- घटती घटना की खबर का असर…जांच का हुआ आदेश…किसानों को राहत मिलने की उम्मीद।
- क्या जाँच के उपरांत जिम्मेदारों पर होगी कार्यवाही या राजनीतिक सहारा लेकर बच निकलेंगे कालाबाजारी?
- वर्तमान में पटना एवं तरगांवा समिति का कार्यभार अनूप कुशवाहा के हवाले जिनके विरुद्ध कई शिकायत।
- किसानों की आशंका सच बया करने पर प्रबंधक की परेशानी का करना पड़ड़ेगा सामना।

-रवि सिंह-
बैकुण्ठपुर 28 मई 2022 (घटती-घटना)। विगत वर्ष सहकारी समिति तरगवां से किसानों की परमिट कटने के बाद भी यूरिया खाद किसानों को प्रदान नहीं किया गया था और धान खरीदी के वक्त बगैर प्रदाय किए हुए खाद व यूरिया की ऋण वसूली सहकारी समिति तरगवां जिसकी मातृ समिति पटना है के प्रबंधकों द्वारा कर ली गई थी। इस वर्ष जब किसानों ने वर्तमान प्रबंधक से विगत वर्ष के बकाए खाद की मांग की तो विगत वर्ष के तत्कालीन प्रबंधक के द्वारा टालमटोल करने पर शिकायत उच्च अधिकारियों को वर्तमान प्रबंधक द्वारा प्रेषित की गई थी। जिसकी खबर प्रमुखता से दैनिक घटती-घटना ने प्रकाशित की थी जिस खबर प्रकाशन के दिन ही सहायक पंजीयक सहकारी संस्थाएं बैकुंठपुर द्वारा मामले की जांच के आदेश कर दिए गया। जिसकी रिपोर्ट 3 दिन में प्रस्तुत की जानी है अब देखना है कि क्या वाकई 3 दिन में जांच हो जाएगी या फिर या जांच सिर्फ नाम के 3 दिन रहेगा, कही हरबार की तरह 3 साल तक यह जांचा चलता न रह जाए, यह भी बताया जा रहा है कि मुख्यमंत्री का दौरा है इससे पहले जांच करना भी अनिवार्य है नहीं तो शिकायत भी जबरदस्त होगी जिस शिकायत के डर से भी यह जांच अत्यंत जरूरी हो गया है।
मामला यह है कि 2 वर्ष पूर्व सहकारी समिति पटना से विलग हो कर दो नए समितियों का गठन सहकारी समिति तरगवां और सहकारी समिति गिरजापुर के नाम से हुआ था। परंतु भंडारण, वितरण व संग्रहण की व्यवस्था ना होने के कारण नवीन गठित समितियों का कार्य संचालन पटना समिति से ही किया जा रहा था। विगत वर्ष खरीफ सीजन में तरगांवा समिति के अंतर्गत आने वाले किसानों को यूरिया एवं खाद की आवश्यकता थी तो खाद प्रदान करने के लिए परमिट तो तत्कालीन समिति प्रबंधक रामकुमार साहू के द्वारा काटा गया परंतु वितरण की व्यवस्था पटना सहकारी समिति के तत्कालीन प्रबंधक अनूप कुशवाहा की थी, जब वे किसान समिति से अपना खाद उठाव करने गए तो उन्हें वहां से खाद का अभाव बताकर वापस बैरंग लौटा दिया गया था। किसानों के साथ विडंबना यह हुई कि जो खाद उन्हें मिला नहीं उसके श्रृण की वसूली धान खरीदी के वक्त तरगांवा समिति के प्रबंधक राम कुमार साहू के द्वारा कर ली गई। इस दौरान तरगांवा समिति में नए प्रबंधक जितेंद्र मिश्रा की पदस्थापना की गई, जिन से उन किसानों ने संपर्क किया जिनकी अवैध ऋण वसूली की गई थी। जब किसानों ने उनसे बकाया खाद का मांग किया तो समिति प्रबंधक जितेन्द्र मिश्रा के द्वारा जिम्मेदार लोगों को इससे अवगत कराया और उनसे खाद की मांग की परंतु इस कृत्य के जिम्मेदार लोगों के द्वारा टालमटोल करने पर उन्होंने उच्चाधिकारियों को शिकायत पत्र किसानों के नाम, मोबाइल नंबर, खाद की मात्रा सहित प्रेषित की। इस पर भी कोई कार्यवाही नहीं हो रही थी और किसानों को बेवजह परेशान होना पड़ रहा था। जिसकी खबर किसानों के हित में घटती घटना के द्वारा प्रकाशित की गई। खबर प्रकाशन के दिन ही सहकारी समिति के सहायक पंजीयक बैकुंठपुर द्वारा शाखा प्रबंधक के नाम से प्रकरण की जांच आदेश जारी किया गया। जिसकी रिपोर्ट 3 दिनों में प्रस्तुत की जानी