- अंतिम चेतावनी देकर बहाली,फिर छह बालक फरार…12 अक्टूबर के आदेश पर सवाल—जिस अधीक्षक का निलंबन खत्म किया,उसी दिन संस्थान की सुरक्षा फिर कठघरे में…
- फिर फरारी,फिर सवाल! प्लेस ऑफ सेफ्टी से 6 अपचारी बालक भागे,दो पकड़े गए,चार की तलाश जारी
- 25 की क्षमता वाले संस्थान में 63 बच्चे; निलंबित प्रभारी अधीक्षक ने दो महीने बाद संभाला पदभार,उसी शाम फरारी… संयोग या व्यवस्था की बड़ी चूक?
- उपशीर्षकः रसोइये पर गर्म खाना फेंककर हंगामा,ड्यूटी गार्ड को कमरे में बंद कर भागे बालक,पुराने मामलों में भी कई बच्चों का पता नहीं,जिला बाल संरक्षण अधिकारी की कार्यप्रणाली और काउंसलिंग व्यवस्था पर उठे गंभीर सवाल…

-न्यूज डेस्क-
अंबिकापुर,13 अक्टूबर 2026 (घटती-घटना)। सरगुजा जिले की बाल संरक्षण व्यवस्था में अपचारी बच्चों के फरार होने का सिलसिला थमने का नाम नहीं ले रहा है,प्लेस ऑफ सेफ्टी और बाल संप्रेक्षण गृह से लगातार सामने आ रही फरारी की घटनाओं के बीच अब एक बार फिर प्लेस ऑफ सेफ्टी से छह अपचारी बालकों के फरार होने का मामला सामने आया है, पुलिस ने तलाश अभियान के दौरान दो बालकों को पकड़ लिया है,जबकि चार अन्य की तलाश जारी है,इस बार घटना के दौरान रसोइये पर गर्म खाना फेंककर हंगामा करने और ड्यूटी पर तैनात गार्ड को कमरे में बंद करने की बात सामने आई है,घटना ने सुरक्षा व्यवस्था के साथ-साथ संस्थान के भीतर के माहौल,बच्चों के व्यवहार,काउंसलिंग और प्रशासनिक निगरानी पर भी गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं, सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि 25 बच्चों की क्षमता वाले प्लेस ऑफ सेफ्टी में कथित तौर पर 63 अपचारी बालक निवासरत थे, यानी निर्धारित क्षमता से 38 अधिक बच्चे, आखिर इतनी बड़ी संख्या में बच्चों को रखने के दौरान सुरक्षा,निगरानी,भोजन,आवास, परामर्श और पुनर्वास की व्यवस्था कैसे संचालित हो रही थी? क्या उपलब्ध संसाधन इतने बच्चों के लिए पर्याप्त थे? क्या अतिरिक्त बच्चों की संख्या के अनुरूप सुरक्षा कर्मियों और अन्य कर्मचारियों की व्यवस्था की गई थी? इन सवालों का जवाब संबंधित विभाग को देना चाहिए,इस पूरे घटनाक्रम में एक और महत्वपूर्ण पहलू सामने आया है। जानकारी के अनुसार, जिस दिन छह बालक फरार हुए,उसी दिन दोपहर करीब 12 बजे निलंबित प्रभारी अधीक्षक नीतू राम कुशवाहा ने लगभग दो महीने बाद फिर से पदभार संभाला था,शाम करीब सात बजे फरारी की घटना सामने आ गई,पदभार संभालने के कुछ ही घंटों बाद हुई इस घटना ने परिस्थितियों को और चर्चा में ला दिया है,हालांकि केवल समय के इस संयोग से किसी अधिकारी की जिम्मेदारी या घटना से उसका संबंध साबित नहीं होता,लेकिन यह जरूर सवाल उठता है कि पदभार ग्रहण करने के बाद संस्थान की वास्तविक स्थिति क्या थी और सुरक्षा व्यवस्था कितनी प्रभावी थी,छह बच्चों की नई फरारी और उसी दिन पदभार संभालने का घटनाक्रम इस बहाली आदेश के संदर्भ में और महत्वपूर्ण हो जाता है,यदि नीतू राम कुशवाहा ने 12 अक्टूबर को दोपहर लगभग 12 बजे पदभार संभाला और उसी शाम करीब 7 बजे छह बच्चे फरार हुए,तो यह जानना जरूरी है कि तीन सदस्यीय जांच समिति ने निलंबन समाप्त करने की अनुशंसा किन तथ्यों के आधार पर की? जांच प्रतिवेदन में सुरक्षा व्यवस्था की कमियों और अधीक्षक की जिम्मेदारी के संबंध में क्या निष्कर्ष निकाले गए? अंतिम चेतावनी के बाद उन्हें दोबारा उसी संवेदनशील संस्थान का प्रभार देने का आधार क्या था? क्या पदभार ग्रहण करने के बाद सुरक्षा व्यवस्था की समीक्षा की गई थी? नई फरारी के बाद क्या बहाली आदेश और जांच समिति के निष्कर्षों की दोबारा समीक्षा होगी?
