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बैकुंठपुर@ बच्चों के हिस्से का मैदान,आयोजनों के नाम! बैकुंठपुर के मिनी स्टेडियम में सालभर उत्सव,विद्यार्थियों के खेलकूद की सुध लेने वाला कौन?

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  • बैकुंठपुर में आयोजनों के लिए मैदान नहीं या जिम्मेदारों को दूसरा विकल्प नहीं?
  • बैकुंठपुर का मिनी स्टेडियम बना ‘ऑल इन वन आयोजन केंद्र’,स्कूल का मैदान बना आयोजनों का अखाड़ा, बच्चों की पढ़ाई जाए भाड़ में!
  • मंच सजते रहे,बच्चे मैदान को तरसते रहे! बैकुंठपुर में आयोजनों की भरमार, स्कूल के मैदान के इस्तेमाल पर उठे सवाल
  • पढ़ाई स्कूल में, आयोजन मैदान में—फिर बच्चों का मैदान किस काम का? राष्ट्रीय पर्व,राजनीतिक कार्यक्रम, गरबा और रावण दहन के बीच मिनी स्टेडियम की भूमिका पर सवाल
  • स्कूल परिसर में लगातार कार्यक्रमों पर सवाल, विद्यार्थियों की सुविधा कब बनेगी प्राथमिकता?
  • कभी राष्ट्रीय पर्व,कभी राजनीतिक जलसा,कभी गरबा तो कभी रावण दहन—कार्यक्रममों की तैयारी में मैदान व्यस्त,बच्चों की पढ़ाई
  • और खेलकूद पर सवाल
  • शहर में आयोजन के लिए अलग मैदान नहीं,या जिम्मेदारों की नजर में स्कूल का मैदान ही सबसे सुविधाजनक?


-रवि सिंह-
बैकुंठपुर,14 अक्टूबर 2026 (घटती-घटना)।
बैकुंठपुर में विकास की एक ऐसी व्यवस्था दिखाई दे रही है,जहां स्कूल का मैदान सिर्फ स्कूल का नहीं रहा! जब राष्ट्रीय पर्व मनाना हो तो मिनी स्टेडियम,राज्योत्सव हो तो मिनी स्टेडियम,जिला गठन उत्सव हो तो मिनी स्टेडियम,राजनीतिक आयोजन हो तो भी मिनी स्टेडियम,गरबा करना हो तो भी मिनी स्टेडियम और रावण दहन की तैयारी करनी हो तो भी नजर इसी मैदान पर टिक जाती है, लगता है शहर में आयोजनों के लिए मैदानों की कमी का समाधान जिम्मेदारों ने बड़ी आसानी से निकाल लिया है—जहां बच्चे पढ़ते हैं,वहीं पूरा शहर कार्यक्रम भी कर ले!
शासकीय आदर्श रामानुज उच्चतर माध्यमिक विद्यालय के मिनी स्टेडियम में सालभर होने वाले आयोजनों को लेकर अब यही सवाल उठने लगा है कि आखिर यह मैदान विद्यार्थियों के लिए है या हर छोटे-बड़े कार्यक्रम के लिए सबसे सुविधाजनक ठिकाना बन चुका है? कार्यक्रमों की सूची लंबी होती जा रही है, तैयारियों की रौनक बढ़ती जा रही है,लेकिन मैदान के मूल उपयोग—खेलकूद और विद्यार्थियों की गतिविधियों—की चिंता किसे है,यह सवाल अब भी अपनी जगह खड़ा है।
बच्चों की पढ़ाई अपनी जगह, आयोजन की तैयारी अपनी जगह!
किसी कार्यक्रम का आयोजन एक दिन में नहीं हो जाता, मंच बनता है,पंडाल लगता है, सजावट होती है,बिजली की व्यवस्था होती है, आने-जाने के रास्ते बनाए जाते हैं और आयोजन के बाद मैदान को फिर से सामान्य स्थिति में लाने का काम भी होता है,स्थानीय स्तर पर उठ रही शिकायतों के मुताबिक,कई आयोजनों की तैयारियों में कार्यक्रम से पहले तीन से चार दिन तक मैदान प्रभावित रहता है, अब जरा इस व्यवस्था की तस्वीर देखिए—एक ओर विद्यार्थी स्कूल पहुंचते हैं, दूसरी ओर मैदान में कार्यक्रम की तैयारी चलती है,बच्चों के लिए मैदान खेलकूद का स्थान है,लेकिन आयोजन की तैयारी शुरू होते ही वही मैदान किसी बड़े समारोह की शक्ल लेने लगता है, विद्यार्थियों को खेलना है तो जगह चाहिए,आयोजकों को कार्यक्रम करना है तो मैदान चाहिए,ऐसे में सवाल उठता है कि बच्चों के हिस्से का मैदान बार-बार आयोजनों के हिस्से में क्यों चला जाता है? व्यंग्य यह है कि कार्यक्रमों की तैयारी के लिए दिन गिने जाते हैं,मंच की सजावट पर ध्यान दिया जाता है, भीड़ की व्यवस्था की चिंता होती है,लेकिन विद्यार्थियों की नियमित गतिविधियों पर कितना असर पड़ता है—इसका हिसाब कौन रखता है? क्या किसी आयोजन की सफलता का पैमाना सिर्फ रोशनी,सजावट,भीड़ और मंच तक सीमित रह गया है?
