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अंबिकापुर@ 40 लाख का सौदा,फर्जी दस्तावेज और आदिवासी जमीन… अब कर्मचारियों-अधिकारियों की भूमिका पर भी उठा सवाल

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  • जमीन के खरीदार तक पहुंची पुलिस…अब ‘फर्जी कागज’ बनाने वालों की बारी?
  • शिकायत से एफआईआर,एफआईआर से गिरफ्तारी… अब सरकारी तंत्र की भूमिका की जांच कब?
  • आलोक दुबे की शिकायत के बाद खुलती गईं परतें,आजाद गिरफ्तार…फर्जी दस्तावेजों का ‘जनक’ कौन?
  • आदिवासी जमीन का खेल,फर्जी मृत्यु प्रमाण पत्र से वंशावली तक,किसने तैयार किया पूरा दस्तावेजी रास्ता?
  • आजाद इराकी गिरफ्तार, लेकिन बड़ा सवाल बाकी—फर्जी मृत्यु प्रमाण पत्र किसने बनाया, वंशावली किसने तैयार की?
  • कलेक्टर की जांच से खुला जमीन फर्जीवाड़ा,पहली गिरफ्तारी के बाद अब ‘कागज बनाने वालों’ की तलाश जरूरी
  • एक जैलाल की वंशावली,दूसरे जैलाल की जमीन! अब पुलिस खोलेगी फर्जी दस्तावेजों की असली कड़ी
  • प्रतीक्षा बस स्टैंड जमीन मामलाः खरीदार गिरफ्तार,पर मृत्यु प्रमाण-पत्र से नामांतरण तक किसने बिछाया रास्ता?


-संवाददाता-
अंबिकापुर,25 सितम्बर 2026(घटती-घटना)।
प्रतीक्षा बस स्टैंड के पास स्थित बेशकीमती जमीन के कथित फर्जी अंतरण का मामला अब एक और महत्वपूर्ण मोड़ पर पहुंच गया है, शिकायत, प्रशासनिक जांच और कलेक्टर के आदेश के बाद एफआईआर दर्ज हुई और अब पुलिस ने इस मामले में पहली गिरफ्तारी की कार्रवाई की है,25 सितंबर को सरगुजा पुलिस की जारी प्रेस विज्ञप्ति के अनुसार,थाना मणिपुर, साइबर सेल और रायपुर पुलिस की संयुक्त टीम ने आजाद इराकी को रायपुर से गिरफ्तार किया है, पुलिस के अनुसार विवादित जमीन के सौदे की रकम 40 लाख रुपये बताई गई है और आरोपी ने पुलिस के समक्ष दिए गए मेमोरेण्डम कथन में दस्तावेजों के फर्जी होने की जानकारी के बावजूद जमीन का सौदा करने की बात स्वीकार की है।
लेकिन गिरफ्तारी के साथ मामला खत्म नहीं हुआ है,बल्कि अब जांच का दूसरा और ज्यादा महत्वपूर्ण सवाल सामने खड़ा हो गया है जिस फर्जी मृत्यु प्रमाण-पत्र और कथित गलत वंशावली के आधार पर पूरी जमीन की दस्तावेजी कहानी आगे बढ़ी,उसे तैयार किसने किया? और उससे भी बड़ा सवाल यह है कि क्या इस पूरी प्रक्रिया में किसी शासकीय कर्मचारी या अधिकारी की भूमिका थी? यदि थी तो वह भूमिका किस स्तर तक थी दस्तावेज तैयार करने,सत्यापन करने,वारिसान दर्ज करने, फौती नामांतरण कराने या राजस्व रिकॉर्ड बदलने तक? प्रशासनिक जांच में पटवारी तथा ग्राम पंचायत के तत्कालीन सरपंच-सचिव की भूमिका को लेकर सवाल सामने आए हैं।
