समाजसेवी साहित्यकार संवर्त कुमार ‘रूप’ ने कहा-भौगोलिक स्थिति, ऐतिहासिक विरासत और क्षेत्रीय जरूरतों के लिहाज से कोरिया को संभाग का दर्जा देने पर हो गंभीर विचार
-रवि सिंह-
कोरिया/बैकुण्ठपुर,06 अक्टूबर 2026 (घटती-घटना)। छत्तीसगढ़ की प्रशासनिक व्यवस्था में कोरिया को संभाग बनाने की मांग एक बार फिर चर्चा में है, समाजसेवी एवं साहित्यकार संवर्त कुमार रुद्र प्रसाद ‘रूप’ ने कोरिया की वर्तमान स्थिति, भौगोलिक परिस्थितियों, ऐतिहासिक पहचान और प्रशासनिक जरूरतों को सामने रखते हुए जिले को संभाग का दर्जा देने की मांग पुरजोर तरीके से उठाई है।
उनका कहना है कि 28 मई 1998 को जिला बनने के बाद कोरियावासियों ने विकास और बेहतर प्रशासन की उम्मीद की थी, लेकिन समय के साथ हुए प्रशासनिक पुनर्गठन और जिले के भू-भाग में कमी के कारण क्षेत्र के सामने नई चुनौतियां खड़ी हुई हैं,उनका तर्क है कि कोरिया को संभाग का दर्जा मिलने से केवल बैकुण्ठपुर या कोरिया जिले को ही लाभ नहीं होगा, बल्कि आसपास के क्षेत्रों के लिए भी प्रशासनिक और आर्थिक गतिविधियों का नया केंद्र विकसित हो सकता है, वर्तमान में कोरिया जिला सरगुजा संभाग के अंतर्गत आता है, जबकि जिला प्रशासन की आधिकारिक वेबसाइट के अनुसार जिले में वर्तमान में दो विकासखंड और चार तहसील हैं।
विभाजन के बाद बदली तस्वीर पर उठाए सवाल- संवर्त कुमार ‘रूप’ का कहना है कि पूर्ववर्ती प्रशासनिक पुनर्गठन के बाद कोरिया का स्वरूप काफी बदल गया, उनके अनुसार पहले पांच विकासखंडों वाले जिले का भूगोल बाद में सीमित होकर कोरिया और सोनहत तक रह गया, वे इसे क्षेत्र के विकास की दृष्टि से असमान पुनर्गठन मानते हैं,उनका कहना है कि प्रशासनिक सीमाओं में बदलाव का असर केवल नक्शे तक सीमित नहीं रहता, इसका प्रभाव राजस्व, रोजगार,व्यापार,प्रशासनिक गतिविधियों और निवेश की संभावनाओं पर भी पड़ता है, उनके अनुसार क्षेत्र में रोजगार के पर्याप्त अवसर नहीं होने से युवाओं का दूसरे शहरों और राज्यों की ओर पलायन चिंता का विषय बन रहा है,वहीं प्रशासनिक गतिविधियां सीमित होने से स्थानीय बाजार और व्यापार पर भी इसका प्रभाव पड़ने की बात वे रखते हैं।
पुरानी विरासत और जर्जर ढांचे का भी मुद्दा-संवर्त कुमार ‘रूप’ ने कोरिया की ऐतिहासिक विरासत और पुराने भवनों की स्थिति को भी अपनी मांग से जोड़ा है,उनका कहना है कि पुराने सिविल लाइन क्षेत्र,न्यायालय-तहसील से जुड़े पुराने भवन तथा ऐतिहासिक रामानुज क्लब जैसी इमारतों का संरक्षण जरूरी है,उनके अनुसार कोरिया केवल एक प्रशासनिक जिला नहीं,बल्कि ऐतिहासिक पृष्ठभूमि वाला क्षेत्र है, इसलिए विकास की योजना में आधुनिक अधोसंरचना के साथ पुरानी विरासत के संरक्षण को भी स्थान मिलना चाहिए।
संभाग बनने से क्या बदल सकता है?-‘रूप’ का तर्क है कि संभाग का दर्जा केवल प्रशासनिक नाम बदलने तक सीमित नहीं होना चाहिए,बल्कि इसके साथ क्षेत्रीय स्तर पर विभिन्न विभागों और संस्थाओं का विस्तार हो सकता है,उनका कहना है कि यदि कोरिया को संभाग बनाया जाता है तो यहां प्रशासनिक कार्यालयों का विस्तार,शिक्षा एवं स्वास्थ्य संस्थानों की स्थापना, रोजगार के नए अवसर और व्यापारिक गतिविधियों को बढ़ावा देने की संभावनाएं बन सकती हैं,हालांकि संभाग बनने से मेडिकल कॉलेज,सुपर-स्पेशलिटी अस्पताल या औद्योगिक कॉरिडोर स्वतः स्थापित होना अनिवार्य नहीं है,इन संस्थानों के लिए अलग-अलग शासन स्तर के निर्णय,बजट और स्वीकृति की आवश्यकता होगी। इसलिए इन संभावनाओं को मांग रखने वाले पक्ष की अपेक्षा के रूप में देखा जाना चाहिए।