गरबा की तैयारी शुरू,मैदान फिर चर्चा में
अब गरबा आयोजन की तैयारी को लेकर मैदान एक बार फिर चर्चा में है,गरबा जैसे सांस्कृतिक कार्यक्रम शहर की सामाजिक और सांस्कृतिक गतिविधियों का हिस्सा हैं,लोग उत्साह से भाग लेते हैं और आयोजक बेहतर व्यवस्था करने की कोशिश करते हैं,लेकिन सवाल आयोजन के विरोध का नहीं, आयोजन स्थल के चयन का है, यदि हर बड़े कार्यक्रम के लिए उसी मैदान को चुना जाएगा,जहां स्कूल के विद्यार्थी पढ़ते हैं और खेलते हैं,तो स्वाभाविक है कि मैदान के उपयोग को लेकर सवाल उठेंगे, क्या गरबा के लिए कोई वैकल्पिक स्थान उपलब्ध नहीं है? यदि उपलब्ध है तो उसका उपयोग क्यों नहीं किया जाता? और यदि उपलब्ध नहीं है तो इतने समय से इस समस्या का स्थायी समाधान क्यों नहीं निकाला गया? आयोजन के दौरान मैदान का कितना हिस्सा बंद रहता है, विद्यार्थियों की खेल गतिविधियां कितने दिनों तक प्रभावित होती हैं और स्कूल प्रबंधन को किस प्रकार की असुविधा होती है—इन सवालों का स्पष्ट जवाब सामने आना चाहिए, सिर्फ कार्यक्रम की तैयारी देखकर उसे सफल मान लेना पर्याप्त नहीं है, यह भी देखना जरूरी है कि उस सफलता की कीमत किसी दूसरे जरूरी काम को तो नहीं चुकानी पड़ रही।
स्कूल के आसपास छात्रावास भी,लेकिन योजना किसकी?
परिसर के आसपास विद्यालयों और छात्रावास में रहने वाले बच्चों की मौजूदगी इस विषय को और गंभीर बनाती है,छात्रावास में रहने वाले विद्यार्थियों की दिनचर्या पढ़ाई, भोजन,आराम और अन्य गतिविधियों से जुड़ी होती है, बड़े आयोजनों के समय अतिरिक्त आवाजाही,शोर,वाहनों और तैयारियों से उनके वातावरण पर क्या प्रभाव पड़ता है,इसकी समीक्षा जरूरी है,यह कहना उचित नहीं होगा कि हर कार्यक्रम से पढ़ाई निश्चित रूप से बाधित होती है। लेकिन जब लगातार आयोजनों के ारण मैदान का उपयोग बदलता रहता है,तो विद्यालय प्रबंधन और शिक्षा विभाग से यह पूछना स्वाभाविक है कि विद्यार्थियों की सुविधा सुनिश्चित करने के लिए क्या व्यवस्था बनाई गई है, क्या आयोजनों का कैलेंडर पहले से तैयार होता है? क्या स्कूल के समय और खेल गतिविधियों को ध्यान में रखकर अनुमति दी जाती है? क्या कार्यक्रम के बाद मैदान को समय पर विद्यार्थियों के उपयोग के लिए तैयार किया जाता है? यदि इन सवालों के जवाब स्पष्ट नहीं हैं,तो व्यवस्था में सुधार की जरूरत है, बच्चों की शिक्षा को केवल कक्षा की चारदीवारी तक सीमित नहीं किया जा सकता। मैदान भी उनके विकास का हिस्सा है,खेल का अवसर छिनने पर उसका असर केवल एक खाली जगह तक सीमित नहीं रहता।
जिम्मेदारों से सीधा सवाल—वैकल्पिक मैदान कब बनेगा?