2 सितंबर की शिकायत से खुला मामला,कलेक्टर ने कराई जांच-मामले की शुरुआत 2 सितंबर 2026 को हुई शिकायत से हुई, भाजपा पार्षद आलोक दुबे ने कलेक्टर सरगुजा के समक्ष शिकायत प्रस्तुत कर पुराने राजस्व रिकॉर्ड और जमीन के दस्तावेजों के आधार पर सवाल उठाए थे,उनका मुख्य सवाल था कि यदि जमीन पुराने सेटलमेंट और अधिकार अभिलेख में आदिवासी खातेदार के नाम दर्ज थी,तो बाद में उसके वारिस और स्वामित्व की स्थिति कैसे बदल गई,शिकायत में प्रतीक्षा बस स्टैंड के पास स्थित भूमि के जल क्षेत्र को मिट्टी डालकर पाटने और वहां प्लाटिंग किए जाने का मुद्दा भी उठाया गया था,प्रशासन ने मामले को गंभीरता से लेते हुए अंबिकापुर एसडीएम से जांच कराई,एसडीएम की जांच के बाद कलेक्टर के समक्ष प्रतिवेदन प्रस्तुत किया गया। इसके आधार पर 23 सितंबर 2026 को कलेक्टर कार्यालय ने संबंधित लोगों के खिलाफ एफआईआर दर्ज कराने के निर्देश दिए, साथ ही भूमि को विधिवत शासन में निहित करने की प्रक्रिया आगे बढ़ाने के निर्देश भी दिए गए,यानी यह मामला सीधे पुलिस कार्रवाई तक नहीं पहुंचा,इसके पीछे शिकायत से लेकर प्रशासनिक जांच तक की पूरी प्रक्रिया हुई।
फर्जी मृत्यु प्रमाण पत्रः पूरे मामले की सबसे अहम कड़ी-प्रशासनिक जांच में मृत्यु प्रमाण पत्र को लेकर गंभीर विसंगति सामने आई,जांच में जैलाल पिता बोधन की मृत्यु 23 अप्रैल 1976 से संबंधित मृत्यु प्रमाण पत्र का उल्लेख हुआ। लेकिन नगर निगम अंबिकापुर से कराए गए सत्यापन में यह सामने आया कि उक्त मृत्यु प्रमाण पत्र नगर निगम के रिकॉर्ड में दर्ज नहीं था और निगम द्वारा जारी नहीं किया गया था,यह जानकारी 4 मई 2026 के निगमीय जवाब से जुड़ी बताई गई है,यहीं से मामला एक सामान्य राजस्व विवाद से आगे बढ़ता है,अगर मृत्यु प्रमाण पत्र निगम ने जारी ही नहीं किया तो वह बना कहां से? किसने बनाया? किसके आवेदन पर बनाया? किसने उसमें दर्ज तथ्यों का सत्यापन किया? किस दस्तावेज के आधार पर उसे राजस्व प्रक्रिया में प्रस्तुत किया गया? और सबसे महत्वपूर्ण—क्या किसी सरकारी कर्मचारी या अधिकारी ने उस दस्तावेज को सही मानते हुए आगे की कार्रवाई की? इन सवालों का जवाब अभी सामने आना बाकी है।
एक जैलाल की वंशावली, दूसरे जैलाल की जमीन—यहीं उलझी पूरी कहानी- मामले की जांच में सबसे महत्वपूर्ण विसंगति वारिसान संबंधी दस्तावेजों को लेकर सामने आई है, प्रशासनिक जांच से जुड़े विवरण के अनुसार ग्राम अमलभिट्ठी के पटवारी ने जैलाल पिता देवराम के वारिसों की जानकारी तैयार की थी,आरोप/जांच का महत्वपूर्ण बिंदु यह है कि इसी जानकारी का इस्तेमाल कथित तौर पर जैलाल पिता बोधन की भूमि के फौती नामांतरण के लिए किया गया,अब यही सवाल पुलिस की जांच का केंद्रीय बिंदु होना चाहिए, जैलाल पिता देवराम और जैलाल पिता बोधन की पहचान कैसे निर्धारित हुई? क्या दोनों अलग-अलग व्यक्ति थे? यदि अलग थे तो एक की वंशावली दूसरे की भूमि के नामांतरण में कैसे इस्तेमाल हुई? उस वंशावली को किसने तैयार किया? किसने उसे प्रमाणित किया? और राजस्व रिकॉर्ड में उसे स्वीकार किस स्तर पर किया गया? प्रशासनिक जांच में यही विसंगति पूरे मामले को गंभीर बनाती है।
