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सूरजपुर@जब आस्था बनी सामाजिक सद्भाव का संदेश कलेक्टर रेना जमील की तस्वीर चर्चा में…

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  • जाति-धर्म की दीवारों से ऊपर इंसानियत,कलेक्टर रेना जमील की तस्वीर दे गई बड़ा संदेश
  • पौधरोपण से पर्यावरण,
  • जलाभिषेक से सद्भाव का संदेश
  • सूरजपुर से सामने आई एक तस्वीर
  • नशामुक्त समाज से सामाजिक सद्भाव तक,कलेक्टर रेना जमील ने दिया संवेदनशीलता का संदेश
  • आस्था अपनी-अपनी,सम्मान सबका—सूरजपुर कलेक्टर की तस्वीर ने दिया सामाजिक एकता का संदेश
  • एक तस्वीर,कई संदेश…पर्यावरण, नशामुक्ति और इंसानियत की बात
  • करती कलेक्टर रेना जमील
  • जब आस्था बनी इंसानियत का संदेश, सूरजपुर में कलेक्टर रेना जमील की तस्वीर ने खींचा ध्यान
  • महिलाओं के साथ पौधरोपण से नशामुक्त समाज और पर्यावरण संरक्षण का संदेश, सिद्धेश्वर मंदिर में जलाभिषेक की तस्वीर ने दिया सामाजिक सद्भाव का संकेत


-ओंकार पाण्डेय-
सूरजपुर,06 अक्टूबर 2026 (घटती-घटना)। समाज केवल नियमों और व्यवस्थाओं से नहीं चलता,बल्कि उन छोटे-छोटे उदाहरणों से भी दिशा पाता है,जो लोगों को सोचने के लिए मजबूर करते हैं,आज जब समाज में जाति, धर्म, वर्ग और अलग-अलग पहचान को लेकर दूरियां दिखाई देती हैं,ऐसे समय में कुछ तस्वीरें बिना किसी लंबे भाषण के भी बड़ा संदेश दे जाती हैं, सूरजपुर की कलेक्टर रेना जमील की सामने आई एक तस्वीर भी इसी तरह का संदेश देती नजर आती है। तस्वीर में कलेक्टर महिलाओं के साथ एक धार्मिक परिसर में दिखाई दे रही हैं, सामने भगवान शिव का मंदिर है और वहां जलाभिषेक की प्रक्रिया चल रही है,यह तस्वीर केवल एक धार्मिक गतिविधि का दृश्य नहीं है, बल्कि इसे व्यापक सामाजिक दृष्टि से देखा जाए तो इसके भीतर आस्था,सामाजिक सहभागिता,महिलाओं की भागीदारी,पर्यावरण संरक्षण,नशामुक्त समाज और आपसी सम्मान जैसे कई संदेश एक साथ दिखाई देते हैं,इससे पहले महिलाओं के साथ पौधरोपण करते हुए दिया गया संदेश भी इसी विचार को आगे बढ़ाता है,एक तरफ पौधा लगाना आने वाली पीढि़यों के लिए पर्यावरण बचाने की जिम्मेदारी का प्रतीक है तो दूसरी तरफ नशे से दूर रहने का संदेश परिवार और समाज के भविष्य से जुड़ा विषय है,इन दोनों संदेशों को एक साथ देखने पर बात केवल किसी एक कार्यक्रम तक सीमित नहीं रहती, बल्कि यह सवाल सामने आता है कि हम अपने समाज को आखिर किस दिशा में ले जाना चाहते हैं?
