केंद्र किसानों के लिए खुला, लेकिन करौंदामुड़ा के किसानों के लिए रास्ता बंद क्यों?
किसान हित की बात,फैसले में दूरी! बड़सरा केंद्र को लेकर समिति प्रबंधन कटघरे में
किसानों की सुविधा पर समिति प्रबंधन का पहरा? बड़सरा केंद्र में शामिल करने की मांग तेज,नजदीक केंद्र, फिर भी किसानों की दूरी बरकरार! करौंदामुड़ा को बड़सरा से जोड़ने की मांग…
149 किसानों की सूची, 100 से अधिक के समर्थन का दावा…फिर करौंदामुड़ा के किसान क्यों वंचित?
धान बेचने की सुविधा पर सवाल,करौंदामुड़ा के किसानों की मांग आखिर अनसुनी क्यों?
किसानों की परेशानी कौन सुनेगा? बड़सरा उपार्जन केंद्र के फैसले पर उठे सवाल
बड़सरा उपार्जन केंद्र में शामिल करने की मांग, 149 पंजीकृत किसानों की सूची और 100 से अधिक किसानों के समर्थन के दावे के बीच ग्रामसभा के प्रस्ताव की सत्यता जांचने की मांग
-संवाददाता-
सूरजपुर,16 अक्टूबर 2026 (घटती-घटना)। धान खरीदी व्यवस्था का उद्देश्य किसानों को उनकी उपज का उचित मूल्य दिलाना,खरीदी प्रक्रिया को सुगम बनाना और उपार्जन केंद्रों तक पहुंचने में होने वाली परेशानियों को कम करना है,लेकिन जब नजदीकी गांव के किसान अपने क्षेत्र के पास स्थित खरीदी केंद्र में धान बेचने की मांग लेकर प्रशासन के दरवाजे तक पहुंचने को मजबूर हों,तो व्यवस्था की प्राथमिकताओं पर सवाल उठना स्वाभाविक है, शिवप्रसादनगर धान खरीदी केंद्र से जुड़े करौंदामुड़ा गांव के किसानों की मांग ने इसी सवाल को सामने ला दिया है।
करौंदामुड़ा के किसानों ने बड़सरा धान उपार्जन केंद्र में शामिल किए जाने की मांग को लेकर कलेक्टर सूरजपुर के समक्ष जनदर्शन के माध्यम से आवेदन प्रस्तुत किया है, आवेदन में किसानों ने अपनी समस्या के साथ दूरी, परिवहन खर्च,समय की बचत और खरीदी केंद्र पर पड़ने वाले भार जैसे मुद्दे उठाए हैं,किसानों का कहना है कि करौंदामुड़ा ग्राम पंचायत बड़सरा से लगा हुआ है और बड़सरा केंद्र उनके गांव के अधिक निकट पड़ता है, इसके बावजूद उन्हें शिवप्रसादनगर केंद्र में धान बेचने जाना पड़ता है, मामला देखने में भले ही एक गांव को दूसरे खरीदी केंद्र से जोड़ने का लगे,लेकिन इसके भीतर कई प्रशासनिक प्रश्न छिपे हैं,क्या केंद्र निर्धारण करते समय गांवों की भौगोलिक स्थिति और किसानों की वास्तविक सुविधा का पर्याप्त आकलन किया गया? क्या करौंदामुड़ा के किसानों की मांग पर समिति ने गंभीरता से विचार किया? और यदि उन्हें बड़सरा केंद्र में शामिल करने में कोई बाधा है, तो उसका स्पष्ट कारण किसानों को बताया गया है या नहीं? इन सवालों के जवाब अब जिला प्रशासन और सहकारिता विभाग से अपेक्षित हैं।
149 पंजीकृत किसानों की सूची,सौ से अधिक किसानों के समर्थन का दावा
