- पटना में भाजपा आरक्षित वर्ग के उम्मीदवार को उतारकर जीत चुकी है चुनाव,अब बैकुंठपुर और शिवपुर-चरचा में ओबीसी-अनारक्षित दावेदारों के प्रतिनिधित्व पर मंथन
- अनारक्षित सीट,दावेदारी पर वर्ग की बहस! कोरिया में भाजपा-कांग्रेस के सामने टिकट का पेच
- पटना में भाजपा का प्रयोग सफल, अब बाकी दो निकायों में किस वर्ग पर दांव लगाएंगे दल?
- शिवपुर-चरचा में कांग्रेस नेता की अनोखी मांग…अनारक्षित सीट पर अनारक्षित वर्ग को ही मिले मौका
- तीन निकाय,तीनों अध्यक्ष पद अनारक्षित,अब टिकट में सामाजिक समीकरण साधने की चुनौती
- ओबीसी बनाम अनारक्षित की बहस तेज,बैकुंठपुर-शिवपुर-चरचा में टिकट पर सबकी नजर
- पटना के बाद बाकी दो निकायों में किसे मौका? भाजपा में अंदरूनी मंथन, कांग्रेस में सार्वजनिक मांग…
- अनारक्षित सीट पर टिकट का सवाल,सामाजिक प्रतिनिधित्व को लेकर दोनों दलों में हलचल
-रवि सिंह-
कोरिया,10 अक्टूबर 2026 (घटती-घटना)। जिले की नगरीय राजनीति में अध्यक्ष पद के आरक्षण को लेकर एक नई बहस शुरू हो गई है। जिले की तीनों नगरीय निकायों में अध्यक्ष पद अनारक्षित श्रेणी के लिए आरक्षित होने के बावजूद अब यह सवाल उठने लगा है कि राजनीतिक दल इस अवसर का उपयोग किस वर्ग के उम्मीदवार को मौका देने के लिए करेंगे। नगर पंचायत पटना में दो वर्ष पहले हुए चुनाव में भाजपा अनारक्षित महिला सीट पर आरक्षित वर्ग के उम्मीदवार को मैदान में उतारकर जीत दर्ज कर चुकी है, अब बैकुंठपुर और शिवपुर-चरचा नगर पालिका के आगामी चुनावों से पहले कांग्रेस और भाजपा के भीतर अनारक्षित तथा अन्य पिछड़ा वर्ग के दावेदारों को मौका देने की मांग चर्चा में है।
इस बहस को शिवपुर-चरचा के एक कांग्रेस नेता द्वारा सार्वजनिक रूप से उठाई जा रही मांग ने और दिलचस्प बना दिया है, उनकी मांग है कि जब सीट अनारक्षित वर्ग के लिए निर्धारित है,तो अनारक्षित वर्ग के दावेदारों को भी अवसर मिलना चाहिए,उनका तर्क है कि स्थानीय निकायों में चुनाव लड़ने का अवसर अनारक्षित वर्ग के नेताओं के लिए महत्वपूर्ण है और यदि यहां भी उन्हें मौका नहीं मिला,तो राजनीतिक प्रतिनिधित्व की उनकी संभावनाएं सीमित हो सकती हैं,दूसरी ओर,भाजपा के भीतर भी ऐसी मांग उठने की चर्चा है कि जिले की शेष दो नगरीय निकायों में से एक में अन्य पिछड़ा वर्ग और दूसरी में अनारक्षित वर्ग के दावेदार को अवसर दिया जाए। हालांकि इस संबंध में पार्टी की ओर से कोई आधिकारिक निर्णय सामने नहीं आया है,ऐसे में आरक्षण के आधार पर उपलब्ध अवसर और राजनीतिक दलों की टिकट रणनीति के बीच संतुलन का सवाल महत्वपूर्ण हो गया है।
पटना में भाजपा का प्रयोग, अब बाकी दो निकायों पर निगाह-नगर पंचायत पटना का पिछला चुनाव इस बहस का प्रमुख संदर्भ बन गया है,वहां अध्यक्ष पद अनारक्षित महिला श्रेणी के लिए निर्धारित था,भाजपा ने आरक्षित वर्ग की महिला उम्मीदवार को अवसर दिया और जीत दर्ज की, दूसरी ओर,कांग्रेस ने अनारक्षित वर्ग की महिला उम्मीदवार के भरोसे चुनाव लड़ा था,स्थानीय राजनीतिक समीकरणों, पार्टी के भीतर बगावत और एक बागी उम्मीदवार के निर्दलीय चुनाव लड़ने को कांग्रेस की हार से जोड़कर देखा गया,पटना का चुनाव अब बैकुंठपुर और शिवपुर-चरचा की टिकट रणनीति पर होने वाली चर्चाओं में उदाहरण के तौर पर सामने आ रहा है,भाजपा के भीतर कुछ दावेदारों और नेताओं की ओर से यह तर्क दिए जाने की चर्चा है कि जब पार्टी पटना में आरक्षित वर्ग के उम्मीदवार को अवसर दे चुकी है,तो अब बाकी दो निकायों में सामाजिक संतुलन का ध्यान रखा जाना चाहिए,इस तर्क के अनुसार,शेष दो निकायों में से एक में अन्य पिछड़ा वर्ग और दूसरे में अनारक्षित वर्ग के उम्मीदवार को अवसर देने से अलग-अलग सामाजिक समूहों को प्रतिनिधित्व मिल सकता है,हालांकि यह मांग पार्टी की आधिकारिक नीति नहीं है और न ही टिकट वितरण का कोई अंतिम फार्मूला घोषित हुआ है,फिलहाल इसे भाजपा के भीतर चल रही राजनीतिक चर्चा के रूप में ही देखा जाना चाहिए।
