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बैकुंठपुर @ न्याय चाहिए या न्यायालय से पहले फैसला? न्याय सड़क पर मिलेगा या न्यायालय में? भीड़ का दबाव फैसला नहीं हो सकता

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  • एफआईआर से हाईकोर्ट तक पहुंचा मामला,फिर अदालत के फैसले से पहले सड़क पर क्यों?
  • गिरफ्तारी हो गई,जांच चल रही,कोर्ट में सुनवाई जारी…फिर न्याय सड़क पर क्यों मांगा जा रहा?
  • जब फैसला अदालत को करना है, तो सड़क पर किस फैसले की मांग?
  • न्यायालय में विचाराधीन मामला, फिर सड़क पर फैसला कराने की कोशिश क्यों?
  • दोष सिद्ध होना बाकी,लेकिन सड़क पर फैसला पहले! आईसी मार्ट प्रकरण ने खड़ा किया बड़ा सवाल…
  • संविधान ने शांतिपूर्ण विरोध का अधिकार दिया है,लेकिन फैसला सुनाने का अधिकार न्यायालय को…
  • आईसी मार्ट प्रकरण में आंदोलन,रैली और पुतला दहन के बीच सबसे बड़ा
  • सवाल न्याय की प्रक्रिया का…दोष सिद्ध होना अभी बाकी है….फिर भी भीड़ के दबाव में कार्रवाई की मांग किस दिशा में ले जा रही है व्यवस्था?
  • संविधान न्यायालय को फैसला करने का अधिकार देता है,सड़क को नहीं…


-रवि सिंह-
बैकुंठपुर,27 सितम्बर 2026 (घटती-घटना)।
न्याय आखिर मिलेगा कहां? सड़क पर,भीड़ के बीच,नारेबाजी में,रैली निकालकर,पुतला दहन करके,किसी कार्यालय का घेराव करके या फिर न्यायालय में? यह सवाल आज इसलिए महत्वपूर्ण हो गया है क्योंकि आईसी मार्ट प्रकरण में न्याय की मांग को लेकर सड़क पर आंदोलन किया गया, जबकि मामला पहले से पुलिस की जांच के दायरे में है और न्यायालय में भी विचाराधीन है,फिर भी 27 सितंबर को आदिवासी,मूलनिवासी एवं अन्य पिछड़ा वर्ग सामाजिक संगठनों की ओर से धरना,रैली,पुतला दहन, कलेक्टर कार्यालय घेराव और ज्ञापन सौंपने का कार्यक्रम प्रस्तावित किया गया था,प्रशासन ने भी कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए अलग-अलग स्थानों पर कार्यपालिक मजिस्ट्रेटों की ड्यूटी लगाई है,यह अपने आप में एक बड़े सवाल की ओर इशारा करता है—क्या न्याय की मांग अब न्यायिक प्रक्रिया के समानांतर सड़क पर फैसला सुनाने की दिशा में बढ़ रही है? आज कोरिया में आईसी मार्ट प्रकरण को लेकर सड़क पर उठने वाली आवाज सिर्फ एक मामले की आवाज नहीं है, यह उस बड़े सवाल की आवाज है, जिससे आने वाले समय में हमारी पूरी न्याय व्यवस्था का चरित्र तय हो सकता है।
क्या अब न्यायालय के फैसले का इंतजार नहीं होगा?-क्या किसी मामले में एफआईआर दर्ज होना पर्याप्त नहीं? क्या पुलिस की जांच शुरू हो जाना पर्याप्त नहीं? क्या एक आरोपी की गिरफ्तारी भी पर्याप्त नहीं? क्या मामला न्यायालय तक पहुंच जाना भी पर्याप्त नहीं? अगर इन सबके बावजूद न्याय पाने के लिए सड़क पर रैली,घेराव और पुतला दहन करना जरूरी हो गया है,तो फिर सवाल केवल किसी आईसी मार्ट प्रकरण का नहीं रह जाता,सवाल यह हो जाता है कि आखिर हमारे देश में न्याय का अंतिम मंच कौन है—न्यायालय या भीड़?
