अधीक्षक को साफ-सफाई,भोजन,स्वास्थ्य और सुरक्षा व्यवस्था दुरुस्त रखने क ा दिया निर्देश
-रवि सिंह-
कोरिया,07 अक्टूबर 2026 (घटती-घटना)। सोनहत विकासखंड के दूरस्थ ग्राम बंशीपुर स्थित बालक छात्रावास में कलेक्टर रोक्तिमा यादव ने पहुंचकर वहां की व्यवस्थाओं का जायजा लिया, निरीक्षण के दौरान उन्होंने छात्रावास में रह रहे बच्चों से सीधे संवाद किया और उनकी पढ़ाई-लिखाई,भोजन,स्वास्थ्य तथा रहने की सुविधाओं के बारे में जानकारी ली,निरीक्षण के दौरान कलेक्टर ने केवल भौतिक व्यवस्थाओं को नहीं देखा,बल्कि बच्चों से उनकी दिनचर्या,पढ़ाई और भविष्य को लेकर भी बातचीत की। जिला प्रशासन की ओर से छात्रावासों में बच्चों को बेहतर सुविधाएं उपलब्ध कराने और नियमित निगरानी पर जोर दिया जा रहा है,जिला प्रशासन की वेबसाइट पर भी रोक्तिमा यादव को वर्तमान कलेक्टर एवं जिला दंडाधिकारी के रूप में दर्ज किया गया है।
बिस्तर से लेकर पंखे और साफ-सफाई तक की जांच-कलेक्टर ने छात्रावास के शयनकक्षों का निरीक्षण किया और बच्चों के लिए उपलब्ध बिस्तर,चादर,कंबल,पंखे तथा साफ-सफाई की स्थिति देखी,उन्होंने अधीक्षक को निर्देशित किया कि बच्चों के उपयोग में आने वाली सभी आवश्यक सामग्री व्यवस्थित और साफ-सुथरी रखी जाए,उन्होंने कहा कि छात्रावास में रहने वाले बच्चों को किसी प्रकार की असुविधा नहीं होनी चाहिए,उनके स्वास्थ्य और सुविधा को प्राथमिकता देते हुए व्यवस्थाओं की नियमित निगरानी जरूरी है,कलेक्टर ने छात्रावास की खिड़कियों में उचित जाली लगाने के निर्देश भी दिए,ताकि बच्चों को असुविधा न हो और सुरक्षा व्यवस्था बेहतर बनी रहे,उन्होंने अधीक्षक का नियमित रात्रि प्रवास सुनिश्चित करने को कहा…साथ ही स्पष्ट किया कि छात्रावास की व्यवस्था में लापरवाही या अव्यवस्था मिलने पर जिम्मेदारी तय करते हुए कार्रवाई की जा सकती है।
जब छात्र ने पूछा…‘कलेक्टर बनने के लिए क्या करना होगा? ‘- निरीक्षण के दौरान एक छात्र ने कलेक्टर से ऐसा सवाल किया, जिसने पूरे संवाद को एक अलग दिशा दे दी, छात्र ने उत्सुकता से पूछा…‘कलेक्टर बनने के लिए क्या करना होगा?’ छात्र की इस जिज्ञासा पर कलेक्टर रोक्तिमा यादव ने प्रसन्नता व्यक्त की और उसे विस्तार से समझाया। उन्होंने कहा कि जीवन में किसी भी बड़े लक्ष्य को हासिल करने के लिए सबसे पहले लक्ष्य तय करना जरूरी है, इसके बाद उस लक्ष्य के लिए नियमित मेहनत, अनुशासन और धैर्य के साथ आगे बढ़ना चाहिए, उन्होंने बताया कि कलेक्टर,पुलिस अधिकारी, डॉक्टर,इंजीनियर या वैज्ञानिक बनने के लिए विद्यार्थियों को अपनी रुचि के अनुसार लक्ष्य निर्धारित कर उसी दिशा में तैयारी करनी चाहिए, 12वीं के बाद स्नातक की पढ़ाई पूरी करने के पश्चात यूपीएससी या पीएससी जैसी प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी की जा सकती है,उन्होंने विद्यार्थियों को नियमित अध्ययन के साथ प्रतियोगी परीक्षाओं से संबंधित पुस्तकों का अध्ययन करने,समाचार-पत्र पढ़ने और देश-दुनिया के सामान्य ज्ञान को मजबूत करने की सलाह दी,कलेक्टर ने छात्र से कहा कि सफलता के लिए केवल सपना देखना पर्याप्त नहीं है, बल्कि उस सपने को पूरा करने के लिए लगातार मेहनत करनी पड़ती है,लक्ष्य के प्रति अनुशासन और धैर्य बनाए रखना सफलता की महत्वपूर्ण कुंजी है,छात्र की जिज्ञासा और उसके लक्ष्य को लेकर उत्सुकता की कलेक्टर ने सराहना की, उन्होंने उसे पेन भेंट किया और जीवन में खूब तरक्की करने का आशीर्वाद दिया।