कांग्रेस नेता की सार्वजनिक मांग से बढ़ी चर्चा-शिवपुर-चरचा में कांग्रेस के एक नेता द्वारा अनारक्षित सीट पर अनारक्षित वर्ग के उम्मीदवार को मौका देने की मांग सार्वजनिक रूप से उठाई जा रही है,यह मांग पार्टी के भीतर टिकट को लेकर चल रही चर्चाओं के बीच सामने आई है,उनका कहना है कि स्थानीय निकायों में अनारक्षित वर्ग के राजनीतिक कार्यकर्ताओं के लिए अध्यक्ष पद का चुनाव एक महत्वपूर्ण अवसर है और इस अवसर पर उन्हें भी प्राथमिकता मिलनी चाहिए,इस मांग के सामने आने के बाद सवाल उठ रहा है कि कांग्रेस शिवपुर-चरचा में अध्यक्ष पद के लिए किस सामाजिक वर्ग से उम्मीदवार चुनती है,क्या पार्टी अनारक्षित वर्ग की किसी महिला दावेदार पर भरोसा जताएगी,या स्थानीय समीकरणों को ध्यान में रखते हुए किसी अन्य पात्र दावेदार को मौका देगी? फिलहाल इसका जवाब पार्टी की आधिकारिक घोषणा के बाद ही मिलेगा, कांग्रेस के लिए चुनौती यह भी है कि टिकट चयन के दौरान दावेदारों के बीच सहमति कैसे बनाई जाए,यदि कई नेता एक ही पद के लिए दावेदारी करते हैं,तो पार्टी को ऐसे उम्मीदवार का चयन करना होगा जिसके पक्ष में संगठन और स्थानीय कार्यकर्ताओं को एकजुट किया जा सके।
भाजपा के सामने भी कम नहीं हैं सवाल-सत्तारूढ़ भाजपा के सामने भी बैकुंठपुर और शिवपुर-चरचा में उम्मीदवार चयन को लेकर कई समीकरण हैं,पटना में आरक्षित वर्ग की महिला उम्मीदवार को अवसर देने और जीत मिलने का उदाहरण पार्टी के भीतर सामाजिक प्रतिनिधित्व के पक्ष में दिए जा रहे तर्कों का आधार बन रहा है,भाजपा के कुछ संभावित दावेदारों के बीच यह चर्चा है कि शेष दो निकायों में एक में ओबीसी और दूसरे में अनारक्षित वर्ग के उम्मीदवार को अवसर देने पर विचार होना चाहिए,इस मांग के पीछे तर्क यह है कि इससे पार्टी अलग-अलग सामाजिक वर्गों के दावेदारों को प्रतिनिधित्व दे सकेगी,हालांकि भाजपा की टिकट रणनीति केवल इसी मांग के आधार पर तय होगी,ऐसा मानना जल्दबाजी होगी, पार्टी नेतृत्व स्थानीय जनाधार, संगठनात्मक भूमिका,चुनावी स्थिति और उम्मीदवार की स्वीकार्यता सहित कई पहलुओं पर विचार कर सकता है,अभी तक यह स्पष्ट नहीं है कि भाजपा दोनों निकायों में किस सामाजिक वर्ग से उम्मीदवार उतारने का निर्णय लेगी।
अनारक्षित सीट का अर्थ और राजनीतिक दलों का निर्णय-इस पूरे विवाद में एक महत्वपूर्ण तथ्य समझना जरूरी है कि अनारक्षित सीट किसी एक सामाजिक वर्ग के लिए आरक्षित सीट नहीं होती, निर्धारित नियमों के अनुसार पात्र उम्मीदवार इसमें चुनाव लड़ सकते हैं,इसलिए अनारक्षित सीट से अन्य पिछड़ा वर्ग अथवा किसी अन्य वर्ग के उम्मीदवार को टिकट देना अपने आप में आरक्षण नियमों का उल्लंघन नहीं है,लेकिन राजनीतिक स्तर पर यह बहस अलग है कि किसी पार्टी को सामाजिक प्रतिनिधित्व और अपने कार्यकर्ताओं की अपेक्षाओं के बीच किस तरह संतुलन बनाना चाहिए, एक पक्ष का तर्क है कि अनारक्षित वर्ग के दावेदारों को भी अवसर मिलना चाहिए,जबकि दूसरा पक्ष व्यापक सामाजिक प्रतिनिधित्व और चुनावी संभावनाओं को महत्व देने की बात कर सकता है, इसी वजह से यह मुद्दा अब केवल आरक्षण की तकनीकी स्थिति नहीं रह गया है,बल्कि पार्टी की रणनीति, स्थानीय नेतृत्व की पसंद और विभिन्न दावेदारों की राजनीतिक महत्वा कांक्षाओं से भी जुड़ गया है।
बैकुंठपुर और शिवपुर- चरचा में किसे मिलेगा मौका?
