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सूरजपुर/ भैयाथान @ मृत्यु के बाद भी खाते में ‘जिंदा’ रहा लेन-देन! हरिप्रसाद के नाम पर केसीसी ऋण और नकद निकासी ने खड़े किए गंभीर सवाल

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  • दस्तावेजों पर केंद्रित मृत्यु 10 मई 2021 को,फिर जून में केसीसी ऋ ण कैसे?,मृत किसान के खाते में हुआ केसीसी ऋण…फिर निकले रुपये…वाउचर पर किसका अंगूठा?
  • किसान दुनिया से चला गया,लेकिन खाते में कर्ज और निकासी का सिलसिला चलता रहा!
  • हरिप्रसाद के खाते से भुगतान, वाउचर पर अंगूठे और चेक की लिखावट की फॉरेंसिक जांच की मांग—फॉरेंसिक जांच से खुलेगा राज?
  • शिवप्रसादनगर समिति में हरिप्रसाद के केसीसी ऋण प्रकरण पर उठे सवाल,जिम्मेदारों की भूमिका की जांच की मांग
  • सहकारिता का हिसाब या सवालों का जाल? मृत किसान के खाते में आखिर किसने किया लेन-देन!
  • हरिप्रसाद के मृत्यु प्रमाणपत्र,बैंक स्टेटमेंट और निकासी वाउचर के आधार पर उठे गंभीर प्रश्न
  • केसीसी ऋण चेक पर हेड राइटिंग तत्कालीन लिपिक सोहराब अंसारी की बताई जा रही, निष्पक्ष जांच और फॉरेंसिक परीक्षण की मांग…
  • सोनपुर आदिम जाति सेवा सहकारी समिति में मृतक हरिप्रसाद के नाम पर? 1.29 लाख के लेन-देन की शिकायत
  • तत्कालीन समिति प्रबंधक जीवतेश श्रीवास्तव और लिपिक सोहराब अंसारी की भूमिका की जांच की मांग
  • विशेष पड़ताल 7 सहकारी समिति और बैंकिंग व्यवस्था की जवाबदेही पर सवाल


-ओेंकार पाण्डेय-
सूरजपुर/ भैयाथान,18 अक्टूबर 2026 (घटती-घटना)।
सहकारिता व्यवस्था का मूल उद्देश्य किसानों को साहूकारों के चंगुल से बचाना, खेती के लिए समय पर ऋण उपलब्ध कराना और सरकारी योजनाओं का लाभ वास्तविक हितग्राहियों तक पहुंचाना है, लेकिन जब किसी मृत किसान के नाम पर मृत्यु के बाद केसीसी ऋण स्वीकृति, नकद निकासी और भुगतान से जुड़ी प्रविष्टियां सामने आएं,तो मामला महज कागजी गलती मानकर किनारे नहीं किया जा सकता, ऐसे दस्तावेज बैंकिंग प्रक्रिया,समिति के कामकाज और संबंधित अधिकारियों की जवाबदेही पर गंभीर सवाल खड़े करते हैं।
मामला आदिम जाति सेवा सहकारी समिति, सोनपुर से संबंधित बताया जा रहा है,उपलब्ध मृत्यु प्रमाण-पत्र में कृषक स्वर्गीय हरिप्रसाद की मृत्यु की तारीख 10 मई 2021 दर्ज है,दूसरी ओर, उपलब्ध बैंक खाते के विवरण में मई और जून 2021 के दौरान राशि जमा होने,केसीसी ऋण से संबंधित प्रविष्टियों तथा नकद निकासी का उल्लेख है, शिकायतकर्ता की ओर से प्रस्तुत विवरण के अनुसार, मृत्यु के बाद भी किसान के नाम पर ऋण की प्रक्रिया और खाते से भुगतान हुआ,यदि इन दस्तावेजों की पुष्टि होती है, तो सबसे बुनियादी सवाल यही होगा कि किसान की मृत्यु के बाद ऋण प्रकरण किसने तैयार किया, बैंक में चेक किसने जमा किया और नकद भुगतान आखिर किस व्यक्ति को मिला? यहां सवाल केवल एक खाते का नहीं है,सवाल उस पूरी प्रक्रिया का है जिसमें ऋण प्रकरण तैयार होता है,समिति के स्तर पर दस्तावेज आगे बढ़ते हैं, बैंक शाखा में चेक जमा होता है और फिर राशि का भुगतान किया जाता है,इन सभी चरणों का रिकॉर्ड मौजूद होना चाहिए, यदि रिकॉर्ड में किसान के नाम पर कार्रवाई दर्ज है,लेकिन किसान का निधन पहले ही हो चुका था,तो दस्तावेजों का मिलान और संबंधित व्यक्तियों की भूमिका की जांच अनिवार्य हो जाती है।
मृत किसान के नाम पर ऋण प्रकरण किसने तैयार किया?
