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मनेन्द्रगढ़-चिरमिरी-भरतपुर@ बिल में सीट कवर,गाड़ी में नहीं…जांच आई तो सीट कवर भी आ गया!

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  • पहली जांच में खुली परत,दूसरी जांच में ‘कवर’ डालने की कवायद?
  • रक्षित केंद्र में जांच या ‘जांच की मरम्मत’? सीट कवर,बिल और ड्राइवरों के बयानों ने बढ़ाई हलचल…
  • जांच में आरोप प्रमाणित होने के बाद ‘री-टेक’ क्यों? रक्षित केंद्र में दूसरी जांच पर सवाल…
  • सीट कवर खरीदा या सिर्फ बिल बना? ड्राइवर बोले…मिला नहीं,अब गाडि़यों में लगाने की कवायद!
  • पहली जांच में आरोप प्रमाणित होने के दावे के बाद फिर जांच की कवायद, वर्तमान प्रभारी के हाथ में जांच की प्रभावित करने की कमान…
  • 40-45 हजार के सीट कवर,बिना लगे बिल और ड्राइवरों के बयान बदलवाने की चर्चा ने खड़े किए बड़े सवाल…
  • डीजल से कंडम गाडि़यों तक,जनरेटर से मरम्मत-पार्ट्स तक शिकायतों की लंबी फेहरिस्त,
  • 55,613 ईंधन भुगतान विवाद के बाद शिकायतकर्ता चालक पर विभागीय कार्रवाई,अब पुराने रिकॉर्ड को ‘नया’ करने की कोशिश का आरोप


-रवि सिंह-
मनेन्द्रगढ़-चिरमिरी-भरतपुर,30 सितम्बर 2026 (घटती-घटना)।
सरकारी दफ्तरों में कभी-कभी फाइलें इतनी दिलचस्प कहानी लिखती हैं कि व्यंग्यकार भी शर्मा जाए,यहां मामला अब सिर्फ डीजल का नहीं रहा,सिर्फ बिल का नहीं रहा और सिर्फ एक सीट कवर का भी नहीं रहा,मामला उस व्यवस्था का है जिसमें पहले सामान कागज पर खरीदा दिखाई देता है,जमीन पर सामान दिखाई नहीं देता, जांच होती है,ड्राइवर कहते हैं कि उन्हें सामान मिला ही नहीं…और फिर खबर है कि जांच के बीच वही सामान गाडि़यों में लगाने की कवायद शुरू हो जाती है।
रक्षित केंद्र मनेन्द्रगढ़ में कथित वित्तीय अनियमितताओं को लेकर 29 जनवरी 2026 को विभाग के भीतर से शिकायत सामने आई थी,शिकायत में कंडम अथवा गैर-चलने वाले वाहनों के नाम पर डीजल,खराब जनरेटरों के नाम पर ईंधन,वाहन मरम्मत की राशि तथा पार्ट्स खरीदी में कथित गड़बड़ी जैसे आरोप लगाए गए थे,मामले में बाद में आरक्षक चालक क्रमांक 72 अजय कुमार नेताम की ओर से 1,34,611 के ईंधन भुगतान में 78,997 भुगतान और 55,613 शेष रहने की शिकायत भी सामने आई,इसके बाद अजय नेताम का रक्षित केंद्र से थाना कोटाडोल पदस्थापन हुआ और फिर उनके खिलाफ रूङ्घ भ्ङ्कस् शोरूम से संबंधित विभागीय जांच का दस्तावेज सामने आया,प्रारंभिक जांच में आरोप प्रथम दृष्टया प्रमाणित प्रतीत होने की बात दर्ज है,अब विभागीय सूत्रों के दावों के अनुसार बलरामपुर के एक अधिकारी द्वारा की गई पहली जांच में शिकायत के आरोप प्रमाणित पाए गए हैं,इसके बाद तत्कालीन रक्षित निरीक्षक हेमंत टोप्पो द्वारा दोबारा जांच की मांग की गई और अब जांच की जिम्मेदारी एमसीबी के अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक को दिए जाने की बात सामने आ रही है,यहीं से सवाल पैदा होता है…जब पहली जांच में आरोप प्रमाणित बताए जा रहे हैं,तो दूसरी जांच की जरूरत किसे पड़ी? और उससे भी बड़ा सवाल…क्या अब जांच होगी या जांच के निष्कर्ष की ‘मरम्मत’ होगी?
