- महिला नेत्री का सवाल—क्या कार्यकर्ता अपमान सहने के लिए हैं?
- कोरिया भाजपा में टिकट की दौड़ के बीच घमासान! जिलाध्यक्ष बोले…जमीन पर उतरिए,महिला नेत्री बोलीं…हम गुलाम नहीं…
- देवेंद्र तिवारी की दावेदारों को नसीहत के बीच मंजू जिवनानी ने संभावित उम्मीदवार के भाई पर लगाया गाली-गलौज और धमकी देने का आरोप
- राजनीतिक विश्लेषण टिकट चाहिए तो जनता के बीच जाइए,पहले कार्यकर्ताओं का सम्मान करना सीखिए!
- नेतृत्व की कसौटी जनविश्वास या कार्यकर्ताओं का अपमान? कोरिया भाजपा में दो पोस्ट से सियासी चर्चा तेज
- एक तरफ जिलाध्यक्ष की नसीहत, दूसरी तरफ महिला नेत्री की पीड़ा…कोरिया भाजपा में उठे सवाल
- संगठनात्मक अनुशासन पर भाजपा में टिकट की दावेदारी पर दो टूक संदेश-जमीन पर काम करो,कार्यकर्ताओं का सम्मान करो…
- महिला कार्यकर्ता के मुद्दे पर केंद्रित हम किसी के गुलाम नहीं,अपमान सहने के लिए नहीं…भाजपा नेत्री मंजू जिवनानी की पोस्ट से चर्चा तेज…
- टिकट की चाह में जनसेवा का दावा, लेकिन कार्यकर्ताओं के सम्मान की परीक्षा बाकी!
-रवि सिंह-
बैकुंठपुर/कोरिया,12 अक्टूबर 2026 (घटती-घटना)। नगरीय निकाय चुनाव की तैयारियों के बीच कोरिया जिले की भाजपा राजनीति में सोशल मीडिया पर सामने आई दो पोस्ट ने नई चर्चा छेड़ दी है,भाजपा जिलाध्यक्ष देवेंद्र तिवारी ने अध्यक्ष और पार्षद पद का चुनाव लड़ने की इच्छा रखने वालों को जमीनी स्तर पर काम करने, कार्यकर्ताओं के बीच जाने और जनता का विश्वास अर्जित करने का संदेश दिया है, वहीं,भाजपा की जिला कार्यालय मंत्री एवं महिला मोर्चा से जुड़ी नेत्री मंजू जिवनानी ने अपनी पोस्ट में एक संभावित उम्मीदवार के भाई पर गाली-गलौज करने और धमकी देने का आरोप लगाते हुए महिला कार्यकर्ताओं के आत्मसम्मान पर सवाल उठाए हैं।
एक पोस्ट में नेतृत्व की कसौटी जनसंपर्क, परिश्रम और जनविश्वास को बताया गया है, जबकि दूसरी पोस्ट में संगठन के लिए काम करने वाली महिला कार्यकर्ता के सम्मान का मुद्दा उठाया गया है,निकाय चुनाव की दावेदारी के बीच सामने आए इन दोनों संदेशों ने स्थानीय राजनीतिक हलकों में यह सवाल खड़ा किया है कि टिकट की दौड़ में सक्रियता और लोकप्रियता के साथ कार्यकर्ताओं के प्रति व्यवहार को भी कितनी अहमियत दी जाएगी, हालांकि,दोनों पोस्ट के बीच किसी प्रत्यक्ष संबंध की पुष्टि नहीं हुई है, महिला नेत्री ने अपनी पोस्ट में कथित दुर्व्यवहार करने वाले व्यक्ति का नाम नहीं बताया है,संबंधित व्यक्ति का पक्ष और घटना की स्वतंत्र पुष्टि भी उपलब्ध नहीं है, ऐसे में आरोपों को आरोप के रूप में ही देखा जाना चाहिए।
जिलाध्यक्ष की पोस्ट…दिखावे से दूर रहकर जमीन पर काम कीजिए?
