
- सावारावा में 10 करोड़ से अधिक के धान का हिसाब उलझा,धान कम मिला,जांच हुई,कलेक्टर ने लिखा एफआईआर…फिर सरकारी हिसाब में सब ठीक कैसे?
- सावारावा में 32,838 मि्ंटल धान कम, कलेक्टर ने एफआईआर के लिए लिखा, फिर आदेश की फाइल कहां गई?
- कलेक्टर के आदेश की अनुपालना, एफआईआर और बाद के स्टॉक सत्यापन पर उठे गंभीर सवाल
- पहले 32 हजार क्विंटल कम,फिर शॉर्टेज शून्य! सावारावा में धान की ‘जादुई वापसी’ पर सवाल
- जांच में धान गायब,आदेश में एफआईआर फिर फाइल भी गायब? सावारावा का सिस्टम सवालों में…
- धान की 82 हजार बोरी कम मिली, कलेक्टर ने कार्रवाई लिखी,फिर किसने कहा ‘सब ठीक है’?
- कागज में धान का पहाड़, मौके पर आधा,कलेक्टर का आदेश भी फाइलों में दबा?
- 82,095 बोरी का अंतर,10.17 करोड़ की गणना,जांच दल ने पकड़ी कमी,अब सवाल—अगर बाद में शॉर्टेज शून्य हुआ तो धान आया कहां से…दी गई जांच एवं उपचार की सुविधा
-ओंकार पाण्डेय-
सूरजपुर/सावारावा,11 अक्टूबर 2026 (घटती-घटना)। सरकारी धान खरीदी में पारदर्शिता के नाम पर नियमों की लंबी सूची है,ऑनलाइन रिकॉर्ड है, भौतिक सत्यापन है, समितियां हैं,बैंक है, खाद्य विभाग है,सहकारिता विभाग है,प्रशासन है और निगरानी के लिए आधुनिक तकनीक तक का इस्तेमाल किया जा रहा है,लेकिन आदिम जाति सेवा सहकारी समिति धान उपार्जन केंद्र सावारावा की कहानी इन तमाम व्यवस्थाओं के बीच एक ऐसा सवाल खड़ा कर रही है,जिसका जवाब अब केवल धान की बोरियों से नहीं,बल्कि सरकारी आदेश की अनुपालन फाइल से देना पड़ेगा।
2025-26 की धान खरीदी के दौरान सावारावा केंद्र में उच्च स्तरीय जांच दल द्वारा भौतिक सत्यापन किया गया,जांच दल में ओड़गी-भैयाथान क्षेत्र के तहसीलदार,नायब तहसीलदार, खाद्य विभाग के अधिकारी,जिला सहकारी केंद्रीय बैंक ओड़गी शाखा प्रबंधक तथा एसडब्ल्यूसी विश्रामपुर के विशेषज्ञ कर्मचारी शामिल थे,जांच में ऑनलाइन रिकॉर्ड के मुकाबले मौके पर भारी मात्रा में धान कम पाया गया,उपलब्ध जांच प्रतिवेदन के अनुसार 65,813.60 मि्ंटल ऑनलाइन स्टॉक के मुकाबले केवल 32,975.60 मि्ंटल धान भौतिक रूप से उपलब्ध मिला, अंतर 32,838 मि्ंटल यानी 82,095 बोरी बताया गया। 3,100 प्रति मि्ंटल की दर से इसकी अनुमानित राशि 10,17,97,800 बैठती है,यहीं से कहानी खत्म नहीं होती,असल कहानी तो इसके बाद शुरू होती है।
जांच हुई तो धान कम था, अब सवाल-फिर धान आया कहां से?
सावारावा प्रकरण का सबसे सीधा सवाल यही है की 1 फरवरी 2026 को जब जांच टीम पहुंची, तब रिकॉर्ड में मौजूद धान के मुकाबले 32,838 मि्ंटल धान कम था,जांच हुई, स्टॉक की गणना हुई, अंतर दर्ज हुआ, रिपोर्ट तैयार हुई, मामला कलेक्टर कार्यालय तक पहुंचा, और 10 फरवरी 2026 को कलेक्टर कार्यालय से खरीदी प्रभारी रिजवान अंसारी के विरुद्ध प्राथमिक सूचना दर्ज कराने के संबंध में कार्रवाई के लिए पत्र जारी किया गया,अब सवाल यह है कि उसके बाद क्या हुआ? यदि कार्रवाई हुई तो उसका रिकॉर्ड कहां है? यदि एफआईआर दर्ज हुई तो अपराध क्रमांक क्या है? यदि एफआईआर दर्ज नहीं हुई तो कलेक्टर कार्यालय के पत्र पर कार्रवाई क्यों नहीं हुई? और यदि बाद में धान की कमी शून्य अथवा नगण्य हो गई तो वह धान आखिर आया कहां से? यही वह सवाल है जो पूरे मामले को सामान्य स्टॉक अंतर से उठाकर प्रशासनिक जवाबदेही के केंद्र में खड़ा करता है।
कलेक्टर का आदेश क्या सिर्फ कागज था?