आईजी ने भी देखे थे वाहन,फिर शिकायतों की यह कहानी कैसे?-यह भी कम दिलचस्प संयोग नहीं है कि 30 और 31 जनवरी 2026 को सरगुजा रेंज के आईजी ने एमसीबी जिले का वार्षिक निरीक्षण किया था। 31 जनवरी को रक्षित केंद्र मनेन्द्रगढ़ में निरीक्षण,परेड और पुलिस दरबार हुआ था तथा उस समय रक्षित निरीक्षक के रूप में हेमंत टोप्पो मौजूद थे,रक्षित केंद्र का महत्व ही इसलिए है क्योंकि यहां सरकारी वाहनों और उनसे जुड़ी व्यवस्थाओं का बड़ा हिस्सा संचालित होता है, और इसी दौर में विभाग के भीतर से शिकायत सामने आना यह सवाल खड़ा करता है कि क्या शिकायत में उठाए गए बिंदु भी निरीक्षण के दायरे में आए थे? यदि आए थे तो निष्कर्ष क्या था? यदि नहीं आए थे तो शिकायत के बाद जांच कैसे हुई? और यदि जांच हुई तो उसकी रिपोर्ट कहां है?
पहला सवाल डीजल का…कंडम गाड़ी आखिर चलती कैसे रही-29 जनवरी की शिकायत में कंडम अथवा गैर-चलने वाले वाहनों के नाम पर डीजल निकासी का आरोप था,अब जरा सरकारी हिसाब की भाषा में सवाल समझिए,गाड़ी कंडम है…तो डीजल किसने जलाया? गाड़ी खड़ी है…तो किलोमीटर किसने चलाया? गाड़ी चल नहीं रही…तो लॉगबुक में ईंधन की खपत कैसे आई? और अगर रिकॉर्ड में सब कुछ सही है तो वाहन की उस दिन की तस्वीर,लॉगबुक,किलोमीटर रीडिंग और पंप की पर्ची सामने रखने में परेशानी क्या है? सरकारी डीजल कोई ऐसा अदृश्य ईंधन तो है नहीं जो कंडम गाड़ी में जाकर अचानक हवा में विलीन हो जाए।
और असली ट्विस्ट…सीट कवर खरीदा गया,लेकिन गाड़ी पर लगा ही नहीं!-मामले का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा कीमत से भी ज्यादा भौतिक उपलब्धता का है, विभागीय सूत्रों के अनुसार जांच के दौरान ड्राइवरों से पूछा गया तो उन्होंने कथित तौर पर कहा कि उन्हें सीट कवर दिया ही नहीं गया, उनकी गाडि़यों में सीट कवर लगा ही नहीं था, अब सरकारी खरीद का गणित यहां आकर अटक जाता है,अगर बिल कहता है…खरीदा गया, ड्राइवर कहता है—मिला नहीं,गाड़ी कहती है…लगा नहीं,तो फिर सीट कवर गया कहां? क्या वह फाइल में बैठा था?
