- पांच हत्याएं,उजड़ा बचपन और 22 साल का इंतजार,पीडि़त परिवार को मदद मिली या सिर्फ आश्वासन?
- 2017 में फांसी आजीवन कारावास में बदली,2026 में फिर क्षमा की चर्चा! चेर हत्याकांड के पीडि़त परिवार ने जताया विरोध
- हत्यारे की सजा पर फैसले हुए,पीडि़तों की मदद का हिसाब कौन देगा? 22 साल बाद भी परिवार के सवाल बरकरार
- शिवपुर-चरचा में कांग्रेस नेता की अनोखी मांग…अनारक्षित सीट पर अनारक्षित वर्ग को ही मिले मौका
- जिनका बचपन पांच हत्याओं ने उजाड़ा, वे आज भी मदद के इंतजार में! चेर हत्याकांड के पीडि़तों की दर्दभरी दास्तान
- पीडि़त परिवार को सहारा मिला या नहीं, जवाब गायब,दोषी को और राहत के सवाल पर परिवार की दोटूक असहमति!
- सरकारें बदलीं,22 साल गुजर गए,चेर हत्याकांड के पीडि़त परिवार की सहायता का हिसाब अब भी सवालों में…
–रवि सिंह-
कोरिया,11 अक्टूबर 2026 (घटती-घटना)। पांच लोगों की हत्या,बचपन में माता-पिता का साया छिन जाना,रिश्तेदारों के सहारे जिंदगी गुजारना और फिर वर्षों तक आर्थिक सहायता की प्रतीक्षा—चेर हत्याकांड के जीवित बचे बच्चों की कहानी केवल एक जघन्य अपराध की कहानी नहीं है, बल्कि अपराध के बाद पीडि़त परिवार के पुनर्वास और सरकारी जवाबदेही का भी सवाल है,करीब 22 साल बाद परिवार ने दैनिक घटती घटना को बताया कि उन्हें अब तक सम्मानजनक आर्थिक सहायता नहीं मिली है, परिवार ने एक और महत्वपूर्ण बात सामने रखी है,उनका कहना है कि वर्ष 2017 में सोनू सरदार का मृत्युदंड आजीवन कारावास में बदले जाने के बाद,वर्ष 2026 में शासन स्तर पर उसे और राहत देने अथवा क्षमा किए जाने के संबंध में उनसे राय मांगी गई थी,परिवार के मुताबिक,उन्होंने इस पर अपनी असहमति जताई थी,इस पूरे प्रकरण में दो सवाल एक साथ खड़े होते हैं—पहला,इतने गंभीर अपराध के बाद जीवित बचे बच्चों की आर्थिक सहायता और पुनर्वास की वास्तविक स्थिति क्या है? दूसरा,जब सोनू सरदार की सजा 2017 में ही मृत्युदंड से आजीवन कारावास में बदल चुकी थी,तो परिवार के अनुसार 2026 में उसे और राहत देने या क्षमा करने के संबंध में राय मांगने की प्रक्रिया किस आधार पर शुरू हुई और परिवार की असहमति के बाद क्या हुआ? इन सवालों का जवाब भावनाओं या अनुमानों से नहीं, बल्कि संबंधित सरकारी पत्रों, आवेदन, भुगतान अभिलेखों और आधिकारिक पक्ष से सामने आना चाहिए।
यह वही मामला है,जिसमें 26 नवंबर 2004 की रात एक ही परिवार के पांच लोगों की हत्या कर दी गई थी,अदालतों में लंबी कानूनी लड़ाई चली,निचली अदालत ने मृत्युदंड सुनाया, हाईकोर्ट ने उसकी पुष्टि की और सुप्रीम कोर्ट ने भी सजा बरकरार रखी,लेकिन बाद में दया याचिका के निपटारे में हुई देरी सहित कानूनी आधारों पर दिल्ली हाईकोर्ट ने 2017 में सोनू सरदार का मृत्युदंड आजीवन कारावास में बदल दिया,पीडि़त परिवार के लिए यह घटनाक्रम केवल अदालत के फैसले का विषय नहीं था,यह उस उम्मीद से भी जुड़ा था,जिसके सहारे वे अपने परिजनों की हत्या के बाद न्याय की प्रतीक्षा करते रहे,अब सूरजपुर के बहुचर्चित दोहरे हत्याकांड में अदालत से मृत्युदंड की सजा सुनाए जाने के बाद चेर हत्याकांड की चर्चा फिर सामने आई है,इसी संदर्भ में जब चेर हत्याकांड के जीवित बचे बच्चों ने दैनिक घटती घटना से संपर्क कर अपनी स्थिति बताई,तो मामला केवल पुराने अपराध की याद नहीं रहा,यह सवाल भी सामने आया कि इतने वर्षों में पीडि़त परिवार की सहायता, पुनर्वास और सरकारी जवाबदेही की स्थिति आखिर क्या रही?
