Breaking News

बैकुण्ठपुर@ उद्घाटन के लिए गाड़ी ने लिया ‘अवतार’, कार्यक्रम खत्म होते ही हुई ‘अदृश्य’?

Share

गाड़ी आई कहां से, उद्घाटन हुआ कैसे? RTI के जवाब ने खड़ा कर दिया ‘अवतार’ और ‘गायब’ वाहन का सवाल
सरकारी रिकॉर्ड में वाहन खरीदी नहीं, ‘इको विकास समिति लोलकी’ का भी अता-पता नहीं, फिर वीवीआईपी कार्यक्रम में गाड़ी पर समिति का नाम कैसे आया?
न खरीदी का रिकॉर्ड, न समिति का अस्तित्व…फिर किस गाड़ी का हुआ लोकार्पण?
गाड़ी खरीदी नहीं गई, समिति बनी नहीं…फिर उद्घाटन के दिन गाड़ी आई कहां से?
उद्घाटन के दिन गाड़ी मौजूद, रिकॉर्ड में खरीदी गायब…‘इको विकास समिति लोलकी’ भी सवालों में
गाड़ी आई, फूल-माला सजी, लोकार्पण हुआ…फिर गाड़ी गई कहां? RTI ने पूछा हिसाब
न समिति का पता, न वाहन खरीदी का रिकॉर्ड…फिर किसके नाम पर हुआ वीवीआईपी लोकार्पण?
RTI ने बढ़ाई उलझन: गाड़ी खरीदी नहीं तो आई कहां से, समिति थी नहीं तो नाम आया कैसे?
सरकारी रिकॉर्ड में वाहन खरीदी नहीं, ‘इको विकास समिति लोलकी’ का अस्तित्व भी नहीं, फिर वीवीआईपी लोकार्पण में वाहन पर समिति का नाम कैसे आया?
दैनिक घटती घटना लगातार उठा रहा मामला, अब शासन-प्रशासन की जवाबदेही पर नजर
विशेष रिपोर्ट | राजन पाण्डेय
बैकुण्ठपुर 05 अक्टूबर 2026 (घटती-घटना)।  कभी-कभी सरकारी फाइलें ऐसे सवाल खड़े कर देती हैं, जिनका जवाब तलाशते-तलाशते पूरा मामला व्यंग्य का रूप ले लेता है, गुरु घासीदास राष्ट्रीय उद्यान में जून 2022 में हुए कथित वीवीआईपी पर्यटक वाहन लोकार्पण का मामला भी अब कुछ ऐसा ही सवाल बनकर सामने आया है।
सूचना के अधिकार से मिली जानकारी के अनुसार, संबंधित वाहन की शासकीय खरीदी का रिकॉर्ड सामने नहीं आया है, दूसरी ओर, जिस ‘इको विकास समिति लोलकी’ के नाम का उल्लेख वाहन पर किया गया था, उसके गठन अथवा संचालन की जानकारी भी विभागीय रिकॉर्ड में उपलब्ध नहीं होने की बात सामने आई है, अब सवाल सीधा है की जब समिति थी ही नहीं और वाहन खरीदा ही नहीं गया, तो फिर उद्घाटन के दिन वाहन आया कहां से? और यहीं से शुरू होता है इस पूरे मामले का सबसे बड़ा व्यंग्य, वाहन ने शायद खुद ही ‘अवतार’ लिया था! मान लीजिए विभाग ने वाहन खरीदा नहीं था, तो फिर उद्घाटन के दिन वह वाहन वहां पहुंचा कैसे? क्या वह किसी निजी व्यक्ति का था? क्या किसी एजेंसी से किराए पर लिया गया था? क्या किसी अन्य संस्था या योजना का वाहन था? या फिर वह केवल वीवीआईपी लोकार्पण के लिए कुछ समय के लिए ‘अवतार’ लेकर कार्यक्रम स्थल पर पहुंचा और कार्यक्रम समाप्त होते ही फिर अपने मूल लोक में वापस चला गया? व्यंग्य इसलिए बनता है क्योंकि RTI के जवाब ने सवालों को खत्म करने के बजाय और ज्यादा गहरा कर दिया है, अगर वाहन किराए पर आया था तो किराए का रिकॉर्ड कहां है? अगर निजी वाहन था तो मालिक कौन था? अगर किसी एजेंसी ने उपलब्ध कराया था तो उसका अनुबंध कहां है? अगर किसी दूसरी सरकारी योजना का वाहन था तो उसे गुरु घासीदास राष्ट्रीय उद्यान की पहल के रूप में किस आधार पर प्रस्तुत किया गया? इन सवालों का जवाब अभी जांच और दस्तावेजों के परीक्षण से ही सामने आ सकता है, लेकिन इतना जरूर है कि वाहन के वास्तविक स्रोत और उपयोग की कहानी स्पष्ट किए जाने की जरूरत बढ़ गई है।

