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सूरजपुर@ आखिर किसके इशारे पर नाच रहे हैं बनज? आज दुर्गाचरण कल श्यामलाल…आखिर अगला आदेश किसके नाम?

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  • सहकारिता में कैसी ‘कलाबाजी’? पहले दुर्गाचरण को बोर्ड की शक्तियां,फिर हटाने की कवायद और अब आदेशों की उलझी कहानी
  • आखिर बनज किसके इशारे पर? सहकारिता में आदेशों का ऐसा खेल—पहले दुर्गाचरण हटे,फिरश्यामलाल को मिली कमान! सहकारिता में ‘आदेश एक्सप्रेस’! कुर्सी वही,आदेश नए! सोनपुर समिति में प्राधिकृत अधिकारी बदलने का सिलसिला क्यों?
  • आदेशों पर आदेश,सवालों का जवाब गायब—सोनपुर में सहकारिता विभाग की ‘अजब व्यवस्था’
  • दुर्गाचरण हटे,श्यामलाल आए…फिर आदेश आया—सोनपुर में फाइल आखिर किस दिशा में दौड़ रही है?
  • सहकारिता विभाग का कमाल : पहले जिसे अधिकार दिया,उसी व्यवस्था को बदला, फिर बदली व्यवस्था पर फिर आदेश!
  • पहले प्राधिकृत अधिकारी दुर्गाचरण सिंह को हटाया,फिर उसी पद पर श्यामलाल सिंह को अधिकार,तीन साल में आदेशों का ऐसा खेल कि व्यवस्था ही कटघरे में
  • 18 नवंबर 2024 के आदेश में दुर्गाचरण सिंह को बोर्ड की शक्तियों के उपयोग के लिए अधिकृत किया गया
  • 24 जुलाई 2026 को श्यामलाल सिंह को उसी पद पर अधिकृत किया गया और 1 अक्टूबर 2026 को फिर आदेश जारी


-ओंकार पाण्डेय-
सूरजपुर,03 अक्टूबर 2026 (घटती-घटना)।
सहकारिता विभाग में आदेशों की अपनी एक अलग दुनिया है, यहां कभी किसी व्यक्ति को नियमों के तहत प्राधिकृत अधिकारी बनाया जाता है,फिर उसी व्यवस्था को बदल दिया जाता है और कुछ समय बाद उसी समिति के लिए फिर दूसरा आदेश सामने आ जाता है, सवाल तब और बड़ा हो जाता है,जब एक ही समिति के संबंध में अलग-अलग समय पर जारी आदेशों को सामने रखकर देखा जाए और यह पूछा जाए कि आखिर विभाग की नीति क्या है—नियम के अनुसार व्यवस्था चलाना या परिस्थितियों के अनुसार आदेश बदलते रहना?
सहकारिता विभाग में नियमों की किताब मोटी है, आदेशों की फाइलें उससे भी मोटी हैं और आम आदमी का सवाल सबसे छोटा—आखिर हुआ क्या? लेकिन सोनपुर की आदिम जाति सेवा सहकारी समिति मर्यादित, पंजीयन क्रमांक 580 का मामला अब इतना सीधा भी नहीं रहा कि एक आदेश दिखाकर कहानी खत्म कर दी जाए,यहां कहानी एक व्यक्ति को अधिकार देने,फिर उसी व्यवस्था से हटाने और फिर उसके आसपास पैदा हुए पात्रता-विवाद की है,मामला इसलिए भी दिलचस्प है क्योंकि उपलब्ध दस्तावेजों में एक तरफ 18 नवंबर 2024 का वह आदेश मौजूद है,जिसमें दुर्गाचरण सिंह को समिति के बोर्ड की शक्तियों का प्रयोग करने के लिए प्राधिकृत किया गया था,दूसरी तरफ 24 जुलाई 2026 का आदेश है,जिसमें उन्हीं दुर्गाचरण सिंह के स्थान पर श्यामलाल सिंह को बोर्ड की शक्तियों का प्रयोग करने के लिए प्राधिकृत किया गया,इसके बाद 1 अक्टूबर 2026 का आदेश श्यामलाल सिंह की प्राधिकृत व्यवस्था को आगे बढ़ाता दिखाई देता है, अब सवाल सिर्फ यह नहीं कि कुर्सी पर कौन बैठा, सवाल यह है कि कुर्सी बदलने की जरूरत क्यों पड़ी? और उससे भी बड़ा सवाल है की अगर दुर्गाचरण सिंह को बोर्ड की शक्तियों के लिए योग्य मानकर विभाग ने आदेश जारी किया था,तो बाद में उनकी पात्रता पर सवाल किस आधार पर उठा?