‘उत्तर छत्तीसगढ़ की नई इकोनॉमिक कैपिटल’ बनाने की सोच-संवर्त कुमार ‘रूप’ का कहना है कि कोरिया की स्थिति ऐसी है कि यदि इसे संभागीय मुख्यालय के रूप में विकसित किया जाए तो बैकुण्ठपुर क्षेत्र आसपास के जिलों के लिए भी आर्थिक और प्रशासनिक गतिविधियों का केंद्र बन सकता है,उनके शब्दों में, ‘यदि कोरिया को संभाग बनाया जाता है तो यह केवल बैकुण्ठपुर या कोरिया का विकास नहीं होगा,बल्कि उत्तर छत्तीसगढ़ की एक नई इकोनॉमिक कैपिटल के रूप में उभरने की संभावना बनेगी,उनका मानना है कि इससे आसपास के क्षेत्रों को भी शिक्षा, स्वास्थ्य, व्यापार, परिवहन और प्रशासनिक सुविधाओं का लाभ मिल सकता है।
भौगोलिक स्थिति और ऐतिहासिक पहचान को आधार– संवर्त कुमार ‘रूप’ ने कोरिया की भौगोलिक स्थिति, ऐतिहासिक महत्ता,निश्चित भू-भाग और अवसर की समता को संभाग बनाए जाने के पक्ष में प्रमुख आधार बताया है,उनका कहना है कि किसी क्षेत्र के प्रशासनिक पुनर्गठन का उद्देश्य केवल प्रशासनिक सीमाएं निर्धारित करना नहीं,बल्कि नागरिकों को बेहतर सुविधाएं उपलब्ध कराना और क्षेत्रीय विकास को संतुलित करना होना चाहिए,इसी आधार पर वे कोरिया को संभाग बनाने की मांग को केवल स्थानीय मांग न मानकर उत्तर छत्तीसगढ़ के व्यापक विकास से जोड़कर देखने की अपील कर रहे हैं।
मुद्दा अब प्रशासनिक निर्णय से आगे जनचर्चा का-कोरिया को संभाग बनाने की मांग पर अंतिम निर्णय शासन स्तर पर होना है, इसके लिए क्षेत्रफल,जनसंख्या,प्रशासनिक आवश्यकता,आर्थिक क्षमता,मौजूदा संभागीय संरचना,वित्तीय प्रभाव और आसपास के जिलों पर संभावित प्रभाव जैसे विभिन्न पहलुओं का अध्ययन जरूरी होगा,फिलहाल संवर्त कुमार ‘रूप’ ने क्षेत्र की जनता से इस मुद्दे पर गंभीरता से विचार करने और अपनी आवाज उठाने का आह्वान किया है, उनका कहना है कि कोरिया की वर्तमान स्थिति को देखते हुए अब यह सवाल केवल एक जिले की प्रशासनिक पहचान का नहीं,बल्कि आने वाली पीढि़यों के लिए क्षेत्र के विकास की दिशा तय करने का सवाल है।
कमी संसाधनों की नहीं,प्रशासनिक इच्छाशक्ति की है-संवर्त कुमार ‘रूप’ का कहना है कि कोरिया के पास प्राकृतिक संसाधन, ऐतिहासिक पहचान और पर्याप्त भू-क्षेत्रीय संभावनाएं हैं,आवश्यकता इस बात की है कि इन क्षमताओं को योजनाबद्ध तरीके से विकास में बदला जाए,उनके अनुसार कमी संसाधनों की नहीं, प्रशासनिक इच्छाशक्ति की है,अब सवाल यह है कि कोरिया को संभाग बनाने की मांग भविष्य में कितनी व्यापक जनसमर्थन प्राप्त करती है और शासन इस प्रस्ताव को किन प्रशासनिक एवं वित्तीय मानकों पर परखता है,फिलहाल इस मांग ने कोरिया के भविष्य,प्रशासनिक पहचान और क्षेत्रीय विकास को लेकर एक नई बहस जरूर शुरू कर दी है।
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