उपलब्ध दस्तावेजों के अनुसार,हरिप्रसाद की मृत्यु 10 मई 2021 को हुई,इसके बाद 25 मई 2021 को उनके खाते में राजीव गांधी किसान न्याय योजना के तहत 17 हजार रुपये की राशि के भुगतान/निकासी का विवरण बताया गया है, बैंक स्टेटमेंट में 3 जून 2021 को 75 हजार रुपये की केसीसी ऋ ण राशि जमा होने और उसी दिन 49 हजार रुपये तथा 4 जून को 26 हजार रुपये की नकद निकासी दर्ज है, आगे 11 जून 2021 को 54 हजार रुपये की एक अन्य केसीसी ऋण संबंधी प्रविष्टि और 17 जून को 49 हजार रुपये तथा 21 जून को 5 हजार रुपये की नकद निकासी का उल्लेख मिलता है, 23 अगस्त 2021 को राजीव गांधी किसान न्याय योजना के तहत 18,500 रुपये की राशि से संबंधित प्रविष्टि भी उपलब्ध विवरण में दिखाई गई है,इन प्रविष्टियों की तारीखें अपने आप में किसी व्यक्ति की आपराधिक संलिप्तता सिद्ध नहीं करतीं, लेकिन मृत्यु प्रमाण-पत्र और बैंक रिकॉर्ड को साथ रखकर देखने पर एक ऐसा प्रश्न जरूर पैदा होता है,जिसका उत्तर अनुमान से नहीं,मूल दस्तावेजों और जांच से मिलना चाहिए, यदि हरिप्रसाद का निधन 10 मई को हो गया था, तो जून में उनके नाम से जुड़े केसीसी ऋ ण प्रकरण की प्रक्रिया किसने पूरी की? चेक किसने बनाया? बैंक में जमा पर्ची किसने भरी? भुगतान प्राप्त करने वाले के रूप में किसकी पहचान दर्ज हुई? क्या बैंक ने भुगतान के समय खाताधारक की पहचान और आवश्यक दस्तावेजों का सत्यापन किया था? सहकारिता व्यवस्था में किसान की मृत्यु के बाद खाते में आने वाली प्रत्येक राशि अपने आप में गलत नहीं मानी जा सकती, सरकारी योजना की पात्रता, खाते में पहले से मौजूद राशि,ऋण स्वीकृति की तारीख और भुगतान के नियम अलग-अलग जांच के विषय हैं,लेकिन मृत्यु के बाद ऋण स्वीकृति और नकद निकासी का क्रम सामने आए तो उसे सामान्य लेनदेन बताकर छोड़ देना भी उचित नहीं होगा,प्रत्येक प्रविष्टि के पीछे मौजूद मूल वाउचर,चेक,स्वीकृति आदेश और भुगतान रिकॉर्ड की जांच से ही वास्तविक स्थिति स्पष्ट हो सकती है।
चेक की हेड राइटिंग पर सवाल फॉरेंसिक जांच की मांग
इस प्रकरण का एक महत्वपूर्ण पहलू केसीसी ऋण से जुड़े चेक और भुगतान दस्तावेजों की लिखावट है, शिकायतकर्ता की ओर से दावा किया जा रहा है कि चेक पर मौजूद हेड राइटिंग तत्कालीन लिपिक सोहराब अंसारी की है,हालांकि,केवल लिखावट के आधार पर यह निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होगा कि चेक किसने तैयार किया या किसी अनियमितता में किसकी भूमिका थी,इसकी पुष्टि मूल चेक,संबंधित दस्तावेजों और विशेषज्ञ परीक्षण से ही हो सकती है,यदि चेक की लिखावट को लेकर संदेह है,तो जांच एजेंसी को मूल चेक और संबंधित प्रकरण के दस्तावेज सुरक्षित कराकर उनका परीक्षण कराना चाहिए, साथ ही,उस अवधि में संबंधित लिपिक के आधिकारिक हस्तलेखन के प्रमाणित नमूने,समिति के रिकॉर्ड,ऋ ण स्वीकृति संबंधी कागजात और बैंक में जमा दस्तावेजों का मिलान कराया जा सकता है,जरूरत