है। सूत्रों के अनुसार खबर प्रकाशन एवं जांच आदेश होने के पश्चात जिम्मेदार समिति प्रबंधक राम कुमार साहू एवं श्री अनूप कुशवाहा के द्वारा उन किसानों से संपर्क किया जा रहा है जिनकी अवैध ऋण वसूली कर ली गई थी, उन्हें आश्वासन के साथ चेताया भी जा रहा है। वर्तमान में पटना एवं तरगांवा दोनों समिति का कार्यभार अनूप कुशवाहा के हवाले है। जिनके विरुद्ध में शिकायत है किसानों को आशंका है कि यदि वे सच बयान करते हैं तो उन्हें फिर से इन्हीं प्रबंधकों का सामना करना है, जो बाद में किसानों की परेशानी का सबब बन सकता है।
जिस प्रबंधक के विरुद्ध शिकायत उन्हीं को नई समिति का अतिरिक्त प्रभार
समिति प्रबंधक तरगंवा की जिम्मेदारी संभाल रहे जितेन्द्र मिश्रा का बगैर किसी कारण अचानक कोरिया जिला से सीधे सरगुजा स्थानांतरण कर दिया गया। जिसकी वजह उपरोक्त प्रकरण में जितेंद्र मिश्रा द्वारा शिकायत दर्ज करना एवं यूरिया की कालाबाजारी न होने देने से देखा जा रहा है। स्थानांतरण का एक कारण यह भी बताया जा रहा है कि उन्होंने एक रसूखदार निजी खाद दुकान संचालक को यूरिया की वह मात्रा जो किसानों को आवंटित होनी है जिसे देने से मना कर दिया गया था जिस वजह से अपने रसूख का इस्तेमाल करते हुए निजी दुकानदार द्वारा इनका स्थानांतरण अन्यंत्र करा दिया गया। विडंबना यह है कि यूरिया की इस कालाबाजारी में जिन पर आरोप लगाया गया है उसी को पटना समिति के अलावा तरगवां समिति का अतिरिक्त प्रभार दे दिया गया है ताकि किसान परेशान रहे और रसूखदार को किसानो के हिसे का खाद मिलाता रहे।
जब भंडारण, वितरण, परमिट सब कुछ ऑनलाइन एवं पारदर्शी..तो खाद की शॉर्टेज व कालाबाजारी कैसे?
वर्तमान में विगत कुछ वर्षों से सहकारी समितियों में व्यवस्था को पारदर्शी बनाने और किसानों को सहज सुलभ सुविधा उपलब्ध कराने के लिए खाद यूरिया के वितरण, भंडारण, संग्रहण, परमिट कटने एवं धान खरीदी से लेकर भुगतान की सारी प्रक्रिया को शासन द्वारा ऑनलाइन कर दिया गया है। जब समितियों में यूरिया एवं खाद की उपलब्धता रहती है तभी किसानों को परमिट जारी हो सकता है। यदि समितियों में खाद एवं यूरिया की अनुपलब्धता है तो ऑनलाइन प्रक्रिया होने के कारण परमिट जारी नहीं होता। विगत वर्ष तरगंवा समिति द्वारा जब किसानों को परमिट प्रदान किया गया तो ऑनलाइन व्यवस्था होने के कारण निश्चित ही समिति में खाद की उपलब्धता थी। जब किसान समिति से खाद उठाव करने गए तो उन्हें खाद की शॉर्टेज बता कर वापस बैरंग लौटा दिया गया आखिर क्यों? इस व्यवस्था में यह संभव नहीं है कि परमिट कटने के बाद खाद की शॉर्टेज हो जाए। संभव यह है कि किसानों के हिस्से का यूरिया एवं खाद खुले बाजार में बिक्री कर दिया गया हो और किसानों को आश्वासन देकर बैरंग वापस लौटा दिया गया हो। इस आशंका को बल इस बात से भी मिलता है कि निजी दुकानदार जिसका मामले में पूरा दखल है, जिनकी स्वयं की जमीन का रकबा अत्यंत कम है उस किसानों के हिस्से का सैकड़ों बोरी यूरिया परमिट के द्वारा प्रदान किया गया। जबकि शासन द्वारा 1 एकड़ भूमि होने पर 2 बोरी यूरिया की पात्रता ही निर्धारित है। यदि ईमानदारी से जांच की जाए तो सारे प्रकरण का खुलासा हो सकता है। देखने वाली बात यह है कि जांच की प्रक्रिया में क्या कुछ निकल कर सामने आता है? दोषियों पर कार्यवाही सुनिश्चित होती है या नहीं? या विभाग की लचर व्यवस्था के कारण सब कुछ पहले जैसे ही ठंडे बस्ते में चला जाएगा?
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