करौंदामुड़ा के किसानों की ओर से प्रस्तुत दस्तावेजों में पंजीकृत किसानों की सूची संलग्न है,उपलब्ध सूची में क्रमांक 1 से 149 तक किसानों के नाम दर्ज हैं,इसके अतिरिक्त,बड़सरा धान उपार्जन केंद्र में शामिल किए जाने के समर्थन में सौ से अधिक किसानों की लिखित सहमति होने का दावा आवेदन में किया गया है, किसानों ने इसे अपनी सामूहिक मांग बताते हुए प्रशासन से पुनर्विचार की अपील की है,यदि यह मांग वास्तव में बड़ी संख्या में किसानों की जरूरत को दर्शाती है,तो उसका परीक्षण केवल औपचारिक पत्राचार तक सीमित नहीं रहना चाहिए, किसानों की सूची का पंजीयन रिकॉर्ड से मिलान, समर्थन पत्रों का सत्यापन और गांव की वास्तविक स्थिति का निरीक्षण कर निर्णय लिया जा सकता है, इससे यह भी स्पष्ट होगा कि कितने किसान बड़सरा केंद्र से जुड़ना चाहते हैं और इससे खरीदी व्यवस्था पर क्या प्रभाव पड़ेगा, किसानों की मांग का अर्थ यह नहीं कि केंद्र बदलना स्वतः अनिवार्य हो जाता है,लेकिन जब पंजीकृत किसानों की सूची और समर्थन पत्र प्रशासन के सामने रखे गए हैं,तब उन पर विचार करने और निर्णय के कारण बताने की जिम्मेदारी संबंधित विभाग की बनती है,किसानों की सुविधा के सवाल का जवाब सिर्फ यह कहकर नहीं टाला जा सकता कि व्यवस्था पहले से चल रही है।
समिति प्रबंधन पर किसानों के आरोप, लेकिन जांच के बिना निष्कर्ष नहीं
किसानों की ओर से उठाए गए सवालों के बीच शिवप्रसादनगर समिति के प्रबंधक सोहराब अंसारी की भूमिका पर भी सवाल उठाए जा रहे हैं,शिकायतकर्ता पक्ष का आरोप है कि करौंदामुड़ा के किसानों को बड़सरा केंद्र से जोड़ने की मांग पर समिति प्रबंधन का रवैया सहयोगात्मक नहीं रहा, शिकायतकर्ता यह आशंका भी जता रहे हैं कि अलग केंद्र पर खरीदी होने से धान खरीदी की प्रक्रिया और रिकॉर्ड की निगरानी अधिक स्पष्ट हो सकती है,शिकायतकर्ता पक्ष ने हदीस अंसारी को भी अपने आरोपों में उल्लेखित किया है और दावा किया है कि नए उपार्जन केंद्र से खरीदी व्यवस्था में पारदर्शिता बढ़ने की आशंका के कारण इसका विरोध किया जा रहा है,हालांकि,उपलब्ध आवेदन और किसान सूचियां इन व्यक्तियों की कथित मंशा या किसी अनियमितता में संलिप्तता को अपने आप प्रमाणित नहीं करतीं, इन आरोपों की पुष्टि के लिए समिति के पत्राचार, केंद्र निर्धारण संबंधी प्रस्ताव, विभागीय निर्णय और संबंधित पक्षों का जवाब आवश्यक है।
चार-पांच किलोमीटर की दूरी बनाम नजदीकी केंद्र की सुविधा
किसानों के आवेदन में शिवप्रसादनगर धान खरीदी केंद्र की दूरी लगभग चार से पांच किलोमीटर बताई गई है, उनका कहना है कि बड़सरा केंद्र करौंदामुड़ा के अधिक निकट है, किसानों के अनुसार, नजदीकी केंद्र से जुड़ने पर धान परिवहन का खर्च और समय कम होगा तथा खरीदी के दौरान होने वाली भागदौड़ से राहत मिलेगी, धान खरीदी केवल उपज लेकर केंद्र पहुंचने भर की प्रक्रिया नहीं है, किसान को परिवहन की व्यवस्था करनी पड़ती है, टोकन और निर्धारित समय के अनुरूप उपज पहुंचानी होती है तथा खरीदी प्रक्रिया पूरी होने तक कई तरह की परेशानियों का सामना करना पड़ सकता है। ऐसे में