पटवारी से लेकर पंचायत तक—अब सरकारी तंत्र की भूमिका भी जांच का विषय- यही वह बिंदु है जहां इस मामले का दूसरा बड़ा सवाल सामने आता है, प्रशासनिक जांच के विवरण के अनुसार पटवारी द्वारा तैयार की गई वारिसान जानकारी का उल्लेख जांच में है, साथ ही ग्राम पंचायत अमलभिट्ठी के तत्कालीन सरपंच और सचिव की भूमिका पर भी सवाल उठाए गए हैं, यह ध्यान रखना जरूरी है कि जांच में किसी कर्मचारी या अधिकारी की भूमिका पर सवाल उठना और उसका आपराधिक रूप से दोषी होना दो अलग बातें हैं, लेकिन पुलिस के लिए अब यह जांचना बेहद महत्वपूर्ण होगा कि मृत्यु प्रमाण पत्र तैयार कराने की प्रक्रिया कहां से शुरू हुई? पंचायत स्तर पर कौन-कौन से दस्तावेज बने? वारिसान/वंशावली किसने तैयार की? उसे किसने प्रमाणित किया? पटवारी ने किस आधार पर वारिसों की जानकारी तैयार की? फौती नामांतरण के दौरान पुराने अधिकार अभिलेख की जांच हुई या नहीं? नामांतरण किस अधिकारी के आदेश से हुआ? रजिस्ट्री से पहले राजस्व रिकॉर्ड और प्रस्तुत दस्तावेजों का मिलान किस स्तर पर किया गया? यही जांच तय करेगी कि यह केवल निजी पक्षों के बीच कथित दस्तावेजी फर्जीवाड़ा था या सरकारी रिकॉर्ड तक पहुंचने वाली प्रक्रिया में भी किसी स्तर पर मदद मिली।
कलेक्टर के आदेश के बाद एफआईआर,अब पुलिस जांच में बदला मामला- कलेक्टर की जांच के बाद 23 सितंबर को एफआईआर के निर्देश दिए गए, इसके बाद उपलब्ध एफआईआर दस्तावेज के अनुसार 24 सितंबर 2026 को थाना मणिपुर में अपराध क्रमांक 168/2026 दर्ज हुआ, मामले में भारतीय न्याय संहिता की धाराएं 318(4), 338,336(3),340(2) एवं 61(2) लगाई गई हैं,इससे यह स्पष्ट है कि मामला अब राजस्व विभाग की फाइल तक सीमित नहीं रहा,पुलिस ने इसे आपराधिक विवेचना में ले लिया है।
25 सितंबर को पुलिस की कार्रवाई—रायपुर से आजाद इराकी गिरफ्तार– 25 सितंबर की सरगुजा पुलिस प्रेस विज्ञप्ति के अनुसार डीआईजी एवं एसएसपी के निर्देशन में थाना मणिपुर, साइबर सेल और रायपुर पुलिस की संयुक्त टीम ने आरोपी आजाद इराकी को रायपुर से गिरफ्तार किया, पुलिस के अनुसार तकनीकी जानकारी के आधार पर आरोपी के संभावित ठिकाने की पहचान की गई और रायपुर पुलिस टीम के साथ कार्रवाई की गई,पुलिस के मुताबिक गिरफ्तार आरोपी की पहचान, आजाद इराकी,पिता रियाजुद्दीन इराकी,उम्र 43 वर्ष,निवासी मस्जिद मोहल्ला जयनगर,थाना जयनगर,जिला सूरजपुर के रूप में हुई है,पुलिस का कहना है कि पूछताछ के दौरान आरोपी ने अपने मेमोरेण्डम कथन में यह स्वीकार