सबसे आश्चर्यजनक पहलू यही है कि मामले में उपलब्ध दस्तावेजों के अनुसार कलेक्टर कार्यालय ने कार्रवाई के लिए बाकायदा पत्र जारी किया था, पत्र में सावारावा केंद्र में हुई जांच और स्टॉक के भारी अंतर का उल्लेख करते हुए खरीदी प्रभारी रिजवान अंसारी के विरुद्ध प्राथमिक सूचना दर्ज कराने के लिए कार्रवाई करने को कहा गया, लेकिन अब यदि उस आदेश के बाद भी अपेक्षित कार्रवाई नहीं हुई,तो सवाल उठना स्वाभाविक है क्या कलेक्टर का आदेश केवल फाइल में दर्ज करने के लिए था? क्या आदेश का पालन करने की कोई समयसीमा और निगरानी व्यवस्था नहीं थी? क्या संबंधित शाखा ने कलेक्टर कार्यालय को अनुपालन रिपोर्ट दी? यदि दी तो उसमें क्या लिखा गया? यदि नहीं दी तो क्यों नहीं दी गई? और सबसे बड़ा सवाल— कलेक्टर के आदेश के बाद स्नढ्ढक्र की प्रक्रिया आखिर किस टेबल पर जाकर रुक गई? यही वह बिंदु है जहां आदेश जारी हुआ और आदेश का पालन हुआ के बीच का अंतर सामने आता है।
और विडंबना देखिए…
जांच दल में बैंक शाखा प्रबंधक भी शामिल थे- यह मामला इसलिए भी गंभीर प्रश्न पैदा करता है क्योंकि उपलब्ध जांच प्रतिवेदन के अनुसार जिला सहकारी केंद्रीय बैंक ओड़गी शाखा प्रबंधक जांच दल का हिस्सा थे,यानी जिस भौतिक सत्यापन में स्टॉक का भारी अंतर सामने आया,उस जांच प्रक्रिया में बैंक प्रतिनिधि की मौजूदगी भी थी, इसके बाद कलेक्टर कार्यालय ने उसी खरीदी प्रभारी के विरुद्ध प्राथमिक सूचना दर्ज कराने की कार्रवाई के लिए शाखा प्रबंधक को पत्र भेजा,यानी घटनाक्रम कुछ इस तरह बनता है—जांच दल में शामिल अधिकारी ? स्टॉक की कमी सामने आई ? जांच रिपोर्ट बनी ? कलेक्टर कार्यालय ने कार्रवाई के लिए पत्र जारी किया ? अब सवाल है कि उस आदेश का अनुपालन कहां हुआ? यदि कार्रवाई हुई है तो दस्तावेज सामने आने चाहिए,यदि नहीं हुई तो कारण सामने आना चाहिए,यही पारदर्शिता है।
पहले कम दिखा,फिर पूरा कैसे हुआ?