दूरी कम होने का सीधा संबंध किसान के समय और खर्च से जुड़ता है, यही वजह है कि किसानों की मांग को केवल केंद्र बदलने की मांग मानकर नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए, प्रशासन को यह देखना होगा कि बड़सरा केंद्र में करौंदामुड़ा को शामिल करने से क्या व्यावहारिक लाभ होगा, केंद्र की क्षमता कितनी है और क्या खरीदी संबंधी नियम इसकी अनुमति देते हैं, यदि कोई तकनीकी या प्रशासनिक बाधा है, तो उसका कारण भी स्पष्ट किया जाना चाहिए, किसानों के लिए बनाई गई व्यवस्था में किसान ही अपनी सुविधा समझाने के लिए दफ्तरों के चक्कर लगाएं, तो व्यवस्था की समीक्षा जरूरी हो जाती है।
शिवप्रसादनगर केंद्र पर भार कमकरने का तर्क भी आवेदन में
किसानों ने अपने आवेदन में शिवप्रसादनगर धान खरीदी केंद्र पर आसपास के कई गांवों के किसानों का दबाव होने की बात कही है, दस्तावेज में लगभग दस गांवों के करीब दो हजार पंजीकृत किसानों का उल्लेख किया गया है, किसानों का तर्क है कि करौंदामुड़ा को बड़सरा केंद्र से जोड़ने पर शिवप्रसादनगर केंद्र पर भार कम करने में भी मदद मिल सकती है, हालांकि, इन आंकड़ों की पुष्टि संबंधित विभाग के पंजीयन और केंद्रवार रिकॉर्ड से की जानी चाहिए, यदि किसी एक केंद्र पर बड़ी संख्या में किसानों का दबाव है और नजदीकी केंद्र में उन्हें समायोजित करना नियमों तथा उपलब्ध क्षमता के अनुरूप संभव है, तो इस विकल्प की जांच करना प्रशासनिक दृष्टि से उचित होगा, दूसरी ओर,केवल दूरी के आधार पर केंद्र बदलना भी पर्याप्त नहीं होगा, खरीदी की क्षमता, भंडारण, परिवहन व्यवस्था,पंजीयन की प्रक्रिया और अन्य प्रशासनिक शर्तों का परीक्षण आवश्यक है,यही वह बिंदु है जहां सहकारिता विभाग की भूमिका महत्वपूर्ण हो जाती है, किसानों की मांग का समर्थन या विरोध करने से पहले रिकॉर्ड आधारित मूल्यांकन होना चाहिए,यदि मांग व्यावहारिक है, तो उस पर कार्रवाई का रास्ता तलाशा जाना चाहिए, यदि संभव नहीं है,तो नियमों और तथ्यों के साथ कारण दर्ज होना चाहिए।
ग्राम पंचायत के प्रस्ताव पर भी उठे सवाल
इस विवाद का एक अहम पहलू ग्राम पंचायत स्तर पर प्रस्ताव की स्थिति है,किसानों के ज्ञापन में कहा गया है कि करौंदामुड़ा को बड़सरा केंद्र में शामिल नहीं किए जाने से संबंधित प्रस्ताव ग्राम पंचायत स्तर से प्रस्तुत किया गया था, शिकायतकर्ता पक्ष का कहना है कि यह प्रस्ताव किसानों की वास्तविक इच्छा और व्यापक सहमति के अनुरूप नहीं है, इसी कारण उन्होंने ग्रामसभा की कार्यवाही,उपस्थिति और प्रस्ताव में दर्ज सहमति का निष्पक्ष सत्यापन कराने की मांग की है,यह आरोप अपने आप में किसी अनियमितता को सिद्ध नहीं करता,लेकिन इसकी जांच के लिए स्पष्ट प्रक्रिया मौजूद है,ग्रामसभा की मूल कार्यवाही रजिस्टर,उपस्थित सदस्यों के हस्ताक्षर,प्रस्ताव पारित किए जाने की तारीख और संबंधित दस्तावेजों का परीक्षण किया जा सकता