कोरिया भाजपा जिलाध्यक्ष देवेंद्र तिवारी ने अपनी सोशल मीडिया पोस्ट की शुरुआत ‘जय माता दी’ के संबोधन से करते हुए लिखा कि दिखावे से दूर रहकर जमीनी स्तर पर काम करना ही एक सच्चे जनसेवक की पहचान है, उन्होंने अध्यक्ष अथवा पार्षद का चुनाव लड़ने की इच्छा रखने वालों को सोशल मीडिया पर सक्रिय रहने के साथ-साथ कार्यकर्ताओं के बीच जाने,जनमानस से जुड़ने और उनका विश्वास अर्जित करने की सलाह दी, उनकी पोस्ट में स्पष्ट संदेश है कि चुनाव लड़ने की इच्छा रखने वाले लोगों को केवल प्रचार तक सीमित नहीं रहना चाहिए,तिवारी ने लिखा कि मैदान खाली है और जरूरत मैदान में उतरकर परिश्रम करने की है,उन्होंने कार्यकर्ताओं को केवल चुनावों में उपयोग का साधन नहीं, बल्कि जनता के बीच नेतृत्व की विश्वसनीयता की सबसे बड़ी गारंटी बताया,उनके अनुसार, कार्यकर्ताओं के बीच किया गया परिश्रम जनमानस में विश्वास पैदा करता है और यही विश्वास किसी व्यक्ति की वास्तविक जीत का कारण बनता है,पोस्ट का निष्कर्ष भी इसी विचार पर केंद्रित है कि नेतृत्व प्रचार से नहीं, बल्कि परिश्रम, संपर्क और विश्वास से स्थापित होता है।
बैकुंठपुर और शिवपुर-चरचा के दावेदारों के लिए क्या हैं संकेत?
आगामी नगरीय निकाय चुनाव को देखते हुए जिलाध्यक्ष की पोस्ट को संभावित दावेदारों के लिए राजनीतिक नसीहत के तौर पर देखा जा रहा है, बैकुंठपुर और शिवपुर-चरचा में अध्यक्ष तथा पार्षद पद के लिए दावेदारी करने वाले नेताओं के सामने जनता के बीच अपनी स्वीकार्यता और संगठन के साथ अपने तालमेल को प्रदर्शित करने की चुनौती होगी,स्थानीय निकाय चुनावों में वार्ड स्तर का संपर्क, नागरिकों की समस्याओं की समझ, कार्यकर्ताओं के साथ संवाद और नियमित जनसंपर्क महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं,सोशल मीडिया पर अपनी सक्रियता दिखाना और आम लोगों के बीच वास्तविक विश्वास अर्जित करना अलग-अलग बातें हैं,जिलाध्यक्ष की पोस्ट इसी अंतर को रेखांकित करती है,उनका संदेश है कि जो लोग नेतृत्व की जिम्मेदारी चाहते हैं, उन्हें जमीन पर उतरकर काम करना होगा,हालांकि, पोस्ट में किसी खास दावेदार का नाम नहीं लिया गया है और न ही टिकट वितरण के औपचारिक मानदंडों की घोषणा की गई है,इसलिए इसे किसी व्यक्ति विशेष के खिलाफ संदेश मानने के बजाय जमीनी सक्रियता पर केंद्रित संगठनात्मक संदेश के रूप में देखना उचित होगा।
दूसरी पोस्ट ने बदली चर्चा की दिशा, मंजू जिवनानी ने जताई पीड़ा?
