- शिकायत की जांच कौन करेगा? विभाग अपनी फाइलें जांचने के बजाय शिकायतकर्ता से मांग रहा सबूत
- जिन दस्तावेजों की जांच मांगी,वही विभाग ने शिकायतकर्ता से मांग लिए…
- विभाग के पास भर्ती की पूरी फाइल,फिर शिकायतकर्ता क्यों बने दस्तावेज जुटाने वाला?
- शिकायतकर्ता से बयान और दस्तावेज मांगे,अब विभाग अपनी फाइल कब खोलेगा?
- भर्ती से पदोन्नति तक रिकॉर्ड विभाग के पास,
- जांच में शिकायतकर्ता से ही सबूत की मांग…
- खाद्य विभाग में जांच का उलटा खेल? सरकारी रिकॉर्ड
- विभाग के पास,दस्तावेज शिकायतकर्ता से तलब
- 2015 की 71 पदों वाली भर्ती से लेकर योग्यता,
- वरिष्ठता और पदोन्नति तक शिकायत,13 अक्टूबर को बयान
- के लिए बुलाया, अब मूल रिकॉर्ड की जांच का इंतजार
न्यूज डेस्क
रायपुर/अंबिकापुर,30 सितम्बर 2026 (घटती-घटना)। खाद्य एवं औषधि प्रशासन विभाग में वर्ष 2015 की Food Safety Officer भर्ती, शैक्षणिक योग्यता सत्यापन, वरिष्ठता सूची और पदोन्नति को लेकर की गई शिकायत अब एक अजीब प्रशासनिक स्थिति में पहुंचती दिखाई दे रही है। शिकायत में विभाग से जिस मूल रिकॉर्ड और दस्तावेजों की जांच करने की मांग की गई थी,उन्हीं दस्तावेजों को जांचने के बजाय विभाग ने शिकायतकर्ता को ही दस्तावेज और साक्ष्य लेकर उपस्थित होने का निर्देश दे दिया है।
नियंत्रक, खाद्य एवं औषधि प्रशासन कार्यालय से 21 सितंबर 2026 को जारी पत्र क्रमांक GENS-21/1658/2026 में दैनिक घटती-घटना के प्रतिनिधि रवि सिंह को 13 अक्टूबर 2026 को सुबह 11 बजे दस्तावेजों/साक्ष्यों के साथ उपस्थित होकर बयान देने के लिए कहा गया है, अब सवाल यह है कि जिस शिकायत में विभाग की अपनी भर्ती और पदोन्नति प्रक्रिया की जांच की मांग की गई है, उसके मूल दस्तावेज आखिर शिकायतकर्ता के पास कैसे होंगे?
शिकायत क्या थी और विभाग ने क्या किया?-शिकायत में वर्ष 2015 में Food Safety Officer के 71 पदों पर हुई भर्ती, शैक्षणिक योग्यता सत्यापन,वरिष्ठता सूची,पदोन्नति तथा विशेष रूप से सर्वेश कुमार यादव और सिद्धार्थ पांडे की नियुक्ति एवं पात्रता की उच्चस्तरीय जांच की मांग की गई थी, शिकायत में जिन दस्तावेजों और रिकॉर्ड की जांच की मांग की गई, उनमें मुख्य रूप से विभागीय भर्ती रिकॉर्ड, शैक्षणिक योग्यता सत्यापन,संबंधित विश्वविद्यालयों से पत्राचार,वरिष्ठता सूची और पदोन्नति से संबंधित फाइलें शामिल हैं,इनमें से अधिकांश मूल रिकॉर्ड किसी निजी व्यक्ति के पास नहीं,बल्कि संबंधित विभाग के कार्यालयीन अभिलेखों में होने चाहिए, लेकिन विभाग ने शिकायतकर्ता से ही कहा है कि वह दस्तावेज/साक्ष्य के साथ उपस्थित होकर बयान दे।
