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अम्बिकापुर@ केशवपुर डीएमएफ मामले में बड़ा न्यायिक आदेश,1.32 करोड़ की कथित गड़बड़ी पर 9 के खिलाफ एफआईआर के निर्देश

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आत्मानंद महाविद्यालय के विकास कार्यों में बिना निविदा भुगतान और बिल-वाउचर को लेकर उठे सवाल,पूर्व जनपद सीईओ,इंजीनियर,सरपंच-सचिव और निर्माण फर्में जांच के दायरे में
-संवाददाता-
अम्बिकापुर,13 अक्टूबर 2026 (घटती-घटना)
। सरकारी धन से विकास कार्य कराने के नाम पर यदि नियमों की अनदेखी और भुगतान में अनियमितता के आरोप सामने आते हैं,तो जवाबदेही तय होना जरूरी है। सरगुजा जिले के केशवपुर स्थित स्वामी आत्मानंद महाविद्यालय के विकास कार्यों से जुड़ा जिला खनिज संस्थान न्यास (डीएमएफ) का मामला अब इसी सवाल को लेकर चर्चा में है। मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट न्यायालय ने 1 करोड़ 32 लाख 33 हजार रुपये की राशि से संबंधित कथित वित्तीय अनियमितताओं के मामले में नौ आरोपितों के खिलाफ एफआईआर दर्ज कर विवेचना करने के निर्देश दिए हैं। आरटीआई कार्यकर्ता अभयनारायण पाण्डेय की ओर से भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 175(3) के तहत प्रस्तुत आवेदन पर यह आदेश दिया गया। शिकायत में आरोप लगाया गया है कि महाविद्यालय के उन्नयन और सौंदर्यीकरण के लिए स्वीकृत राशि के भुगतान में निर्धारित प्रक्रियाओं की अनदेखी की गई। अब पुलिस विवेचना में यह स्पष्ट होगा कि भुगतान किस प्रक्रिया के तहत हुआ,निर्माण कार्यों की वास्तविक स्थिति क्या थी और संबंधित अधिकारियों,पंचायत पदाधिकारियों तथा निर्माण फर्मों की क्या भूमिका रही।
तीन कार्यों के लिए स्वीकृत हुए थे 1.32 करोड़ रुपये
प्रार्थी के अनुसार, 31 मार्च 2023 को केशवपुर स्थित महाविद्यालय के विकास के लिए तीन अलग-अलग प्रशासनिक स्वीकृतियां जारी की गई थीं। गार्डन सौंदर्यीकरण और सीसी रोड निर्माण के लिए 33 लाख 24 हजार रुपये, प्रथम तल पर प्रयोगशाला एवं पुस्तकालय के नवीनीकरण तथा अहाता निर्माण के लिए 49 लाख 57 हजार रुपये और भूतल पर प्राचार्य कक्ष, कार्यालय नवीनीकरण तथा पार्किंग शेड निर्माण के लिए 49 लाख 52 हजार रुपये स्वीकृत किए गए थे। तीनों कार्यों की कुल स्वीकृत राशि 1 करोड़ 32 लाख 33 हजार रुपये थी। इन कार्यों के लिए ग्राम पंचायत केशवपुर को निर्माण एजेंसी बनाया गया था। शिकायत में आरोप है कि तत्कालीन जनपद पंचायत सीईओ सुरेश्वर नाथ तिवारी और उपअभियंता विवेक प्रताप सिंह राठौर ने अपने पद का दुरुपयोग करते हुए सरपंच-सचिव के माध्यम से दो निर्माण फर्मों को भुगतान कराया। आरोप के मुताबिक,खुली निविदा और निर्धारित खरीद प्रक्रिया का पालन किए बिना मेसर्स अनन्या कंस्ट्रक्शन एंड सप्लायर्स तथा मेसर्स स्मृति कंस्ट्रक्शन,कॉन्ट्रैक्टर एंड सप्लायर्स को आरटीजीएस और चेक के माध्यम से राशि हस्तांतरित की गई। प्रार्थी ने यह भी आरोप लगाया है कि निर्माण कार्यों के संबंध में पंचायत को आवश्यक बिल-वाउचर उपलब्ध नहीं कराए गए। इन आरोपों की पुष्टि अब मूल भुगतान अभिलेखों,कार्यादेश,माप पुस्तिका और तकनीकी जांच के आधार पर होनी है।
कलेक्टर की जांच रिपोर्ट में भी अनियमितताओं का उल्लेख : प्रार्थी के मुताबिक,तत्कालीन जिला पंचायत उपाध्यक्ष आदित्येश्वर शरण सिंह देव की शिकायत के बाद कलेक्टर सरगुजा ने चार सदस्यीय जांच दल गठित किया था। इसमें डिप्टी कलेक्टर राम सिंह ठाकुर,लोक निर्माण विभाग के कार्यपालन अभियंता वीरेंद्र कुमार सिंह,जिला पंचायत की एडीपीओ नेहा सिंह और सहायक कोषालय अधिकारी मनोज कुमार शर्मा शामिल थे। शिकायत में दावा किया गया है कि जांच दल ने स्वीकृत प्राक्कलन और तकनीकी नियमों के अनुरूप कार्य नहीं होने तथा वित्तीय अनियमितताओं की ओर संकेत किया था। न्यायालय ने उपलब्ध विवरण के अनुसार जांच दल के सदस्यों के विरुद्ध अपराध बनता नहीं माना,क्योंकि वे जांच समिति में शामिल थे। अब यह भी महत्वपूर्ण होगा कि जांच रिपोर्ट में दर्ज निष्कर्षों के आधार पर प्रशासन ने क्या कार्रवाई की और संबंधित कार्यों की गुणवत्ता तथा भुगतान का स्वतंत्र तकनीकी सत्यापन कराया गया या नहीं।