और ‘इको विकास समिति लोलकी’… यह समिति भी जैसे उद्घाटन के दिन ही पैदा हुई थी?- मामले का दूसरा सवाल वाहन से भी ज्यादा दिलचस्प है, वाहन पर ‘इको विकास समिति लोलकी’ का नाम लिखा था, लेकिन RTI से सामने आई जानकारी के अनुसार विभाग के पास इस नाम से समिति के गठन या संचालन की जानकारी उपलब्ध नहीं है, तो फिर सवाल यह है कि जब समिति का सरकारी रिकॉर्ड में पता नहीं, तो वाहन पर उसका नाम किस आधार पर लिखा गया? क्या समिति बनाने का प्रस्ताव था? क्या समिति बनने वाली थी? क्या नाम केवल कार्यक्रम के लिए इस्तेमाल किया गया? क्या किसी ग्रामसभा की बैठक हुई थी? क्या समिति की सदस्य सूची थी? क्या उसका बैंक खाता था? क्या संचालन के लिए कोई आदेश जारी हुआ था? अगर इनमें से कुछ भी नहीं था तो फिर वाहन पर समिति का नाम लिखे जाने की कहानी और भी उलझ जाती है, यानी एक तरफ वाहन का खरीद रिकॉर्ड नहीं, दूसरी तरफ समिति का गठन रिकॉर्ड में नहीं, लेकिन उद्घाटन के दिन दोनों मौजूद—वाहन भी और समिति का नाम भी, यही वह बिंदु है जहां पूरा मामला सरकारी व्यवस्था से एक अजीब-सा सवाल पूछता दिखाई देता है क्या सरकारी योजनाओं में कभी-कभी पहले उद्घाटन हो जाता है और उसके बाद कागज तलाशे जाते हैं? बेशक, यह केवल व्यंग्यात्मक सवाल है। वास्तविक उत्तर दस्तावेजों की जांच के बाद ही मिल सकता है।
उद्घाटन हुआ तो फिर उद्घाटन किस चीज का हुआ?- जून 2022 के कार्यक्रम की अहमियत इसलिए भी बढ़ जाती है क्योंकि उपलब्ध जानकारी के अनुसार इसमें तत्कालीन मुख्यमंत्री, गृह मंत्री, प्रभारी सचिव, कलेक्टर और वन विभाग के वरिष्ठ अधिकारियों की मौजूदगी थी, ऐसे वीवीआईपी कार्यक्रम में जिस योजना, वाहन या व्यवस्था को सार्वजनिक रूप से प्रस्तुत किया जाता है, उसके पीछे प्रशासनिक तैयारी और दस्तावेज होना स्वाभाविक अपेक्षा है, अब अगर रिकॉर्ड कहता है कि वाहन खरीदा नहीं गया, तो सवाल उठना स्वाभाविक है कि उद्घाटन आखिर किस आधार पर हुआ?
उद्घाटन के बाद वाहन गया कहां?- यह सवाल भी कम महत्वपूर्ण नहीं है, अगर वाहन ईको-टूरिज्म के लिए था, तो उसके बाद उसकी लॉगबुक कहां है? किसके नाम पर वाहन था? उसका RC कहां है? चेसिस नंबर और इंजन नंबर क्या था? बीमा किसके नाम पर था? फिटनेस प्रमाणपत्र किसके पास था? चालक कौन था? ईंधन का भुगतान किस मद से हुआ? वाहन कहां-कहां चला? कितने पर्यटक उसमें बैठे? किसके खाते में आय जमा हुई? और सबसे बड़ा सवाल— अगर वाहन सरकारी खरीदी का नहीं था तो उसे कार्यक्रम के बाद वापस किसके पास भेज दिया गया? क्योंकि अगर वाहन वास्तव में ईको-टूरिज्म व्यवस्था का हिस्सा था तो उसके बाद उसका संचालन भी किसी न किसी रिकॉर्ड में होना चाहिए, विभागीय रिकॉर्ड, वाहन की लॉगबुक, अनुमति, ईंधन व्यय और चालक संबंधी भुगतान जैसे दस्तावेज इस पूरी कहानी को साफ कर सकते हैं।
अगर किराए की गाड़ी थी तो किराए का हिसाब भी तो होगा?- यही वह सवाल है जो पूरे प्रकरण को और रोचक बनाता है, मान लेते हैं कि विभाग ने वाहन खरीदा ही नहीं और किसी निजी व्यक्ति या एजेंसी से वाहन लिया गया, तो फिर किराया कितना था? किसने भुगतान किया? किस मद से भुगतान हुआ? बिल किसने लगाया? भुगतान वाउचर कहां है? किस अधिकारी ने अनुमति दी? किस तारीख से वाहन लिया गया? कार्यक्रम खत्म होने के बाद वाहन कहां गया? यदि भुगतान हुआ तो कैशबुक या बैंक रिकॉर्ड में उसका उल्लेख होना चाहिए, यदि भुगतान नहीं हुआ तो वाहन मुफ्त में किसने उपलब्ध कराया और क्यों? यहां सवाल केवल वाहन का नहीं रह जाता। सवाल प्रशासनिक पारदर्शिता का हो जाता है।
‘गाड़ी आई, उद्घाटन हुआ और फिर गायब’—यह कहानी दस्तावेज मांगती है- गाड़ी खरीदी नहीं गई, लेकिन उद्घाटन हो गया, समिति बनी नहीं, लेकिन उसका नाम वाहन पर आ गया, गाड़ी दिखाई दी, उद्घाटन हुआ और फिर उसके बाद उसका ठिकाना सवाल बन गया, अब अगर कोई पूछे कि गाड़ी आई कहां से, तो जवाब दस्तावेजों से मिलना चाहिए, कहानी से नहीं, और यही कारण है कि इस पूरे मामले में अब RC, चेसिस नंबर, इंजन नंबर, स्वामित्व दस्तावेज, लॉगबुक, भुगतान रिकॉर्ड, अनुमति पत्र और कार्यक्रम से जुड़े दस्तावेजों की जांच महत्वपूर्ण हो जाती है।
ईको-टूरिज्म और रोजगार का सपना भी सवालों के घेरे में- इस मामले को केवल एक वाहन तक सीमित करके देखना भी उचित नहीं होगा, यदि उस समय वाहन को ईको-टूरिज्म की पहल के रूप में प्रस्तुत किया गया था तो यह भी जानना जरूरी है कि उसके बाद इस व्यवस्था का क्या हुआ, स्थानीय युवाओं को रोजगार मिला या नहीं? स्थानीय वाहन चालकों को अवसर मिला या नहीं? गाइड की व्यवस्था बनी या नहीं? पर्यटकों के लिए परिवहन व्यवस्था चली या नहीं? ईको-टूरिज्म से कोई आय हुई या नहीं? किसी समिति को संचालन की जिम्मेदारी दी गई या नहीं? इन सवालों का जवाब मिलने पर पता चलेगा कि कार्यक्रम केवल उद्घाटन तक सीमित था या वास्तव में कोई व्यवस्था जमीन पर उतरी थी।

