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अम्बिकापुर@प्रतीक्षा बस स्टैंड की जमीन के कथित फर्जी अंतरण पर एफआईआर के निर्देश

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कलेक्टर की जांच रिपोर्ट में खुला राजस्व रिकॉर्ड का खेल! 1954-55 के अभिलेख में गोंड के नाम दर्ज भूमि,दूसरे जैलाल के वारिसों की जानकारी से फौती नामांतरण का उल्लेख


-संवाददाता-
अम्बिकापुर,23 सितम्बर 2026 (घटती-घटना)। प्रतीक्षा बस स्टैंड अंबिकापुर क्षेत्र की बेशकीमती जमीन से जुड़े मामले ने अब गंभीर मोड़ ले लिया है, खसरा क्रमांक 3714 की भूमि के कथित फर्जी एवं दोषपूर्ण दस्तावेजों के आधार पर अंतरण के मामले में कलेक्टर सरगुजा ने तहसीलदार अंबिकापुर को संबंधित व्यक्तियों के विरुद्ध प्राथमिकी दर्ज कराने के निर्देश दिए हैं, इसके साथ ही जांच में सामने आए तथ्यों के आधार पर भूमि को विधिवत शासन में निहित करने की प्रक्रिया शुरू करने के निर्देश भी दिए गए हैं। कलेक्टर कार्यालय से जारी आदेश दिनांक 23 सितंबर 2026 में यह कार्रवाई अनुविभागीय अधिकारी (राजस्व) अंबिकापुर के जांच प्रतिवेदन के आधार पर की गई है। मामला इसलिए गंभीर है क्योंकि जांच रिपोर्ट में जिस भूमि के अंतरण पर सवाल उठाए गए हैं, उसके पुराने राजस्व अभिलेखों को लेकर ही बड़ी विसंगतियां सामने आने का उल्लेख है, जांच में कहा गया है कि संबंधित भूमि वर्ष 1954-55 के पूर्व से जैलाल पिता बोधन, जाति गोंड के नाम दर्ज थी, वहीं बाद की राजस्व प्रक्रिया में एक अलग व्यक्ति के नाम और उसके वारिसों की जानकारी का उपयोग कर फौती नामांतरण किए जाने का उल्लेख जांच रिपोर्ट में किया गया है।
तालाब की जमीन पाटकर प्लाटिंग की शिकायत से शुरू हुआ मामला
प्रकरण की शुरुआत प्रतीक्षा बस स्टैंड क्षेत्र में स्थित भूमि के संबंध में की गई शिकायत से हुई, शिकायत में कहा गया था कि खसरा क्रमांक 3714 की भूमि में मौजूद जल क्षेत्र को पाटकर प्लाटिंग की जा रही है,शिकायत में यह भी उल्लेख था कि यह क्षेत्र तालाब के रूप में उपयोग होता रहा है और आसपास के लोग निस्तारी,नहाने,पशुओं को पानी पिलाने तथा अन्य आवश्यकताओं के लिए इसका उपयोग करते रहे हैं,कलेक्टर कार्यालय के आदेश में यह भी दर्ज है कि नगर निगम अम्बिकापुर के मास्टर प्लान 2021 में संबंधित भूमि को नगर निगम के तालाबों की सूची में शामिल किए जाने तथा तालाब के रूप में उपयोग किए जाने संबंधी तथ्य शिकायत में प्रस्तुत किए गए थे,इसी शिकायत के आधार पर अनुविभागीय अधिकारी (राजस्व) अंबिकापुर से जांच कराई गई,यानी मामला सिर्फ किसी निजी भूमि के सामान्य विवाद तक सीमित नहीं था,शिकायत में जल क्षेत्र, उसके उपयोग और भूमि के अंतरण के साथ प्लाटिंग का मुद्दा भी उठाया गया था।
जैलाल की मौत का प्रमाण पत्र भी रिकॉर्ड में नहीं मिला-मामले में एक और महत्वपूर्ण तथ्य जांच के दौरान सामने आने का उल्लेख है,भूमि के मूल खातेदार जैलाल पिता बोधन की मृत्यु 23 अप्रैल 1976 को होने संबंधी दस्तावेज प्रस्तुत किए गए थे,लेकिन नगर पालिक निगम अंबिकापुर से प्राप्त जानकारी के अनुसार इस मृत्यु से संबंधित प्रस्तुत प्रमाण पत्र निगम के रिकॉर्ड में दर्ज नहीं था और न ही निगम द्वारा जारी किया गया था। यह जानकारी निगम द्वारा 4 मई 2026 को दी गई थी, यानी जिस मृत्यु प्रमाण पत्र के आधार पर आगे की राजस्व कार्रवाई का रास्ता बना,उसी दस्तावेज की नगर निगम रिकॉर्ड में पुष्टि नहीं होने की बात जांच रिपोर्ट में दर्ज है,अब यही दस्तावेज और उससे जुड़ी पूरी प्रक्रिया आगे होने वाली पुलिस जांच में महत्वपूर्ण हो सकती है।