यही असली जांच का सवाल-मान लीजिए किसी दूसरे सत्यापन में बाद में स्टॉक पूरा पाया गया, तो यह अपने आप में अच्छी बात हो सकती है—लेकिन तब एक दूसरा सवाल पैदा होगा, वह अतिरिक्त धान आया कहां से? किस तारीख को आया? किस वाहन से आया? किस गोदाम या मिल से आया? उसकी तौल कहां हुई? किस गेट एंट्री में दर्ज हुआ? किस स्टॉक रजिस्टर में दर्ज हुआ? ऑनलाइन पोर्टल में किस तारीख को स्टॉक बदला? किस अधिकारी ने उसका सत्यापन किया? क्या उस समय सीसीटीवी फुटेज उपलब्ध था? क्या परिवहन दस्तावेज उपलब्ध हैं? क्या तौल पर्चियां उपलब्ध हैं? और क्या यह पूरा रिकॉर्ड उस 1 फरवरी की जांच रिपोर्ट से मेल खाता है? अगर ये दस्तावेज हैं तो सामने आने चाहिए,और यदि दस्तावेज नहीं हैं,तो फिर 32,838 मि्ंटल के अंतर के बाद शून्य शॉर्टेज तक पहुंचने की कहानी खुद एक स्वतंत्र जांच का विषय बन जाती है।
क्या जांच को समय मिला था? सवाल है,प्रमाण नहीं
यहां एक बेहद गंभीर सवाल उठाया जा रहा है—क्या संबंधित व्यवस्था को बाद में स्टॉक पूरा करने का समय मिला? लेकिन इस बिंदु को अभी निष्कर्ष के रूप में नहीं कहा जा सकता, इसे प्रमाणित करने के लिए तारीखवार रिकॉर्ड की जरूरत होगी,यदि 1 फरवरी को स्टॉक कम था और बाद की किसी तारीख को पूरा हो गया,तो उन दोनों तारीखों के बीच की पूरी गतिविधि जांचनी होगी,1 फरवरी का स्टॉक रिकॉर्ड,उसके बाद की आवक,परिवहन पर्चियां,वाहनों की गेट एंट्री,तौल रिकॉर्ड,बारदाना रिकॉर्ड,ऑनलाइन पोर्टल में बदलाव,सीसीटीवी फुटेज,पुनः भौतिक सत्यापन, यही रिकॉर्ड बताएंगे कि वास्तव में क्या हुआ, सवाल उठाना आसान है,लेकिन इस सवाल का जवाब दस्तावेज से निकलना चाहिए।
खाली बारदाने भी कहानी में मौजूद हैं…
जांच में केवल धान की कमी ही नहीं मिली थी, खाली बारदानों की स्थिति भी दर्ज की गई, भौतिक सत्यापन में 40,750 खाली बारदाने पाए गए, जबकि ऑनलाइन रिकॉर्ड में 32,789 बारदाने दर्ज बताए गए। यानी खाली बारदानों में भी 7,961 नग का अंतर था,जब धान की मात्रा और बारदानों की संख्या दोनों में अंतर सामने आता है तो स्वाभाविक रूप से सवाल उठता है कि खरीदी केंद्र का स्टॉक प्रबंधन किस तरीके से किया जा रहा था, बारदाने कहां से आए? कितने उपयोग हुए? कितने वापस गए? कितने पुराने थे? कितने नए थे? किस रजिस्टर में कितने दर्ज थे? जांच रिपोर्ट ने भौतिक स्थिति दर्ज कर दी है। अब आगे का काम रिकॉर्ड का मिलान करना है।
जांच के समय जिम्मेदार लोग अनुपस्थित,रजिस्टर भी नहीं मिले…
जांच रिपोर्ट के अनुसार समिति प्रबंधक विष्णु प्रताप सिंह और खरीदी प्रभारी रिजवान अंसारी जांच के समय मौजूद नहीं थे,समिति सचिव से संपर्क का प्रयास किया गया और मोबाइल बंद बताया गया। कुछ रजिस्टर उपलब्ध नहीं होने के कारण मौके पर पूर्ण रिकॉर्ड मिलान नहीं हो पाया, यह स्थिति अपने आप में जांच का विषय है, क्योंकि जिस दिन किसी केंद्र के स्टॉक का उच्चस्तरीय भौतिक सत्यापन हो रहा हो, उसी दिन जिम्मेदार व्यक्ति मौजूद नहीं हों और आवश्यक अभिलेख भी मौके पर उपलब्ध न हों, तो जांच के बाद सवाल उठना स्वाभाविक है, धान कम मिला—जिम्मेदार नहीं मिले,रजिस्टर मांगा—रजिस्टर पूरा नहीं मिला,जांच हुई—अंतर सामने आया,कलेक्टर ने कार्रवाई के लिए लिखा—अब कार्रवाई कहां है? यही पूरी कहानी का सबसे तीखा व्यंग्य है।