दैनिक घटती घटना लगातार उठा रहा सवाल—अब सरकार कितनी गंभीर?- इस पूरे मामले को लेकर दैनिक घटती घटना लगातार खबरें प्रकाशित कर रहा है और उपलब्ध दस्तावेजों, RTI से प्राप्त जानकारी तथा सामने आए सवालों के आधार पर शासन-प्रशासन का ध्यान आकर्षित करने का प्रयास कर रहा है, मकसद किसी व्यक्ति विशेष को दोषी ठहराना नहीं, बल्कि उन सवालों के जवाब सामने लाना है जो अब दस्तावेजों के कारण सार्वजनिक चर्चा का विषय बन गए हैं, कोरिया जन सहयोग समिति ने भी PCCF और वन सचिव को शिकायत देकर मामले की उच्चस्तरीय जांच की मांग की है, समिति ने वाहन की खरीदी, पंजीयन, स्वामित्व, समिति के गठन और लोकार्पण कार्यक्रम की प्रशासनिक प्रक्रिया से जुड़े दस्तावेजों की जांच की मांग की है, समिति ने दस दिन के भीतर जांच की प्रक्रिया शुरू करने की मांग करते हुए कार्रवाई नहीं होने पर न्यायालय जाने की बात कही है।
अब असली ‘लोकार्पण’ जवाबों का होना चाहिए- पूरे मामले में सबसे बड़ा सवाल यही है कि सरकारी रिकॉर्ड में वाहन खरीदी नहीं है तो वह वाहन था किसका? यदि वाहन निजी था—मालिक कौन? यदि किराए का था—भुगतान कहां? यदि किसी अन्य संस्था का था—उसे यहां किस आधार पर लाया गया? यदि सरकारी योजना का था—रिकॉर्ड कहां? और यदि ‘इको विकास समिति लोलकी’ अस्तित्व में नहीं थी—तो वाहन पर उसका नाम किसने और किस आधार पर लिखा? इन सवालों के जवाब किसी राजनीतिक बयान से नहीं, दस्तावेजों से मिलने चाहिए, और शायद यही इस पूरे मामले का सबसे बड़ा व्यंग्य है की उद्घाटन के दिन गाड़ी मौजूद थी, गाड़ी पर समिति का नाम भी मौजूद था… अब RTI के बाद सवाल यह है कि रिकॉर्ड में न गाड़ी मिल रही है, न समिति, तो फिर सवाल रहेगा की “गाड़ी आई कहां से… और गई कहां?” अब निगाहें वन विभाग के उच्चाधिकारियों पर हैं, शिकायत पर समयबद्ध जांच होती है या नहीं, वाहन का वास्तविक स्वामित्व सामने आता है या नहीं और ‘इको विकास समिति लोलकी’ के नाम के इस्तेमाल का आधार स्पष्ट होता है या नहीं—इन सवालों के जवाब ही इस उलझी कहानी की अगली कड़ी तय करेंगे। फिलहाल उपलब्ध सामग्री के आधार पर मामला जांच की मांग और दस्तावेजी स्पष्टीकरण के स्तर पर है।


Share

Check Also

कोरिया@ बैकुण्ठपुर शहर को पीछे करने की दिशा में फिर एक नया प्रयास?

Share तहसील-एसडीएम कार्यालय चेरवापारा ले जाने की मांग पर उठे सवाल, राजीव गुप्ता बोले—पहले जनता …

Leave a Reply