26 नवंबर 2004ः एक रात में पांच जिंदगियां खत्म,बच्चों से छिन गया परिवार– न्यायिक दस्तावेजों के अनुसार,26 नवंबर 2004 को शमीन/शमीम अख्तर,उनकी पत्नी रुक्साना बीबी,उनके बच्चे याकूब और राना तथा चालक असगर अली की हत्या कर दी गई थी, अभियोजन के अनुसार,आरोपी कबाड़ बेचने के बहाने पहले घर आए थे और बाद में रुपये लूटने के उद्देश्य से लौटे,वारदात के दौरान परिवार की बच्ची शबाना किसी तरह वहां से निकलकर बची, अगले दिन घर में पांच लोगों के शव मिलने की जानकारी सामने आई,इस वारदात ने परिवार को पूरी तरह उजाड़ दिया, जीवित बचे बच्चों के सामने सबसे बड़ी चुनौती थी—बचपन में माता-पिता और परिजनों को खोने के बाद जिंदगी कैसे आगे बढ़े? परिवार के मुताबिक,उन्हें रिश्तेदारों के सहारे उत्तर प्रदेश के देवरिया क्षेत्र में रहना पड़ा,वहां बचपन बीता और जीवन की बुनियादी जरूरतों के लिए दूसरों पर निर्भर रहना पड़ा,परिवार का कहना है कि बड़े होने के बाद ही वे वापस कोरिया क्षेत्र से जुड़ पाए,यह केवल एक आपराधिक घटना का विवरण नहीं, बल्कि उस सामाजिक और आर्थिक संकट की कहानी है,जिसका सामना किसी गंभीर अपराध के बाद बचे हुए परिजनों को करना पड़ सकता है, जिन बच्चों की उम्र उस समय बहुत कम थी, उनके लिए माता-पिता की हत्या के बाद सुरक्षा,पालन-पोषण, शिक्षा और भविष्य की चिंता एक साथ खड़ी हो गई थी।
अदालतों में मृत्युदंड बरकरार, फिर 2017 में सजा आजीवन कारावास में बदली
चेर हत्याकांड में सोनू सरदार के खिलाफ मुकदमा चला,न्यायिक रिकॉर्ड के अनुसार, सत्र न्यायालय ने 27 फरवरी 2008 को मृत्युदंड सुनाया,छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने 8 मार्च 2010 को इसकी पुष्टि की और सुप्रीम कोर्ट ने 23 फरवरी 2012 को अपील खारिज करते हुए मृत्युदंड बरकरार रखा,इसके बाद राज्यपाल और राष्ट्रपति के समक्ष दया याचिका की प्रक्रिया चली,राज्यपाल ने 8 अप्रैल 2013 और राष्ट्रपति ने 5 मई 2014 को दया याचिका खारिज कर दी थी,लेकिन मामला यहीं समाप्त नहीं हुआ,सोनू सरदार की ओर से दया याचिका के निपटारे में देरी और अन्य कानूनी आधारों पर दिल्ली हाईकोर्ट में याचिका दायर की गई,28 जून 2017 को दिल्ली हाईकोर्ट ने मृत्युदंड को आजीवन कारावास में बदल दिया, फैसले में दया याचिका के निपटारे में हुई देरी को महत्वपूर्ण आधारों में शामिल किया गया था, यहां कानूनी स्थिति को स्पष्ट रखना जरूरी है, मृत्युदंड में बदलाव अदालत