेखनी पहाड़ को लेकर ग्रामीणों में विशेष श्रद्धा है,स्थानीय मान्यता के अनुसार, वनवास काल में लक्ष्मण ने माता सीता को यहां लिखना-पढ़ना सिखाया था,पहाड़ की चट्टानों पर दिखाई देने वाली गोलाकार आकृतियों को सीता लेखनी से जोड़कर देखा जाता है,इन आकृतियों और प्राचीन लिपि संबंधी दावों की पुरातात्विक जांच इस स्थल की ऐतिहासिक पहचान को और स्पष्ट कर सकती है,नवगई गांव के समीप स्थित रक्सगंडा जलप्रपात अपनी प्राकृतिक संरचना के लिए प्रसिद्ध है, स्थानीय जनश्रुति में इसका नाम राक्षसों से जुड़ी एक कथा के साथ समझाया जाता है, मान्यता है कि वनवास के समय भगवान श्रीराम और लक्ष्मण ने यहां राक्षसों का वध किया था। ‘रक्स’ को राक्षस और ‘गंडा’ को ढेर से जोड़ने वाली व्याख्या भी स्थानीय लोकपरंपरा का हिस्सा है, प्रेमनगर तहसील के रामेश्वरनगर में एक विशाल लोहे के तीर-धनुष के रखे होने की बात कही जाती है, इसकी लंबाई लगभग 12 फीट और वजन करीब 90 किलोग्राम बताए जाने का उल्लेख स्थानीय विवरणों में मिलता है,ग्रामीण मान्यता इसे भगवान श्रीराम के धनुष से जोड़ती है।
इसी तरह प्रतापपुर तहसील के मरहट्ठा गांव में चट्टान पर बने पदचिह्नों को श्रीराम और लक्ष्मण से संबंधित माना जाता है, शिवपुर स्थित अर्द्धनारीश्वर जलेश्वरनाथ मंदिर भी क्षेत्र की धार्मिक आस्था का केंद्र है, प्रचलित मान्यता के अनुसार,भगवान श्रीराम ने वनवास के दौरान यहां शिवलिंग की स्थापना कर पूजा-अर्चना की थी, मंदिर के समीप सीता पांव और गोसाई ढोढ़ी नामक स्थलों को भी माता सीता से जुड़ी लोककथाओं के कारण महत्व प्राप्त है, सूरजपुर के पहाड़गांव स्थित पिलखा पहाड़ी को लेकर एक अन्य रोचक कथा सुनाई जाती है,स्थानीय मान्यता के अनुसार, यहां विश्रवा ऋषि का आश्रम था। पहाड़ी की दो चोटियों को लक्ष्मण से जुड़ी एक कथा के साथ जोड़ा जाता है,जिसमें उनके द्वारा इन चोटियों को कांवर में उठाकर रामगढ़ ले जाने और बहिंगा टूटने से दोनों का वहीं रह जाने की बात कही जाती है,यह कथा स्थानीय लोकस्मृति का हिस्सा है और पीढि़यों से सुनाई जाती रही है।
मैनपाटः शरभंग ऋषि की तपोभूमि की कथा
सरगुजा का मैनपाट अपनी प्राकृतिक सुंदरता,पहाडि़यों, वनों और जलप्रपातों के लिए प्रसिद्ध है,इसे अक्सर छत्तीसगढ़ का शिमला कहा जाता है,लेकिन यहां की पहचान केवल प्राकृतिक पर्यटन तक सीमित नहीं है,मैनपाट और आसपास के क्षेत्रों में ऋषि-मुनियों की तपस्या तथा रामायण काल से जुड़ी मान्यताएं भी प्रचलित हैं,शरभंग ग्राम में शरभंग ऋषि के आश्रम को लेकर विशेष धार्मिक विश्वास है, जनश्रुति के अनुसार,भगवान श्रीराम वनवास काल में इस क्षेत्र में पहुंचे और महर्षि शरभंग सहित दूसरे ऋषियों से भेंट की,समीप स्थित शरभंगा जलप्रपात अपनी प्राकृतिक सुंदरता के कारण आकर्षण का केंद्र है,इन कथाओं को स्थानीय धार्मिक परंपरा के रूप में सहेजना आवश्यक है,साथ ही क्षेत्र की प्राकृतिक संरचना,जैव विविधता और आदिवासी-सांस्कृतिक विरासत का संरक्षण भी पर्यटन विकास के साथ प्राथमिकता में रहना चाहिए।
जशपुरः प्राचीन मंदिरों औरआश्रमों में वनवास की स्मृतियां