अगर पहले अपात्र थे तो 18 नवंबर 2024 का आदेश किसने बनाया?
यही सवाल इस पूरे प्रकरण का सबसे धारदार बिंदु है,मान लीजिए बाद की कार्रवाई में यह निष्कर्ष निकला कि दुर्गाचरण सिंह बोर्ड की शक्तियों का प्रयोग करने के योग्य नहीं थे,तो फिर सवाल सीधा है 18 नवंबर 2024 को उन्हें योग्य किस आधार पर माना गया था? क्या उस समय उनके दस्तावेजों की जांच नहीं हुई? क्या उनकी पात्रता का परीक्षण नहीं किया गया? क्या समिति की अनुशंसा बिना जांच स्वीकार कर ली गई? क्या विभाग ने आदेश जारी करने से पहले नियमों की समीक्षा नहीं की? या फिर 2024 में वे नियमसम्मत रूप से पात्र थे और बाद में कोई नई परिस्थिति सामने आई? अगर नई परिस्थिति आई तो वह क्या थी? यही वह दस्तावेज है जिसे अब फाइल से बाहर आना चाहिए।
और अगर पात्र थे तो हटाने का आधार क्या था?
दूसरी तरफ यदि दुर्गाचरण सिंह की नियुक्ति/प्राधिकृति नियमसम्मत थी, तो बाद में उन्हें हटाने की जरूरत क्यों पड़ी? केवल शिकायत? तो शिकायत की जांच कहां है? आरोप? तो आरोपों का सत्यापन कहां है? जांच? तो जांच रिपोर्ट कहां है? अपात्रता? तो अपात्र घोषित करने का आदेश कहां है? क्योंकि शिकायत और दोष सिद्ध होना दो अलग बातें हैं, किसी के खिलाफ शिकायत होना अपने आप यह साबित नहीं करता कि वह व्यक्ति दोषी या अपात्र है, और यदि विभाग ने शिकायत के आधार पर कोई प्रतिकूल निर्णय लिया, तो उस निर्णय की प्रशासनिक प्रक्रिया भी रिकॉर्ड में होनी चाहिए।
क्या शिकायत केवल शिकायत थी या कार्रवाई का आधार बन गई?
आपके बताए घटनाक्रम में यह सवाल प्रमुख है कि दुर्गाचरण सिंह के विरुद्ध शिकायत कराकर उन्हें हटाने का प्रयास किया गया, यदि ऐसा हुआ तो यह जांचना जरूरी है कि शिकायत के बाद विभाग ने कौन-सी प्रक्रिया अपनाई,क्योंकि सरकारी व्यवस्था में शिकायत का मतलब यह नहीं होता कि शिकायत में लिखी हर बात स्वतः सत्य हो गई,शिकायत के बाद जांच होनी चाहिए,रिकॉर्ड देखे जाने चाहिए,संबंधित व्यक्ति का पक्ष लिया जाना चाहिए,और फिर निष्कर्ष के आधार पर निर्णय होना चाहिए,यदि यह प्रक्रिया पूरी हुई है तो विभाग के पास रिकॉर्ड होगा,यदि प्रक्रिया पूरी नहीं हुई तो यही सवाल सबसे बड़ा बन जाएगा।
फिर आया वह सवाल… कोर्ट जाएंगे तो क्या होगा?
आपके बताए घटनाक्रम के अनुसार दुर्गाचरण सिंह अपने खिलाफ होने वाली कार्रवाई को उच्च न्यायालय बिलासपुर में चुनौती देने की तैयारी कर रहे थे,यहीं से कहानी में एक और सवाल जुड़ता है,यदि कोई प्रशासनिक आदेश न्यायालय में चुनौती के योग्य स्थिति में पहुंच रहा था और उसके बाद विभागीय स्तर पर निर्णय में बदलाव हुआ,तो क्या दोनों घटनाओं के बीच कोई संबंध था? यह संबंध तभी स्थापित किया जा सकता है जब संबंधित न्यायालयीन दस्तावेज और विभागीय नोटशीट सामने हों,लेकिन अगर टाइमलाइन में यह दिखाई दे रहा है कि पहले हटाने की प्रक्रिया, फिर न्यायालयीन चुनौती की तैयारी,और उसके बाद पुनः अधिकार देने का निर्णय,तो यह निश्चित रूप से जांच का महत्वपूर्ण पहलू है।
‘नियम’ और ‘सुविधा’ के बीच की दूरी कितनी है?