किया कि उसे जमीन के दस्तावेज फर्जी और कूटरचित होने की जानकारी थी, इसके बावजूद उसने 40 लाख रुपये में विवादित जमीन का सौदा किया,पुलिस ने पर्याप्त साक्ष्य पाए जाने के बाद उसे गिरफ्तार कर न्यायालय में प्रस्तुत किए जाने की जानकारी दी है, किसी आरोपी का पुलिस पूछताछ में दिया गया कथन अंतिम न्यायिक निष्कर्ष नहीं होता; उसकी कानूनी स्थिति अदालत में साक्ष्यों के परीक्षण से तय होगी।
नौ लोगों के खिलाफ कार्रवाई, कई आरोपी अभी फरार-कलेक्टर की जांच के आधार पर क्रेता-विक्रेता समेत कई लोगों के खिलाफ एफआईआर की कार्रवाई के निर्देश दिए गए थे,प्रकाशित प्रशासनिक विवरणों में चंद्रशेखर यादव,आजाद इराकी,नोहरसाय, रामकुमार,श्रीलाल,पूर्णिमा,जनकुंवर,चंद्रभान यादव और मीरा यादव के नाम सामने आए हैं, पुलिस की प्रेस विज्ञप्ति में बताया गया है कि मामले में शामिल अन्य आरोपी फरार हैं और उनकी तलाश जारी है,इससे स्पष्ट है कि आजाद इराकी की गिरफ्तारी को पुलिस इस प्रकरण की अंतिम कार्रवाई नहीं मान रही है,जांच अभी जारी है और अन्य आरोपियों की भूमिका भी विवेचना के दायरे में है।
40 लाख का सौदा—लेकिन जमीन की असली कीमत और भी बड़ा सवाल- पुलिस की प्रेस विज्ञप्ति में विवादित जमीन का सौदा 40 लाख रुपये में किए जाने की बात सामने आई है,लेकिन प्रतीक्षा बस स्टैंड और रिंग रोड जैसे शहर के महत्वपूर्ण क्षेत्र में स्थित जमीन की बाजार कीमत को लेकर अलग-अलग रिपोर्टों में इसे करोड़ों रुपये की बेशकीमती जमीन बताया गया है,इसलिए जांच का एक पहलू यह भी हो सकता है कि जमीन का वास्तविक बाजार मूल्य क्या था,सौदे की रकम किस माध्यम से दी गई और रकम का लेन-देन किन लोगों के बीच हुआ, हालांकि इस संबंध में उपलब्ध पुलिस प्रेस विज्ञप्ति 40 लाख रुपये के कथित सौदे का उल्लेख करती है,उससे आगे भुगतान के तरीके या धन के स्रोत के बारे में अभी कोई विस्तृत आधिकारिक जानकारी सामने नहीं आई है।
तालाब की जमीन को पाटकर प्लाटिंग की शिकायत ने बढ़ाई गंभीरता-मामला तब और गंभीर हुआ जब जमीन के जल क्षेत्र को मिट्टी डालकर पाटे जाने और प्लाटिंग किए जाने की शिकायत सामने आई,मीडिया रिपोर्टों के अनुसार नगर निगम की टीम ने डाली गई मिट्टी हटाकर जमीन को कब्जामुक्त कराने की कार्रवाई शुरू की थी,इसी कार्रवाई के दौरान जमीन पर अपना दावा करने वाले कुछ लोगों और निगम/प्रशासनिक अमले के बीच विवाद की स्थिति भी सामने आई थी,इसलिए अब जांच केवल पुराने दस्तावेजों तक सीमित नहीं है,एक तरफ सवाल है जमीन के रिकॉर्ड में बदलाव कैसे हुआ? दूसरी तरफ सवाल है तालाब के रूप में दर्ज जमीन पर मिट्टी डालकर उसका स्वरूप बदलने की कोशिश किस आधार पर हुई? और तीसरा सवाल जिस जमीन को खरीदने-बेचने का दावा किया गया,उस पर वास्तविक अधिकार किसके पास था?