जांच शुरू हुई तो सीट कवर अचानक प्रकट होने लगे?-विभागीय सूत्रों का दावा है कि अब वर्तमान में रक्षित केंद्र का प्रभार संभाल रहे अधिकारी द्वारा ड्राइवरों को बुलाकर मौखिक रूप से कहा जा रहा है कि सीट कवर ले जाइए और अपनी-अपनी गाडि़यों में लगाइए,यहीं से कहानी में सबसे बड़ा सवाल पैदा होता है की यदि सीट कवर पहले खरीदे गए थे तो वे अब तक कहां थे? यदि वे स्टॉक में थे तो ड्राइवरों को पहले क्यों नहीं दिए गए? यदि खरीदे ही नहीं गए थे तो पुराना बिल किस आधार पर था? और यदि अब खरीदे जा रहे हैं तो क्या पुरानी खरीदी को बाद में वास्तविक दिखाने की कोशिश हो रही है? इन सवालों का उत्तर रिकॉर्ड देगा, लेकिन विभागीय सूत्रों के अनुसार ड्राइवरों से पुराने बयान बदलवाने की कोशिश की भी चर्चा है,यदि यह दावा सही पाया जाता है तो यह सीट कवर से कहीं ज्यादा गंभीर मामला होगा।
ड्राइवरों के बयान बदलवाने का दावा…जांच का असली इम्तिहान यहीं- यदि किसी ड्राइवर ने जांच में पहले कहा कि मुझे सीट कवर नहीं मिला और बाद में उससे कहा जाए कि सीट कवर ले जाओ और गाड़ी में लगा दो,तो स्वाभाविक सवाल होगा कि आखिर बीच में ऐसा क्या बदल गया? सीट कवर बदला या कहानी? यही कारण है कि ड्राइवरों के पहले बयान,बाद के बयान और वर्तमान स्थिति की स्वतंत्र वीडियोग्राफी के साथ जांच की जानी चाहिए,क्योंकि किसी भी जांच में गवाह का बयान बदलने से ज्यादा महत्वपूर्ण यह देखना होता है कि बयान क्यों बदला।
पहली जांच में आरोप प्रमाणित,फिर दूसरी जांच…कहीं ‘रीटेक’ तो नहीं?-अब आते हैं जांच के सबसे गंभीर हिस्से पर, विभागीय सूत्रों के अनुसार बलरामपुर के अधिकारी ने मामले की जांच की और शिकायत के आरोप प्रमाणित पाए,यदि पहली जांच रिपोर्ट वास्तव में यही कहती है तो फिर तत्कालीन रक्षित निरीक्षक द्वारा दूसरी जांच की मांग करना उनका अधिकार हो सकता है,लेकिन उसके बाद सवाल जांच की निष्पक्षता का है,दूसरी जांच उसी जिले के अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक को क्यों? यदि मामला उसी पुलिस इकाई के अधिकारियों,कर्मचारियों और रिकॉर्ड से जुड़ा है तो बाहर के अधिकारी से जांच क्यों नहीं? क्योंकि यहां मामला केवल एक अधिकारी के खिलाफ शिकायत का नहीं है,यह मामला अब पहली जांच बनाम दूसरी जांच का हो गया है,पुराने बयान बनाम नए बयान,पुराने बिल बनाम बाद की भौतिक खरीदी और रिकॉर्ड बनाम वास्तविकता का बन चुका है।
वर्तमान प्रभारी के हाथ में जांच और सीट कवर लगाने की कवायद…दोनों साथ क्यों?-विभागीय सूत्रों के दावे को यदि घटनाक्रम के साथ देखा जाए तो सबसे असहज सवाल यही है,एक तरफ वर्तमान प्रभारी को जांच प्रक्रिया में जिम्मेदारी मिलने की बात है, दूसरी तरफ उसी दौरान ड्राइवरों को सीट कवर देने और गाडि़यों में लगाने की चर्चा है,तीसरी तरफ पुराने बयान बदलवाने की कोशिश का दावा है,अब अगर यह सब अलग-अलग घटनाएं हैं तो विभाग के पास उन्हें अलग-अलग साबित करने के लिए दस्तावेज होने चाहिए, लेकिन यदि ये घटनाएं एक-दूसरे से जुड़ी हैं तो क्या जांच से पहले जांच से जुड़े भौतिक साक्ष्यों को बदला जा रहा है? यह प्रश्न बेहद गंभीर है और इसकी स्वतंत्र पुष्टि आवश्यक है।