सरगुजा संभाग के जशपुर जिले में भी भगवान श्रीराम के वनवास से संबंधित कई लोकमान्यताएं प्रचलित हैं, बगीचा का शिव मंदिर, रेंगले का लेखा पत्थर,रिंगारघाट का लक्ष्मण पंजा और पत्थलगांव क्षेत्र का किलकिला आश्रम प्रमुख स्थलों में गिने जाते हैं,किलकिला आश्रम में प्राचीन शिव मंदिर और राम-जानकी मंदिर स्थित हैं,स्थानीय जनश्रुति के अनुसार,वनवास के दौरान भगवान श्रीराम,माता सीता और लक्ष्मण ने यहां कुछ समय बिताया था,इन धार्मिक स्थलों के साथ जुड़ी लोककथाएं क्षेत्र के लोगों की आस्था का हिस्सा हैं और स्थानीय सांस्कृतिक पहचान को मजबूत करती हैं।
शिवरीनारायण से सिहावा तक फैली रामकथा
सरगुजा अंचल से आगे छत्तीसगढ़ के अन्य भागों में भी भगवान श्रीराम के वनवास की स्मृतियों से जुड़ी परंपराएं व्यापक हैं,जांजगीर-चांपा जिले का शिवरीनारायण माता शबरी की भक्ति की कथा के लिए प्रसिद्ध है,लोकमान्यता के अनुसार,माता शबरी ने प्रभु श्रीराम को प्रेमपूर्वक बेर अर्पित किए थे,यह प्रसंग भक्ति,समर्पण और निष्कपट प्रेम का प्रतीक माना जाता है,बलौदाबाजार का तुरतुरिया महर्षि वाल्मीकि के आश्रम से जुड़ी मान्यताओं के लिए जाना जाता है,रायपुर जिले के चंदखुरी में माता कौशल्या मंदिर स्थित है, जबकि गरियाबंद के राजिम का धार्मिक महत्व नदियों के संगम और प्राचीन मंदिरों से जुड़ा है,धमतरी जिले की सिहावा पहाडि़यों को ऋषि-मुनियों की तपोभूमि माना जाता है,बस्तर के जगदलपुर और सुकमा के रामाराम में भी रामकथा से जुड़ी लोकपरंपराएं प्रचलित हैं,इन स्थलों की भौगोलिक दूरी और स्थानीय कथाओं में अंतर होने के बावजूद,वे छत्तीसगढ़ की व्यापक धार्मिक-सांस्कृतिक विरासत का हिस्सा हैं।
बलरामपुरः रामचौरा पहाड़ और सीता चौक की मान्यताएं


बलरामपुर जिले में सीता चौक,सीता चुआं और रामचौरा पहाड़ जैसे स्थल धार्मिक मान्यताओं के कारण पहचाने जाते हैं,राजपुर तहसील के दुप्पी ग्राम पंचायत क्षेत्र में स्थित सीता चौक नाले के आसपास बड़ी चट्टानें और प्राकृतिक संरचनाएं हैं,स्थानीय लोगों का विश्वास है कि वनवास काल में माता सीता ने यहां चौका पूरने का कार्य किया था,चट्टानों पर बने कुछ निशानों को भी इसी परंपरा से जोड़कर देखा जाता है, तातापानी से लगभग चार किलोमीटर दूर रजबंधा गांव के समीप रामचौरा पहाड़ स्थित है,लगभग 500 फीट ऊंचे इस पहाड़ के संबंध में जनश्रुति है कि भगवान श्रीराम, माता सीता और लक्ष्मण ने वनवास के दौरान यहां कुछ समय बिताया था,पहाड़ी के ऊपर स्थित धोबिन कुंड को भी इसी कथा से जोड़कर देखा जाता है,स्थानीय मान्यता के अनुसार,तीनों ने यहां स्नान किया था,ऐसे स्थलों के लिए धार्मिक आस्था के साथ प्रकृति संरक्षण भी महत्वपूर्ण है,पहाड़ी,जलस्रोत और जंगल यदि सुरक्षित रहें, तो इन स्थानों पर आने वाले श्रद्धालुओं और पर्यटकों को भी बेहतर अनुभव मिल सकता है।
सरगुजा का रामगढ़ः आस्था के साथ पुरातात्विक महत्व भी…