है, जरूरत पड़ने पर ग्रामसभा में उपस्थित ग्रामीणों के बयान लेकर यह भी पता लगाया जा सकता है कि प्रस्ताव किस परिस्थिति में पारित हुआ था,यदि प्रस्ताव वास्तव में व्यापक सहमति से पारित हुआ था,तो उसका रिकॉर्ड सामने आना चाहिए, यदि ग्रामीणों की सहमति को लेकर विवाद है, तो उसका समाधान भी दस्तावेजों और निष्पक्ष सत्यापन के आधार पर होना चाहिए,गांव के किसानों से जुड़ा निर्णय किसी एक कागज की मौजूदगी भर से अंतिम नहीं माना जाना चाहिए,उस कागज की वास्तविकता और प्रक्रिया भी जांच के दायरे में होनी चाहिए।
समिति प्रबंधन पर आरोप,जवाब और रिकॉर्ड की जरूरत
किसानों की शिकायत में शिवप्रसादनगर समिति के प्रबंधक सोहराब अंसारी की भूमिका पर सवाल उठाए गए हैं, शिकायतकर्ता पक्ष का आरोप है कि करौंदामुड़ा के किसानों को बड़सरा केंद्र से जोड़ने की मांग पर समिति प्रबंधन का रवैया सहयोगात्मक नहीं रहा, शिकायत में हदीस अंसारी का नाम भी लिया गया है और यह आशंका व्यक्त की गई है कि अलग केंद्र पर खरीदी होने से निगरानी और पारदर्शिता बढ़ सकती है, इसलिए इसका विरोध किया जा रहा है, इन आरोपों की गंभीरता को देखते हुए संबंधित समिति के पत्राचार, केंद्र निर्धारण संबंधी प्रस्ताव, किसानों के आवेदन पर की गई कार्रवाई और विभाग को भेजे गए जवाब की जांच आवश्यक है, हालांकि, उपलब्ध दस्तावेजों के आधार पर किसी व्यक्ति की मंशा या किसी कथित अनियमितता में उसकी संलिप्तता को प्रमाणित तथ्य के रूप में प्रस्तुत नहीं किया जा सकता, संबंधित व्यक्तियों और समिति का पक्ष सामने आने से मामले की तस्वीर अधिक स्पष्ट होगी, जांच का एक सीधा सवाल यह भी है कि क्या समिति ने करौंदामुड़ा के किसानों की मांग पर कोई लिखित निर्णय लिया है? यदि लिया है, तो उसका आधार क्या है? क्या किसानों को कारण बताया गया? क्या बड़सरा केंद्र की क्षमता और दूरी का तुलनात्मक आकलन हुआ? और क्या सहकारिता विभाग ने इस विवाद पर कोई स्वतंत्र समीक्षा की? इन सवालों के जवाब से यह स्पष्ट होगा कि विवाद किसी वास्तविक प्रशासनिक बाधा के कारण लंबित है या निर्णय प्रक्रिया में सुधार की जरूरत है।
किसान हितैषी दावों की असली परीक्षा स्थानीय फैसलों में
सरकार और प्रशासन की किसान हितैषी योजनाओं का उद्देश्य तभी पूरा होता है, जब उनका लाभ जमीन पर किसानों तक पहुंचे, खरीदी केंद्रों का संचालन, किसानों का पंजीयन, टोकन व्यवस्था और परिवहन की सुविधा—ये सभी पहलू इसी उद्देश्य से जुड़े हैं, लेकिन यदि किसानों को अपनी स्थानीय समस्या के समाधान के लिए बार-बार आवेदन देना पड़े, तो संबंधित व्यवस्था की समीक्षा करना जरूरी हो जाता है, करौंदामुड़ा के किसान यह दावा कर रहे हैं कि बड़सरा केंद्र उनके लिए अधिक सुविधाजनक है, प्रशासन को इस दावे का वस्तुनिष्ठ परीक्षण करना चाहिए, इसमें गांव से दोनों केंद्रों की वास्तविक दूरी, किसान संख्या, केंद्र की क्षमता, खरीदी व्यवस्था