पड़ने पर सक्षम जांच एजेंसी विधिवत प्रक्रिया के तहत हस्तलेखन विशेषज्ञ से राय ले सकती है,इसी तरह भुगतान वाउचर पर अंगूठे के निशान को लेकर भी सवाल उठाए गए हैं,यदि किसी दस्तावेज पर हरिप्रसाद का अंगूठा होने का दावा किया गया है,जबकि उनकी मृत्यु पहले ही दर्ज है,तो यह पता करना जरूरी होगा कि निशान वास्तव में किसका है,किस परिस्थिति में लगाया गया और दस्तावेज किसने प्रस्तुत किया, इसके लिए मूल दस्तावेजों की उपलब्धता,उनकी प्रामाणिकता और विधिवत फॉरेंसिक परीक्षण महत्वपूर्ण होंगे।
तत्कालीन समिति प्रबंधक जीवतेश श्रीवास्तव की भूमिका की भी जांच जरूरी
इस मामले में तत्कालीन समिति प्रबंधक जीवतेश श्रीवास्तव की भूमिका भी जांच के दायरे में स्पष्ट की जानी चाहिए,सवाल यह है कि संबंधित अवधि में समिति के स्तर पर केसीसी ऋ ण प्रकरण तैयार करने,दस्तावेजों की जांच,चेक जारी करने और बैंक को भेजने की जिम्मेदारी किसके पास थी, ऋण स्वीकृति की प्रक्रिया में किस अधिकारी या कर्मचारी ने हस्ताक्षर किए,किसने दस्तावेजों का सत्यापन किया और किस स्तर पर भुगतान के लिए फाइल आगे बढ़ाई गई—इन सभी बिंदुओं का रिकॉर्ड सामने आना चाहिए,यहां जिम्मेदारी तय करने का आधार पदनाम या आरोप नहीं, बल्कि दस्तावेजों पर मौजूद हस्ताक्षर, आदेश, कार्य-विभाजन,बैंक रिकॉर्ड और संबंधित समय की आधिकारिक जिम्मेदारियां होनी चाहिए,यदि जांच में यह सामने आता है कि किसी अधिकारी या कर्मचारी ने निर्धारित प्रक्रिया का पालन नहीं किया,तो उसके अनुसार जवाबदेही तय की जानी चाहिए।
बैंक शाखा की प्रक्रिया भी सवालों से बाहर नहीं
ऋण प्रकरण समिति में तैयार होने के बाद बैंक तक पहुंचता है,ऐसे में यह जांच केवल समिति तक सीमित नहीं रहनी चाहिए,बैंक शाखा में चेक किसने जमा किया, जमा पर्ची पर किसके हस्ताक्षर हैं,भुगतान पर्ची किसने भरी और नकद राशि किस व्यक्ति को दी गई—इन सवालों का उत्तर बैंक के मूल रिकॉर्ड से मिल सकता है,उपलब्ध बैंक स्टेटमेंट में 3 और 4 जून 2021 को कुल 75 हजार रुपये तथा 17 और 21 जून 2021 को कुल 54 हजार रुपये की नकद निकासी दर्ज होने की बात सामने रखी गई है,इन प्रविष्टियों के पीछे मौजूद भुगतान वाउचर,कैश भुगतान रजिस्टर, टोकन या भुगतान क्रमांक,पहचान सत्यापन संबंधी रिकॉर्ड और बैंक कर्मचारी की भूमिका की जांच जरूरी है,बैंक में मौजूद सीसीटीवी फुटेज यदि अब उपलब्ध न हो,तो उस समय के अन्य रिकॉर्ड और दस्तावेजों से प्रक्रिया की पुष्टि करने का प्रयास किया जाना चाहिए,सबसे अहम सवाल यह है कि क्या भुगतान स्वयं खाताधारक को किया गया था या किसी अन्य व्यक्ति ने राशि प्राप्त की? यदि किसी प्रतिनिधि को भुगतान हुआ,तो उसके लिए कौन-से दस्तावेज प्रस्तुत किए गए और बैंक ने किन नियमों के तहत भुगतान किया? बैंक की जवाबदेही का आकलन संबंधित नियमों और मूल रिकॉर्ड के आधार पर ही किया जा सकता है।
खाते में राशि आई और निकली,लेकिन वास्तविक हितग्राही कौन था?