सहकारिता विभाग के आदेशों को देखकर व्यंग्य करने का सबसे आसान तरीका यही है नियम वही, समिति वही, पंजीयन क्रमांक वही—580, बोर्ड वही,लेकिन समय के साथ बोर्ड की शक्तियों का इस्तेमाल करने वाला व्यक्ति बदल गया, पहले राजेश सिंह,फिर दुर्गाचरण सिंह,फिर श्यामलाल सिंह,और फिर अक्टूबर 2026 का आदेश,आम आदमी तो पूछेगा ही—साहब, समिति चल रही है या प्राधिकृत अधिकारी की कुर्सी का ट्रायल चल रहा है? लेकिन इस व्यंग्य के पीछे वास्तविक सवाल है—हर बदलाव की प्रशासनिक वजह क्या थी?
प्रभारी उप पंजीयक अनिल कुमार बनज पर उठ रहे सवाल
24 जुलाई 2026 और 1 अक्टूबर 2026 के उपलब्ध आदेशों पर प्रभारी उप पंजीयक अनिल कुमार बनज के हस्ताक्षर दिखाई देते हैं,इसलिए सवाल सीधे उनके कार्यालय से पूछा जाना चाहिए दुर्गाचरण सिंह को हटाने का आधार क्या था? क्या कोई जांच रिपोर्ट थी? क्या कोई शिकायत थी? क्या उन्हें सुनवाई का अवसर दिया गया? श्यामलाल सिंह को उनके स्थान पर लाने का प्रशासनिक आधार क्या था? क्या 18 नवंबर 2024 के आदेश की समीक्षा की गई? यदि की गई तो उसका निष्कर्ष क्या था? और यदि बाद में दुर्गाचरण सिंह की स्थिति बदली, तो किस आदेश से बदली? यही सवाल व्यक्ति विशेष पर आरोप लगाने से ज्यादा महत्वपूर्ण हैं।
‘किसके इशारे पर नाच रहे हैं? ‘—व्यंग्य का सवाल,जवाब फाइल से- सहकारिता विभाग के अधिकारियों को ‘नचनिया’ कहना तीखा व्यंग्य है,लेकिन असली पत्रकारिता का सवाल ये है की आदेश जिस तरह बदल रहे है की व्यवस्थ भी शर्मा जाए, सवाल यह नहीं कि कौन किसके इशारे पर नाच रहा है,सवाल यह है की किसके प्रस्ताव पर आदेश निकला? किसकी नोटशीट पर निर्णय हुआ? किस अधिकारी ने किस नियम की व्याख्या की? किस जांच को आधार बनाया गया? किस कारण से पिछला आदेश बदला गया? अगर इन पांच सवालों के जवाब मिल जाएं तो ‘इशारे’ की कहानी अपने आप साफ हो जाएगी।
भाजपा समर्थक दुर्गाचरण के साथ ही क्यों?
इस पूरे मामले का एक राजनीतिक पहलू भी है, दुर्गाचरण सिंह को भाजपा समर्थित व्यक्ति है, भाजपा सरकार के दौरान उन्हें प्राधिकृत अधिकारी बनाया गया,बाद में उन्हीं के खिलाफ हटाने की कार्रवाई की बात सामने आई और फिर अधिकारों को लेकर विवाद खड़ा हुआ, राजनीतिक पहचान को कार्रवाई मान जा रहा है, लेकिन यह सवाल जरूर पूछा जा सकता है की यदि कोई व्यक्ति उसी सरकार के कार्यकाल में नियमों के तहत प्राधिकृत किया गया था, तो बाद में उसे हटाने के लिए कौन-सी नई प्रशासनिक परिस्थिति पैदा हुई? अगर विभाग के पास उसका स्पष्ट जवाब है तो मामला साफ, अगर जवाब नहीं है तो सवाल और गहरा।
तीन साल का अनुभव… दुर्गाचरण ने क्या देखा?