जिलाध्यक्ष की पोस्ट के बीच भाजपा नेत्री मंजू जिवनानी की सोशल मीडिया पोस्ट सामने आई, जिसमें उन्होंने अपने साथ कथित गाली-गलौज और धमकी का आरोप लगाया, पोस्ट में उन्होंने स्वयं को भारतीय जनता पार्टी की सामान्य और निष्ठावान महिला कार्यकर्ता बताते हुए लिखा कि वे संगठन को अपना परिवार मानकर समर्पण के साथ काम करती आई हैं,जिवनानी ने आरोप लगाया कि एक संभावित उम्मीदवार के भाई ने उन्हें गालियां दीं और ‘अपनी औकात में रहे, उसे औकात दिखा दूंगा’ जैसी धमकी दी,उन्होंने इसे पीड़ादायक बताते हुए सवाल उठाया कि क्या महिला कार्यकर्ता केवल अपमान और गालियां सहने के लिए हैं? क्या उनके आत्मसम्मान का कोई मूल्य नहीं है? उन्होंने अपनी पोस्ट में यह भी लिखा कि जब संबंधित व्यक्ति अभी उम्मीदवार भी नहीं बना है, तब उसके परिजनों का कथित व्यवहार आगे की स्थिति को लेकर चिंता पैदा करता है,उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि सामान्य कार्यकर्ता किसी के गुलाम नहीं हैं, वे संगठन के लिए समर्पित हैं, लेकिन अपमान सहने के लिए नहीं, पोस्ट के अंत में जिवनानी ने पद की महत्वाकांक्षा रखने वालों को पहले कार्यकर्ताओं का सम्मान करना सीखने की बात कही,उनके संदेश का केंद्र केवल कथित विवाद नहीं, बल्कि संगठन में काम करने वाले कार्यकर्ताओं के आत्मसम्मान का प्रश्न भी है।
आरोपों की पुष्टि जरूरी, संबंधित पक्ष का पक्ष भी अहम-मंजू जिवनानी की पोस्ट में कथित दुर्व्यवहार करने वाले व्यक्ति का नाम नहीं है, पोस्ट में उसे एक संभावित उम्मीदवार का भाई बताया गया है,इसलिए बिना स्वतंत्र पुष्टि के किसी व्यक्ति या दावेदार की पहचान जोड़ना उचित नहीं होगा,इस मामले में यह स्पष्ट होना बाकी है कि कथित घटना कब और कहां हुई, क्या इस संबंध में पार्टी संगठन को औपचारिक शिकायत दी गई है और क्या पुलिस में कोई आवेदन किया गया है, संबंधित व्यक्ति का पक्ष भी सामने आना आवश्यक है, यदि शिकायत की जाती है,तो संबंधित पक्षों के बयान और उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर निष्पक्ष जांच से ही वास्तविक स्थिति स्पष्ट हो सकेगी, महिला नेत्री के आरोप गंभीर हैं, लेकिन जांच और पुष्टि से पहले उन्हें स्थापित तथ्य के रूप में प्रस्तुत नहीं किया जा सकता।
महिला कार्यकर्ताओं के सम्मान का सवाल क्यों बना महत्वपूर्ण?
राजनीतिक संगठनों में महिला कार्यकर्ता संगठनात्मक कार्यक्रमों, जनसंपर्क और चुनावी गतिविधियों में सक्रिय भूमिका निभाती हैं, ऐसे में उनके सम्मान और शिकायतों को गंभीरता से सुनना संगठनात्मक अनुशासन का महत्वपूर्ण हिस्सा है, जिवनानी की पोस्ट ने इसी विषय को सार्वजनिक चर्चा में ला दिया है, उनका सवाल है कि संगठन के प्रति निष्ठा रखने वाली महिला कार्यकर्ता को यदि कथित तौर पर अपमानजनक व्यवहार का सामना करना पड़े, तो उसकी शिकायत को किस तरह सुना जाएगा और उसके आत्मसम्मान की रक्षा कैसे होगी? यह मुद्दा किसी एक राजनीतिक दल तक सीमित नहीं, बल्कि राजनीतिक संगठनों में सम्मानजनक व्यवहार और शिकायतों के निष्पक्ष समाधान से जुड़ा व्यापक प्रश्न है, यदि कोई कार्यकर्ता दुर्व्यवहार की शिकायत करती है, तो तथ्यों की जांच कर उचित निर्णय लेना संगठन की जिम्मेदारी का हिस्सा हो सकता है, फिलहाल, उपलब्ध पोस्ट से यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि संगठन ने शिकायत पर कोई निर्णय लिया है या संबंधित व्यक्ति के विरुद्ध कार्रवाई की है।