दोपहर 12 बजे पदभार,शाम 7 बजे फरारी…संयोग या व्यवस्था की विफलता?-इस घटना का सबसे चर्चित पहलू निलंबित प्रभारी अधीक्षक नीतू राम कुशवाहा की वापसी से जुड़ा है,उपलब्ध जानकारी के अनुसार,करीब दो महीने बाद उन्होंने घटना वाले दिन दोपहर लगभग 12 बजे पदभार ग्रहण किया,उसी शाम करीब सात बजे छह अपचारी बालकों के फरार होने की घटना सामने आ गई, अब सवाल उठ रहा है कि आखिर निलंबित प्रभारी अधीक्षक को पदभार सौंपने की प्रक्रिया किस आधार पर पूरी की गई? क्या पदभार ग्रहण करने से पहले संस्थान की सुरक्षा व्यवस्था की समीक्षा की गई थी? क्या उन्हें पूर्व में हुई फरारी की घटनाओं,सुरक्षा संबंधी निर्देशों और लंबित सुधारात्मक कार्यों की जानकारी दी गई थी? यह भी स्पष्ट होना चाहिए कि पदभार ग्रहण करने के बाद सुरक्षा व्यवस्था की तत्काल समीक्षा की गई थी या नहीं,हालांकि सात घंटे के भीतर हुई घटना को सीधे पदभार ग्रहण करने से जोड़कर निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होगा, लेकिन जब संस्थान में पहले से कई फरारी की घटनाएं हो चुकी हों, तब नए सिरे से जिम्मेदारी संभालने के समय सुरक्षा व्यवस्था का आकलन करना महत्वपूर्ण हो जाता है,सबसे बड़ा सवाल यह है कि जिस संस्थान में पहले ही बार-बार सुरक्षा चूक हो चुकी थी,वहां व्यवस्था को दुरुस्त करने के लिए वास्तव में क्या कदम उठाए गए थे?