और इस मामले में तो हाईकोर्ट खुद सुनवाई कर रहा है-यह कोई ऐसा मामला नहीं है जिसमें पुलिस ने हाथ खड़े कर दिए हों और न्याय की कोई प्रक्रिया शुरू ही न हुई हो,मामला हाईकोर्ट तक पहुंच चुका है, 8 सितंबर 2026 के आदेश में हाईकोर्ट ने जगत कुमार बैद और दीपक बैद को अंतरिम अग्रिम जमानत दी, न्यायालय ने आदेश में पुलिस प्रशासन द्वारा जांच किए जाने के तरीके को भी ध्यान में रखा,और इससे भी महत्वपूर्ण बात यह है कि हाईकोर्ट ने पुलिस से कई सवालों के जवाब मांगे हैं,कोर्ट ने पूछा है कि जब एफआईआर 9 जुलाई को दर्ज हुई तो 09 जुलाई को फरारी पंचनामा जारी करने की आवश्यकता क्यों पड़ी? उस अवधि में आरोपियों की गिरफ्तारी के लिए क्या कदम उठाए गए? आरोपियों की तलाश में कौन-सा वाहन इस्तेमाल किया गया? CCTV DVR की रिपोर्ट क्या है? अर्थात न्यायालय ने जांच के सवालों को अपने हाथ में लिया है,फिर आज सड़क पर फैसला जल्दी करवाने की जरूरत आखिर क्यों?
न्यायालय ने सवाल पूछे हैं, इसका मतलब यह भी है कि प्रक्रिया अभी पूरी नहीं हुई-यह बात आंदोलन करने वालों को ही नहीं, बल्कि प्रशासन और समाज के हर व्यक्ति को समझनी होगी,हाईकोर्ट ने किसी आरोपी को दोषी नहीं ठहराया है,हाईकोर्ट ने पुलिस को भी दोषी नहीं ठहराया है, अदालत ने कहा है—इन सवालों का जवाब दीजिए,दस्तावेज दीजिए,DVR रिपोर्ट प्रस्तुत कीजिए,फरारी पंचनामा की आवश्यकता स्पष्ट कीजिए,तलाश में इस्तेमाल वाहन की जानकारी दीजिए,अर्थात न्यायालय अभी साक्ष्यों और प्रक्रिया को परख रहा है, तो क्या समाज को न्यायालय को अपना काम करने के लिए समय नहीं देना चाहिए?
क्या भीड़ की ताकत न्याय का नया पैमाना बनेगी?-आज सबसे खतरनाक सवाल यही है,मान लीजिए किसी मामले में 500 लोग सड़क पर उतरते हैं,कल किसी दूसरे मामले में 5 हजार लोग उतरते हैं,परसों 20 हजार लोग उतरते हैं तो क्या जिसके साथ ज्यादा लोग होंगे,उसका दावा ज्यादा मजबूत माना जाएगा? क्या जिसके पास ज्यादा नारे होंगे,उसका साक्ष्य ज्यादा मजबूत माना जाएगा? क्या जिसके प्रदर्शन में ज्यादा भीड़ होगी,प्रशासन उसी के दबाव में गिरफ्तारी करेगा? अगर ऐसा होने लगा तो फिर न्याय साक्ष्यों से नहीं, भीड़ की संख्या से तय होने लगेगा,और यह किसी भी लोकतांत्रिक समाज के लिए बेहद खतरनाक स्थिति होगी।
आज की भीड़ कल किसी और के खिलाफ भी खड़ी हो सकती है-आज हम किसी एक मामले में भीड़ के दबाव को सही मान लें,लेकिन कल यही तरीका किसी दूसरे व्यक्ति के खिलाफ इस्तेमाल हो सकता है,किसी पर आरोप लगा,लोग सड़क पर उतर गए,नारे लगे,कार्यालय घेरा गया,गिरफ्तारी की मांग हुई, प्रशासन पर दबाव पड़ा,और गिरफ्तारी हो गई, फिर दोष सिद्ध होने से पहले ही समाज ने उसे अपराधी मान लिया, क्या हम ऐसी व्यवस्था चाहते हैं? अगर नहीं,तो आज ही यह सीमा तय करनी होगी कि विरोध लोकतंत्र का हिस्सा है,लेकिन फैसला न्यायालय का ही रहेगा।