किसकी भूमिका पर जांच में उठे सवाल?- कलेक्टर के आदेश में एसडीएम की जांच रिपोर्ट के आधार पर चन्द्रशेखर यादव पिता स्व. जगतपाल यादव और आजाद इराकी पिता रियाजुद्दीन इराकी की भूमि अंतरण में भूमिका का उल्लेख किया गया है, इसके अलावा जांच रिपोर्ट में अन्य विक्रेताओं नोहरसाय,रामकुमार,श्रीलाल, पूर्णिमा,जनकुंवर,चन्द्रभान यादव एवं मीरा यादव की संलिप्तता भी प्रतीत होने की बात कही गई है, इतना ही नहीं,ग्राम पंचायत अमलभिट्ठी के तत्कालीन संबंधित सरपंच एवं सचिव की भूमिका भी जांच में संदेहास्पद बताई गई है, रिपोर्ट के अनुसार ग्राम पंचायत स्तर पर भी दस्तावेज तैयार करने अथवा प्रक्रिया में भूमिका की जांच की जरूरत सामने आई है,यह सभी नाम जांच रिपोर्ट में उल्लेखित हैं,इनके विरुद्ध आरोपों की अंतिम पुष्टि पुलिस जांच और न्यायिक प्रक्रिया में ही होगी।
दस्तावेजों में सामने आई विसंगतियां अब जांच का केंद्र- इस पूरे मामले में सबसे अहम सवाल अब यही है कि राजस्व रिकॉर्ड में नामांतरण की प्रक्रिया किस आधार पर हुई? एक ओर जांच रिपोर्ट में पुराने रिकॉर्ड में जैलाल पिता बोधन गोंड का नाम होने का उल्लेख है, दूसरी ओर जैलाल पिता देवराम के वारिसों की जानकारी तैयार किए जाने और उसका इस्तेमाल जैलाल पिता बोधन के वारिसों के लिए किए जाने की बात कही गई है,इसके बाद मृत्यु प्रमाण पत्र का सवाल सामने आता है,जिसकी नगर निगम रिकॉर्ड में पुष्टि नहीं होने की बात जांच में दर्ज है, फिर इसी आधार पर तैयार वारिसान और राजस्व रिकॉर्ड में हुई फौती नामांतरण की प्रक्रिया सवालों के घेरे में आती है, यही कारण है कि अब पुलिस जांच में केवल भूमि की वर्तमान स्थिति ही नहीं,बल्कि पुराने राजस्व रिकॉर्ड से लेकर वंशावली,मृत्यु प्रमाण पत्र,फौती नामांतरण, बिक्री दस्तावेज और रजिस्ट्री की पूरी श्रृंखला की जांच महत्वपूर्ण होगी।
भूमि शासन में निहित करने की भी तैयारी- कलेक्टर ने तहसीलदार अंबिकापुर को संबंधित व्यक्तियों के खिलाफ संबंधित थाने में प्राथमिकी दर्ज कराने के साथ पालन प्रतिवेदन अविलंब प्रस्तुत करने के निर्देश दिए हैं, साथ ही जांच प्रतिवेदन और राजस्व अभिलेखों के आधार पर भूमि को विधिवत शासन में निहित करने की प्रक्रिया आगे बढ़ाने के निर्देश दिए गए हैं, कलेक्टर के आदेश की प्रतिलिपि पुलिस अधीक्षक सरगुजा, एसडीएम अंबिकापुर तथा जिला जनसंपर्क कार्यालय को भी भेजी गई है।
1954-55 के रिकॉर्ड से शुरू होती है पूरी कहानी
अनुविभागीय अधिकारी (राजस्व) की जांच रिपोर्ट का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा भूमि के पुराने रिकॉर्ड से जुड़ा है,रिपोर्ट के अनुसार संबंधित भूमि जैलाल पिता बोधन,जाति गोंड के नाम राजस्व अभिलेखों में दर्ज थी,आदेश में इसे अनुसूचित जनजाति वर्ग की भूमि के रूप में भी संदर्भित किया गया है, यहीं से सवाल उठता है कि यदि मूल अधिकार अभिलेख में भूमि जैलाल पिता बोधन गोंड के नाम दर्ज थी,तो बाद की राजस्व प्रक्रिया में इस भूमि के वारिसों की पहचान कैसे बदली और किस आधार पर नामांतरण की कार्रवाई हुई? जांच रिपोर्ट में इसी प्रक्रिया को लेकर दस्तावेजों की वैधता पर गंभीर सवाल दर्ज किए गए हैं।
एक जैलाल की जगह दूसरे जैलाल के वारिसों की जानकारी!