के फैसले के माध्यम से हुआ था,दया याचिका और सजा में बदलाव संवैधानिक तथा न्यायिक प्रक्रिया का हिस्सा था,लेकिन इस कानूनी प्रक्रिया के बीच पीडि़त परिवार की भावनाएं और उनकी जिंदगी पर पड़े असर को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता,परिवार की पीड़ा यह है कि जिन पांच लोगों की हत्या ने उनका पूरा जीवन बदल दिया,उस मामले में मृत्युदंड की पुष्टि के बाद भी आखिरकार सजा आजीवन कारावास रह गई,उनके लिए यह एक अधूरी उम्मीद जैसा अनुभव रहा,यह परिवार का नजरिया है, वहीं अदालत का फैसला अपने कानूनी आधारों पर दिया गया था।
2026 में फिर राहत या क्षमा का सवाल? परिवार बोला
हम सहमत नहीं…मृतक की बेटी शबाना खातून ने दैनिक घटती-घटना ने दैनिक घटती-घटना को बताया कि वर्ष 2017 में सजा आजीवन कारावास में बदले जाने के बाद वर्ष 2026 में शासन स्तर से सोनू सरदार को और राहत देने या क्षमा किए जाने के संबंध में उनसे राय मांगी गई थी,उनसे पूछा गया था कि क्या वे आरोपी को क्षमा करना चाहते हैं,परिवार का कहना है कि उन्होंने इस पर सहमति नहीं जताई और विरोध दर्ज कराया,परिवार की पीड़ा का आधार समझना जरूरी है,जिस वारदात में उनके पांच परिजनों की हत्या हुई,उसने उनके बचपन और भविष्य को बदल दिया,वे वर्षों तक रिश्तेदारों के सहारे रहे और आज भी आर्थिक सहायता को लेकर सवाल उठा रहे हैं,ऐसे में परिवार के मुताबिक,जब 2017 में मृत्युदंड आजीवन कारावास में बदल गया था और फिर 2026 में और राहत या क्षमा के संबंध में राय मांगी गई,तो उन्होंने अपनी असहमति जताना उचित समझा, उनका सवाल है कि जिस अपराध ने उनका पूरा परिवार उजाड़ दिया,उसमें आरोपी को और राहत देने के सवाल पर वे सहमत कैसे हो सकते हैं? परिवार की यह भावना उनके अपने अनुभव और पीड़ा से जुड़ी है,हालांकि,यहां एक कानूनी अंतर स्पष्ट करना जरूरी है,क्षमा,सजा में परिहार और समयपूर्व रिहाई अलग-अलग कानूनी प्रक्रियाएं हो सकती हैं,इसलिए 2026 में आए कथित पत्र वहक में किस प्रक्रिया का उल्लेख था,यह मूल पत्र देखकर ही निश्चित किया जा सकता है,परिवार की सदस्य शबाना का कहना है कि उनसे राय मांगी गई थी,अब मुख्य सवाल यह है कि 2026 में शासन स्तर पर किस प्रकार की राहत पर विचार किया जा रहा था? क्या वह क्षमा,सजा में परिहार या समयपूर्व रिहाई से संबंधित प्रस्ताव था? परिवार की असहमति दर्ज की गई या नहीं? और संबंधित प्राधिकारी ने आगे क्या निर्णय लिया?