सरगुजा जिले के उदयपुर विकासखंड में स्थित रामगढ़ पहाड़ी इस अंचल के सबसे महत्वपूर्ण ऐतिहासिक और सांस्कृतिक स्थलों में शामिल है,जिला प्रशासन के अनुसार, इसे रामगिरि भी कहा जाता है। यहां राम-जानकी मंदिर,जानकी कुंड,हाथीपोल और सीताबेंगरा व जोगीमाड़ा गुफाएं प्रमुख आकर्षण हैं,स्थानीय मान्यता के अनुसार,वनवास के दौरान भगवान श्रीराम,माता सीता और लक्ष्मण ने इस क्षेत्र में कुछ समय बिताया था, रामगढ़ की विशेषता यह है कि यहां धार्मिक लोकमान्यता और पुरातात्विक महत्व दोनों मौजूद हैं,सीताबेंगरा और जोगीमाड़ा गुफाएं प्राचीन शैलकृत संरचनाएं हैं,इन गुफाओं में प्राचीन ब्राह्मी लिपि के अभिलेखों और चित्रांकन का उल्लेख मिलता है,भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के संरक्षित स्मारकों की सूची में सीताबेंगरा और जोगीमाड़ा गुफाओं को रामगढ़ पहाड़ी के संरक्षित स्मारकों के रूप में दर्ज किया गया है, इन गुफाओं को रामायण की लोकमान्यताओं से जोड़ा जाता है,लेकिन उनके पुरातात्विक इतिहास का अध्ययन अलग वैज्ञानिक और ऐतिहासिक पद्धतियों से होता है,यही अंतर इस क्षेत्र को और दिलचस्प बनाता है—एक ओर स्थानीय समाज की धार्मिक स्मृतियां हैं,दूसरी ओर प्राचीन कला,अभिलेख और शैलकृत वास्तुकला का अध्ययन, रामगढ़ की प्राकृतिक सुंदरता,ऊंची पहाड़ी,जंगल और गुफाएं इसे धार्मिक पर्यटन के साथ इतिहास और पुरातत्व में रुचि रखने वालों के लिए भी महत्वपूर्ण बनाती हैं।
दशहरा का संदेश और विरासत संरक्षण की जिम्मेदारी
दशहरा भगवान श्रीराम के जीवन से जुड़े आदर्शों,धर्म की स्थापना और बुराई पर अच्छाई की विजय का प्रतीक है,सरगुजा अंचल में राम वन गमन से जुड़ी मान्यताएं इस पर्व को एक स्थानीय सांस्कृतिक संदर्भ भी देती हैं, यहां की नदियां,पहाडि़यां,गुफाएं,मंदिर और जलप्रपात केवल पर्यटन स्थल नहीं,बल्कि पीढि़यों से संजोई गई स्मृतियों के केंद्र भी हैं,इन स्थलों की वास्तविक क्षमता तभी सामने आएगी,जब धार्मिक आस्था के साथ उनकी ऐतिहासिक और प्राकृतिक पहचान का संरक्षण किया जाए,बेहतर सड़क,स्पष्ट दिशा-सूचक बोर्ड,स्वच्छता, सुरक्षित पहुंच,श्रद्धालुओं के लिए मूलभूत सुविधाएं और स्थानीय गाइड जैसी व्यवस्थाएं पर्यटन को बढ़ावा दे सकती हैं। साथ ही, स्थानीय लोककथाओं और पुरातात्विक साक्ष्यों का व्यवस्थित दस्तावेजीकरण जरूरी है,ताकि मान्यता और प्रमाण के बीच अंतर स्पष्ट रहे,राम वन गमन से जुड़ी सभी स्थानीय कथाओं को एक ही तरह का ऐतिहासिक प्रमाण नहीं माना जा सकता,कुछ स्थलों का पुरातात्विक महत्व अभिलेखों और प्राचीन संरचनाओं से स्थापित होता है,जबकि अन्य का महत्व मुख्यतः जनश्रुतियों और धार्मिक विश्वासों पर आधारित है, दोनों प्रकार की विरासत को सम्मानपूर्वक समझना और सहेजना इस क्षेत्र के सांस्कृतिक विकास के लिए आवश्यक है,कोरिया-एमसीबी के सीतामढ़ी-हरचौका से सरगुजा के रामगढ़ और मैनपाट तक फैली रामकथा की लोकस्मृतियां छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक पहचान का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं,दशहरा के अवसर पर इन स्थलों को याद करना केवल धार्मिक आस्था का विषय नहीं,बल्कि अपनी लोकपरंपराओं,प्राकृतिक धरोहर और प्राचीन इतिहास को समझने तथा आने वाली पीढि़यों के लिए सुरक्षित रखने का संकल्प भी है।


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