जांच रिपोर्ट के अनुसार अमलभिट्ठी के पटवारी द्वारा जैलाल पिता देवराम के वारिसों की जानकारी तैयार की गई थी,लेकिन इस जानकारी का उपयोग जैलाल पिता बोधन के वारिसों के संबंध में करते हुए राजस्व अभिलेखों में फौती नामांतरण की कार्रवाई किए जाने का उल्लेख जांच रिपोर्ट में है, यही वह बिंदु है जिसने पूरे मामले को गंभीर बना दिया है, जांच रिपोर्ट में दो अलग-अलग पिताओं के नाम दर्ज होने के बावजूद वारिसों की जानकारी के इस्तेमाल की बात सामने आती है, यदि जांच में दर्ज यह तथ्य आगे की आपराधिक जांच में भी प्रमाणित होता है,तो यह स्पष्ट करना महत्वपूर्ण होगा कि संबंधित दस्तावेज किसने तैयार किए, किस स्तर पर उनका परीक्षण हुआ और राजस्व रिकॉर्ड में नामांतरण की कार्रवाई किस आधार पर की गई।
एसटी भूमि के अंतरण में फर्जी दस्तावेज का उल्लेख
कलेक्टर के आदेश में एसडीओ राजस्व की जांच रिपोर्ट के निष्कर्ष का उल्लेख करते हुए कहा गया है कि अनुसूचित जनजाति वर्ग की भूमि के अंतरण में फर्जी एवं दोषपूर्ण दस्तावेजों के आधार पर छल-कपट एवं धोखाधड़ी किए जाने की बात सामने आई है, इसी आधार पर संबंधित व्यक्तियों के विरुद्ध प्राथमिकी दर्ज कराने के निर्देश दिए गए हैं, यानी प्रशासन ने इस मामले को केवल राजस्व रिकॉर्ड की त्रुटि मानकर बंद नहीं किया है, जांच निष्कर्षों के आधार पर इसे आपराधिक कार्रवाई योग्य मामला मानते हुए पुलिस में एफआईआर दर्ज कराने की दिशा में कदम बढ़ाया गया है।
आलोक दुबे की शिकायत के बाद जांच ने पकड़ा मामला
इस मामले को दस्तावेजों के साथ उठाने वाले वरिष्ठ पार्षद आलोक दुबे ने बताया कि उन्होंने 2 सितंबर 2026 को कलेक्टर सरगुजा के समक्ष शिकायत प्रस्तुत की थी,उनके अनुसार शिकायत के साथ भूमि के पुराने दस्तावेज और राजस्व रिकॉर्ड से जुड़े तथ्य भी प्रस्तुत किए गए थे,आलोक दुबे का सवाल है कि जब पुराने सेटलमेंट और अधिकार अभिलेख में भूमि जैलाल गोंड के नाम दर्ज थी, तो बाद की प्रक्रिया में यह नाम और वारिसों का स्वरूप कैसे बदल गया, उन्होंने आरोप लगाया है कि कथित तौर पर भूमि दलाल,तत्कालीन राजस्व अधिकारियों और संबंधित कर्मचारियों की मिलीभगत से फर्जी वंशावली तैयार कर भूमि का अंतरण कराया गया, हालांकि,यह आरोप शिकायतकर्ता का है इसकी अंतिम पुष्टि पुलिस जांच एवं न्यायिक प्रक्रिया में ही होगी।
अब एफआईआर के बाद खुलेगा जमीन के दस्तावेजों का पूरा राज…
प्रशासनिक जांच के बाद अब इस मामले की अगली कड़ी पुलिस कार्रवाई होगी, एफआईआर दर्ज होने के बाद पुलिस के सामने सबसे बड़ी चुनौती दस्तावेजों की पूरी कड़ी को खंगालने की होगी, मूल अधिकार अभिलेख में नाम किसका था? वारिस कौन थे? मृत्यु प्रमाण पत्र कहां से आया? उसकी वैधता कैसे जांची गई? एक अन्य जैलाल के वारिसों की जानकारी का इस्तेमाल कैसे हुआ? फौती नामांतरण किस अधिकारी के आदेश से हुआ? बिक्री और रजिस्ट्री की प्रक्रिया किन दस्तावेजों के आधार पर हुई? और भूमि के अंतरण से जुड़े प्रत्येक व्यक्ति की भूमिका क्या रही? इन सवालों के जवाब ही इस पूरे प्रकरण की वास्तविक तस्वीर सामने ला सकते हैं, फिलहाल इतना स्पष्ट है कि 23 सितंबर 2026 के कलेक्टर आदेश ने मामले को शिकायत और राजस्व जांच के स्तर से आगे बढ़ाकर आपराधिक कार्रवाई के चरण में पहुंचा दिया है, जांच रिपोर्ट में दस्तावेजों और नामांतरण प्रक्रिया को लेकर जो गंभीर तथ्य दर्ज किए गए हैं, उनके आधार पर एफआईआर के निर्देश दिए गए हैं, अब पुलिस जांच और आगे की न्यायिक प्रक्रिया यह तय करेगी कि जांच में सामने आए आरोपों में से कौन-से तथ्य साक्ष्यों से प्रमाणित होते हैं।


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