हमें मदद नहीं मिली…बच्चों ने घटती-घटना को बताई अपनी पीड़ा- इस पूरे मामले में सबसे महत्वपूर्ण पहलू पीडि़त परिवार की आर्थिक स्थिति और सहायता का है, जीवित बचे बच्चों ने दैनिक घटती-घटना को बताया कि उन्हें अब तक सम्मानजनक आर्थिक सहायता नहीं मिली,उनका कहना है कि माता-पिता और परिवार के अन्य सदस्यों की हत्या के बाद उन्हें दूसरों के सहारे जीवन बिताना पड़ा, लेकिन इतने वर्षों में उनकी जिंदगी को दोबारा संभालने के लिए पर्याप्त सरकारी सहायता नहीं मिली,परिवार की इस बात को केवल मौखिक दावे तक सीमित मानकर छोड़ देना भी उचित नहीं होगा,उपलब्ध दस्तावेज बताते हैं कि सहायता के लिए पहले भी आवेदन दिए गए थे, वर्ष 2005 के आसपास भेजे गए पत्रों में बच्चों की स्थिति और आर्थिक मदद की आवश्यकता बताई गई थी,बाद में शबाना खातून की ओर से भी सहायता की मांग की गई, वर्ष 2022 में मुख्यमंत्री और जिला विधिक सेवा प्राधिकरण को दिए गए आवेदनों में परिवार ने आर्थिक सहायता नहीं मिलने की बात लिखी थी,ये आवेदन इस बात का दस्तावेजी संकेत हैं कि परिवार ने सहायता की मांग उठाई थी। हालांकि,इनसे अपने आप यह अंतिम रूप से प्रमाणित नहीं होता कि किसी भी सरकारी विभाग या योजना से कभी कोई राशि नहीं मिली,यह जानने के लिए जिला प्रशासन,पुलिस, जिला विधिक सेवा प्राधिकरण और संबंधित विभागों के भुगतान अभिलेखों की जांच जरूरी है,लेकिन सवाल अपनी जगह कायम है की यदि परिवार को सहायता मिली थी, तो कितनी मिली,कब मिली,किस योजना के तहत मिली और क्या वह पीडि़तों की जरूरतों के अनुरूप थी? और यदि सहायता नहीं मिली या प्रक्रिया अधूरी रह गई,तो इतने वर्षों तक ऐसा क्यों हुआ?
2022 में आवेदन,2023 में दस्तावेजों की प्रक्रिया-फिर आगे क्या हुआ?
उपलब्ध रिकॉर्ड के अनुसार,शबाना खातून ने वर्ष 2022 में जिला विधिक सेवा प्राधिकरण, बैकुंठपुर के समक्ष आर्थिक सहायता की मांग रखी थी,आवेदन में उन्होंने परिवार के सदस्यों की हत्या,बचपन में माता-पिता के खोने और आर्थिक कठिनाइयों का उल्लेख करते हुए मदद मांगी थी,इसके बाद वर्ष 2023 में जिला विधिक सेवा प्राधिकरण की ओर से बैकुंठपुर थाने को पत्र भेजे जाने का रिकॉर्ड भी उपलब्ध है, पत्र में शबाना खातून को पहचान और संबंधित दस्तावेजों की प्रक्रिया के लिए उपस्थित कराने का अनुरोध किया गया था, इससे यह संकेत मिलता है कि आवेदन के बाद कम से कम कुछ प्रशासनिक प्रक्रिया आगे बढ़ी थी,लेकिन उपलब्ध दस्तावेजों से ये स्पष्ट नहीं है कि उस प्रक्रिया का अंतिम परिणाम क्या हुआ, क्या पीडि़त मुआवजा निर्धारित किया गया? क्या पात्रता का परीक्षण पूरा हुआ? क्या कोई राशि स्वीकृत हुई? यदि स्वीकृत हुई तो भुगतान हुआ या नहीं? यदि आवेदन लंबित रहा तो उसका कारण क्या था? यही वह बिंदु है जहां प्रशासन की जवाबदेही जरूरी हो जाती है, किसी आवेदन पर पत्राचार होना और पीडि़त परिवार तक वास्तविक सहायता पहुंचना दो अलग-अलग बातें हैं,पीडि़त परिवार को प्रक्रिया की जानकारी देना,उसे आवश्यक दस्तावेज जुटाने में सहायता करना और पात्रता के अनुरूप लाभ दिलाना संबंधित संस्थाओं की जिम्मेदारी का हिस्सा है।
सरकारें बदलीं,लेकिन पीडि़त परिवार की सहायता पर स्थिति स्पष्ट क्यों नहीं?