पुराने मामलों में फरार बच्चों की वापसी पर भी स्पष्टता जरूरी-पिछली घटनाओं के बाद कितने बच्चे वापस लाए गए, कितनों को पुलिस ने पकड़ा और कितने अब भी लापता हैं…इसकी एक स्पष्ट और आधिकारिक स्थिति सामने आनी चाहिए, आपके द्वारा दी गई जानकारी के अनुसार,एक पूर्व घटना में पांच बच्चों के फरार होने के बाद केवल एक की वापसी हुई थी,जबकि चार का पता नहीं चलने की बात कही जा रही है,इस विवरण की संबंधित पुलिस रिकॉर्ड से पुष्टि आवश्यक है,यदि पूर्व मामलों के कुछ बच्चे अब भी नहीं मिले हैं,तो यह और गंभीर विषय है, ऐसे में केवल नई फरारी की घटना पर ध्यान देना पर्याप्त नहीं होगा, प्रत्येक मामले में फरार बच्चों की वर्तमान स्थिति,तलाश की कार्रवाई और संस्थान में वापसी का पूरा विवरण सार्वजनिक होना चाहिए,इससे यह भी पता चलेगा कि प्रशासन पुरानी घटनाओं से कितना सबक ले पाया है और फरार बच्चों की तलाश में पुलिस तथा बाल संरक्षण विभाग के बीच कितना समन्वय रहा है।
काउंसलिंग व्यवस्था पर भी सवाल…बच्चे भागना क्यों चाहते हैं?-इस पूरे मामले में एक महत्वपूर्ण पहलू बच्चों की मानसिक स्थिति और काउंसलिंग व्यवस्था का भी है,आखिर बच्चे बार-बार संस्थान से बाहर निकलने का जोखिम क्यों उठा रहे हैं? क्या यह केवल सुरक्षा व्यवस्था की कमजोरी का परिणाम है,या बच्चों की समस्याओं को समझने और उनके समाधान में भी कहीं कमी रह रही है? इसी तरह,केवल सुरक्षा व्यवस्था मजबूत कर देना भी पर्याप्त नहीं होगा,यदि बच्चों की शिकायतों,तनाव,आपसी विवाद और व्यवहार संबंधी समस्याओं को समझने की व्यवस्था प्रभावी नहीं है,जांच में यह भी देखा जाना चाहिए कि घटना से पहले बच्चों के बीच कोई विवाद हुआ था या नहीं,किसी ने शिकायत की थी या नहीं और कर्मचारियों ने किसी असामान्य व्यवहार की सूचना अधिकारियों को दी थी या नहीं,यदि बच्चों के मन में असंतोष या भय है, तो उसकी पहचान और समाधान के लिए नियमित व्यक्तिगत परामर्श तथा शिकायत सुनने की निष्पक्ष व्यवस्था जरूरी है।
जिला कार्यालय में काउंसलर, फिर संस्थानों में परामर्श व्यवस्था कैसी?- आपके द्वारा उपलब्ध कराई गई जानकारी के अनुसार,जिला बाल संरक्षण कार्यालय में पहले से एक काउंसलर मौजूद है,जबकि बाल संरक्षण संस्थानों से जुड़े दो काउंसलरों के भी जिला कार्यालय में सेवाएं देने की बात सामने आई है, यदि यह स्थिति सही है,तो यह जांच का विषय है कि संवेदनशील संस्थानों में बच्चों की नियमित काउंसलिंग किस प्रकार की जा रही है, क्या संस्थान में रहने वाले प्रत्येक बच्चे को जरूरत के अनुसार व्यक्तिगत परामर्श मिलता है? क्या बच्चों की मानसिक स्थिति और व्यवहार में बदलाव का रिकॉर्ड रखा जाता है? क्या गंभीर तनाव या विवाद की स्थिति में तत्काल हस्तक्षेप किया जाता है? यदि संस्थानों के लिए नियुक्त काउंसलर वास्तव में जिला कार्यालय में काम कर रहे हैं,तो उनके पदस्थापन आदेश,कार्य-विवरण और उपस्थिति रिकॉर्ड की समीक्षा की जानी चाहिए,यह भी स्पष्ट होना चाहिए कि जिला कार्यालय और संस्थानों में काउंसलिंग की जिम्मेदारी का बंटवारा किस आधार पर किया गया है, यदि संस्थानों में बच्चों की संख्या क्षमता से काफी अधिक है,तो परामर्श सेवाओं की आवश्यकता भी उसी अनुपात में बढ़ती है।