क्या शिकायतकर्ता विभागीय फाइल लेकर घूमे?-मामले की विडंबना यही है कि जिस दस्तावेज की प्रमाणिकता जांचनी है, वह विभाग के पास ही उपलब्ध है,उदाहरण के लिए भर्ती की मूल फाइल विभाग के पास, दस्तावेज सत्यापन की फाइल विभाग के पास, विश्वविद्यालयों से किया गया पत्राचार विभाग के पास,प्राप्त जवाब विभाग के पास, नोटशीट विभाग के पास,वरिष्ठता सूची विभाग के पास,पदोन्नति संबंधी रिकॉर्ड विभाग के पास,ऐसे में शिकायतकर्ता से इन सभी अभिलेखों को उपलब्ध कराने की अपेक्षा पर स्वाभाविक रूप से सवाल उठता है,क्या अब शिकायतकर्ता विभागीय कार्यालय में जाकर मूल फाइल अपने कब्जे में ले और फिर उसे जांच अधिकारी के सामने प्रस्तुत करे? यह सवाल व्यंग्य नहीं,बल्कि शिकायत निपटारे की प्रक्रिया को लेकर उठने वाला मूल प्रश्न है।
शिकायतकर्ता का काम दस्तावेज बनाना या विभाग का रिकॉर्ड जांचना?-शिकायतकर्ता का दायित्व उपलब्ध तथ्यों और दस्तावेजों के आधार पर शिकायत करना है,इसके बाद यह संबंधित सक्षम प्राधिकारी का दायित्व बनता है कि वह शिकायत में उठाए गए बिंदुओं की जांच करे और आवश्यक मूल अभिलेख संबंधित शाखाओं से मंगाए, यदि किसी बाहरी दस्तावेज की आवश्यकता है तो शिकायतकर्ता से उसकी प्रति मांगी जा सकती है,लेकिन विभाग के अपने रिकॉर्ड की जांच के लिए शिकायतकर्ता को ही जिम्मेदार बना देना प्रक्रिया को उलटा कर देता है।
अब सबसे बड़ा सवाल-शिकायतकर्ता सरकारी फाइल कहां से लाए?
यहां सवाल किसी अधिकारी के पक्ष या विपक्ष का नहीं,बल्कि जांच की प्रक्रिया का है, यदि शिकायतकर्ता ने विभाग से कहा है कि आप अपनी फाइल में उपलब्ध दस्तावेजों की जांच कीजिए और यह देखिए कि नियमों के अनुसार नियुक्ति,योग्यता सत्यापन,वरिष्ठता और पदोन्नति हुई या नहीं तो विभागीय जांच की स्वाभाविक प्रक्रिया क्या यह नहीं होनी चाहिए कि संबंधित अधिकारी स्वयं अपनी फाइलों का परीक्षण करें? आखिर शिकायतकर्ता विभाग की फाइलों में रखे मूल दस्तावेज लेकर कहां से आएगा? क्या शिकायतकर्ता को विभागीय रिकॉर्ड तक पहुंच प्राप्त है? क्या उसे संबंधित शाखा की मूल भर्ती फाइल दी गई है? क्या उसे नोटशीट देखने की अनुमति दी गई है? यदि नहीं, तो फिर उससे उन्हीं अभिलेखों को प्रस्तुत करने की अपेक्षा किस आधार पर की जा रही है?
दस्तावेजों की जांच जरूरी,
बयान बाद में भी हो सकता है…
शिकायतकर्ता का बयान लेना जांच प्रक्रिया का हिस्सा हो सकता है,लेकिन यदि शिकायत का आधार विभागीय रिकॉर्ड में मौजूद दस्तावेज हैं, तो बयान के साथ-साथ मूल सरकारी अभिलेखों का परीक्षण भी आवश्यक है, क्योंकि शिकायतकर्ता अपने पास उपलब्ध दस्तावेज दे सकता है,लेकिन विभागीय फाइल में मौजूद प्रत्येक दस्तावेज उसके पास होना संभव नहीं है,इसलिए इस मामले में सवाल यह नहीं है कि रवि सिंह के पास कितने दस्तावेज हैं,बल्कि यह है कि विभाग के पास मौजूद दस्तावेजों की जांच कब और किस स्तर पर होगी?