45 हजार का सीट कवर…बाजार से लेकर सरकारी फाइल तक जांच जरूरी- यहां एक बात स्पष्ट करना जरूरी है की बाजार में 08-10 हजार में सीट कवर लगने की बात अपने आप में सरकारी खरीद को गलत साबित नहीं करती,सरकारी वाहन के मॉडल,सीटों की संख्या,सामग्री,फिटिंग और गुणवत्ता के कारण कीमत अधिक हो सकती है,लेकिन यदि सरकारी रिकॉर्ड में 40-45 हजार प्रति सेट खर्च दिखाया गया है तो विभाग को बताना चाहिए की सीट कवर का स्पेसिफिकेशन क्या था? कौन सा मटेरियल था? कितनी सीटों के लिए था? फिटिंग का खर्च कितना था? जीएसटी कितना था? कोटेशन कितने फर्मों से लिए गए? न्यूनतम दर क्या थी? सप्लायर कौन था? सप्लाई कब हुई? स्टॉक में कब दर्ज हुई? भुगतान कब हुआ? वाहन में कब लगाया गया? इन सवालों का जवाब मिल जाए तो ?45 हजार का सीट कवर महंगा था या उचित—फैसला खुद हो जाएगा।
एक और संयोग…शिकायतकर्ता चालक और उसके बाद विभागीय कार्रवाई-मामले में अजय नेताम की शिकायत को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता, उनके आवेदन में 1,34,611 के ईंधन भुगतान में 78,997 भुगतान और 55,613 शेष रहने की बात थी,इसके बाद 10 अगस्त के आदेश से उन्हें थाना कोटाडोल भेजा गया,फिर उनके खिलाफ रूङ्घ भ्ङ्कस् शोरूम प्रकरण में विभागीय कार्रवाई की प्रक्रिया सामने आई, जांच दस्तावेज में शिकायतकर्ता,गवाहों और सीसीटीवी का उल्लेख है तथा प्रारंभिक जांच में आरोप प्रथमदृष्टया प्रमाणित प्रतीत होने की बात कही गई है,यह कहना कि कार्रवाई उनकी वित्तीय शिकायत के कारण हुई,उपलब्ध दस्तावेजों से सिद्ध नहीं है,लेकिन एक पत्रकार का सवाल यह जरूर है की क्या दोनों घटनाओं की टाइमलाइन और संबंधित अधि कारियों/ व्यक्तियों के संबंधों की स्वतंत्र जांच हुई?
और फिर सामने आया कारोबारी कनेक्शन का दावा-विभागीय सूत्रों के अनुसार,अजय नेताम के खिलाफ शिकायत करने वाले व्यक्ति के वाहन मरम्मत/गैराज कारोबार से जुड़े होने तथा सरकारी वाहनों की मरम्मत से संबंधित काम से उसके संबंध होने का दावा किया जा रहा है,सूत्रों का यह भी दावा है कि उसी कारोबारी के भोजन/होटल कारोबार से जुड़े होने और रक्षित केंद्र में भोजन सप्लाई से भी संबंध होने की बात सामने आई है,इन दावों की स्वतंत्र पुष्टि अभी आवश्यक है, लेकिन यदि दस्तावेजों में यह संबंध प्रमाणित होता है तो जांच का दायरा बहुत बड़ा हो जाएगा, फिर सवाल होगा की एक ही कारोबारी को वाहन मरम्मत और भोजन सप्लाई का काम कैसे मिला? क्या दोनों कामों के लिए अलग-अलग निविदा/स्वीकृति थी? कितना भुगतान हुआ? क्या वही व्यक्ति शिकायतकर्ता भी था? क्या उस कारोबारी का विभागीय अधिकारियों से कोई ऐसा संबंध था जिससे हितों के टकराव की स्थिति बनती हो? इन सवालों का जवाब आरोप से नहीं, रिकॉर्ड से चाहिए।
हेमंत टोप्पो का स्थानांतरण भी जांच के दायरे में नहीं,बल्कि सवालों के दायरे में-सितंबर 2026 में हेमंत टोप्पो को मां महामाया एयरपोर्ट दरिमा,अंबिकापुर से अस्थायी रूप से संबद्ध किए जाने और उनकी अनुपस्थिति में उप निरीक्षक जगदेव कुशवाहा को रक्षित केंद्र का कार्य सौंपे जाने का आदेश सामने आया,लेकिन इस आदेश में वित्तीय शिकायत को कारण नहीं बताया गया है,इसलिए इसे कार्रवाई या सजा कहना उचित नहीं होगा, फिर भी सवाल यह है कि क्या पहली जांच के बाद उनके खिलाफ कोई प्रशासनिक निष्कर्ष निकला? क्या आरोप प्रमाणित हुए थे? क्या कोई विभागीय कार्रवाई शुरू हुई? क्या राशि की वसूली हुई? क्या दूसरी जांच का उद्देश्य पहली जांच की समीक्षा था या उसके निष्कर्ष को चुनौती देना?
