
- स्थानीय शिक्षकों-अधिकारियों की अनदेखी का आरोप,गैर-शैक्षणिक कार्य में शिक्षकों को लगाने के निर्देशों के बीच प्रभार देने पर उठा सवाल
- सूरजपुर के व्याख्याता को सोनहत बीईओ का प्रभार, ‘पैराशूट लैंडिंग’ पर कमरो ने उठाए सवाल
- स्थानीय अधिकारी दरकिनार,बाहर से प्रभार क्यों? शिक्षा विभाग में ‘पैराशूट लैंडिंग’ पर सवाल
- शिक्षक स्कूल में पढ़ाए या दफ्तर संभाले? सोनहत बीईओ प्रभार पर कमरो का सवाल
- नियमों की दुहाई, फिर भी संलग्नीकरण! सोनहत बीईओ प्रभार को लेकर शिक्षा विभाग घिरा
- सोनहत बीईओ की कुर्सी पर ‘बाहरी’ प्रभार,पूर्व विधायक कमरो ने शिक्षा सचिव से मांगा जवाब
-संवाददाता-
मनेन्द्रगढ़/कोरिया,24 सितम्बर 2026 (घटती-घटना)। राजनीति में अब तक ‘पैराशूट प्रत्याशी’ शब्द खूब सुना गया था—ऐसा प्रत्याशी जो स्थानीय जमीन की जानकारी से पहले चुनावी मैदान में उतर जाए, लेकिन एमसीबी-कोरिया के शिक्षा विभाग में अब ‘पैराशूट लैंडिंग’ शब्द प्रशासनिक व्यवस्था को लेकर उठ रहे सवालों के साथ चर्चा में है, फर्क सिर्फ इतना है कि यहां पैराशूट लेकर कोई चुनाव लड़ने नहीं आया, बल्कि आरोप यह है कि महत्वपूर्ण प्रशासनिक जिम्मेदारी के लिए स्थानीय व्यवस्था को पीछे छोड़कर दूसरे जिले में पदस्थ शिक्षक को सीधे प्रभार की कुर्सी तक पहुंचा दिया गया। मामला सूरजपुर जिले के शासकीय उच्चतर माध्यमिक विद्यालय कृष्णपुर में पदस्थ व्याख्याता हजारी लाल चक्रधारी को सोनहत विकासखंड शिक्षा अधिकारी का प्रशासनिक प्रभार दिए जाने से जुड़ा है, पूर्व विधायक गुलाब कमरो ने इस मामले को लेकर स्कूल शिक्षा विभाग के सचिव को ज्ञापन भेजते हुए नियमों, प्रशासनिक आवश्यकता और स्थानीय स्तर पर उपलब्ध अधिकारियों की स्थिति पर जवाब मांगा है, यानी सवाल सिर्फ यह नहीं है कि प्रभार किसे मिला, सवाल यह भी है कि क्यों मिला, किस नियम से मिला और स्थानीय स्तर पर कौन उपलब्ध था?
सचिवालय का आदेश बनाम जमीन पर व्यवस्था-मामले का सबसे दिलचस्प पहलू यही है कि एक तरफ शासन स्तर पर शिक्षकों को गैर-शैक्षणिक कार्यों में लगाने से बचने की बात कही जाती है,दूसरी तरफ एक विद्यालय में पदस्थ व्याख्याता को दूसरे जिले के विकासखंड में प्रशासनिक जिम्मेदारी देने का मामला सामने आता है, यहीं से व्यवस्था पर व्यंग्यात्मक सवाल उठता है—क्या अब शिक्षक की नियुक्ति स्कूल में पढ़ाने के लिए और प्रभार कार्यालय चलाने के लिए होगा? यदि शिक्षक को पढ़ाना है तो उसे विद्यालय में होना चाहिए,यदि प्रशासनिक पद संभालना है तो फिर यह भी स्पष्ट होना चाहिए कि वह किस संवर्ग के पद पर,किस नियम के तहत और किस प्रशासनिक आवश्यकता के आधार पर जिम्मेदारी संभाल रहा है, पूर्व विधायक कमरो ने इसी विरोधाभास को अपने ज्ञापन में उठाया है,उनका कहना है कि विभाग को यह स्पष्ट करना चाहिए कि सोनहत में स्थानीय स्तर पर उपलब्ध अधिकारियों और कर्मचारियों की स्थिति क्या थी तथा दूसरे जिले में पदस्थ व्याख्याता को प्रभार देने की आवश्यकता क्यों पड़ी।