दुर्गाचरण सिंह के लिए यह पूरा घटनाक्रम सिर्फ एक पद का उतार-चढ़ाव नहीं है,15 दिसंबर 2023 के आदेश से शुरू हुई व्यवस्था के बाद 18 नवंबर 2024 को उन्हें बोर्ड की शक्तियां मिलीं, इसके बाद 2026 में फिर वही पद और अधिकार विवाद के केंद्र में आ गए,एक व्यक्ति के लिए यह अनुभव निश्चित रूप से प्रशासनिक प्रक्रिया की जटिलता को समझने वाला रहा होगा,लेकिन जनता के लिए इससे भी बड़ा सवाल यह है की अगर सरकारी आदेशों में इतनी आसानी से बदलाव हो सकता है तो आम समिति सदस्य किस आदेश को अंतिम माने? आज का आदेश? कल का संशोधित आदेश? या अगले महीने आने वाला नया आदेश?
सहकारिता की साख का सवाल
सहकारी समितियां किसानों और सदस्यों की संस्थाएं हैं,यहां आदेशों की विश्वसनीयता महत्वपूर्ण है,यदि किसी व्यक्ति को बोर्ड की शक्तियां दी जाती हैं तो समिति के सदस्य यह मानते हैं कि विभाग ने नियमों की जांच के बाद ही यह निर्णय लिया होगा,और यदि बाद में वही व्यक्ति हटाया जाता है तो सदस्य यह जानना चाहेंगे कि क्यों,फिर यदि पात्रता को लेकर अलग-अलग निष्कर्ष सामने आते हैं तो विश्वास का संकट और बढ़ता है,इसलिए सोनपुर का मामला केवल दुर्गाचरण सिंह का निजी विवाद नहीं रह जाता,यह सवाल बन जाता है कि—सहकारिता विभाग के आदेशों में निरंतरता और पारदर्शिता कितनी है?
अब फाइल को बोलना पड़ेगा-इस पूरे मामले में सबसे प्रभावी जांच कोई राजनीतिक बयान नहीं होगी,न कोई आरोप,न कोई प्रत्यारोप, सिर्फ पूरी फाइल,15 दिसंबर 2023 का आदेश,18 नवंबर 2024 का आदेश,दुर्गाचरण सिंह के खिलाफ शिकायत,जांच आदेश, जांच रिपोर्ट, अपात्रता संबंधी आदेश,24 जुलाई 2026 का आदेश,उच्च न्यायालय से संबंधित दस्तावेज, यदि कोई हो,पुनः प्राधिकृत किए जाने का आदेश, यदि जारी हुआ हो,1 अक्टूबर 2026 का आदेश,इन सभी को तारीखवार रख दिया जाए तो पूरी कहानी सामने आ जाएगी।
व्यंग्य का अंतिम सवाल—सहकारिता में ‘सिस्टम’ कौन चला रहा है?-सोनपुर की कहानी को व्यंग्य में समेटें तो तस्वीर कुछ ऐसी बनती है की पहले कहा गया की आइए दुर्गाचरण सिंह,बोर्ड की शक्तियां संभालिए, कुछ समय बाद—अब हटिए,आपकी जगह दूसरा अधिकारी आएगा, फिर सवाल है की क्यों हटाया? जवाब तलाशिए तो शिकायत,शिकायत तलाशिए तो जांच,जांच तलाशिए तो रिपोर्ट, रिपोर्ट तलाशिए तो फाइल,और फाइल तलाशते-तलाशते सवाल पहुंच जाता है आखिर यह फैसला हुआ कैसे? यही तो सरकारी व्यवस्था की सबसे बड़ी विडंबना है की आदेश सामने है, लेकिन आदेश की आत्मा यानी कारण फाइल के अंदर छिपा हुआ है।
अब सहकारिता विभाग से जवाब चाहिए-
अगर दुर्गाचरण सिंह अपात्र थे तो 18 नवंबर 2024 को उन्हें बोर्ड की शक्तियां क्यों दी गईं?
अगर वे पात्र थे तो बाद में उन्हें हटाने की कार्रवाई क्यों हुई?
यदि शिकायत हुई तो उसकी जांच कहां है?
यदि जांच हुई तो रिपोर्ट कहां है?
यदि अपात्र घोषित किया गया तो आदेश कहां है?
24 जुलाई 2026 को श्यामलाल सिंह को उनके स्थान पर लाने का वास्तविक आधार क्या था?
यदि बाद में दुर्गाचरण सिंह को फिर बोर्ड की शक्तियां मिलीं तो वह आदेश कहां है?
यदि जांच अधिकारी ने दो अलग-अलग निष्कर्ष दिए तो दोनों रिपोर्टों में अंतर क्यों है?

और सबसे बड़ा सवाल—पूरे निर्णय की नोटशीट में किसने क्या लिखा?