अब जांच की दिशा बदलनी चाहिए—‘किसने जमीन खरीदी’ से आगे ‘किसने कागज बनाए’ तक-आजाद इराकी की गिरफ्तारी के बाद पुलिस के सामने अगली चुनौती केवल अन्य आरोपियों को पकड़ना नहीं है,इस मामले में असली दस्तावेजी कड़ी तब सामने आएगी जब पुलिस यह पता लगाएगी कि मृत्यु प्रमाण पत्र और वंशावली की शुरुआत किसने की थी,क्योंकि किसी जमीन की रजिस्ट्री अचानक नहीं होती,उससे पहले दस्तावेज तैयार होते हैं,दस्तावेजों के आधार पर वारिस तय होते हैं,वारिस के आधार पर नामांतरण होता है, नामांतरण के बाद रिकॉर्ड तैयार होता है, और उसी रिकॉर्ड के आधार पर जमीन की बिक्री का रास्ता खुलता है,यदि जांच में मृत्यु प्रमाण-पत्र फर्जी पाया जाता है और साथ ही यह भी प्रमाणित होता है कि एक दूसरे व्यक्ति की वंशावली का इस्तेमाल किया गया, तो पुलिस के लिए यह जानना आवश्यक होगा कि इन दोनों दस्तावेजों को तैयार करने और राजस्व प्रक्रिया तक पहुंचाने में कौन-कौन लोग शामिल थे।
सबसे बड़ा सवालः क्या सरकारी तंत्र के भीतर भी कोई कड़ी जुड़ी है?- यही इस पूरे प्रकरण का सबसे अहम दूसरा सवाल है, फर्जी मृत्यु प्रमाण पत्र किसने तैयार किया? वंशावली किसने बनाई? पंचनामा किसने तैयार कराया? पटवारी ने किस आधार पर वारिसों की जानकारी तैयार की? फौती नामांतरण किस दस्तावेज के आधार पर हुआ? नामांतरण की फाइल किस अधिकारी के सामने गई? किसने दस्तावेजों को सही माना? और रजिस्ट्री से पहले किसी स्तर पर पुराने आदिवासी भूमि रिकॉर्ड और नए वारिसान रिकॉर्ड के बीच अंतर क्यों नहीं पकड़ा गया? प्रशासनिक जांच में पंचायत पदाधिकारियों और पटवारी की भूमिका को लेकर सवाल सामने आने के बाद इन बिंदुओं की पुलिस जांच और महत्वपूर्ण हो जाती है, यदि किसी शासकीय कर्मचारी या अधिकारी की भूमिका केवल लापरवाही तक सीमित थी तो उसकी प्रकृति अलग होगी,लेकिन यदि जांच में जानबूझकर गलत दस्तावेज तैयार करने, प्रमाणित करने,रिकॉर्ड बदलने या गलत नामांतरण में सहायता करने के साक्ष्य मिलते हैं, तो मामला और गंभीर हो सकता है, अभी ऐसी किसी भूमिका को तथ्य के रूप में स्थापित नहीं किया जा सकता। यह जांच का प्रश्न है और पुलिस को इसे दस्तावेजों के मूल स्रोत तक जाकर स्पष्ट करना होगा।
शिकायतकर्ता का सवाल अब पुलिस के सामने भी– आलोक दुबे की शिकायत से जिस मामले की प्रशासनिक जांच शुरू हुई,वह अब एफआईआर और गिरफ्तारी तक पहुंच चुका है, शिकायत में उठाया गया मूल सवाल था कि पुराने रिकॉर्ड में दर्ज जमीन की पहचान और वारिसों की स्थिति बाद के रिकॉर्ड में कैसे बदल गई,कलेक्टर की जांच ने दस्तावेजी विसंगतियों को सामने रखा,कलेक्टर के आदेश के बाद एफआईआर हुई और अब पुलिस ने गिरफ्तारी की है, लेकिन इस कार्रवाई के बाद शिकायत का दूसरा सवाल और बड़ा हो गया है अगर फर्जी मृत्यु प्रमाण पत्र था तो बनाने वाला कौन था? अगर वंशावली गलत थी तो तैयार किसने की? अगर वारिसान गलत था तो उसे प्रमाणित किसने किया? अगर नामांतरण गलत दस्तावेज पर हुआ तो राजस्व स्तर पर किसने उसे आगे बढ़ाया? इन सवालों का जवाब मिले बिना मामले की पूरी तस्वीर सामने नहीं आएगी।
शिकायत से गिरफ्तारी तक—पूरे मामले की टाइमलाइन
2 सितंबर 2026ः भाजपा पार्षद आलोक दुबे ने कलेक्टर से शिकायत की।
इसके बादः कलेक्टर ने एसडीएम अंबिकापुर से मामले की जांच कराई।
जांच मेंः पुराने राजस्व रिकॉर्ड, मृत्यु प्रमाण पत्र, वारिसान और फौती नामांतरण से जुड़ी विसंगतियों का उल्लेख हुआ।