एआई कैमरा भी सवालों के घेरे में लेकिन इसकी जांच जरूरी…
शासन द्वारा धान खरीदी केंद्रों की निगरानी और पारदर्शिता के उद्देश्य से एआई कैमरा लगाए जाने की बात आपके उपलब्ध तथ्यों में कही गई है, सावारावा प्रकरण में अब सवाल यह भी उठता है कि यदि केंद्र पर ऐसी निगरानी व्यवस्था सक्रिय थी,तो इतने बड़े स्टॉक अंतर के दौरान उसका रिकॉर्ड क्या कहता है, क्या कैमरा लगातार सक्रिय था? क्या उसका डेटा सुरक्षित है? क्या 1 फरवरी के आसपास की रिकॉर्डिंग उपलब्ध है? क्या उसमें धान की आवक-जावक दिखाई देती है? क्या परिवहन और स्टॉक की स्थिति का मिलान कैमरा रिकॉर्ड से किया गया? यदि कैमरा लगा था लेकिन इस मामले की वास्तविक स्थिति पकड़ने में उसकी भूमिका सामने नहीं आई,तो उसकी उपयोगिता पर भी सवाल उठेंगे,लेकिन यहां भी निष्कर्ष निकालने के बजाय कैमरा डेटा की स्वतंत्र जांच जरूरी है, क्योंकि कैमरा लगा होना और कैमरे की निगरानी प्रभावी होना—दो अलग बातें हैं।
सहकारिता विभाग की भूमिका भी सवालों से बाहर नहीं
सावारावा का मामला केवल एक खरीदी प्रभारी तक सीमित करके समाप्त कर देना पूरे घटनाक्रम को छोटा कर देगा, क्योंकि धान खरीदी सहकारी समितियों की व्यवस्था से जुड़ी है,रिकॉर्ड, समिति संचालन,बैंकिंग व्यवस्था, खरीदी प्रक्रिया,स्टॉक और प्रशासनिक निगरानी—इन सभी स्तरों पर अलग-अलग जिम्मेदारियां हैं, ऐसे में यदि एक केंद्र पर 32,838 मि्ंटल का अंतर सामने आया,तो सवाल यह भी होना चाहिए कि नियमित निगरानी के दौरान यह अंतर पहले क्यों नहीं दिखाई दिया? क्या समय-समय पर स्टॉक मिलान हुआ? क्या समिति के रिकॉर्ड की जांच हुई? क्या ऑनलाइन और भौतिक स्टॉक का मिलान किया गया? यदि हुआ तो उस समय अंतर क्यों नहीं पकड़ा गया? और यदि नहीं हुआ तो निगरानी व्यवस्था का उद्देश्य क्या रह गया?
पहले चोरी करो,पकड़े जाओ तो सामान वहीं रख दो…
क्या व्यवस्था इतनी आसान है?-यही वह व्यंग्य है जो सावारावा प्रकरण सबसे तीखे तरीके से सामने रखता है,यदि किसी सरकारी स्टॉक में भारी कमी मिलती है, जांच होती है,कार्रवाई के लिए आदेश निकलता है और उसके बाद यदि वही कमी किसी तरह समाप्त हो जाती है,तो क्या केवल इसलिए मामला खत्म हो जाना चाहिए? क्या सरकारी स्टॉक की कमी का हिसाब बाद में माल रखकर बराबर किया जा सकता है? क्या जांच के समय उपलब्ध नहीं था तो बाद में उपलब्ध कराना पर्याप्त है? क्या कार्रवाई से बचने के लिए बाद का स्टॉक पहले की कमी को स्वतः समाप्त कर देता है? बिल्कुल नहीं—अगर ऐसा हुआ है तो इसकी वैधता और प्रक्रिया दस्तावेजों से जांची जानी चाहिए,क्योंकि सरकारी रिकॉर्ड कोई ऐसा ब्लैकबोर्ड नहीं है जिसे गलती पकड़े जाने के बाद मिटाकर फिर से साफ कर दिया जाए।
अब सबसे बड़ा सवाल-शून्य शॉर्टेज आया कहां से?