बैंक स्टेटमेंट में राजीव गांधी किसान न्याय योजना की राशि,केसीसी ऋ ण से संबंधित जमा और नकद निकासी की प्रविष्टियां दिखाई गई हैं,इन प्रविष्टियों को अलग-अलग जांचना जरूरी है,योजना की राशि का खाते में आना,ऋण की स्वीकृति और नकद भुगतान—तीनों अलग-अलग घटनाएं हैं,यह मान लेना सही नहीं होगा कि हर राशि अनियमित रूप से निकाली गई,लेकिन यह भी जरूरी है कि मृत्यु की तारीख के बाद दर्ज लेनदेन का लाभ वास्तव में किसे मिला,इसकी पुष्टि की जाए,जांच में यह भी देखा जाना चाहिए कि केसीसी ऋ ण के लिए आवेदन कब किया गया,स्वीकृति की तारीख क्या थी,ऋ ण दस्तावेज किसने तैयार किए और भुगतान के लिए बैंक में कौन उपस्थित हुआ,यदि ऋ ण स्वीकृति मृत्यु के बाद हुई,तो संबंधित नियमों के अनुसार उस प्रक्रिया की वैधता की जांच होनी चाहिए,यदि स्वीकृति पहले हुई थी लेकिन भुगतान बाद में किया गया, तो उस स्थिति में भी खाताधारक की मृत्यु के बाद भुगतान की प्रक्रिया किस आधार पर अपनाई गई,यह स्पष्ट किया जाना चाहिए।
अंगूठे का निशान किसका? फॉरेंसिक जांच से खुल सकती है तस्वीर
सूत्रों से उपलब्ध आहरण पर्चियों पर अंगूठे के निशान दिखाई देते हैं, लेकिन तस्वीर देखकर यह प्रमाणित नहीं किया जा सकता कि वे निशान स्वर्गीय हरिप्रसाद के हैं या किसी अन्य व्यक्ति के, इसके लिए मूल पर्चियों की जांच,उपलब्ध पुराने नमूनों से तुलना और विशेषज्ञ की राय आवश्यक होगी है,यदि शिकायत में अंगूठे के निशान को लेकर संदेह जताया गया है,तो जांच एजेंसी को संबंधित मूल दस्तावेज सुरक्षित रखने चाहिए, भुगतान प्राप्ति पर्ची,नकद आहरण फॉर्म,चेक, चेक-जमा पर्ची,ऋ ण आवेदन और सत्यापन संबंधी अभिलेखों की जांच होनी चाहिए, आवश्यकता पड़ने पर अंगूठे के निशानों की फॉरेंसिक जांच भी कराई जा सकती है,यही नहीं, यदि चेक या ऋ ण प्रकरण की लिखावट को लेकर किसी व्यक्ति पर संदेह है इस लिए दस्तावेजों की हस्तलेखन विशेषज्ञ से जांच करना जरुरी हो जाता है,सवाल यह नहीं कि किसी पर्ची पर निशान दिखाई दे रहा है या नहीं,सवाल यह है कि उस निशान को किसने प्रमाणित किया? भुगतान के समय पहचान की पुष्टि किसने की और बैंक के रिकॉर्ड में भुगतान प्राप्त करने वाले व्यक्ति का विवरण कहां है।
फाइल बंद करने से पहले सच्चाई सामने आनी चाहिए
इस पूरे प्रकरण में जांच का दायरा स्पष्ट होना चाहिए,सबसे पहले हरिप्रसाद का मृत्यु प्रमाण-पत्र,केसीसी ऋ ण स्वीकृति आदेश,मूल चेक,चेक जमा पर्ची,नकद भुगतान वाउचर,खाते का प्रमाणित स्टेटमेंट और समिति के संबंधित रजिस्टर एक साथ रखे जाएं,इसके बाद दस्तावेजों पर मौजूद हस्ताक्षर और हेड राइटिंग का परीक्षण कराया जाए,भुगतान वाउचर पर लगे अंगूठे के निशान की