23 सितंबर 2026ः कलेक्टर ने जांच रिपोर्ट के आधार पर संबंधित लोगों के खिलाफ एफआईआर के निर्देश दिए।
24 सितंबर 2026ः थाना मणिपुर में अपराध क्रमांक 168/2026 दर्ज हुआ।
25 सितंबर 2026ः सरगुजा पुलिस ने संयुक्त कार्रवाई में आजाद इराकी को रायपुर से गिरफ्तार करने की जानकारी दी।

अबः अन्य फरार आरोपियों की तलाश और दस्तावेजों की विस्तृत जांच जारी है।
अब पुलिस के सामने सिर्फ जमीन नहीं, पूरा ‘दस्तावेजी रास्ता’ है-इस मामले की जांच की सबसे अहम कड़ी अब यही है पुराना अधिकार अभिलेख? मृत्यु प्रमाण पत्र ? वंशावली/वारिसान? पंचायत स्तर के दस्तावेज ? पटवारी की रिपोर्ट? फौती नामांतरण? राजस्व रिकॉर्ड? विक्रय दस्तावेज? रजिस्ट्री? जमीन का कब्जा/प्लाटिंग, इस पूरी श्रृंखला में जहां भी पहला गलत दस्तावेज तैयार हुआ,वहीं से कथित फर्जीवाड़े की असली शुरुआत मानी जा सकती है,आजाद इराकी की गिरफ्तारी ने पुलिस कार्रवाई की शुरुआत जरूर कर दी है,लेकिन मामले का सबसे महत्वपूर्ण अध्याय अभी बाकी है—फर्जी दस्तावेजों का स्रोत कौन था और सरकारी रिकॉर्ड तक उनकी पहुंच कैसे हुई? अगर जांच इस सवाल तक पहुंचती है और दस्तावेजों के आधार पर किसी सरकारी कर्मचारी या अधिकारी की भूमिका सामने आती है,तो कार्रवाई की दिशा जमीन के खरीदार-विक्रेता से आगे बढ़कर उस तंत्र तक जा सकती है जिसने कथित तौर पर दस्तावेजों को वैधता का रास्ता दिया,यही वह बिंदु है जहां प्रतीक्षा बस स्टैंड जमीन प्रकरण की असली परत खुल सकती है,सरगुजा पुलिस ने कहा है कि मामले की अग्रिम वैधानिक विवेचना जारी है और फरार सह-आरोपियों की तलाश की जा रही है।
खसरा नंबर 3714ः तालाब भी,आदिवासी भूमि का पुराना रिकॉर्ड भी
मामला खसरा नंबर 3714 से जुड़ा है,उपलब्ध दस्तावेजों में इसका रकबा 0.250 हेक्टेयर/0.231 हेक्टेयर बताया गया है,पुलिस की प्रेस विज्ञप्ति में इसे नगर निगम के मास्टर प्लान-2021 और तालाबों की शासकीय सूची में दर्ज 6.25 एकड़ तालाब क्षेत्र का हिस्सा बताया गया है,जांच से जुड़े दस्तावेजों और रिपोर्टों के अनुसार यह क्षेत्र स्थानीय लोगों के निस्तारी,स्नान और छठ पूजा जैसे सामाजिक-धार्मिक उपयोग से जुड़ा रहा है,प्रकाशित जांच विवरण में इसे रिंगबांध तालाब क्षेत्र से भी जोड़ा गया है,यही वजह है कि विवाद केवल जमीन की खरीद-बिक्री तक सीमित नहीं है,एक तरफ जमीन के पुराने स्वामित्व और जाति संबंधी रिकॉर्ड का सवाल है,तो दूसरी तरफ उसके तालाब क्षेत्र के रूप में दर्ज होने का भी प्रश्न है।
1954-55 से पहले के रिकॉर्ड में जैलाल पिता बोधन गोंड़
प्रशासनिक जांच के अनुसार खसरा नंबर 3714 की भूमि 1954-55 से पहले के राजस्व अभिलेख में जैलाल पिता बोधन,जाति गोंड़,अनुसूचित जनजाति के नाम दर्ज थी,यही रिकॉर्ड अब पूरे मामले की सबसे महत्वपूर्ण कड़ी बन गया है,क्योंकि यदि पुराना अधिकार अभिलेख किसी अनुसूचित जनजाति खातेदार के नाम था,तो बाद के वर्षों में भूमि का वारिस कौन बना, किस आधार पर बना और फिर भूमि गैर-अनुसूचित जनजाति के नाम कैसे पहुंची—इन सभी सवालों का जवाब दस्तावेजों की पूरी श्रृंखला से ही मिलेगा,पुलिस की प्रेस विज्ञप्ति में भी कहा गया है कि आरोपियों ने कथित रूप से फर्जी मृत्यु प्रमाण-पत्र और कूटरचित दस्तावेजों का सहारा लेकर दूसरे व्यक्ति की वंशावली और नामांतरण का दुरुपयोग किया।


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