चेर हत्याकांड को हुए करीब 22 वर्ष बीत चुके हैं,इस दौरान राज्य में सरकारें बदलीं, प्रशासनिक अधिकारी बदले और समय के साथ योजनाएं तथा प्रक्रियाएं भी आगे बढ़ीं, लेकिन पीडि़त परिवार की ओर से आर्थिक सहायता को लेकर सवाल उठना बताता है कि इस मामले की मौजूदा स्थिति की समीक्षा जरूरी है,यह किसी एक सरकार या एक अधिकारी पर बिना रिकॉर्ड के आरोप लगाने का विषय नहीं है, बल्कि यह पता लगाने का सवाल है कि अलग-अलग समय पर परिवार की सहायता के लिए क्या कदम उठाए गए? वर्ष 2005 के पत्रों पर क्या कार्रवाई हुई? बाद के आवेदनों का क्या हुआ? 2022 में विधिक सेवा प्राधिकरण के सामने मामला आने के बाद क्या निर्णय लिया गया? 2023 में दस्तावेजों की प्रक्रिया के बाद कोई भुगतान या अन्य सहायता स्वीकृत हुई या नहीं? यदि सहायता दी गई थी,तो प्रशासन को उसका विवरण सामने रखना चाहिए,यदि पात्रता में कोई कमी थी,तो परिवार को उसका कारण और उपलब्ध विकल्प बताए जाने चाहिए,और यदि आवेदन किसी स्तर पर लंबित रह गया,तो यह स्पष्ट होना चाहिए कि उसे आगे बढ़ाने की जिम्मेदारी किसकी थी? सरकारी सहायता को लेकर सवाल उठाना किसी पक्ष पर राजनीतिक आरोप लगाने से अलग है,यह पीडि़त परिवार के अधिकारों और सरकारी प्रक्रिया की पारदर्शिता का सवाल है, इतने गंभीर अपराध के बाद बचे हुए बच्चों को वर्षों तक अपने आवेदन की स्थिति जानने के लिए भटकना पड़े, तो व्यवस्था की संवेदनशीलता पर सवाल उठना स्वाभाविक है।
सूरजपुर के फैसले के बाद चेर हत्याकांड फिर चर्चा में क्या पुराने मामले से सबक लिया जाएगा?
अक्टूबर 2026 में सूरजपुर के चर्चित दोहरे हत्याकांड में जिला एवं सत्र न्यायालय ने तीन आरोपियों को मृत्युदंड और एक आरोपी को प्राकृतिक जीवन के अंत तक आजीवन कारावास की सजा सुनाई,मृत्युदंड के मामलों में हाईकोर्ट की पुष्टि की कानूनी प्रक्रिया भी आवश्यक है,इस फैसले के बाद चेर हत्याकांड का संदर्भ फिर सामने आया,दोनों मामलों की परिस्थितियां और कानूनी प्रक्रिया अलग हैं, इसलिए उन्हें एक जैसा मानना उचित नहीं होगा,लेकिन इन मामलों के बीच एक व्यापक प्रश्न समान रूप से महत्वपूर्ण है—गंभीर अपराध के बाद पीडि़त परिवार और बचे हुए बच्चों की जिंदगी को संभालने की जिम्मेदारी कौन उठाता है? अदालत का फैसला अपराध और आरोपी की कानूनी जवाबदेही तय करता है,लेकिन पीडि़त परिवार के लिए उसके बाद भी कई कठिनाइयां बनी रह सकती हैं—आर्थिक संकट,शिक्षा और रोजगार की समस्या, सामाजिक सुरक्षा की कमी और लंबे समय तक मानसिक पीड़ा,ऐसे में पीडि़त सहायता व्यवस्था का उद्देश्य केवल आवेदन लेना नहीं,बल्कि पात्र लोगों तक वास्तविक मदद पहुंचाना भी होना चाहिए,चेर हत्याकांड के जीवित बचे बच्चों की ओर से उठाया गया सवाल इसी व्यापक जिम्मेदारी की याद दिलाता है,यदि किसी परिवार ने दशकों पहले सहायता मांगी थी और बाद में भी आवेदन दिए,तो उन आवेदनों की स्थिति का एक समेकित विवरण सार्वजनिक होना चाहिए,इससे न केवल परिवार को जवाब मिलेगा,बल्कि यह भी स्पष्ट होगा कि पीडि़त सहायता से जुड़ी सरकारी प्रक्रिया कहां तक पहुंची।
प्रशासन और शासन से सीधे सवाल- पीडि़त परिवार के दावों और उपलब्ध दस्तावेजों के आधार पर जिला प्रशासन, जिला विधिक सेवा प्राधिकरण और संबंधित शासन विभागों से निम्न सवालों के जवाब अपेक्षित हैं—
- वर्ष 2005 के आसपास पीडि़त परिवार की ओर से आर्थिक सहायता के लिए दिए गए आवेदनों पर क्या
कार्रवाई हुई? - शबाना खातून के वर्ष 2022 के आवेदन पर क्या निर्णय लिया गया?