इस संबंध में आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने आने पर ही स्थिति अधिक स्पष्ट होगी।
टिकट की दावेदारी के साथ जनविश्वास और व्यवहार की भी परीक्षा
बैकुंठपुर और शिवपुर-चरचा के आगामी नगरीय निकाय चुनाव में संभावित दावेदारों के सामने जनता के बीच अपनी पकड़ मजबूत करने और संगठन के प्रति प्रतिबद्धता प्रदर्शित करने की चुनौती रहेगी,जिलाध्यक्ष की पोस्ट ने इस दिशा में जमीनी काम,जनसंपर्क और कार्यकर्ताओं के विश्वास को महत्व दिया है,वहीं,मंजू जिवनानी की पोस्ट ने कथित दुर्व्यवहार के आरोपों के माध्यम से कार्यकर्ताओं के आत्मसम्मान का सवाल सामने रखा है,अब देखना होगा कि चुनावी तैयारियों के बीच पार्टी संगठन इन मुद्दों को किस तरह संभालता है और संभावित दावेदार जनता तथा कार्यकर्ताओं के बीच अपनी विश्वसनीयता कैसे स्थापित करते हैं,निकाय चुनाव से पहले सामने आए इन दोनों संदेशों का व्यापक राजनीतिक अर्थ यही है कि नेतृत्व की दावेदारी केवल प्रचार तक सीमित नहीं रह सकती,जनता के बीच काम,कार्यकर्ताओं के साथ सम्मानजनक व्यवहार और संगठनात्मक अनुशासन भी विश्वसनीय नेतृत्व के महत्वपूर्ण आधार हैं।
कार्यकर्ताओं को चुनावी साधन नहीं,संगठन की ताकत मानने का संदेश?
देवेंद्र तिवारी की पोस्ट में कार्यकर्ताओं को नेतृत्व की विश्वसनीयता की गारंटी बताया गया है,दूसरी ओर,जिवनानी ने अपनी पोस्ट में कहा है कि कार्यकर्ता संगठन के लिए समर्पित हैं,किसी के गुलाम नहीं,दोनों पोस्ट में कार्यकर्ताओं की भूमिका प्रमुखता से सामने आती है, हालांकि दोनों का संदर्भ अलग है, जिलाध्यक्ष का संदेश चुनाव लड़ने के इच्छुक लोगों को जमीनी परिश्रम और जनविश्वास की अहमियत समझाने पर केंद्रित है,महिला नेत्री की पोस्ट कथित दुर्व्यवहार के आरोप और कार्यकर्ताओं के सम्मान के सवाल पर केंद्रित है,इन दोनों संदेशों के बीच कोई प्रत्यक्ष संबंध स्थापित नहीं हुआ है,लेकिन एक ही चुनावी माहौल में इनका सामने आना संगठनात्मक व्यवहार को लेकर चर्चा का विषय बन गया है, राजनीतिक दावेदारी के दौरान कार्यकर्ताओं के साथ संवाद, सम्मान और तालमेल किस तरह बनाए रखा जाता है, यह भी स्थानीय राजनीति में महत्वपूर्ण हो सकता है।
संगठन की प्रतिक्रिया पर रहेगी नजर- महिला नेत्री की पोस्ट के सार्वजनिक होने के बाद इस विषय पर चर्चा शुरू हुई है,अब यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि भाजपा संगठन इस मामले में क्या रुख अपनाता है, क्या महिला नेत्री की शिकायत को औपचारिक रूप से सुना जाएगा? क्या संबंधित पक्ष से जवाब लिया जाएगा? और यदि आरोपों की पुष्टि होती है, तो क्या नियमानुसार संगठनात्मक कदम उठाए जाएंगे? इन सवालों का जवाब अभी उपलब्ध नहीं है, संगठन की ओर से आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने आने और संबंधित पक्ष का पक्ष मिलने के बाद ही मामले की स्थिति अधिक स्पष्ट होगी।
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