- बैकुंठपुर की फांसी से सूरजपुर के मृत्युदंड तक…बदल गया फैसला,लौटा वही सवाल…
- बैकुंठपुर का इतिहास फिर दोहराया, सूरजपुर में तीन को मृत्युदंड
- 2008 में बैकुंठपुर,2026 में सूरजपुर…फांसी के फैसले का फिर अध्याय
- 18 साल पुरानी गूंज फिर सुनाई दी…सरगुजा में तीन को फांसी
- सोनू सरदार मामले के बाद सरगुजा संभाग में फिर मृत्युदंड का बड़ा फैसला, सूरजपुर में तीन दोषियों को फांसी—अगली कसौटी हाईकोर्ट की
- सोनू सरदार मामले में ट्रायल कोर्ट ने 2006 को मृत्युदंड सुनाया था,बाद में हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट ने इसे बरकरार रखा,जबकि 2017 में दिल्ली हाईकोर्ट ने मृत्युदंड को उम्रकैद में बदल दिया।
-रवि सिंह-
सूरजपुर/बैकुंठपुर,08 अक्टूबर 2026 (घटती-घटना)। सरगुजा संभाग के न्यायिक इतिहास में सूरजपुर की अदालत का 8 अक्टूबर 2026 का फैसला सिर्फ एक दोहरे हत्याकांड में सजा सुनाए जाने की घटना नहीं है,इस फैसले ने करीब दो दशक पुराने उस न्यायिक अध्याय को भी फिर सामने ला दिया है,जिसकी शुरुआत कोरिया के बैकुंठपुर से हुई थी और जिसमें मृत्युदंड से लेकर हाईकोर्ट,सुप्रीम कोर्ट,दया याचिका और अंततःउम्रकैद तक की पूरी न्यायिक यात्रा देखने को मिली थी। बैकुंठपुर के सोनू सरदार मामले में पांच लोगों की हत्या के बाद निचली अदालत ने मृत्युदंड सुनाया था,हाईकोर्ट ने उसे बरकरार रखा,सुप्रीम कोर्ट ने भी फांसी की सजा कायम रखी,लेकिन वर्षों तक चली दया याचिका की प्रक्रिया और उसमें हुई देरी ने मामले को फिर अदालत तक पहुंचाया,28 जून 2017 को दिल्ली हाईकोर्ट ने मृत्युदंड को उम्रकैद में बदल दिया, अब करीब दो दशक बाद सूरजपुर में एक बार फिर निचली अदालत से तीन दोषियों को मृत्युदंड सुनाया गया है,फर्क इतना है कि इस बार कहानी अभी पूरी नहीं हुई है, अदालत ने सजा सुनाई है,लेकिन मृत्युदंड का क्रियान्वयन छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट की पुष्टि के बिना नहीं हो सकता,आपके उपलब्ध न्यायालयीन आदेश में भी यह बात स्पष्ट रूप से दर्ज है।
2004 की वह रात,जिसने बैकुंठपुर को हिला दिया था-26 नवंबर 2004 बैकुंठपुर के चेर गांव में कबाड़ व्यवसायी शमीम अख्तर अपने परिवार के साथ घर पर थे, सुप्रीम कोर्ट के रिकॉर्ड के अनुसार वे रायपुर से कबाड़ बेचकर लौटे थे और उनके पास करीब 1.70 लाख रुपये नकद थे,अभियोजन के अनुसार सोनू सरदार और उसके साथियों ने घर में घुसकर लूट की वारदात को अंजाम दिया, इस घटना में शमीम अख्तर,उनकी पत्नी रुखसाना बीबी,उनके दो छोटे बच्चों और ड्राइवर असगर अली की हत्या हुई,शमीम की नौ वर्षीय बेटी शबाना पीछे के दरवाजे से निकलकर बच गई थी और घटना की महत्वपूर्ण गवाह बनी,यह वह मामला था जिसने उस समय पूरे कोरिया क्षेत्र को झकझोर दिया था।
फिर शुरू हुई अदालत की लंबी लड़ाई-सोनू सरदार का सत्र प्रकरण 2006 में दर्ज हुआ,लेकिन ट्रायल कोर्ट ने 27 फरवरी 2008 को उसे दोषी ठहराते हुए मृत्युदंड सुनाया,अदालत ने इसे‘रेयरेस्ट ऑफ रेयर’ श्रेणी का मामला माना था,इसके बाद मामला रुका नहीं।
2008—बैकुंठपुर की अदालत से मृत्युदंड
2010—छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने सजा बरकरार रखी
2012—सुप्रीम कोर्ट ने भी मृत्युदंड कायम रखा
2013—राज्यपाल ने दया याचिका खारिज की
2014 — राष्ट्रपति ने दया याचिका खारिज की
2017—दिल्ली हाईकोर्ट ने मृत्युदंड को उम्रकैद में बदला सुप्रीम कोर्ट ने 23 फरवरी 2012 को मृत्युदंड बरकरार रखते हुए मामले को अत्यंत गंभीर और ‘रेयरेस्ट ऑफ रेयर’ माना था। लेकिन न्यायिक कहानी का अंतिम अध्याय अभी बाकी था।