हाईकोर्ट ने खुद जांच के महत्वपूर्ण पहलुओं पर सवाल उठाए हैं-यहां एक और महत्वपूर्ण बात है की 21 अगस्त को हाईकोर्ट ने कोरिया पुलिस की वेबसाइट पर जारी उस प्रेस रिलीज को लेकर सवाल उठाया था, जिसमें आरोपियों को फरार बताया गया था जबकि उनकी अग्रिम जमानत याचिका न्यायालय में लंबित थी, अदालत ने तत्कालीन एसपी को यह बताने के लिए कहा था कि प्रेस रिलीज जारी करने से पहले पुलिस ने क्या सामग्री जुटाई थी और क्या अग्रिम जमानत लंबित होने की स्थिति का सत्यापन किया गया था, उसी आदेश मेंCCTV DVR को लेकर भी सवाल दर्ज हुआ था। न्यायालय के समक्ष यह बताया गया था कि 7 जुलाई की घटना के बाद DVR 10 जुलाई को जब्त किया गया था, लेकिन उसे फॉरेंसिक लैब नहीं भेजा गया था, अब 8 सितंबर के आदेश में फिर DVR रिपोर्ट और पुलिस की कार्रवाई से संबंधित जानकारी मांगी गई है, तो फिर सवाल यह भी है की जब न्यायालय खुद जांच के इन पहलुओं को देख रहा है, तब समाज को न्यायालय के अगले कदम का इंतजार क्यों नहीं करना चाहिए?
अगर जांच गलत है तो उसे सही कराने का रास्ता भी कानून में है- किसी को यह अधिकार नहीं कि वह कहे—अब कुछ नहीं किया जा सकता, कानून में रास्ते हैं, जांच पर सवाल है तो उच्च अधिकारियों के सामने शिकायत की जा सकती है, निष्पक्ष जांच की मांग न्यायालय से की जा सकती है, नए साक्ष्य सामने आएं तो जांच एजेंसी के समक्ष रखे जा सकते हैं, पुलिस की कार्रवाई से असंतोष है तो न्यायिक हस्तक्षेप मांगा जा सकता है, यानी न्याय पाने के लिए संस्थागत रास्ते मौजूद हैं, फिर सड़क पर दबाव ही सबसे प्रभावी रास्ता क्यों माना जाए?
क्या प्रशासन भीड़ देखकर निर्णय करेगा?- यह सवाल प्रशासन से भी पूछा जाना चाहिए, अगर किसी कार्यालय का घेराव होता है और उसके बाद प्रशासन कार्रवाई करता है, तो क्या वह कार्रवाई जांच के रिकॉर्ड पर आधारित होगी या आंदोलन के दबाव पर? किसी भी अधिकारी को यह सुनिश्चित करना होगा कि निर्णय भीड़ के आकार से नहीं, दस्तावेज और साक्ष्य से हो, आज अगर 500 लोग किसी गिरफ्तारी की मांग करते हैं और प्रशासन गिरफ्तार कर लेता है, तो कल 5 लोग किसी निर्दोष की गिरफ्तारी की मांग करें तो क्या होगा? कानून संख्या नहीं देखता, कानून साक्ष्य देखता है।
