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अम्बिकापुर@टीबी मरीज का इलाज ही नहीं,परिवार का बचाव भी जरूरी

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संक्रमण की श्रृंखला तोडने सरकारी-निजी डॉक्टर एकजुट,संपर्क में रहने वालों की जांच और बचाव उपचार पर जोर

-संवाददाता-
अम्बिकापुर,07 अक्टूबर 2026 (घटती-घटना)। सरगुजा को टीबी मुक्त बनाने के लिए अब मरीज के उपचार के साथ उसके परिवार और निकट संपर्क में रहने वाले लोगों को संक्रमण से बचाने पर भी विशेष जोर दिया जाएगा। इसके लिए शासकीय और निजी चिकित्सकों ने मिलकर काम करने का संकल्प लिया है। द इंटरनेशनल यूनियन अगेंस्ट ट्यूबरकुलोसिस एंड लंग डिजीज (द यूनियन) एवं राष्ट्रीय क्षय उन्मूलन कार्यक्रम, सरगुजा के संयुक्त तत्वावधान में अंबिकापुर में आयोजित चिकित्सकीय कार्यशाला में इस रणनीति पर चर्चा की गई। जिला क्षय रोग अधिकारी, सरगुजा राष्ट्रीय क्षय उन्मूलन कार्यक्रम अधिकारी डॉ. शैलेन्द्र गुप्ता ने बताया कि टीबी के जीवाणु से संक्रमित होना और सक्रिय टीबी रोग होना अलग-अलग स्थिति है। संक्रमित हर व्यक्ति में बीमारी विकसित नहीं होती, लेकिन रोग प्रतिरोधक क्षमता कमजोर होने सहित अन्य परिस्थितियों में निष्कि्रय संक्रमण भविष्य में सक्रिय टीबी का रूप ले सकता है। सक्रिय फेफड़ों की टीबी से पीडि़त अनुपचारित मरीज से एक वर्ष में करीब 10 से 15 लोगों तक संक्रमण फैलने की आशंका रहती है। इसलिए मरीज की शीघ्र पहचान और पूर्ण उपचार के साथ उसके संपर्क में रहने वाले लोगों की जांच जरूरी है। वरिष्ठ मेडिसिन विशेषज्ञ डॉ. जीके सिंह ने बताया कि टीबी के जीवाणु से संक्रमित लोगों में करीब 5 से 10 प्रतिशत को जीवनकाल में सक्रिय टीबी विकसित होने का खतरा हो सकता है। इसलिए मरीज की पहचान होते ही परिवार और निकट संपर्क में रहने वाले जोखिम वाले लोगों की जांच कर सक्रिय टीबी को बाहर करना तथा पात्र लोगों को बचाव उपचार से जोडऩा जरूरी है। कार्यशाला में डॉ. हर्षप्रीत सिंह, डॉ. अमित सिंह, डॉ. प्रतीक खरे, पैथोलॉजिस्ट डॉ. अल्का सिंह, डॉ. आकाश सिंह,रेडियोलॉजिस्ट डॉ. दीपिका भगत,एंडोक्राइनोलॉजिस्ट डॉ. अवनी और स्त्री रोग विशेषज्ञ डॉ. स्नेहा सिंह सहित विशेषज्ञ चिकित्सकों ने टीबी संक्रमण की रोकथाम और उपलब्ध बचाव उपचार की जानकारी दी। चिकित्सकों ने स्पष्ट किया कि सक्रिय टीबी की संभावना को जांच के माध्यम से बाहर करने के बाद ही बचाव की दवाएं दी जानी चाहिए। मुख्य अतिथि सिविल सर्जन डॉ. जेके रेलवानी ने शासकीय चिकित्सालय में टीबी मरीजों के लिए उपलब्ध जांच एवं उपचार सुविधाओं की जानकारी दी। उन्होंने बताया कि क्षय नियंत्रण केंद्र में टीबी रोग विशेषज्ञ डॉ. कमल नारायण गुप्ता नियमित सेवाएं दे रहे हैं। होली क्रॉस हॉस्पिटल की संचालिका सिस्टर ममता एवं डॉ. मधु ने मरीजों के परिवार और पात्र संपर्क व्यक्तियों को बचाव उपचार से जोडऩे में संस्थान की सहभागिता का भरोसा दिलाया। संगवारी संस्थान के डॉ. चैतन्य मलिक, डॉ. पवन मिखले और डॉ. धीरज संगवारी ने ग्रामीण व दूरस्थ क्षेत्रों में मरीजों की पहचान और संपर्क व्यक्तियों को स्वास्थ्य सेवाओं से जोडऩे की चुनौतियां बताईं। द यूनियन के प्रतिनिधि अंशुल हुडा ने कहा कि बड़ी संख्या में संभावित टीबी मरीज सबसे पहले निजी चिकित्सकों और अस्पतालों में पहुंचते हैं। इसलिए निजी चिकित्सक टीबी उन्मूलन की महत्वपूर्ण कड़ी हैं।
मरीज के उपचार के साथ उसके परिवार और निकट संपर्क में रहने वालों की जानकारी लेकर उन्हें भी राष्ट्रीय क्षय उन्मूलन कार्यक्रम से जोडऩा जरूरी है।


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