प्रामाणिकता पर संदेह होने पर सक्षम विशेषज्ञ से विधिवत परीक्षण कराया जाए, बैंक और समिति के संबंधित कर्मचारियों के बयान लेकर उस समय की जिम्मेदारियां और प्रक्रिया भी स्पष्ट की जाए,जांच एजेंसी को यह भी निर्धारित करना चाहिए कि ऋ ण की स्वीकृति किस तारीख को हुई,चेक किस तारीख को बनाया गया,बैंक में किसने जमा किया और राशि किसे दी गई,यदि दस्तावेजों में किसी तरह की छेड़छाड़,गलत पहचान,नियमों के उल्लंघन या अन्य अपराध के प्रमाण मिलते हैं,तो संबंधित कानून के अनुसार कार्रवाई की जानी चाहिए,सहकारिता का उद्देश्य किसान को राहत देना है,न कि ऐसी फाइलों का निर्माण करना जिनमें किसान की मृत्यु एक तारीख को दर्ज हो और उसी के बाद उसके नाम पर ऋण और नकद भुगतान की प्रविष्टियां सामने आएं,यदि रिकॉर्ड में कोई वास्तविक त्रुटि है,तो उसका दस्तावेजी स्पष्टीकरण सामने आना चाहिए,और यदि प्रक्रिया में गंभीर अनियमितता हुई है,तो जिम्मेदार लोगों की पहचान कर कार्रवाई होनी चाहिए,अंतिम सवाल यही है की जब हरिप्रसाद की मृत्यु 10 मई 2021 को दर्ज है,तो उसके बाद केसीसी ऋण से जुड़ी प्रक्रिया किसने पूरी की,नकद राशि किसने प्राप्त की और भुगतान वाउचर पर अंगूठा किसका है? इसका जवाब किसी बयान,सफाई या आपसी समझौते से नहीं,बल्कि मूल दस्तावेजों, बैंक रिकॉर्ड और निष्पक्ष जांच से मिलना चाहिए।
ऋण वितरण सही था…तो शिकायतकर्ता पर दबाव बनाने की जरूरत क्यों?
सोनपुर आदिम जाति सेवा सहकारी समिति से जुड़े कथित ऋण प्रकरण में अब एक नया सवाल खड़ा हो रहा है,शिकायतकर्ता देवीचरण जो मृतक का बेटे के आरोपों के अनुसार,तत्कालीन समिति प्रबंधक जीवतेश श्रीवास्तव,जवाहरलाल कुशवाहा और तत्कालीन लिपिक सोहराब अंसारी से जुड़े लोगों पर शिकायत वापस लेने के लिए दबाव बनाने की कोशिश किए जाने की बात सामने आ रही है,शिकायतकर्ता के घर बार-बार दस्तक देने और कथित तौर पर धमकी के साथ आर्थिक प्रलोभन देकर समझौते का दबाव बनाने के आरोप भी लगाए जा रहे हैं,इस पूरे घटनाक्रम में हदीस अंसारी की भूमिका को लेकर भी सवाल उठाए जा रहे हैं,हालांकि,इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि और संबंधित पक्षों का जवाब सामने आना बाकी है,सूत्रों से मिली जानकारी के मुताबिक,15 अक्टूबर 2026 को शिकायतकर्ता देवीचरण को कथित तौर पर भैयाथान स्थित बैंक शाखा ले जाया गया,जहां उन्हें जबरन बैठाकर रखने का आरोप है,बताया जा रहा है कि शिकायतकर्ता वहां से निकल गया और इसके बाद से पिछले दो दिनों से उसके फरार होने की चर्चा है, इस दावे की भी आधिकारिक पुष्टि होना बाकी है,सबसे बड़ा सवाल यह है कि यदि ऋण वितरण की प्रक्रिया पूरी तरह नियमानुसार थी, तो शिकायतकर्ता से