अब दस्तावेज बोले…इस पूरे मामले में सबसे गंभीर बात किसी व्यक्ति का हटना या किसी दूसरे का आना मात्र नहीं है,गंभीर बात है निर्णय प्रक्रिया का बदलता स्वरूप,18 नवंबर 2024 के दस्तावेज में दुर्गाचरण सिंह को बोर्ड की शक्तियों के लिए प्राधिकृत किए जाने की व्यवस्था स्पष्ट है,24 जुलाई 2026 के दस्तावेज में श्यामलाल सिंह को दुर्गाचरण सिंह के स्थान पर प्राधिकृत किए जाने की व्यवस्था स्पष्ट है,1 अक्टूबर 2026 का दस्तावेज श्यामलाल सिंह की प्राधिकृत व्यवस्था को आगे बढ़ाता दिखाई देता है,अब इनके बीच यदि शिकायत,जांच,अपात्रता,न्यायालयीन चुनौती और पुनः पात्रता/पुनः प्राधिकृति के दस्तावेज मौजूद हैं, तो वही इस पूरे प्रकरण का वास्तविक चेहरा सामने रखेंगे,सहकारिता विभाग को अब बयान नहीं, फाइल खोलनी चाहिए,क्योंकि सवाल यह नहीं कि ‘बनज किसके इशारे पर नाच रहे हैं? सवाल उससे भी बड़ा है सोनपुर समिति में आदेश किस नियम के इशारे पर बदलते रहे? और यदि हर आदेश नियमसम्मत था, तो जवाब बेहद आसान है—नियम बताइए, जांच रिपोर्ट दिखाइए,नोटशीट सामने रखिए और पूरी कहानी खुद-ब-खुद साफ हो जाएगी,वरना सोनपुर समिति की फाइल जनता को यही पूछने पर मजबूर करेगी—सहकारिता में नियम लिखे किसलिए जाते हैं,अगर हर नए आदेश के साथ उनकी व्याख्या भी नई हो जाए?
18 नवंबर 2024—विभाग ने खुद दी थी बोर्ड की शक्तियां
सबसे पहले उस दस्तावेज पर नजर डालिए, जहां से इस कहानी की शुरुआत होती है, 18 नवंबर 2024 को कार्यालय उप आयुक्त सहकारिता एवं उप पंजीयक सहकारी संस्थाएं,जिला सूरजपुर से संशोधित आदेश जारी हुआ,इसमें पहले के 15 दिसंबर 2023 के आदेश का संदर्भ है, जिसके तहत राजेश सिंह, शाखा प्रबंधक,जिला सहकारी केंद्रीय बैंक शाखा भैयाथान को सोनपुर समिति का प्राधिकृत अधिकारी नियुक्त किया गया था,इसके बाद 18 नवंबर 2024 को समिति की गठित समिति की अनुशंसा के आधार पर दुर्गाचरण सिंह को आदिम जाति सेवा सहकारी समिति मर्यादित सोनपुर,पंजीयन क्रमांक 580 के बोर्ड की शक्तियों का प्रयोग करने के लिए प्राधिकृत किया गया,आदेश में संबंधित सहकारी अधिनियम की धारा 49(8) और विभागीय अधिसूचना का भी उल्लेख किया गया है,साथ ही उन्हें आगामी आदेश तक बोर्ड की शक्तियों का प्रयोग करने के लिए अधिकृत किए जाने की बात दर्ज है, यानी उस समय विभाग के स्तर पर दुर्गाचरण सिंह को यह अधिकार देना कोई मौखिक या अनौपचारिक व्यवस्था नहीं थी,सरकारी आदेश था, अधिकारी के हस्ताक्षर थे,समिति की अनुशंसा का उल्लेख था,और सबसे महत्वपूर्ण—बोर्ड की शक्तियां प्रयोग करने का स्पष्ट अधिकार दिया गया था।
फिर अचानक शिकायतों की एंट्री—और शुरू हुई हटाने की कहानी…
आपके बताए पूरे घटनाक्रम के अनुसार,इसके बाद समिति का संचालन चलता रहा,लेकिन बाद में दुर्गाचरण सिंह के विरुद्ध शिकायतों के आधार पर उन्हें बोर्ड की शक्तियों से हटाने की कवायद शुरू हुई,यहीं से मामला सामान्य प्रशासनिक फेरबदल से निकलकर सवालों की चौखट पर आ जाता है,क्यों? क्योंकि यदि शिकायत के आधार पर किसी ऐसे व्यक्ति को हटाया जा रहा है जिसे विभाग ने खुद पहले प्राधिकृत किया था, तो शिकायत के बाद की प्रक्रिया भी उतनी ही स्पष्ट होनी चाहिए, शिकायत क्या थी? किसने की? जांच किसने की? दुर्गाचरण सिंह को क्या नोटिस दिया गया? उनका पक्ष क्या था? जांच में क्या पाया गया? क्या उन्हें अपात्र घोषित किया गया? यदि किया गया तो किस आदेश से? और सबसे बड़ा सवाल— क्या उस समय विभाग ने अपने ही 18 नवंबर 2024 के आदेश की वैधता और आधार की भी समीक्षा की?