सावारावा मामले की पूरी कहानी का सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यही है, 1 फरवरी 2026 को जांच में 32,838 मि्ंटल की कमी थी,यदि बाद में यह कमी शून्य दिखाई गई है,तो यह अपने आप में जांच का विषय है,कमी शून्य कैसे हुई? किस रिकॉर्ड के आधार पर हुई? किस अधिकारी ने सत्यापित किया? किस तारीख को सत्यापित किया? क्या वही जांच टीम दोबारा गई? क्या अलग टीम गई? क्या धान की वास्तविक भौतिक गिनती हुई? क्या बाद में धान आया? अगर आया तो कहां से आया? किसके वाहन से आया? किस रजिस्टर में दर्ज हुआ? क्या ऑनलाइन रिकॉर्ड में उसका समय दर्ज है? क्या सीसीटीवी में उसकी पुष्टि होती है? जब तक इन सवालों के जवाब दस्तावेजों से नहीं मिलते,तब तक शून्य शॉर्टेज केवल एक नया सवाल है,समाधान नहीं।
सावारावा प्रकरण में अब जांच का दायरा बढ़ना चाहिए…
अब केवल यह जांचना पर्याप्त नहीं होगा कि 32,838 मि्ंटल धान कम क्यों था,जांच को यह भी देखना चाहिए कि 1 फरवरी की जांच के बाद स्टॉक में क्या परिवर्तन हुआ,10 फ रवरी के कलेक्टर आदेश पर क्या कार्रवाई हुई,एफआईआर की प्रक्रिया किस स्तर तक गई,संबंधित बैंक शाखा ने क्या किया, पुलिस को क्या दस्तावेज मिले, सहकारिता विभाग ने क्या कार्रवाई की, बाद में कोई पुनः सत्यापन हुआ या नहीं,यदि हुआ तो उसकी रिपोर्ट क्या कहती है, यदि कमी समाप्त हुई तो धान की आवक का दस्तावेजी स्रोत क्या है, और यदि कमी समाप्त नहीं हुई तो 10.17 करोड़ के अनुमानित अंतर का वर्तमान हिसाब क्या है।
सवाल अब रिजवान अंसारी से आगे बढ़कर पूरे सिस्टम से है
रिजवान अंसारी का नाम कलेक्टर कार्यालय के 10 फरवरी 2026 के पत्र में खरीदी प्रभारी के विरुद्ध प्राथमिक सूचना दर्ज कराने की कार्रवाई के संदर्भ में आता है,इसका अर्थ यह नहीं कि आरोप सिद्ध हो गए; अंतिम जिम्मेदारी जांच और विधिक प्रक्रिया से तय होगी,लेकिन इससे एक महत्वपूर्ण सवाल जरूर पैदा होता है जिस व्यक्ति के विरुद्ध कार्रवाई के लिए कलेक्टर कार्यालय ने पत्र जारी किया, उस कार्रवाई का अंतिम परिणाम क्या हुआ? यह सवाल किसी एक व्यक्ति को दोषी ठहराने के लिए नहीं,बल्कि प्रशासनिक जवाबदेही तय करने के लिए है,क्योंकि यदि कार्रवाई हुई है तो रिकॉर्ड सामने आना चाहिए,और यदि कार्रवाई नहीं हुई तो उसके कारण भी सामने आने चाहिए।
सहकारिता में पहुंच की चर्चा लेकिन जांच दस्तावेज से हो…
क्षेत्र में यह सवाल उठाया जा रहा है कि क्या सहकारिता व्यवस्था में प्रभाव या पहुंच के कारण कार्रवाई प्रभावित हुई, लेकिन किसी व्यक्ति या अधिकारी पर ऐसा आरोप बिना प्रमाण लगाना उचित नहीं होगा, हां, यह जरूर पूछा जा सकता है कि यदि कलेक्टर कार्यालय से कार्रवाई के लिए पत्र जारी हुआ था और फिर भी कार्रवाई आगे नहीं बढ़ी,तो फाइल की मूवमेंट सार्वजनिक क्यों नहीं है? किस अधिकारी ने क्या किया? किसे पत्र भेजा? किसने प्राप्त किया? किसने जवाब दिया? किस तारीख को जवाब दिया? क्या पुलिस को दस्तावेज भेजे गए? क्या एफआईआर दर्ज हुई? अगर नहीं हुई तो किस आधार पर नहीं हुई? यही वे सवाल हैं जिनसे कथित मैनेजमेंट की चर्चा को प्रमाण या खंडन में बदला जा सकता है।
क्या कलेक्टर के आदेश की अवहेलना हुई? यह जांच का विषय क्यों नहीं होना चाहिए?
कलेक्टर कार्यालय के उपलब्ध पत्र में खरीदी प्रभारी के विरुद्ध प्राथमिक सूचना दर्ज कराने के संबंध में कार्रवाई के निर्देश का उल्लेख है, इसलिए यदि उस आदेश का पालन नहीं हुआ,तो यह सिर्फ धान खरीदी का मामला नहीं रह जाता,यह प्रशासनिक आदेश के अनुपालन का प्रश्न बन जाता है, और अगर आदेश का पालन हुआ है तो सरकार को उसका रिकॉर्ड सामने रखने में कोई परेशानी नहीं होनी चाहिए, एफआईआर हुई है तो अपराध क्रमांक बताइए, एफआईआर नहीं हुई तो कारण बताइए,जांच आगे बढ़ी है तो केस डायरी/जांच की स्थिति बताइए, स्टॉक दोबारा सत्यापित हुआ है तो रिपोर्ट बताइए, कमी समाप्त हुई है तो धान की आवक का हिसाब बताइए,यही पारदर्शिता है।
घटती-घटना – Ghatati-Ghatna – Online Hindi News Ambikapur घटती-घटना – Ghatati-Ghatna – Online Hindi News Ambikapur