महिलाएं बदलाव की सबसे मजबूत कड़ी-किसी भी समाज में स्थायी बदलाव केवल प्रशासनिक आदेशों से नहीं आता, परिवार से लेकर समाज तक महिलाओं की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण होती है, घर में बच्चों की आदतों,संस्कारों और सोच पर सबसे पहला प्रभाव परिवार का होता है,यदि परिवार नशे के खिलाफ मजबूती से खड़ा हो,यदि माता-पिता बच्चों से संवाद करें,यदि समाज युवाओं को सही दिशा दिखाए, तो नशे जैसी समस्या के खिलाफ लड़ाई कहीं अधिक प्रभावी हो सकती है,इसीलिए महिलाओं की सहभागिता केवल कार्यक्रम की भागीदारी नहीं,बल्कि सामाजिक बदलाव की एक महत्वपूर्ण कड़ी बन सकती है, आज जरूरत इस बात की है कि महिलाओं को केवल कार्यक्रमों की दर्शक या सहभागी के रूप में नहीं, बल्कि सामाजिक परिवर्तन की सक्रिय भागीदार के रूप में देखा जाए।
और फिर सामने आई वह तस्वीर…– इसी पूरे संदर्भ के बीच सिद्धेश्वर मंदिर परिसर की वह तस्वीर अपने आप में एक अलग संदेश देती है,तस्वीर में कलेक्टर रेना जमील भगवान शिव के मंदिर में जलाभिषेक के दौरान दिखाई दे रही हैं और आसपास महिलाएं मौजूद हैं,इस तस्वीर को किसी व्यक्ति की निजी धार्मिक आस्था के रूप में परिभाषित करना उचित नहीं होगा, लेकिन सामाजिक दृष्टि से यह तस्वीर एक अलग संदेश जरूर देती है—समाज में अलग-अलग पहचान रखने वाले लोगों के बीच सम्मान और सहभागिता की जगह बनी रहनी चाहिए, किसी की व्यक्तिगत पहचान,पृष्ठभूमि या आस्था कुछ भी हो सकती है,लेकिन सार्वजनिक जीवन में समाज के प्रत्येक वर्ग के साथ संवाद और सम्मान लोकतांत्रिक सामाजिक व्यवस्था की महत्वपूर्ण आवश्यकता है, यही वह बिंदु है जहां तस्वीर एक साधारण तस्वीर से आगे बढ़कर एक विचार बन जाती है।
धर्म से ऊपर इंसानियत का सवाल- हमारे समाज में धर्म और आस्था का अपना महत्व है,लोग अपनी-अपनी धार्मिक मान्यताओं के अनुसार जीवन जीते हैं, लेकिन जब धार्मिक पहचान को इंसान की पहचान से बड़ा बना दिया जाता है,तब समाज में दूरी पैदा होने लगती है,दूसरी ओर यदि यही आस्था लोगों को जोड़ने, एक-दूसरे की भावनाओं का सम्मान करने और सामाजिक सौहार्द बनाए रखने का माध्यम बने तो उसका प्रभाव सकारात्मक हो सकता है, सिद्धेश्वर मंदिर परिसर की तस्वीर को इसी व्यापक दृष्टि से देखा जाए तो इसका सबसे बड़ा संदेश यही हो सकता है कि—आस्था अलग हो सकती है, लेकिन इंसानियत अलग नहीं होनी चाहिए, पूजा का तरीका अलग हो सकता है, लेकिन एक-दूसरे के सम्मान का तरीका समान होना चाहिए,पहचान अलग हो सकती है,लेकिन समाज के प्रति जिम्मेदारी साझा हो सकती है।
आज समाज को इसी सोच की जरूरत है-आज सोशल मीडिया के दौर में छोटी-सी बात भी विवाद का कारण बन जाती है, जाति,धर्म,राजनीतिक विचार या व्यक्तिगत पहचान के आधार पर लोगों को अलग-अलग खांचों में देखने की प्रवृत्ति बढ़ती दिखाई देती है, ऐसे वातावरण में जरूरत उन उदाहरणों की है जो लोगों को यह याद दिलाएं कि समाज की सबसे बड़ी ताकत उसकी विविधता है, यदि कोई व्यक्ति दूसरे की आस्था का सम्मान करता है,यदि कोई अधिकारी समाज के लोगों के बीच सहजता से खड़ा होता है,यदि महिलाएं पर्यावरण और नशामुक्ति जैसे विषयों पर आगे आती हैं और यदि प्रशासन तथा समाज मिलकर सकारात्मक संदेश देता है,तो यह केवल एक कार्यक्रम नहीं रहता,यह सामाजिक संवाद की शुरुआत बन सकता है।