जिला बाल संरक्षण अधिकारी की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल-बार-बार फरारी की घटनाओं के बाद अब जिला बाल संरक्षण अधिकारी की निगरानी व्यवस्था और प्रशासनिक कार्यप्रणाली पर भी सवाल उठ रहे हैं,जिला स्तर पर संस्थानों के निरीक्षण, सुरक्षा संबंधी कमियों की पहचान, निर्देशों के पालन की समीक्षा और बच्चों की देखभाल से संबंधित व्यवस्थाओं की निगरानी महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां हैं, ऐसे में यह स्पष्ट होना चाहिए कि संबंधित संस्थानों का निरीक्षण कब-कब हुआ,निरीक्षण में क्या कमियां मिलीं और उनके निराकरण के लिए क्या कदम उठाए गए,यदि सुरक्षा संबंधी कमियां पहले से दर्ज थीं, तो क्या उन्हें दूर करने के लिए समयसीमा निर्धारित की गई थी? यदि निर्देश दिए गए थे,तो उनके पालन की पुष्टि किसने की? और यदि निरीक्षण में कोई बड़ी कमी नहीं मिली थी,तो बार-बार बच्चों के फरार होने की घटनाओं का कारण क्या रहा? जिला बाल संरक्षण अधिकारी की भूमिका की समीक्षा का अर्थ पहले से दोषी ठहराना नहीं है, इसका उद्देश्य यह पता लगाना होना चाहिए कि निगरानी व्यवस्था कहां कमजोर रही और जिम्मेदारी किस स्तर पर निर्धारित की जानी चाहिए।
सिर्फ अधीक्षक का निलंबन पर्याप्त नहीं,पूरे तंत्र की जांच जरूरी-इससे पहले तीन बच्चों के फरार होने की घटना के बाद प्लेस ऑफ सेफ्टी के प्रभारी अधीक्षक नीतू राम कुशवाहा को निलंबित किया गया था,अब उनके पदभार संभालने के दिन ही छह बच्चों की फरारी की घटना सामने आने से परिस्थितियां और जटिल हो गई हैं,लेकिन इस बार जांच का दायरा केवल अधीक्षक तक सीमित नहीं रहना चाहिए,यह देखना होगा कि संस्थान में निर्धारित क्षमता से अधिक बच्चों को रखने का निर्णय किस स्तर पर लिया गया, सुरक्षा कर्मियों की संख्या पर्याप्त थी या नहीं, काउंसलिंग व्यवस्था कितनी प्रभावी थी और जिला स्तर पर निरीक्षण के निर्देशों का पालन हो रहा था या नहीं,यदि किसी स्तर पर लापरवाही सामने आती है,तो उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर जिम्मेदारी तय की जानी चाहिए। साथ ही, जिन कर्मचारियों ने घटना के समय ड्यूटी निभाई,उनकी भूमिका भी निष्पक्ष जांच का हिस्सा होनी चाहिए।
पुलिस की तलाश जारी,दो बालक मिले,चार की खोज बाकी-घटना की सूचना मिलने के बाद गांधीनगर थाना पुलिस ने तलाश अभियान शुरू किया। उपलब्ध विवरण के अनुसार, पुलिस ने शहर के विभिन्न मार्गों, रेलवे स्टेशन,बस स्टैंड और अन्य संभावित स्थानों पर तलाश की,इस दौरान दो बालकों को पकड़कर वापस संस्थान लाया गया,जबकि चार अन्य की तलाश जारी है,अब प्राथमिकता फरार बालकों को सुरक्षित वापस लाने की है,इसके साथ ही घटना के दौरान रसोइये के साथ हुई घटना और गार्ड को कमरे में बंद किए जाने के आरोपों की भी जांच आवश्यक है,यदि किसी कर्मचारी को चोट पहुंची है,तो उसका चिकित्सकीय परीक्षण और बयान दर्ज किया जाना चाहिए,पुलिस की कार्रवाई के साथ विभाग को यह सुनिश्चित करना होगा कि बाकी बच्चों की सुरक्षा प्रभावित न हो और घटना के बाद परिसर में सुरक्षा संबंधी कमियों को तत्काल दूर किया जाए।
25 की क्षमता,63 बच्चे… आखिर कैसे संभल रही थी व्यवस्था?