21 सितंबर के आदेश ने खड़ा किया बड़ा सवाल-आपके द्वारा उपलब्ध कराई गई जानकारी के अनुसार 21 सितंबर 2026 के संयुक्त संचालक,सरगुजा संभाग के आदेश से कृष्णपुर,जिला सूरजपुर में पदस्थ व्याख्याता हजारी लाल चक्रधारी को सोनहत विकासखंड शिक्षा अधिकारी का प्रशासनिक प्रभार दिया गया, यहीं से विवाद ने तूल पकड़ा,सवाल यह है कि सोनहत कोई ऐसा निर्जन प्रशासनिक द्वीप नहीं है जहां विभाग को अधिकारी खोजने के लिए दूसरे जिले तक जाना पड़ा हो,एमसीबी और कोरिया में शिक्षा विभाग का अपना प्रशासनिक ढांचा है, यहां वर्षों से काम कर रहे अधिकारी और कर्मचारी भी हैं,ऐसे में स्वाभाविक सवाल है स्थानीय स्तर पर पात्रता रखने वाले अधिकारी उपलब्ध थे या नहीं? अगर थे तो उन्हें जिम्मेदारी क्यों नहीं दी गई? अगर नहीं थे तो विभाग यह तथ्य सार्वजनिक क्यों नहीं करता कि स्थानीय स्तर पर उपयुक्त अधिकारी उपलब्ध नहीं था? और यदि बाहर से प्रभार देना ही जरूरी था,तो विद्यालय में पदस्थ व्याख्याता को ही प्रशासनिक जिम्मेदारी देने का आधार क्या था? यही वे सवाल हैं जिनका जवाब आदेश से ज्यादा महत्वपूर्ण हो गया है।
शिक्षक पढ़ाएगा या बीईओ कार्यालय चलाएगा?-स्कूल शिक्षा विभाग के सामने सबसे बड़ा व्यावहारिक सवाल शिक्षक के मूल दायित्व से जुड़ता है,व्याख्याता की मूल जिम्मेदारी विद्यार्थियों को पढ़ाना है। दूसरी ओर विकासखंड शिक्षा अधिकारी का काम प्रशासनिक है—शिक्षा संस्थानों की निगरानी, विभागीय समन्वय,योजनाओं का क्रियान्वयन और प्रशासनिक कार्यों से जुड़ी जिम्मेदारियां इसमें आती हैं,अब यदि किसी विद्यालय में पदस्थ व्याख्याता को विकासखंड स्तर की प्रशासनिक जिम्मेदारी दे दी जाती है, तो सवाल उठना स्वाभाविक है कि उनके मूल विद्यालय का क्या होगा? क्या वहां उनकी कक्षाएं चलेंगी? क्या वे नियमित रूप से विद्यार्थियों को पढ़ा पाएंगे? क्या उनकी जगह कोई अन्य शिक्षक उपलब्ध कराया गया है? या फिर व्यवस्था यह मानकर चल रही है कि एक कुर्सी पर बैठने से दूसरी कुर्सी अपने आप संभल जाएगी? यही वह बिंदु है जहां मामला सिर्फ पदस्थापना का नहीं रह जाता,बल्कि शैक्षणिक व्यवस्था बनाम प्रशासनिक व्यवस्था का प्रश्न बन जाता है।
‘स्थानीय अधिकारी कहां हैं?’—सबसे बड़ा सवाल- इस विवाद का दूसरा पहलू स्थानीय अधिकारियों को लेकर है, पूर्व विधायक का कहना है कि एमसीबी और कोरिया में लंबे समय से काम कर रहे अनुभवी अधिकारी और शिक्षक उपलब्ध हैं, यदि यह तथ्य सही है तो विभाग को यह बताना होगा कि उन्हें दरकिनार करने की आवश्यकता क्यों पड़ी, किसी भी प्रशासनिक व्यवस्था में स्थानीय अनुभव अपने आप में अंतिम पात्रता नहीं होता,लेकिन पद की पात्रता,वरिष्ठता,संवर्ग और प्रशासनिक आवश्यकता को पारदर्शी तरीके से सामने रखना जरूरी होता है, वरना सवाल उठते हैं और सवालों के बीच आदेश छोटा पड़ जाता है।
‘पैराशूट लैंडिंग’ पर बढ़ी स्थानीय नाराजगी-पूर्व विधायक गुलाब कमरो ने बाहर से अधिकारी अथवा कर्मचारी लाकर महत्वपूर्ण जिम्मेदारी देने की स्थिति को ‘पैराशूट लैंडिंग’ की संज्ञा दी है, यह उनका राजनीतिक आरोप/रूपक है,कोई आधिकारिक प्रशासनिक श्रेणी नहीं, लेकिन इस शब्द ने उस बहस को जरूर सामने ला दिया है जो अक्सर सरकारी कार्यालयों में दबे स्वर में होती है की क्या स्थानीय स्तर पर काम करने वाले कर्मचारियों को उनकी वरिष्ठता और अनुभव के अनुरूप अवसर मिल रहा है? यदि किसी बाहरी जिले के कर्मचारी को प्रभार देना नियमसम्मत और प्रशासनिक आवश्यकता पर आधारित है तो विभाग को नियम और कारण स्पष्ट करने में कठिनाई नहीं होनी चाहिए, और यदि स्थानीय स्तर पर पात्र अधिकारी उपलब्ध नहीं थे, तो यह भी बताया जा सकता है, असल समस्या आदेश से ज्यादा आदेश की पारदर्शिता को लेकर है।