विद्यार्थियों को मिली सुविधाएं या केवल कागजों में पूरे हुए काम? इस मामले का सबसे महत्वपूर्ण पक्ष यह है कि विकास कार्यों के नाम पर स्वीकृत राशि का वास्तविक लाभ महाविद्यालय और विद्यार्थियों को कितना मिला। प्रयोगशाला, पुस्तकालय, कार्यालय,अहाता और पार्किंग जैसी सुविधाओं के लिए राशि स्वीकृत होने के बाद उनकी वास्तविक स्थिति की जांच जरूरी है। यदि भुगतान के अनुपात में काम नहीं हुआ या निर्धारित गुणवत्ता का पालन नहीं किया गया, तो यह सरकारी धन के उपयोग और निगरानी व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े करेगा। इसके लिए स्थल निरीक्षण, माप पुस्तिका,तकनीकी मूल्यांकन और भुगतान दस्तावेजों का मिलान किया जाना चाहिए।
अब पुलिस विवेचना पर टिकी निगाहें…
न्यायालय के निर्देश के बाद पुलिस को प्राथमिकी दर्ज कर निष्पक्ष विवेचना करनी होगी। जांच में यह स्पष्ट होना चाहिए कि राशि किसके आदेश पर जारी हुई, भुगतान किन खातों में गया, निर्माण किसने कराया और कार्यों का सत्यापन किस स्तर पर किया गया। यदि सरकारी धन के दुरुपयोग की पुष्टि होती है,तो संबंधित व्यक्तियों के विरुद्ध कानून के अनुसार कार्रवाई और राशि की वसूली के लिए कदम उठाए जाने चाहिए। केशवपुर का यह मामला केवल एफआईआर दर्ज करने तक सीमित नहीं रहना चाहिए। प्रशासन को यह भी स्पष्ट करना चाहिए कि स्वीकृत राशि के बदले वास्तव में कितना काम हुआ और विद्यार्थियों को अपेक्षित सुविधाएं मिलीं या नहीं। न्यायालय का आदेश जांच की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है, लेकिन अंतिम निष्कर्ष साक्ष्यों और न्यायिक प्रक्रिया के बाद ही सामने आएगा।
फर्म के दस्तावेज में इंजीनियर का मोबाइल नंबर होने का दावा
मामले में एक महत्वपूर्ण आरोप यह भी है कि स्मृति कंस्ट्रक्शन से संबंधित शासकीय दस्तावेजों में दर्ज मोबाइल नंबर तत्कालीन उपअभियंता विवेक प्रताप सिंह राठौर का था। प्रार्थी के अनुसार,सरपंच और सचिव ने भी अधिकारियों के दबाव में हस्ताक्षर करने की बात कही थी। यदि इन तथ्यों की पुष्टि होती है,तो यह जांच का महत्वपूर्ण पहलू होगा। पुलिस को फर्म के पंजीयन दस्तावेज,बैंक खाते,भुगतान विवरण,बिल-वाउचर और संबंधित व्यक्तियों के बीच व्यावसायिक संबंधों की जांच करनी होगी। केवल मोबाइल नंबर दर्ज होने या किसी व्यक्ति के बयान के आधार पर अपराध सिद्ध नहीं माना जा सकता।
लोकसेवक होने से नहीं मिलता हर आरोप में संरक्षण…
सुनवाई के दौरान लोकसेवकों को मिलने वाले कानूनी संरक्षण का मुद्दा भी उठा। उपलब्ध विवरण के अनुसार,न्यायालय ने आरोपित कृत्यों को शासकीय दायित्व का हिस्सा मानकर संरक्षण देने की दलील स्वीकार नहीं की। हालांकि,एफआईआर दर्ज करने का निर्देश दोष सिद्ध होने के समान नहीं है। संबंधित व्यक्तियों की भूमिका और आरोपों की सत्यता का निर्धारण पुलिस विवेचना तथा न्यायिक प्रक्रिया के आधार पर होगा।
2024 में भी सामने आई थी उन्नयन कार्यों को लेकर खबर…
अगस्त 2024 में एनडीटीवी की एक रिपोर्ट में भी केशवपुर स्थित आत्मानंद महाविद्यालय के उन्नयन के नाम पर डीएमएफ राशि के उपयोग को लेकर आरोपों का उल्लेख किया गया था। उस रिपोर्ट में करीब 1.81 करोड़ रुपये का आंकड़ा सामने आया था। वर्तमान न्यायालयीन प्रकरण के उपलब्ध विवरण में तीन कार्यों की स्वीकृत राशि 1.32 करोड़ 33 हजार रुपये बताई गई है। दोनों आंकड़ों के बीच संबंध स्पष्ट करने के लिए मूल स्वीकृति आदेशों और भुगतान अभिलेखों का मिलान आवश्यक है।


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