प्लेस ऑफ सेफ्टी का उद्देश्य केवल अपचारी बच्चों को एक स्थान पर रखना नहीं,बल्कि उन्हें सुरक्षित वातावरण उपलब्ध कराना,उनकी मनोवैज्ञानिक जरूरतों को समझना और सुधार की प्रक्रिया से जोड़ना भी है, ऐसे संस्थान में बच्चों की संख्या निर्धारित क्षमता से काफी अधिक होना अपने आप में गंभीर समीक्षा का विषय है,यदि 25 बच्चों की क्षमता वाले संस्थान में 63 बच्चे रह रहे थे,तो सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या प्रत्येक बच्चे के लिए पर्याप्त जगह,निगरानी, भोजन,स्वास्थ्य सुविधा और व्यक्तिगत परामर्श उपलब्ध था? क्या सुरक्षाकर्मियों की संख्या बच्चों की वास्तविक संख्या के अनुरूप थी? क्या ड्यूटी पर तैनात कर्मचारियों को आपात स्थिति से निपटने का प्रशिक्षण दिया गया था? क्या परिसर के प्रवेश और निकास द्वारों की सुरक्षा पर्याप्त थी? इस बार सामने आए घटनाक्रम के अनुसार,बालकों ने पहले रसोई के पास गर्म खाना फेंककर हंगामा किया,इसके बाद ड्यूटी पर तैनात गार्ड को कमरे में बंद कर दिया और संस्थान से बाहर निकल गए,इस घटनाक्रम से सुरक्षा व्यवस्था में मौजूद संभावित कमजोरियों की जांच जरूरी हो जाती है,यह भी जांच का विषय है कि घटना के समय कितने कर्मचारी ड्यूटी पर थे, बच्चों की निगरानी किस प्रकार की जा रही थी और हंगामे के दौरान सुरक्षा कर्मियों ने क्या कदम उठाए।
फरारी का पुराना रिकॉर्ड भी कम गंभीर नहीं…
प्लेस ऑफ सेफ्टी और बाल संप्रेक्षण गृह से वर्ष 2026 में लगातार बच्चों के फरार होने की घटनाएं सामने आई हैं,इससे पहले भी इन घटनाओं को लेकर सुरक्षा व्यवस्था पर सवाल उठते रहे हैं।

अंतिम घटना की तारीख 13 अक्टूबर को प्रकाशित विवरण के आधार पर पिछली रात की मानी गई है,घटना की आधिकारिक तारीख और पूर्व मामलों में बच्चों की बरामदगी की स्थिति की पुष्टि संबंधित अभिलेखों से की जानी चाहिए,इन घटनाओं को जोड़कर देखें तो यह अब किसी एक दिन की आकस्मिक चूक का मामला नहीं रह जाता,लगातार होने वाली फरारी संस्थान की सुरक्षा व्यवस्था,निगरानी और सुधारात्मक कदमों की प्रभावशीलता पर सवाल खड़े करती है, पहली घटना के बाद यदि सुरक्षा व्यवस्था मजबूत की गई थी,तो दूसरी घटना कैसे हुई? दूसरी घटना के बाद समीक्षा हुई थी,तो तीसरी बार 13 बच्चे कैसे फरार हो गए? जुलाई की घटना के बाद भी यदि सुधारात्मक कदम उठाए गए थे,तो अब फिर छह बच्चे किस तरह बाहर निकल गए? हर बार जांच और सुरक्षा मजबूत करने की बात सामने आती है,लेकिन फरारी की घटनाओं का दोहराया जाना यह मांग करता है कि इस बार केवल घटना की जांच नहीं,बल्कि पिछले मामलों में लिए गए निर्णयों के क्रियान्वयन की भी समीक्षा की जाए।
अब प्रशासन को इन
सवालों का जवाब देना होगा
– 25 की क्षमता वाले संस्थान में 63 बच्चे क्यों रखे गए थे?
