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सूरजपुर/ सोनपुर@ प्राधिकृत अधिकारी श्यामलाल सिंह की अनुपस्थिति और बार-बार नई पंजी संधारित किए जाने पर सदस्यों ने उठाए सवाल

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30 सितंबर की वार्षिक साधारण आमसभा में किसानों ने मांगी पुरानी कार्यवाही पंजी
विवादित कर्मचारी की नियुक्ति से लेकर बर्खास्तगी अवधि के वेतन भुगतान तक मांगा पूरा रिकॉर्ड—जानकारी नहीं मिलने पर आमसभा की कार्यवाही स्थगित करने का दावा
-ओंकार पाण्डेय-
सूरजपुर/ सोनपुर,02 अक्टूबर 2026 (घटती-घटना)।
आदिम जाति सेवा सहकारी समिति मर्यादित सोनपुर,पंजीयन क्रमांक 580 में 30 सितंबर को आयोजित वार्षिक साधारण आमसभा उस समय सवालों के घेरे में आ गई,जब बैठक में मौजूद कृषकों और सदस्यों ने संस्था की कार्यवाही पंजी उपलब्ध कराने की मांग उठाते हुए समिति के कामकाज से जुड़े पुराने निर्णयों और हाल में की गई कार्यवाहियों पर जानकारी मांगी, उपलब्ध जानकारी के अनुसार सदस्यों ने विशेष रूप से इस बात पर आपत्ति जताई कि संस्था की बैठक कार्यवाही पंजी बार-बार नई क्यों संधारित की गई और इन्हीं बैठकों में कार्यवाहक सचिव नियुक्त कर विवादित कर्मचारियों को दोबारा कार्य पर रखने तथा बाद में भुगतान किए जाने का आधार क्या था। बताया गया है कि सदस्यों के सवालों का अपेक्षित रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं होने और प्राधिकृत अधिकारी श्यामलाल सिंह,जो भैयाथान शाखा के शाखा प्रबंधक हैं, की अनुपस्थिति को लेकर भी आपत्ति जताई गई, इसके बाद आमसभा में उपस्थित सदस्यों ने बैठक का विरोध किया और 30 सितंबर की आमसभा की कार्यवाही स्थगित कर दी गई,यह घटनाक्रम ऐसे समय सामने आया है जब सोनपुर समिति में कार्यवाही पंजी,कर्मचारी की पुनर्नियुक्ति और वेतन भुगतान को लेकर पहले से सवाल उठते रहे हैं,हालांकि इन सभी आरोपों की अंतिम पुष्टि संबंधित मूल अभिलेखों और सक्षम विभागीय जांच से ही हो सकती है।
आमसभा में पहला सवाल—पुरानी कार्यवाही पंजी आखिर कहां है?- सहकारी संस्था की आमसभा में जब सदस्यों ने संस्था की बैठक कार्यवाही पंजी उपलब्ध कराने की मांग की तो मामला सीधे उस रिकॉर्ड तक पहुंच गया,जिसे संस्था के निर्णयों का महत्वपूर्ण दस्तावेज माना जाता है,सदस्यों का सवाल था कि यदि पूर्व में संस्था की बैठकें हुई हैं तो उनकी मूल कार्यवाही पंजी कहां है? हाल की बैठकों में नई कार्यवाही पंजी क्यों संधारित की गई? किसके आदेश से नई पंजी खोली गई? क्या पुरानी पंजी उपलब्ध थी? यदि उपलब्ध थी तो नई पंजी की जरूरत क्यों पड़ी? और यदि पुरानी पंजी उपलब्ध नहीं थी तो वह कहां गई? यही सवाल आमसभा में उठाए जाने की बात सामने आ रही है।