- वर्ष 2023 में दस्तावेजों और पहचान की प्रक्रिया के लिए पत्र भेजे जाने के बाद मामला किस स्थिति में
पहुंचा? - क्या परिवार को पीडि़त प्रतिकर या किसी अन्य सरकारी योजना के तहत राशि स्वीकृत हुई? यदि हां, तो
कितनी राशि और किस तारीख को भुगतान किया गया? - यदि सहायता नहीं दी गई, तो उसका कारण क्या था? क्या परिवार को लिखित रूप से जानकारी दी गई?
- परिवार के अनुसार वर्ष 2026 में सोनू सरदार को और राहत देने या क्षमा किए जाने के संबंध में राय मांगी
गई थी, क्या शासन या संबंधित विभाग के रिकॉर्ड में ऐसा कोई पत्र है? - यदि पत्र जारी हुआ था, तो वह किस प्रक्रिया से संबंधित था—क्षमा, सजा में परिहार या समयपूर्व रिहाई?
- परिवार की असहमति का क्या रिकॉर्ड बनाया गया और उसके बाद क्या कार्रवाई हुई?
- क्या परिवार की मौजूदा आर्थिक और सामाजिक स्थिति की समीक्षा कर उन्हें लागू नियमों के तहत किसी
सहायता या पुनर्वास योजना से जोड़ने की आवश्यकता है?
न्याय का अर्थ केवल सजा नहीं, उजड़ी जिंदगी को सहारा देना भी है- चेर हत्याकांड के 22 वर्ष बाद यह मामला एक बार फिर समाज और प्रशासन के सामने एक बुनियादी सवाल रखता है, पांच लोगों की हत्या के बाद जो बच्चे बचे, उन्होंने अपने परिजनों के बिना जीवन बिताया, अदालतों में मुकदमा चला, मृत्युदंड की पुष्टि हुई और बाद में कानूनी प्रक्रिया के तहत सजा आजीवन कारावास में बदल गई, लेकिन परिवार की ओर से आर्थिक सहायता को लेकर उठाया गया सवाल अब भी स्पष्ट जवाब मांगता है, पीडç¸त परिवार की मांग को केवल पुराने मामले की पुनरावृत्ति मानकर नहीं छोड़ा जाना चाहिए, यदि उन्हें सहायता नहीं मिली, तो यह पता लगना चाहिए कि ऐसा क्यों हुआ। यदि सहायता मिली, तो उसका पूरा विवरण सामने आना चाहिए, यदि कोई प्रक्रिया अधूरी रह गई, तो उसे पूरा करने के लिए संबंधित विभाग को कदम उठाना चाहिए, क्योंकि अपराध के बाद न्याय की लड़ाई केवल अदालत के फैसले पर खत्म नहीं होती, जिन बच्चों का बचपन छिन गया, जिनके सिर से माता-पिता का साया उठ गया और जिन्होंने दूसरों के सहारे जिंदगी आगे बढ़ाई, उनके लिए सरकारी संवेदनशीलता भी उतनी ही महत्वपूर्ण है, चेर हत्याकांड का सबसे बड़ा अनुत्तरित सवाल यही है—आरोपी की सजा पर वर्षों तक कानूनी प्रक्रिया चली, लेकिन पीडि़त परिवार की सहायता की स्थिति का स्पष्ट और सार्वजनिक हिसाब अब तक सामने क्यों नहीं है? अब जरूरत केवल पुराने जख्मों को याद करने की नहीं, बल्कि रिकॉर्ड की जांच कर पीडç¸त परिवार को ठोस जवाब देने की है, न्याय केवल अपराधी को सजा सुनाने से जुड़ा प्रश्न नहीं है, अपराध के बाद बिखर गए जीवन को फिर से खड़ा करने की जिम्मेदारी भी व्यवस्था के सामने रहती है।
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