– क्या अतिरिक्त बच्चों की संख्या के अनुरूप कर्मचारियों और सुरक्षा संसाधनों की व्यवस्था थी?
– निलंबित प्रभारी अधीक्षक को दो महीने बाद पदभार सौंपने का निर्णय किन आधारों पर लिया गया?
– पदभार ग्रहण करने के दिन सुरक्षा व्यवस्था की समीक्षा हुई थी या नहीं?
– पुराने मामलों में फरार हुए कितने बच्चे वापस लाए गए और कितने अब भी लापता हैं?
– संस्थान में नियुक्त काउंसलरों की वास्तविक पदस्थापना और कार्यस्थल क्या हैं?
– जिला बाल संरक्षण अधिकारी ने पिछली घटनाओं के बाद कौन-कौन से निरीक्षण और सुधारात्मक कदम उठाए?
– क्या सभी फरारी की घटनाओं की संयुक्त समीक्षा कर जिम्मेदारी तय की जाएगी?
बच्चे भाग रहे हैं, व्यवस्था को अपनी कमियां तलाशनी होंगी-प्लेस ऑफ सेफ्टी से छह अपचारी बालकों की ताजा फरारी ने एक बार फिर स्पष्ट कर दिया है कि समस्या को केवल सुरक्षा कर्मियों की संख्या या दीवारों और दरवाजों तक सीमित करके नहीं देखा जा सकता,निर्धारित क्षमता से अधिक बच्चों का निवास, बार-बार फरारी,पुराने मामलों में बच्चों की वापसी को लेकर अस्पष्टता और काउंसलिंग व्यवस्था पर उठते सवाल—इन सभी पहलुओं की एक साथ समीक्षा जरूरी है,सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि बच्चों के फरार होने को न तो सामान्य घटना मानकर नजरअंदाज किया जा सकता है और न ही बिना जांच के इसे प्रताड़ना का प्रमाण माना जा सकता है, प्रशासन को बच्चों की सुरक्षा,उनके अधिकारों और संस्थान की जवाबदेही—तीनों को ध्यान में रखकर निष्पक्ष जांच करानी चाहिए,अब सवाल केवल यह नहीं है कि छह बच्चे कैसे भागे,बल्कि यह भी है कि पिछली घटनाओं के बाद व्यवस्था में क्या बदला, क्षमता से अधिक बच्चों को रखने की नौबत क्यों आई और निगरानी तंत्र ने अपनी जिम्मेदारी कितनी प्रभावी ढंग से निभाई,जब तक इन सवालों के ठोस जवाब नहीं मिलते और सुधार जमीन पर दिखाई नहीं देता,तब तक बाल संरक्षण व्यवस्था पर उठते सवाल खत्म होने वाले नहीं हैं।
आदेश में सामने आए 5 बड़े तथ्य…
- निलंबन समाप्तः आदेश में उल्लेख है कि 24 जुलाई 2026 के आदेश से नीतू राम कुशवाहा को निलंबित किया गया था।
- तीन सदस्यीय जांच समितिः कलेक्टर/अध्यक्ष,जिला बाल संरक्षण समिति के आदेशानुसार गठित समिति ने जांच प्रतिवेदन प्रस्तुत किया।
- अंतिम चेतावनीः जांच प्रतिवेदन के आधार पर नीतू राम कुशवाहा को भविष्य के लिए अंतिम चेतावनी जारी करते हुए निलंबन तत्काल प्रभाव से समाप्त किया गया।
- फिर मिली जिम्मेदारीः उन्हें प्लेस ऑफ सेफ्टी (बालक) एवं शासकीय विशेष गृह (बालक),अंबिकापुर के प्रभारी अधीक्षक का प्रभार सौंपा गया।
- बहाली अवधि का वेतनः आदेश में 24 जुलाई 2026 से बहाली तक की निलंबन अवधि को कर्तव्यावधि मानते हुए पूर्ण वेतन भुगतान की स्वीकृति दी गई है।
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