नशामुक्त समाज और पर्यावरण—दोनों लड़ाइयां भविष्य के लिए-एक ओर आज समाज नशे की समस्या से जूझ रहा है,दूसरी ओर पर्यावरण लगातार दबाव में है। दोनों समस्याओं की सबसे बड़ी मार आने वाली पीढि़यों को झेलनी पड़ सकती है,नशा परिवारों को भीतर से कमजोर करता है और पर्यावरण का नुकसान जीवन की प्राकृतिक परिस्थितियों को प्रभावित करता है,इसलिए यदि एक ही मंच से नशामुक्त समाज और पर्यावरण संरक्षण का संदेश सामने आता है तो उसे केवल औपचारिक गतिविधि के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए,जरूरत इस बात की है कि ऐसे संदेश गांव-गांव,मोहल्ले-मोहल्ले और परिवार-परिवार तक पहुंचें।
बड़ा सवाल—क्या हम तस्वीर का संदेश समझ पाएंगे?-किसी भी सार्वजनिक कार्यक्रम की सफलता केवल इस बात से तय नहीं होती कि कितने लोग उपस्थित हुए या कितने पौधे लगाए गए,असल सफलता तब होगी जब लगाया गया पौधा बचाया जाए,असल सफलता तब होगी जब नशे की गिरफ्त में जा रहे किसी युवा को परिवार समय रहते रोक सके,असल सफलता तब होगी जब माता-पिता अपने बच्चों से संवाद करें,असल सफलता तब होगी जब समाज किसी व्यक्ति को उसकी जाति या धर्म से पहले इंसान के रूप में देखे,और असल सफलता तब होगी जब धार्मिक स्थल लोगों को बांटने के बजाय सम्मान,सद्भाव और सामाजिक एकता का संदेश देने वाले स्थान बनें।
तस्वीर से बड़ा संदेश यही—पहचान से पहले इंसानियत- सूरजपुर से सामने आई यह तस्वीर इसलिए महत्वपूर्ण हो जाती है क्योंकि इसे केवल एक व्यक्ति की मंदिर में मौजूदगी के रूप में देखने के बजाय व्यापक सामाजिक संदर्भ में देखा जा सकता है, महिलाओं के साथ पौधरोपण—पर्यावरण बचाने का संदेश,नशामुक्त समाज की बात—परिवार और युवा पीढ़ी को बचाने का संदेश,धार्मिक परिसर में सहभागिता—सामाजिक सम्मान और संवाद का संदेश,और इन सबको जोड़कर निकलने वाला संदेश—समाज को जोड़कर रखने के लिए इंसानियत सबसे बड़ी कड़ी है, आज जरूरत इसी सोच को आगे बढ़ाने की है, क्योंकि समाज तब मजबूत नहीं होता जब सभी लोग एक जैसा सोचते हैं,समाज तब मजबूत होता है जब अलग-अलग सोच और पहचान रखने वाले लोग एक-दूसरे के अस्तित्व और सम्मान को स्वीकार करते हुए साथ खड़े होते हैं,शायद यही वजह है कि कभी-कभी एक तस्वीर सैकड़ों शब्दों से ज्यादा प्रभाव छोड़ जाती है,क्योंकि तस्वीर में दिखाई देने वाला दृश्य कुछ क्षणों का होता है,लेकिन उससे निकलने वाला सामाजिक संदेश पीढि़यों तक पहुंच सकता है।
पौधा लगाने से लेकर समाज को बचाने तक का संदेश
पौधरोपण को अक्सर केवल एक औपचारिक कार्यक्रम मान लिया जाता है, एक पौधा लगाया गया, फोटो खिंची और कार्यक्रम समाप्त—अगर सोच इतनी ही हो तो पौधरोपण का उद्देश्य अधूरा रह जाता है, लेकिन पौधा वास्तव में आने वाले वर्षों की जिम्मेदारी है, आज लगाया गया पौधा कल किसी बच्चे को छाया देगा,किसी परिवार को फल देगा, पर्यावरण को मजबूती देगा और प्रकृति के संतुलन में अपनी भूमिका निभाएगा, इसी तरह नशामुक्त समाज की बात भी केवल नारा लगाने से पूरी नहीं होगी,नशे का असर एक व्यक्ति तक सीमित नहीं रहता। उसका असर परिवार की आर्थिक स्थिति,बच्चों के भविष्य,घरेलू वातावरण और अंततः पूरे समाज पर पड़ सकता है,इसलिए पर्यावरण बचाने और समाज को नशे से बचाने—दोनों की लड़ाई मूल रूप से आने वाली पीढि़यों के भविष्य की लड़ाई है,यही वजह है कि महिलाओं के साथ पौधरोपण और नशामुक्त समाज का संदेश एक महत्वपूर्ण सामाजिक संदर्भ पैदा करता है।


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