सभी छात्रावासों की नियमित निगरानी के निर्देश-निरीक्षण के दौरान कलेक्टर ने जिला आदिम जाति विकास विभाग के सहायक आयुक्त को जिले में संचालित सभी छात्रावासों का नियमित निरीक्षण करने के निर्देश दिए,उन्होंने कहा कि प्रत्येक छात्रावास में बच्चों को आवश्यक सुविधाएं मिलें और व्यवस्थाओं की लगातार निगरानी होती रहे,उन्होंने छात्रावास अधीक्षक और शिक्षकों को यह भी समझाया कि बच्चों के साथ काम करना केवल नौकरी का दायित्व नहीं है,सेवा का वास्तविक अर्थ बच्चों के भविष्य को संवारना,उनकी भावनाओं को समझना और उन्हें आगे बढ़ने का अवसर देना है,उन्होंने शासन की मंशा के अनुरूप जिम्मेदारी से कार्य करने और बच्चों की सुविधाओं एवं शिक्षा को प्राथमिकता देने की बात कही।
निरीक्षण का बड़ा संदेश
बंशीपुर जैसे दूरस्थ क्षेत्र के छात्रावास में कलेक्टर का निरीक्षण केवल व्यवस्थाओं की जांच तक सीमित नहीं रहा,एक ओर जहां उन्होंने बिस्तर,भोजन,साफ-सफाई,स्वास्थ्य और सुरक्षा जैसी बुनियादी सुविधाओं को परखा,वहीं दूसरी ओर बच्चों से सीधे संवाद कर उनकी पढ़ाई और भविष्य की आकांक्षाओं को जानने का प्रयास किया,खास तौर पर कलेक्टर बनने को लेकर छात्र का सवाल और उस पर मिला मार्गदर्शन इस निरीक्षण का प्रेरणादायी पहलू रहा। यह संवाद इस बात की ओर भी संकेत करता है कि दूरस्थ क्षेत्र में रहने वाले बच्चों के सपने किसी बड़े शहर के बच्चों से छोटे नहीं होते—जरूरत उन्हें सही मार्गदर्शन,अवसर और प्रोत्साहन देने की है, जिला प्रशासन द्वारा छात्रावासों के नियमित निरीक्षण पर जोर दिया जा रहा है। हाल की समय-सीमा बैठक में भी कलेक्टर ने आदिम जाति विकास विभाग के अधिकारी को जिले के सभी छात्रावासों का नियमित निरीक्षण करने और विद्यार्थियों को आवश्यक सुविधाएं सुनिश्चित करने के निर्देश दिए थे।
बच्चों से पूछा…पढ़ाई कैसी चल रही है?
निरीक्षण के दौरान कलेक्टर ने बच्चों से सहज माहौल में बातचीत की,उन्होंने उनसे पूछा कि पढ़ाई कैसी चल रही है,नियमित रूप से नाश्ता और भोजन मिल रहा है या नहीं तथा स्वास्थ्य परीक्षण की व्यवस्था कैसी है, कलेक्टर ने इस बात पर जोर दिया कि छात्रावास केवल बच्चों के रहने और भोजन की व्यवस्था तक सीमित नहीं होना चाहिए,यहां रहने वाले विद्यार्थियों को ऐसा वातावरण मिलना चाहिए,जहां वे पढ़ाई के साथ अपने व्यक्तित्व और आत्मविश्वास को भी विकसित कर सकें,उन्होंने कहा कि बच्चों की शिक्षा की गुणवत्ता पर लगातार ध्यान दिया जाना आवश्यक है, इसके लिए पढ़ाई के साथ सामान्य ज्ञान,खेलकूद,योग और अन्य रचनात्मक गतिविधियों को भी छात्रावास की दिनचर्या का हिस्सा बनाया जाना चाहिए।
हर शनिवार होगी रचनात्मक गतिविधियां
कलेक्टर ने छात्रावास में प्रत्येक शनिवार को विशेष गतिविधियां आयोजित करने के निर्देश दिए, इनमें सामान्य ज्ञान, समाचार-पत्र वाचन, खेलकूद और योगाभ्यास जैसी गतिविधियां शामिल हैं, उन्होंने बच्चों में अपनी बात रखने और सार्वजनिक रूप से संवाद करने का आत्मविश्वास विकसित करने के लिए वाद-विवाद जैसी रचनात्मक गतिविधियां आयोजित करने पर भी जोर दिया, कलेक्टर ने कहा कि बच्चों के साथ दोस्ताना व्यवहार किया जाना चाहिए,ताकि वे अपनी समस्याओं, सवालों और मन की बात को बिना झिझक सामने रख सकें, बच्चों के मन में किसी अधिकारी या शिक्षक को लेकर डर के बजाय संवाद और विश्वास का वातावरण होना जरूरी है।
छात्रावास को सिर्फ रहने की जगह नहीं,सीखने का केंद्र बनाने पर जोर
बंशीपुर छात्रावास के निरीक्षण के दौरान सामने आया सबसे महत्वपूर्ण संदेश यही रहा कि बच्चों के लिए छात्रावास की व्यवस्था केवल भोजन,बिस्तर और भवन तक सीमित नहीं होनी चाहिए। दूरस्थ क्षेत्रों से आकर छात्रावास में रहने वाले बच्चों को बेहतर शैक्षणिक वातावरण,मार्गदर्शन और व्यक्तित्व विकास के अवसर भी मिलना जरूरी है,इस दृष्टि से सामान्य ज्ञान,समाचार-पत्र वाचन,खेल,योग और वाद-विवाद जैसी गतिविधियां बच्चों में आत्मविश्वास बढ़ाने का माध्यम बन सकती हैं, वहीं कलेक्टर और बच्चों के बीच सीधे संवाद से उनकी समस्याओं और जिज्ञासाओं को समझने का अवसर भी मिलता है।
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