और लागू नियमों को शामिल किया जाना चाहिए। निर्णय चाहे किसानों की मांग के पक्ष में हो या नियमों के आधार पर उसके विपरीत, उसकी वजह स्पष्ट होनी चाहिए, किसान हित का अर्थ केवल केंद्र खोल देना नहीं, बल्कि यह सुनिश्चित करना भी है कि केंद्रों का निर्धारण वास्तविक जरूरतों के अनुरूप हो। इसी तरह पारदर्शिता का अर्थ सिर्फ रिकॉर्ड तैयार करना नहीं, बल्कि निर्णय के आधार और प्रक्रिया को जवाबदेह बनाना भी है।
अब कलेक्टर और सहकारिता विभाग से अपेक्षित है स्पष्ट कार्रवाई
करौंदामुड़ा के किसानों का मामला अब जनदर्शन में पहुंच चुका है, उपलब्ध दस्तावेजों में पंजीकृत किसानों की सूची, बड़सरा केंद्र से जोड़ने की मांग और समर्थन पत्रों का उल्लेख है, ऐसे में प्रशासन के पास जांच शुरू करने के लिए प्रारंभिक आधार मौजूद है, अगला कदम इन दस्तावेजों की पुष्टि और संबंधित पक्षों से जवाब लेकर तथ्यों के आधार पर निर्णय करना होना चाहिए, अब देखना यह है कि प्रशासन इस मांग को सामान्य आवेदन मानकर फाइलों में सीमित रखता है या स्थल निरीक्षण और रिकॉर्ड सत्यापन के जरिए स्पष्ट निर्णय लेता है, किसानों की मांग स्वीकार करना या न करना प्रशासनिक नियमों और उपलब्ध तथ्यों पर निर्भर करेगा, लेकिन मांग पर निष्पक्ष विचार और कारणयुक्त जवाब देना जरूरी है,सबसे बड़ा सवाल यही है जब किसान अपनी सुविधा के लिए पंजीकृत सूची और समर्थन पत्रों के साथ प्रशासन तक पहुंच चुके हैं,तो उन्हें स्पष्ट निर्णय के लिए कितना इंतजार करना पड़ेगा? करौंदामुड़ा के किसानों की मांग का समाधान केवल एक गांव को दूसरे केंद्र से जोड़ने का मामला नहीं है। यह सहकारिता व्यवस्था की जवाबदेही, ग्रामसभा के प्रस्तावों की विश्वसनीयता और किसान सुविधा को निर्णय प्रक्रिया में वास्तविक महत्व देने की परीक्षा भी है, अब इस परीक्षा में प्रशासन क्या कदम उठाता है, इसकी निगाह किसानों के साथ-साथ पूरे क्षेत्र की खरीदी व्यवस्था पर रहेगी।
जांच के केंद्र में रहने चाहिए ये सवाल
- करौंदामुड़ा के किसानों को बड़सरा धान उपार्जन केंद्र से जोड़ने के आवेदन पर अब तक क्या कार्रवाई हुई?
- क्या 149 पंजीकृत किसानों की सूची और सौ से अधिक किसानों के समर्थन का दावा विभागीय रिकॉर्ड से सत्यापित किया गया?
- करौंदामुड़ा को बड़सरा केंद्र से जोड़ने के
संबंध में ग्राम पंचायत का मूल प्रस्ताव क्या
कहता है? - क्या ग्रामसभा की कार्यवाही,उपस्थिति और
सहमति का निष्पक्ष सत्यापन कराया गया? - क्या शिवप्रसादनगर समिति ने किसानों की मांग पर लिखित निर्णय लिया और उसका आधार स्पष्ट किया?
- क्या बड़सरा केंद्र की क्षमता,दूरी और खरीदी व्यवस्था का आकलन कर करौंदामुड़ा के किसानों को वहां शामिल करने की संभावना जांची गई?
- यदि मांग स्वीकार नहीं की जा सकती,तो किसानों को नियमों और तथ्यों सहित स्पष्ट जवाब कब दिया जाएगा?
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