संविधान की बात करने वालों के सामने भी आज बड़ी परीक्षा है-संविधान केवल अधिकार मांगने का दस्तावेज नहीं है,संविधान यह भी सिखाता है कि अधिकारों के साथ संस्थाओं पर विश्वास रखा जाए,अगर हम संविधान की बात करते हैं तो हमें न्यायपालिका की भूमिका भी स्वीकार करनी होगी,अगर हम डॉ. अंबेडकर के विचारों की बात करते हैं तो हमें यह भी समझना होगा कि संवैधानिक रास्ते और कानून का शासन केवल भाषण का विषय नहीं, व्यवहार का विषय है, संविधान की रक्षा का अर्थ केवल संविधान की प्रति लेकर सड़क पर खड़ा होना नहीं है,संविधान की रक्षा तब होती है जब हम उसके द्वारा बनाई गई न्याय प्रक्रिया पर भी भरोसा करते हैं।
आज का असली सवालःक्या हम अदालत से पहले फैसला चाहते हैं?-
यही इस पूरे मामले का सबसे कठोर सवाल है की अगर आज की रैली का उद्देश्य है निष्पक्ष जांच करो तो यह लोकतांत्रिक मांग है, अगर उद्देश्य है की सभी साक्ष्यों की जांच करो तो यह जायज मांग है,अगर उद्देश्य है की जिसकी भूमिका सिद्ध हो,उसके खिलाफ कानून के अनुसार कार्रवाई करो तो यह भी न्याय की मांग है, लेकिन अगर उद्देश्य यह हो कि अदालत के फैसले से पहले ही आरोपी को दोषी मानो और हमारी भीड़ के दबाव में कार्रवाई करो तो फिर हमें रुककर सोचना होगा कि हम न्याय मांग रहे हैं या न्याय की प्रक्रिया को अपने हाथ में लेने की कोशिश कर रहे हैं।
कल का दिन इसलिए महत्वपूर्ण था…
आईसी मार्ट प्रकरण में 27 सितंबर को सामाजिक संगठनों की ओर से सभा, रैली,पुतला दहन और कलेक्टर कार्यालय तक पहुंचकर ज्ञापन सौंपने का कार्यक्रम रखा गया था,इसके लिए प्रशासन ने भी कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए अलग-अलग स्थानों पर कार्यपालिक मजिस्ट्रेटों की ड्यूटी लगाई है,अर्थात आज सड़क पर आक्रोश दिखाई दिया,लोग अपनी मांग रखेंगे,नारे लगें,प्रशासन से न्याय की मांग की,यह लोकतंत्र में संभव है और शांतिपूर्ण विरोध का अधिकार भी है,लेकिन इसी लोकतांत्रिक अधिकार के बीच एक बेहद असहज सवाल खड़ा करना जरूरी है…जब मामला पहले ही न्यायालय में है,तब सड़क पर आखिर किस न्याय की तलाश की जा रही है?
एक गिरफ्तारी हो चुकी है,फिर भी क्या न्याय नहीं हुआ?
आईसी मार्ट प्रकरण में पुलिस ने अपराध दर्ज किया है,एक आरोपी की गिरफ्तारी भी हो चुकी है, यानी पुलिस ने कार्रवाई शुरू कर दी है,लेकिन यहां एक कानूनी और नैतिक अंतर समझना जरूरी है की गिरफ्तारी दोषसिद्धि नहीं है,किसी व्यक्ति को गिरफ्तार किया जा सकता है,उसके खिलाफ जांच हो सकती है,आरोप लगाए जा सकते हैं,मुकदमा चल सकता है…लेकिन जब तक न्यायालय उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर दोष सिद्ध नहीं करता,तब तक उसे कानूनन दोषी नहीं माना जा सकता,यही कारण है कि न्यायालय में सुनवाई होती है,यही कारण है कि आरोपी को बचाव का अधिकार दिया जाता है,यही कारण है कि अभियोजन को अपना साक्ष्य प्रस्तुत करना पड़ता है,और यही कारण है कि अंततः न्यायालय निर्णय देता है,अगर गिरफ्तारी ही दोष सिद्धि है, तो मुकदमे की जरूरत क्या है?