संलग्नीकरण बंद करने का आदेश और फिर नई व्यवस्था?- कमरो ने अपने ज्ञापन में संलग्नीकरण की व्यवस्था को लेकर भी सवाल उठाया है,उनका आरोप है कि शासन स्तर से संलग्नीकरण समाप्त करने के निर्देश जारी किए जाते हैं,लेकिन बाद में अलग रास्ते से वैसी ही व्यवस्था दोबारा दिखाई देती है,यहीं व्यंग्य का सबसे बड़ा बिंदु सामने आता है अगर संलग्नीकरण गलत था तो समाप्त क्यों किया गया? और अगर किसी विशेष परिस्थिति में जरूरी था तो समाप्त करने का आदेश क्यों निकला? और यदि बाद में फिर जरूरत पड़ी तो नई व्यवस्था का नियम क्या है? सरकारी आदेशों की सबसे बड़ी ताकत उनकी स्पष्टता होती है,आदेश यदि एक बात कहे और जमीन पर व्यवस्था दूसरी दिखाई दे तो कर्मचारियों में भ्रम और असंतोष पैदा होना स्वाभाविक है।
‘लेनदेन’ के आरोप भी ज्ञापन में, लेकिन जांच जरूरी-कमरो ने पदस्थापना और संलग्नीकरण को लेकर कथित राजनीतिक प्रभाव तथा ‘लेनदेन’ संबंधी आरोपों की जांच की मांग भी की है,यहां स्पष्ट करना जरूरी है कि इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि उपलब्ध सामग्री से नहीं हुई है,इसलिए इन्हें तथ्य के रूप में प्रस्तुत नहीं किया जा सकता,यदि शासन चाहे तो इस पूरे पहलू की निष्पक्ष जांच कराकर स्थिति स्पष्ट कर सकता है, क्योंकि किसी भी सरकारी पदस्थापना पर सवाल उठना अलग बात है और उसमें आर्थिक लेनदेन सिद्ध होना अलग बात, दोनों के बीच फर्क बनाए रखना ही जांच की विश्वसनीयता के लिए जरूरी है।
अब गेंद शिक्षा विभाग के पाले में- पूर्व विधायक के ज्ञापन के बाद अब शिक्षा विभाग के सामने कई सवाल हैं की 21 सितंबर का आदेश किस नियम के तहत जारी हुआ? व्याख्याता को बीईओ का प्रभार देने का प्रशासनिक औचित्य क्या था? प्रभार की अवधि कितनी है? क्या व्याख्याता अपने मूल विद्यालय में अध्यापन भी करेंगे? सोनहत में स्थानीय स्तर पर पात्र अधिकारी उपलब्ध थे या नहीं? यदि थे तो उन्हें प्रभार क्यों नहीं दिया गया? यदि नहीं थे तो विभाग ने किस आधार पर वैकल्पिक व्यवस्था चुनी? क्या इस मामले में शिक्षक को गैर-शैक्षणिक दायित्व में लगाने संबंधी शासन के निर्देश लागू होते हैं? इन सवालों का जवाब किसी राजनीतिक बयान से नहीं, बल्कि आदेश, सेवा नियम और विभागीय रिकॉर्ड से मिलना चाहिए, स्कूल शिक्षा विभाग की आधिकारिक वेबसाइट पर 2026 में वरिष्ठता, पदोन्नति और संवर्ग संबंधी कई प्रक्रियाएं सार्वजनिक की गई हैं। इससे यह स्पष्ट है कि विभागीय प्रशासन में पद और संवर्ग आधारित औपचारिक प्रक्रियाएं चल रही हैं,ऐसे में सोनहत के बीईओ प्रभार का मामला भी यदि नियमों के अनुसार है तो नियम सामने रखे जाने चाहिए और यदि कोई विसंगति है तो उसे दूर किया जाना चाहिए।