24 जुलाई 2026 दुर्गाचरण की जगह श्यामलाल
अब आते हैं 24 जुलाई 2026 के उस आदेश पर,जिसने पूरे मामले को नया मोड़ दिया, इस आदेश में 18 नवंबर 2024 के आदेश का स्पष्ट संदर्भ लेते हुए कहा गया है कि दुर्गाचरण सिंह को सोनपुर समिति की बोर्ड शक्तियों का प्रयोग करने के लिए प्राधिकृत किया गया था,इसके बाद आदेश में कहा गया कि श्यामलाल सिंह,शाखा प्रबंधक,जिला सहकारी केंद्रीय बैंक मर्यादित अंबिकापुर,शाखा भैयाथान को दुर्गाचरण सिंह के स्थान पर आदिम जाति सेवा सहकारी समिति सोनपुर की बोर्ड शक्तियों का प्रयोग करने के लिए प्राधिकृत किया जाता है,अब देखिए सरकारी फाइल का खेल कितना दिलचस्प है 18 नवंबर 2024ः दुर्गाचरण सिंह, 24 जुलाई 2026ः दुर्गाचरण सिंह के स्थान पर श्यामलाल सिंह,अब सवाल है की दुर्गाचरण सिंह को हटाने के निर्णय के पीछे पूरी फाइल क्या कहती है? यही असली कहानी है।
यहां से शुरू होता है ‘सहकारिता सिंडिकेट’ का सवाल
क्या दुर्गाचरण सिंह के खिलाफ कोई ‘सिंडिकेट’ काम कर रहा था? सवाल यह है कि ऐसी आशंका पैदा क्यों हुई? क्योंकि घटनाक्रम में निर्णयों का बदलता स्वरूप दिखाई देता है,एक समय व्यक्ति को बोर्ड की शक्तियां दी गईं,फिर वही व्यक्ति हटाने की प्रक्रिया में आया,फिर उसके स्थान पर दूसरा अधिकारी आया,फिर पात्रता और शिकायत का विवाद सामने आया,और अब सवाल यह उठ रहा है कि क्या कहीं बाद में वही स्थिति बदलने की नौबत आई,अगर वास्तव में ऐसा हुआ तो सहकारिता विभाग को जवाब देना होगा कि पहला निर्णय गलत था या दूसरा? क्योंकि दोनों एक साथ सही नहीं हो सकते,यदि दोनों का आधार एक ही परिस्थितियां हों।
जांच अधिकारी भी वही और निष्कर्ष बदल गया तो?
आपके सार में सबसे गंभीर आरोपों में एक यह है कि जिस जांच अधिकारी ने पहले दुर्गाचरण सिंह को अपात्र माना,बाद की जांच में उसी व्यक्ति को योग्य माना गया,यदि दस्तावेज इस बात की पुष्टि करते हैं तो यह पूरे प्रकरण का सबसे महत्वपूर्ण प्रशासनिक प्रश्न होगा,फिर जांच होनी चाहिए पहली जांच कब हुई? किस आदेश से हुई? जांच अधिकारी कौन था? पहली रिपोर्ट में क्या निष्कर्ष था? दूसरी जांच कब हुई? उसी अधिकारी ने क्या नया पाया? क्या कोई नया दस्तावेज मिला? क्या पहले निष्कर्ष को निरस्त किया गया? किस अधिकारी ने दोनों रिपोर्टों को स्वीकार किया? और फिर सवाल सीधा है की एक ही मामले में एक ही जांच अधिकारी की कलम से दो अलग निष्कर्ष क्यों निकले? अगर वास्तव में ऐसा हुआ है तो विभाग को इसका दस्तावेजी स्पष्टीकरण देना चाहिए।


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