आगामी चुनावों से पहले दोनों प्रमुख दलों के सामने सबसे बड़ा सवाल यही है कि बैकुंठपुर और शिवपुर-चरचा में अध्यक्ष पद के लिए किसे उम्मीदवार बनाया जाए,कांग्रेस के भीतर शिवपुर-चरचा से उठी सार्वजनिक मांग ने अनारक्षित वर्ग के प्रतिनिधित्व पर चर्चा को सामने ला दिया है,वहीं भाजपा के भीतर भी बाकी दो निकायों में ओबीसी और अनारक्षित वर्ग के दावेदारों को अवसर देने की मांग की चर्चा है,अब देखना होगा कि दोनों दल इन मांगों को कितना महत्व देते हैं,क्या कांग्रेस शिवपुर-चरचा में अनारक्षित वर्ग की किसी महिला दावेदार को मौका देगी? क्या भाजपा पटना के बाद शेष दो निकायों में अलग-अलग सामाजिक वर्गों को प्रतिनिधित्व देने की रणनीति अपनाएगी? या फिर दोनों दल स्थानीय जनाधार और संगठनात्मक समीकरणों को प्राथमिकता देते हुए अलग-अलग निर्णय लेंगे? फिलहाल इन सवालों का कोई आधिकारिक उत्तर नहीं है,टिकट की घोषणा होने तक संभावित नामों और रणनीतियों को राजनीतिक चर्चाओं के रूप में ही देखा जाना चाहिए,कुल मिलाकर,कोरिया जिले की दो नगर पालिकाओं में अध्यक्ष पद के चुनाव से पहले अनारक्षित सीट पर किस वर्ग को अवसर मिलना चाहिए, यह बहस तेज हो गई है, पटना में भाजपा के पिछले प्रयोग का उदाहरण सामने है,तो शिवपुर-चरचा में कांग्रेस नेता की सार्वजनिक मांग ने नए सवाल खड़े कर दिए हैं,अब निगाह दोनों दलों के निर्णय पर है—वे सामाजिक प्रतिनिधित्व,संगठन की अपेक्षाओं और स्थानीय चुनावी समीकरणों के बीच किस तरह संतुलन बनाते हैं।
तीन निकाय,अध्यक्ष पद अनारक्षित—लेकिन टिकट का गणित अलग
कोरिया जिले में कुल तीन नगरीय निकाय हैं, इनमें नगर पंचायत पटना में अध्यक्ष पद का चुनाव पहले ही संपन्न हो चुका है,जबकि बैकुंठपुर और शिवपुर-चरचा में आगामी चुनाव को लेकर राजनीतिक गतिविधियां तेज हो रही हैं,अध्यक्ष पद के आरक्षण की स्थिति के अनुसार तीनों निकायों में अनारक्षित श्रेणी निर्धारित हुई है, इनमें दो निकायों में अनारक्षित महिला और एक में अनारक्षित मुक्त श्रेणी का प्रावधान रहा है,आरक्षण की इस स्थिति ने राजनीतिक दलों के सामने उम्मीदवार चयन के कई विकल्प खोल दिए हैं,अनारक्षित सीट पर संबंधित नियमों के अनुसार पात्र उम्मीदवार चुनाव लड़ सकते हैं,लेकिन पार्टी किस सामाजिक वर्ग से उम्मीदवार चुनती है,यह उसका राजनीतिक निर्णय होता है,यही कारण है कि आरक्षण घोषित होने के बाद अब चर्चा केवल सीट की श्रेणी तक सीमित नहीं है,बल्कि इस बात पर भी है कि पार्टी अपने उम्मीदवार के चयन में सामाजिक प्रतिनिधित्व और स्थानीय राजनीतिक समीकरणों को कितना महत्व देती है, बैकुंठपुर और शिवपुर-चरचा में अध्यक्ष पद के लिए अलग-अलग दावेदार अपनी दावेदारी प्रस्तुत कर रहे हैं, कई नेता लंबे समय से संगठन में सक्रिय हैं,जबकि कुछ नए चेहरे भी चुनावी संभावनाएं तलाश रहे हैं,ऐसे में टिकट वितरण के समय पार्टी नेतृत्व को दावेदारों की सक्रियता,स्थानीय संपर्क, संगठनात्मक समीकरण और चुनावी संभावनाओं पर विचार करना होगा।
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