‘जांच’ शब्द बड़ा सुंदर है, बशर्ते जांच ही हो-व्यंग्य यहीं है, हमारे सरकारी सिस्टम में फाइलों का अपना विज्ञान है,पहले शिकायत आती है,फिर जांच होती है,जांच में कुछ निकलता है,फिर दूसरी जांच होती है,दूसरी जांच में पहली जांच पर सवाल उठते हैं,फिर तीसरी फाइल बनती है,और जब तक फाइलों का वजन बढ़ता है,मामले का वजन कम होता जाता है, लेकिन इस मामले में सीट कवर ने फाइलों को भी चुनौती दे दी है,फाइल कहती है सीट कवर खरीदा गया,ड्राइवर कहता है मिला नहीं,गाड़ी कहती है लगा नहीं,जांच चलती है अब सीट कवर लगाने की तैयारी,तो जनता पूछ रही है की सीट कवर पहले आया था या जांच?
जांच को बचाने के लिए जांच या जांच को बचाने की कोशिश?-यह सवाल कठोर है,लेकिन परिस्थितियां इसे जन्म देती हैं, यदि पहली जांच गलत थी तो विभाग को सामने आकर कहना चाहिए कि पहली जांच गलत क्यों थी? किस अधिकारी ने गलत निष्कर्ष दिया? कौन से दस्तावेज गलत पढ़े गए? और दूसरी जांच में क्या नया साक्ष्य मिला? यदि पहली जांच सही थी तो दूसरी जांच की जरूरत क्यों पड़ी? और यदि दूसरी जांच जरूरी थी तो उसे जिले से बाहर के अधिकारी को क्यों नहीं दिया गया? यही वे प्रश्न हैं जिनका जवाब विभाग को देना चाहिए।
अब जांच की दिशा साफ होनी चाहिए-इस मामले में निष्पक्ष जांच के लिए कम से कम इन दस्तावेजों को सुरक्षित करना जरूरी है पहली जांच रिपोर्ट,दूसरी जांच का आदेश,सीट कवर की मूल खरीदी फाइल, कोटेशन और दर स्वीकृति,सप्लायर का मूल बिल,स्टॉक रजिस्टर,भुगतान वाउचर, वाहनवार सीट कवर वितरण सूची,ड्राइवरों के मूल बयान,बाद के किसी भी बयान की रिकॉर्डेड प्रति,वाहनों का वर्तमान भौतिक सत्यापन,डीजल-पेट्रोल रजिस्टर,वाहन लॉगबुक,पंप की मूल पर्चियां,मरम्मत एवं पार्ट्स खरीद के बिल,संबंधित सप्लायरों के वर्क ऑर्डर और सबसे महत्वपूर्ण पहली और दूसरी जांच रिपोर्ट को आमने-सामने रखकर सार्वजनिक किया जाए।
सवाल सीट कवर का नहीं, सिस्टम के ‘कवर’ का है-45 हजार का सीट कवर वास्तव में ?45 हजार का था या नहीं—दस्तावेज बताएंगे, सीट कवर खरीदा गया था या नहीं—स्टॉक बताएगा, गाड़ी में लगा था या नहीं—भौतिक सत्यापन बताएगा,ड्राइवर ने क्या कहा था—मूल बयान बताएगा,बाद में बयान बदला या नहीं—दूसरी रिकॉर्डिंग और बयान बताएंगे, पहली जांच में आरोप प्रमाणित हुए या नहीं—जांच रिपोर्ट बताएगी,और दूसरी जांच क्यों हुई—उसका आदेश बताएगा,लेकिन यदि इन सबके बीच रिकॉर्ड बदलने, सामान बाद में लगाने और बयान बदलवाने की कोशिश के दावे सामने आ रहे हैं,तो यह सिर्फ विभागीय जांच का मामला नहीं रह जाता…यह जांच की विश्वसनीयता की परीक्षा बन जाता है, रक्षित केंद्र में सरकारी वाहन हैं,सरकारी ईंधन है,सरकारी पैसा है और सरकारी रिकॉर्ड है,यह किसी की निजी दुकान नहीं कि आज बिल बना,कल सामान आया और परसों कहानी बदल गई,सरकारी खरीद में पहले सामान होना चाहिए,फिर बिल,पहले काम होना चाहिए,फिर भुगतान,और जांच में पहले साक्ष्य सुरक्षित होने चाहिए,फिर बयान,अगर क्रम उलट गया है तो सवाल उठेंगे ही।