अब गेंद विभाग के पाले में…
दैनिक घटती-घटना ने इस पूरे मामले में किसी अधिकारी को दोषी घोषित नहीं किया है, सवाल नियुक्ति और पदोन्नति की प्रक्रिया तथा उपलब्ध रिकॉर्ड की निष्पक्ष जांच का है,यदि विभागीय रिकॉर्ड से यह साबित होता है कि सभी नियुक्तियां, शैक्षणिक सत्यापन,वरिष्ठता और पदोन्नतियां नियमों के अनुसार हुई हैं, तो जांच से यह बात स्पष्ट हो जाएगी, यदि कोई प्रक्रिया संबंधी कमी सामने आती है,तो उसके लिए भी विभागीय स्तर पर कार्रवाई का रास्ता खुला रहेगा,लेकिन जांच का पहला कदम शिकायतकर्ता से सरकारी फाइल मांगना नहीं, बल्कि शिकायत में उठाए गए बिंदुओं से संबंधित सरकारी फाइलों का परीक्षण करना होना चाहिए—क्योंकि जिन अभिलेखों की जांच की मांग की गई है,उनका मूल रिकॉर्ड आखिर विभाग के पास ही है,अब 13 अक्टूबर को यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि विभाग शिकायतकर्ता का बयान लेने के साथ-साथ अपनी मूल फाइलें खोलकर जांच करता है या मामला सिर्फ बयान और दस्तावेज जमा कराने तक सीमित रह जाता है।
नोटशीट पहले ही सवाल खड़े कर चुकी है…
इस मामले में सामने आए एक विभागीय नोटशीट अंश में वर्ष 2015 की भर्ती के दौरान सर्वेश कुमार यादव और सिद्धार्थ पांडे की शैक्षणिक योग्यताओं के संबंध में संबंधित संस्थाओं से जानकारी प्राप्त किए जाने का उल्लेख है,नोटशीट के आधार पर यह सवाल उठा था कि क्या सत्यापन के दौरान केवल विश्वविद्यालय की सामान्य मान्यता देखी गई थी अथवा संबंधित डिग्री प्राप्ति वर्ष और संबंधित कार्यक्रम की मान्यता भी जांची गई थी,इस सवाल का जवाब भी विभागीय रिकॉर्ड में होना चाहिए,यदि विश्वविद्यालय को भेजे गए मूल पत्र में यही पूछा गया था कि संबंधित विश्वविद्यालय मान्यता प्राप्त है या नहीं,तो वह पत्र विभाग की फाइल में होगा,यदि डिग्री के वर्ष और कार्यक्रम की मान्यता की जांच की गई थी,तो उसका प्रमाण भी विभागीय फाइल में होगा,फिर जांच की पहली जिम्मेदारी उन्हीं रिकॉर्डों की जांच करना क्यों नहीं होनी चाहिए?
हाईकोर्ट के आदेश से भी जुड़ा है मामला…
मामले का एक अन्य महत्वपूर्ण पहलू यह है कि खाद्य सुरक्षा अधिकारियों की वरिष्ठता का विवाद पहले ही छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट तक पहुंच चुका है, WPS No.3163/2022 में 28 अप्रैल 2026 के आदेश में हाईकोर्ट ने वर्ष 2015 और वर्ष 2016 की अलग-अलग भर्ती प्रक्रियाओं से नियुक्त अधिकारियों को एक ही वरिष्ठता सूची में शामिल किए जाने पर आपत्ति दर्ज की थी और संबंधित प्राधिकारी को वरिष्ठता के दावे पर पुनर्विचार करने का निर्देश दिया था, ऐसे में शिकायत में वरिष्ठता और पदोन्नति से संबंधित रिकॉर्ड की जांच की मांग करना किसी काल्पनिक विषय पर सवाल उठाना नहीं है,इन विषयों से संबंधित विभागीय रिकॉर्ड मौजूद हैं और उन्हीं रिकॉर्डों का परीक्षण किया जाना है।
अब 13 अक्टूबर को क्या होगा?- विभाग ने रवि सिंह को 13 अक्टूबर को सुबह 11 बजे उपस्थित होकर बयान और दस्तावेज प्रस्तुत करने के लिए कहा है, अब देखना यह होगा कि उस दिन विभाग…
- शिकायतकर्ता द्वारा प्रस्तुत दस्तावेजों को ही देखेगा या अपनी मूल फाइल भी खोलेगा?
- संबंधित भर्ती फाइल मंगाकर जांच करेगा या नहीं?
- शैक्षणिक योग्यता सत्यापन के मूल पत्र और जवाबों का परीक्षण करेगा या नहीं?
- वरिष्ठता और पदोन्नति की फाइल का परीक्षण करेगा या नहीं?
- हाईकोर्ट के आदेश के बाद विभाग द्वारा की गई कार्रवाई का रिकॉर्ड देखेगा या नहीं?
- और सबसे महत्वपूर्ण—क्या शिकायत में उठाए गए प्रत्येक बिंदु पर लिखित जांच निष्कर्ष सामने आएगा?
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