सुप्रीम कोर्ट ने बनाई नई व्यवस्था में दिये ज्यादा अधिकार
नई दिल्ली ,07 अक्टूबर 2021( ए )। सुप्रीम कोर्ट ने बृहस्पतिवार को कहा है कि राष्ट्रीय हरित न्यायाधिकरण(एनजीटी) को पर्यावरण से संबंधित मुद्दों पर स्वतः संज्ञान लेने की शक्ति प्रदान की गई है। शीर्ष अदालत ने कहा कि हरित पैनल पत्रों, अभ्यावेदन और मीडिया रिपोर्टों के आधार पर स्वयं कार्यवाही शुरू कर सकता है।
जस्टिस एएम खानविलकर, जस्टिस हृषिकेश रॉय और जस्टिस सीटी रविकुमार की पीठ ने यह व्यवस्था एनजीटी के स्वतः संज्ञान क्षेत्राधिकार को लेकर दायर याचिकाओं के एक समूह पर दिया है। सुनवाई के दौरान वरिष्ठ वकील संजय पारिख ने तर्क दिया था कि एनजीटी को पर्यावरण की बहाली के लिए आदेश पारित करने की शक्तियां प्रदान की गई हैं, इसलिए यह स्वतः संज्ञान शक्तियों का प्रयोग कर सकता है। हालांकि न्याय मित्र वरिष्ठ वकील आनंद ग्रोवर, मुकुल रोहतगी सहित वरिष्ठ वकीलों के एक समूह ने पारिख की दलीलों का विरोध करते हुए कहा था कि केवल संवैधानिक अदालतें ही अपनी स्वतः संज्ञान की शक्तियों का प्रयोग कर सकती हैं। उनका कहना था कि एनजीटी जैसे वैधानिक न्यायाधिकरण को मूल कानून के दायरे में कार्य करना होता है। वहीं, केंद्र की ओर से अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल ऐश्वर्या भाटी ने तर्क दिया कि एनजीटी के पास किसी मामले का खुद संज्ञान लेने की शक्ति नहीं है। हालांकि, उन्होंने कहा था कि ट्रिब्यूनल की शक्तियां प्रक्रियात्मक बाधाओं से बंधी नहीं हो सकती हैं। उनकी दलील पर पीठ ने उनसे पूछा था कि अगर ट्रिब्यूनल को पर्यावरण के संबंध में कोई सूचना मिलती है तो क्या वह प्रक्रिया शुरू करने के लिए बाध्य नहीं होगा। इस पर भाटी ने जवाब दिया था कि कोई पत्र या संचार प्राप्त होने के बाद संज्ञान लेना ट्रिब्यूनल के अधिकार में है। पीठ ने इस मामले में आठ सितंबर को अपना फैसला सुरक्षित रख लिया था। एनजीटी ने राष्ट्रीय हरित अधिकरण अधिनियम की धारा-19 के तहत पर्यावरण को होने वाले नुकसान से संबंधित कई मामलों में स्वत: संज्ञान लिया था, जिसमें कहा गया था कि यह प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों द्वारा निर्देशित होगा और यह सिविल प्रक्रिया संहिता द्वारा निर्धारित प्रक्रिया के तहत चलने के लिए बाध्य नहीं होगा।
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