ऋण जमा पर्ची पर हस्ताक्षर कराने और शिकायत वापस लेने के लिए कथित दबाव बनाने की जरूरत क्यों पड़ रही है? क्या यह केवल गलतफहमी दूर करने का प्रयास है या शिकायत में उठाए गए सवालों के जवाब देने के बजाय शिकायतकर्ता को ही पीछे हटाने की कोशिश की जा रही है? मामले की निष्पक्ष जांच कर शिकायतकर्ता की सुरक्षा, कथित दबाव और बैंक शाखा में हुए घटनाक्रम की सच्चाई सामने लाना जरूरी है।
दस्तावेजों से सामने आया ये प्रमुख तथ्य…

  1. मृत्यु प्रमाणपत्र-दस्तावेज में हरिप्रसाद की मृत्यु दिनांक 10 मई 2021 दर्ज है। इसलिए इसके बाद उनके नाम से तैयार हुए ऋ ण प्रकरण,बैंक में जमा पर्चियों और भुगतान के दस्तावेजों की जांच महत्वपूर्ण है।
  2. मृत्यु के बाद केसीसी ऋ ण की राशि और निकासी। सूत्रों से उपलब्ध बैंक स्टेटमेंट में ये प्रविष्टियां दिखाई देती हैंः-25 मई 2021, नकद निकासी,17,000। 3 जून 2021, केसीसी राशि जमा,75,000। 3 जून 2021,नकद निकासी,49,000 । 4 जून 2021,नकद निकासी, 26,000। 11 जून 2021, केसीसी राशि जमा, 54,000। 17 जून 2021, नकद निकासी, 49,000। 21 जून 2021, नकद निकासी, 5,000। 23 अगस्त 2021, नकद निकासी, 18,500।
  3. बैंक की आहरण पर्चियों पर अंगूठे के निशान-आपके द्वारा साझा की गई पर्चियों पर अंगूठे के निशान दिखाई देते हैं, लेकिन केवल तस्वीर देखकर यह प्रमाणित नहीं किया जा सकता कि निशान हरिप्रसाद के हैं या किसी अन्य व्यक्ति के, इसके लिए मूल दस्तावेजों की जांच और आवश्यक होने पर विधि-विज्ञान प्रयोगशाला की राय जरूरी होगी।
  4. ऋण प्रकरण की लिखावट और हस्ताक्षर-यह भी जांचा जाना चाहिए कि केसीसी ऋण आवेदन,चेक,जमा पर्ची और भुगतान पर्ची किसने भरी थीं,यदि लिखावट को लेकर किसी व्यक्ति पर संदेह है, तो उसका उल्लेख आरोप या संदेह के रूप में किया जाना चाहिए,जब तक विशेषज्ञ जांच से पुष्टि न हो जाए।
    इस मामले में जांच के लिए सबसे अहम सवाल
    जब मृत्यु प्रमाणपत्र में मृत्यु की तारीख 10 मई 2021 दर्ज है, तो उसके बाद केसीसी ऋ ण प्रकरण किसने तैयार किया?
    75,000 और ?54,000 की ऋण राशि स्वीकृत करने का आधार क्या था?
    बैंक में चेक किसने जमा किया और भुगतान किस व्यक्ति को दिया गया?
    नकद निकासी की पर्चियों पर मौजूद अंगूठे के निशान किसके हैं?
    बैंक के सीसीटीवी फुटेज, भुगतान रजिस्टर, कैशियर रिकॉर्ड और संबंधित कर्मचारियों के अभिलेख उपलब्ध हैं या नहीं?
    ऋण आवेदन, चेक और भुगतान पर्चियों की लिखावट व अंगूठे के निशानों की फॉरेंसिक जांच कराई जाएगी या नहीं?
    शिकायत मिलने के बाद समिति और बैंक स्तर पर क्या कार्रवाई हुई?

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