सवाल कुर्सी का नहीं, व्यवस्था के भरोसे का है- पूरे विवाद को केवल ‘कमरो बनाम शिक्षा विभाग’ की राजनीतिक लड़ाई मानना मामले को छोटा कर देगा, असली सवाल यह है कि सरकारी शिक्षा व्यवस्था में पदस्थापना और प्रभार की प्रक्रिया कितनी पारदर्शी है, किसी शिक्षक को प्रशासनिक जिम्मेदारी देना गलत है या सही—इसका फैसला आरोपों से नहीं,नियमों से होगा, लेकिन जब एक जिले में पदस्थ व्याख्याता को दूसरे जिले के विकासखंड में बीईओ का प्रभार मिलता है,स्थानीय अधिकारी-कर्मचारियों की उपलब्धता पर सवाल उठते हैं,शिक्षक को गैर-शैक्षणिक दायित्व में लगाए जाने की नीति का हवाला दिया जाता है और फिर पूर्व विधायक को शिक्षा सचिव तक ज्ञापन भेजना पड़ता है, तो इतना सवाल पूछना तो बनता है की शिक्षा विभाग में आखिर नियम चल रहे हैं या नियमों के साथ ‘प्रभार व्यवस्था’ भी चल रही है? और यदि नियम ही सर्वोपरि हैं तो उनका हिसाब सार्वजनिक करने में संकोच कैसा? फिलहाल मामला ज्ञापन, आरोप और प्रशासनिक आदेश की व्याख्या के स्तर पर है। संबंधित अधिकारियों अथवा शासन की आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने आने के बाद ही यह स्पष्ट होगा कि 21 सितंबर का प्रभार आदेश किन नियमों और प्रशासनिक परिस्थितियों के आधार पर जारी किया गया, तब तक ‘पैराशूट लैंडिंग’ राजनीतिक व्यंग्य का शब्द भले हो,लेकिन स्थानीय अधिकारियों की उपलब्धता, शिक्षक के मूल दायित्व और प्रभार देने की प्रक्रिया से जुड़े सवाल वास्तविक प्रशासनिक सवाल बने हुए हैं।
विभाग की अपनी वेबसाइट पर पदोन्नति और वरिष्ठता की प्रक्रिया जारी
स्कूल शिक्षा विभाग के आधिकारिक पोर्टल पर वर्ष 2026 में विभिन्न संवर्गों की वरिष्ठता सूची, पदोन्नति और प्रशासनिक पदों से संबंधित प्रक्रियाएं प्रकाशित हुई हैं, पोर्टल पर छत्तीसगढ़ स्कूल शिक्षा सेवा (शैक्षिक एवं प्रशासनिक संवर्ग) भर्ती तथा पदोन्नति नियम 2026 भी उपलब्ध है,साथ ही विकासखंड शिक्षा अधिकारी/सहायक संचालक संवर्ग की वरिष्ठता सूची से संबंधित सूचनाएं भी प्रकाशित की गई हैं,यानी विभाग के पास संवर्ग, वरिष्ठता और पदोन्नति की औपचारिक व्यवस्था मौजूद है, फिर सवाल और सीधा हो जाता है—जब प्रशासनिक पदों के लिए विभागीय संवर्ग और वरिष्ठता की व्यवस्था है, तो प्रभार देने के निर्णय का आधार क्या था? इसका जवाब संबंधित आदेश और सेवा नियमों के परीक्षण से ही सामने आएगा।
‘गैर-शैक्षणिक कार्य’ से दूर रखने के निर्देश का हवाला
पूर्व विधायक कमरो ने अपने ज्ञापन में 23 जून 2026 की स्कूल शिक्षा विभाग की समीक्षा बैठक तथा 25 जून 2026 के लोक शिक्षण संचालनालय के पत्र का हवाला देते हुए शिक्षकों को उनके मूल शैक्षणिक दायित्व से हटाकर गैर-शैक्षणिक कार्यों में लगाए जाने से बचने की बात उठाई है, यहां फिर व्यवस्था के सामने एक सवाल खड़ा होता है,यदि शिक्षक को गैर-शैक्षणिक कार्य से बचाने की नीति है,तो प्रशासनिक प्रभार की ऐसी व्यवस्था को किस श्रेणी में रखा जाएगा? हालांकि यह भी महत्वपूर्ण है कि किसी शिक्षक को प्रशासनिक प्रभार दिया जाना स्वतः नियमविरुद्ध है,ऐसा निष्कर्ष केवल इस आधार पर नहीं निकाला जा सकता, इसके लिए संबंधित आदेश,प्रभार की अवधि,सेवा संवर्ग,लागू नियम और विभागीय आवश्यकता को देखना जरूरी होगा,यही कारण है कि कमरो ने सीधे तौर पर नियमों की जांच और स्थिति स्पष्ट करने की मांग की है।
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