पीडि़त परिवार की पीड़ा वास्तविक हो
सकती है, लेकिन न्याय की प्रक्रिया भी वास्तविक है…
एक बच्ची की मौत कोई सामान्य घटना नहीं है,उसके परिवार का दुःख,आक्रोश और न्याय की मांग स्वाभाविक है,अगर परिवार को लगता है कि किसी ने अपराध किया है तो वह चाहता है कि आरोपी के खिलाफ कार्रवाई हो,समाज भी ऐसी मांग कर सकता है,लेकिन पीडि़त के प्रति संवेदना का अर्थ यह नहीं हो सकता कि आरोपी के खिलाफ लगाए गए आरोपों को बिना न्यायिक परीक्षण के सत्य मान लिया जाए, पीडि़त को न्याय चाहिए…और न्याय का अर्थ है दोषी को सजा,लेकिन दोषी कौन है,यह अदालत तय करेगी, यही वह अंतर है जो आक्रोश और न्याय के बीच खड़ा है।
न्याय की मांग और न्याय का फैसला…दोनों अलग बातें हैं…
यह बात आज बहुत स्पष्ट तरीके से समझने की जरूरत है की न्याय की मांग करना अधिकार है, लेकिन न्याय का फैसला करना अधिकार नहीं,जिम्मेदारी है…और वह जिम्मेदारी कानून ने न्यायालय को दी है,लोग प्रशासन से कह सकते हैं कि जांच तेज हो,कह सकते हैं कि सभी पहलुओं की जांच हो, कह सकते हैं कि किसी अधिकारी की भूमिका भी जांची जाए,कह सकते हैं कि किसी साक्ष्य की अनदेखी न हो,लेकिन यह कहना कि हम सड़क पर खड़े हैं इसलिए हमारी मांग के अनुसार ही कार्रवाई हो ,न्याय की प्रक्रिया को दबाव की राजनीति में बदल सकता है।
क्योंकि कल यही भीड़ आपके खिलाफ भी खड़ी हो सकती है…
यह बात हर उस व्यक्ति को समझनी होगी जो आज सड़क पर किसी और के खिलाफ खड़ा है, कानून का शासन इसलिए जरूरी है क्योंकि वह बहुमत के गुस्से से व्यक्ति की रक्षा करता है, आज भीड़ आपके पक्ष में है,कल वही भीड़ किसी और पक्ष में हो सकती है, आज आप किसी को दोषी मान रहे हैं,कल कोई दूसरा समूह आपको दोषी मान सकता है,इसलिए न्यायालय की जरूरत है,न्यायालय भीड़ से ऊपर इसलिए है क्योंकि न्यायालय को संख्या नहीं, साक्ष्य देखना होता है।
न्याय में जल्दबाजी नहीं,न्याय में प्रमाण चाहिए…
आईसी मार्ट प्रकरण में न्याय होना चाहिए,निष्पक्ष जांच होनी चाहिए, जिसकी भूमिका अपराध में सिद्ध हो, उसके खिलाफ कठोर कानूनी कार्रवाई होनी चाहिए,और यदि किसी पर लगाए गए आरोप सिद्ध नहीं होते,तो उसे भी कानून का संरक्षण मिलना चाहिए,यही न्याय है,आज की रैली, धरना और विरोध को इसी कसौटी पर देखा जाना चाहिए,लोकतंत्र में आवाज दबनी नहीं चाहिए, लेकिन आवाज को फैसला भी नहीं बनना चाहिए,क्योंकि एफआईआर आरोप की शुरुआत है,गिरफ्तारी जांच का हिस्सा है,मुकदमा न्यायिक प्रक्रिया है और दोषसिद्धि न्यायालय का निर्णय,और आईसी मार्ट प्रकरण में अभी यह अंतिम चरण आया ही नहीं है,तो फिर सवाल आज भी वही है जब मामला न्यायालय में पहुंच चुका है,एक आरोपी गिरफ्तार हो चुका है और दोष सिद्ध होना अभी बाकी है,तो फिर न्याय सड़क पर कैसे मिलेगा? न्याय मांगिए, जांच मांगिए,जवाबदेही मांगिए…लेकिन फैसला अदालत को करने दीजिए। क्योंकि अगर सड़क ही फैसला करने लगेगी,तो फिर न्यायालय किस लिए रहेगा?
आज फैसला सड़क पर नहीं,अदालत में होना चाहिए
आईसी मार्ट प्रकरण में एक आरोपी की गिरफ्तारी हो चुकी है, मामला पुलिस के पास है,मामला न्यायालय के सामने है,हाईकोर्ट ने पुलिस जांच से जुड़े सवालों पर जवाब मांगे हैं,अगली सुनवाई की तारीख तय है, ऐसे में आज सड़क पर आक्रोश व्यक्त करने वालों से एक सवाल पूछा जाना चाहिए की आपको न्याय चाहिए या अपनी पसंद का फैसला? अगर न्याय चाहिए तो अदालत को अपना काम करने दीजिए,अगर जांच पर संदेह है तो अदालत के सामने वह संदेह रखिए,अगर पुलिस की कार्रवाई गलत है तो न्यायिक हस्तक्षेप मांगिए,अगर कोई नया साक्ष्य है तो प्रस्तुत कीजिए, लेकिन दोष सिद्ध होने से पहले किसी को दोषी मानना और भीड़ के दबाव में प्रशासन से फैसला करवाना न्याय नहीं हो सकता।


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