सोनू सरदार और सूरजपुर : समानता सिर्फ फांसी नहीं-दोनों मामलों को सिर्फ इसलिए जोड़ना पर्याप्त नहीं होगा कि दोनों में मृत्युदंड सुनाया गया,इनके बीच एक बड़ा न्यायिक अंतर भी है।
सोनू सरदार मामला : मृत्युदंड ? हाईकोर्ट ? सुप्रीम कोर्ट ? दया याचिका ? देरी ? उम्रकैद।
सूरजपुर मामलाः मृत्युदंड? अब हाईकोर्ट की पुष्टि का इंतजार।
यानी सूरजपुर का फैसला अभी अंतिम न्यायिक पड़ाव नहीं है,यही वह बिंदु है जो इस खबर को सामान्य ‘तीन को फांसी’ वाली खबर से अलग करता है।
18 साल की दूरी,लेकिन सवाल वही…क्या मृत्युदंड अंतिम मंजिल बनेगा?-बैकुंठपुर के सोनू सरदार मामले में अदालतों से होते हुए मृत्युदंड की सजा आखिरकार उम्रकैद में बदल गई थी,अब सूरजपुर के मामले में तीन दोषियों के लिए मृत्युदंड का फैसला आया है,इसलिए सवाल सिर्फ यह नहीं है कि अदालत ने क्या सजा सुनाई? बड़ा सवाल यह है कि क्या यह मृत्युदंड हाईकोर्ट की कसौटी पर भी कायम रहेगा? क्या मामला आगे सुप्रीम कोर्ट तक जाएगा? क्या बचाव पक्ष दया याचिका या अन्य संवैधानिक उपायों का सहारा लेगा? और सबसे महत्वपूर्ण क्या सूरजपुर का यह मृत्युदंड सोनू सरदार मामले से अलग अंतिम परिणाम तक पहुंचेगा? इन सवालों के जवाब अब आने वाले न्यायिक चरण तय करेंगे।
बैकुंठपुर का फैसला इतिहास बना, सूरजपुर का फैसला नई परीक्षा
सोनू सरदार मामले ने यह दिखाया कि निचली अदालत से सुनाई गई फांसी की सजा भी न्यायिक प्रक्रिया के कई पड़ावों से गुजरती है,सूरजपुर का मामला अब उसी लंबी संवैधानिक और न्यायिक प्रक्रिया की अगली कड़ी बन गया है,एक तरफ 2004 की घटना और 2008 का मृत्युदंड,दूसरी तरफ 2024 की घटना और 2026 का मृत्युदंड,बीच में करीब दो दशक का अंतर,लेकिन दोनों मामलों के बीच सबसे बड़ा संदेश यही है फांसी का फैसला अंतिम शब्द नहीं होता,अंतिम शब्द न्याय की पूरी प्रक्रिया बोलती है, बैकुंठपुर में उस प्रक्रिया ने मृत्युदंड को उम्रकैद में बदल दिया था,अब सूरजपुर में वही प्रक्रिया किस मुकाम तक पहुंचती है, इस पर पूरे संभाग की निगाह रहेगी।
फांसी की सजा मिली…लेकिन फांसी नहीं हुई…
सोनू सरदार की दया याचिका पर राज्यपाल और राष्ट्रपति के स्तर पर निर्णय होने के बाद भी मृत्युदंड का क्रियान्वयन नहीं हुआ,बाद में दया याचिका के निपटारे में हुई देरी को आधार बनाकर मामला दिल्ली हाईकोर्ट पहुंचा,28 जून 2017 को दिल्ली हाईकोर्ट ने मृत्युदंड को उम्रकैद में बदल दिया,अदालत ने दया याचिका के निपटारे में हुई देरी और उससे उत्पन्न मानसिक पीड़ा को महत्वपूर्ण आधार माना,यानी बैकुंठपुर का वह मामला एक ऐसी मिसाल बन गया जिसमें निचली अदालत ने फांसी दी,हाईकोर्ट ने कायम रखी,सुप्रीम कोर्ट ने भी कायम रखी,लेकिन अंततः हाईकोर्ट ने फांसी को उम्रकैद में बदल दिया।
अब सूरजपुर में फिर तीन फांसी
समय बदला, जिला बदले,लेकिन मृत्युदंड का सवाल फिर सामने खड़ा है,13 अक्टूबर 2024 के सूरजपुर दोहरे हत्याकांड में प्रधान आरक्षक के परिवार की हत्या ने पूरे क्षेत्र को झकझोर दिया था,करीब दो वर्ष चली न्यायिक प्रक्रिया के बाद 28 सितंबर 2026 को अदालत ने चार आरोपियों को दोषी माना,और फिर आया 8 अक्टूबर 2026, फास्ट ट्रैक कोर्ट के न्यायाधीश आनंद प्रकाश वारियाल ने कुलदीप साहू को मृत्युदंड, फूल सिंह उर्फ रिंकू सिंह को मृत्युदंड, चंद्रकांत चौधरी को मृत्युदंड,आर्यन विश्वकर्मा उर्फ गोल्डी को मृत्यु पर्यंत कारावास की सजा सुनाई,अदालत के उपलब्ध आदेश में तीनों मृत्युदंड के मामलों में यह भी स्पष्ट किया गया है कि सजा छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट की पुष्टि तक लागू नहीं की जा सकती।
घटती-घटना – Ghatati-Ghatna – Online Hindi News Ambikapur घटती-घटना – Ghatati-Ghatna – Online Hindi News Ambikapur