बैकुंठपुर में बड़े आयोजनों के लिए अलग मैदान विकसित करने की जरूरत पर अब गंभीरता से विचार होना चाहिए, नगर निकाय और जिला प्रशासन को उपलब्ध सार्वजनिक स्थलों का आकलन करना चाहिए,ताकि राष्ट्रीय पर्व, सांस्कृतिक कार्यक्रम, राजनीतिक आयोजन और अन्य बड़े समारोह ऐसे स्थानों पर हो सकें जहां स्कूल की नियमित गतिविधियां प्रभावित न हों,साथ ही,मिनी स्टेडियम में आयोजन की अनुमति देने के लिए स्पष्ट नियम बनाए जा सकते हैं,विद्यालय प्रबंधन की सहमति, कार्यक्रम की तारीख, तैयारियों की अवधि,मैदान को वापस उपयोग योग्य बनाने की समय-सीमा और यातायात व्यवस्था जैसे पहलुओं को अनुमति का हिस्सा बनाया जाना चाहिए,इससे आयोजनों पर रोक लगाने की जरूरत नहीं पड़ेगी और विद्यार्थियों की सुविधाएं भी सुरक्षित रखी जा सकेंगी,प्रशासन से यह भी स्पष्ट होना चाहिए कि क्या मिनी स्टेडियम का उपयोग केवल अस्थायी आवश्यकता के तहत किया जा रहा है या यही व्यवस्था आगे भी जारी रहने वाली है,यदि यह अस्थायी व्यवस्था है,तो स्थायी विकल्प की समय-सीमा क्या है? और यदि कोई वैकल्पिक मैदान नहीं है,तो उसे विकसित करने की योजना कब बनेगी?
आयोजन की चमक में बच्चों का मैदान गुम न हो जाए…
बैकुंठपुर में उत्सव मनाए जाएं,सांस्कृतिक कार्यक्रम हों,राष्ट्रीय पर्व गरिमा से आयोजित हों—इस पर किसी को आपत्ति नहीं होनी चाहिए,लेकिन उत्सव की चमक ऐसी भी नहीं होनी चाहिए कि विद्यार्थियों की पढ़ाई और खेलकूद की जरूरतें पीछे छूट जाएं, शहर के विकास का अर्थ केवल मंच बनाना और कार्यक्रम कराना नहीं,बल्कि बच्चों के लिए बेहतर सुविधाएं सुनिश्चित करना भी है,मिनी स्टेडियम को सालभर आयोजन स्थल बनाए रखने की व्यवस्था पर अब समीक्षा जरूरी है,यदि कार्यक्रमों की तैयारी के कारण मैदान बार-बार विद्यार्थियों के लिए उपलब्ध नहीं हो पाता,तो प्रशासन को इसका समाधान तलाशना चाहिए,आखिर मैदान की उपयोगिता का आकलन केवल इस आधार पर क्यों हो कि वहां कितने बड़े कार्यक्रम हुए? यह भी देखा जाना चाहिए कि वहां पढ़ने वाले बच्चों को कितने दिन मैदान मिला,व्यंग्यात्मक सवाल यही है की बैकुंठपुर में कार्यक्रमों के लिए मंच तो बार-बार सज जाता है,लेकिन विद्यार्थियों के खेल और पढ़ाई के लिए मैदान कब सजेगा? क्या स्कूल का मिनी स्टेडियम इसी तरह हर आयोजन का स्थायी ठिकाना बना रहेगा,या जिम्मेदार कभी बच्चों के हिस्से की जगह और समय को भी प्राथमिकता देंगे? अब जरूरत है—आयोजन भी हों,लेकिन स्कूल की कीमत पर नहीं,शहर में उत्सव भी हों,लेकिन बच्चों का मैदान छीनकर नहीं।
शहर के बीच कार्यक्रम यातायात भी परेशान
मिनी स्टेडियम शहर के मध्य क्षेत्र में होने के कारण बड़े आयोजनों के समय यातायात पर दबाव बढ़ने की आशंका भी रहती है,कार्यक्रम में आने वाले लोगों और वाहनों की आवाजाही के बीच पार्किंग,प्रवेश-निकास और सड़क पर सुचारु आवागमन की व्यवस्था महत्वपूर्ण हो जाती है,ऐसे में आयोजकों और प्रशासन की जिम्मेदारी केवल कार्यक्रम स्थल को सजाने तक सीमित नहीं हो सकती,यातायात प्रबंधन, पार्किंग और आसपास के लोगों की सुविधा का भी ध्यान रखना होगा। यदि बार-बार आयोजन के समय वही समस्याएं सामने आती हैं, तो हर बार अस्थायी इंतजाम करने के बजाय स्थायी योजना बनाना जरूरी है,शहर के बीचोंबीच मैदान होना सुविधा हो सकती है,लेकिन हर कार्यक्रम के लिए उसी स्थान को चुनना अपने आप में पर्याप्त तर्क नहीं है,सुविधा किसके लिए है—आयोजकों के लिए,दर्शकों के लिए, या विद्यार्थियों के लिए भी? यही वह सवाल है, जिस पर जिम्मेदारों को विचार करना चाहिए।


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