अब सबसे बड़ा सवाल-क्या रक्षित केंद्र की पहली जांच में सामने आए तथ्यों पर कार्रवाई होगी,या दूसरी जांच के नाम पर कहानी का ‘री-टेक’ होगा? क्या ?40-45 हजार के सीट कवर का हिसाब सार्वजनिक होगा? क्या यह बताया जाएगा कि बिल निकलने के समय सीट कवर कहां थे? क्या ड्राइवरों के मूल बयान सुरक्षित हैं? क्या वर्तमान प्रभारी द्वारा कथित रूप से सीट कवर लगाने और बयान बदलने के निर्देशों की जांच होगी? क्या बलरामपुर की पहली जांच रिपोर्ट सामने आएगी? और सबसे अहम—यदि पहली जांच में आरोप प्रमाणित हुए थे तो दूसरी जांच की जरूरत आखिर क्यों पड़ी? इन सवालों का जवाब किसी प्रेस नोट से नहीं मिलेगा।
जवाब सिर्फ फाइल,बिल, लॉगबुक,स्टॉक रजिस्टर,भुगतान रिकॉर्ड और स्वतंत्र जांच से मिलेगा,क्योंकि अब मामला एक सीट कवर का नहीं है। सवाल यह है कि कहीं जांच के नाम पर व्यवस्था का पूरा ‘कवर’ तो नहीं चढ़ाया जा रहा?
खराब जनरेटर भी ‘प्यासा’ था या रिकॉर्ड प्यासा था?
शिकायत में खराब जनरेटरों के नाम पर डीजल निकासी का आरोप भी है,तो फिर सवाल और आसान है जनरेटर खराब था तो चला कब? चला तो कितने घंटे? कितना डीजल खाया? किसने चलाया? कहां लॉग दर्ज हुआ? और यदि जनरेटर चला ही नहीं तो ईंधन किस काम आया? यह गणित किसी बड़े विशेषज्ञ का मोहताज नहीं है,बस डीजल रजिस्टर और जनरेटर की लॉगबुक आमने-सामने रखनी है।
मरम्मत और पार्ट्स : बिल में
गाड़ी ठीक,जमीन पर क्या हालत?
शिकायत में वाहन मरम्मत और पार्ट्स खरीदी में कथित फर्जी बिल का भी आरोप था,यहां भी जांच का फार्मूला बड़ा सरल है बिल है तो सामान दिखाइए,सामान है तो स्टॉक दिखाइए,स्टॉक में है तो वाहन में लगा दिखाइए,वाहन में लगा है तो पुराना पार्ट कहां गया बताइए,और अगर भुगतान हो चुका है तो काम कब हुआ,किसने किया और वाहन की हालत पहले और बाद में क्या थी? सरकारी खरीद में कागज पर गाड़ी हमेशा चमचमाती रहती है। असली परीक्षा तब होती है जब गाड़ी को गैराज से बाहर निकालकर देखा जाए।
अब आया ‘महान सीट कवर प्रकरण’
और यहीं से मामला थोड़ा हास्यास्पद भी हो जाता है और गंभीर भी, विभागीय सूत्रों के अनुसार, सरकारी वाहनों के लिए 40 हजार से अधिक, करीब 45 हजार तक के एक सीट कवर सेट की खरीदी का मामला सामने आया है,अब सवाल यह नहीं कि सीट कवर महंगा है,सवाल है कि 45 हजार का सीट कवर आखिर है कैसा क्या उसमें सोने की जरी लगी है क्या वह बुलेटप्रूफ है? क्या उसमें मसाज सिस्टम है? क्या वह वाहन के साथ एसी, टीवी और मिनी फ्रिज भी लेकर आता है? बेशक यह व्यंग्य है, लेकिन कीमत का सवाल वास्तविक है,यदि विभाग ने इतनी राशि का भुगतान किया है तो स्पेसिफिकेशन, गुणवत्ता,बाजार दर,कोटेशन,खरीद प्रक्रिया और बिल सामने रखे जाने चाहिए।


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