एक दिन के कार्यवाहक सचिव से लेकर भुगतान तक—किसके आदेश पर हुआ सब कुछ?- इस मामले में पहले उठ चुके सवालों को आमसभा ने फिर सामने ला दिया,आरोप है कि संस्था की बैठक कार्यवाही के लिए बार-बार नई पंजी संधारित की गई और एक दिन के लिए कार्यवाहक सचिव/प्रबंधक की व्यवस्था की गई,इसके बाद बर्खास्त अथवा सेवा से पृथक रहे कर्मचारियों को दोबारा कार्य पर रखने तथा उनके पूर्व की अवधि के भुगतान संबंधी निर्णय लिए गए,अब आमसभा में सदस्यों ने कथित रूप से यह जानना चाहा कि कार्यवाहक सचिव को किस आदेश से नियुक्त किया गया? उसे कितने अधिकार दिए गए? नई कार्यवाही पंजी किसके आदेश से तैयार हुई? बर्खास्त कर्मचारी को किसके आदेश पर पुनः कार्य पर लिया गया? और यदि कर्मचारी संस्था में कार्यरत नहीं था तो उसकी अनुपस्थिति अथवा सेवा से पृथक रहने की अवधि का भुगतान किस नियम के तहत किया गया? ये सवाल इसलिए महत्वपूर्ण हैं क्योंकि समिति के खाते से होने वाला प्रत्येक भुगतान दस्तावेजी आधार पर होना चाहिए।
30 सितंबर की आमसभा ने पुराने सवालों को फिर जिंदा कर दिया- 30 सितंबर की वार्षिक साधारण आमसभा में किसानों और सदस्यों ने जिस मुद्दे को प्रमुखता से उठाया,वह केवल किसी एक कर्मचारी का मामला नहीं था, सदस्यों ने कथित तौर पर संस्था की पूरी निर्णय प्रक्रिया और रिकॉर्ड प्रबंधन पर सवाल उठाया,मांग की गई कि कार्यवाही पंजी उपलब्ध कराई जाए और बताया जाए कि नई पंजी क्यों बनाई गई,साथ ही यह भी पूछा गया कि नई पंजी में कार्यवाहक सचिव की नियुक्ति कर किस आधार पर बर्खास्त अथवा सेवा से पृथक कर्मचारियों को वापस कार्य पर रखा गया,फिर उसी तरह नई पंजी संधारित कर किस आदेश के आधार पर कर्मचारियों को भुगतान किया गया? यदि भुगतान किया गया तो क्या उच्च कार्यालय की अनुमति ली गई? यदि अनुमति ली गई तो आदेश कहां है? और यदि अनुमति नहीं ली गई तो भुगतान का आधार क्या था?
आमसभा में जानकारी नहीं मिली तो बैठक ही स्थगित—सहकारिता के लिए बड़ा सवाल- आमसभा संस्था के सदस्यों के लिए वह मंच होती है जहां संस्था के कामकाज, वित्तीय स्थिति और महत्वपूर्ण निर्णयों पर सवाल पूछे जा सकते हैं,ऐसे में यदि बैठक में ही सदस्य कार्यवाही पंजी और वित्तीय निर्णयों से संबंधित रिकॉर्ड मांगें और जानकारी उपलब्ध नहीं हो पाए,तो यह सामान्य स्थिति नहीं कही जा सकती,उपलब्ध जानकारी के अनुसार इसी कारण उपस्थित सदस्यों ने बैठक का विरोध किया और आमसभा की कार्यवाही स्थगित कर दी,अब अगली बैठक में सबसे पहले यही स्पष्ट करना होगा कि जिन दस्तावेजों की मांग की गई थी,वे कहां हैं।
सवाल सिर्फ सोनपुर के नहीं, सहकारिता की जवाबदेही के हैं-सोनपुर समिति का मामला अब केवल एक कर्मचारी की नियुक्ति या वेतन भुगतान तक सीमित नहीं रह गया है,यह सवाल बन गया है कि संस्था में निर्णय कैसे लिए जा रहे हैं? रिकॉर्ड कैसे रखा जा रहा है? कार्यवाही पंजी कितनी हैं? किस पंजी को मूल माना जा रहा है? कार्यवाहक सचिव की नियुक्ति किस अधिकार से होती है? वित्तीय भुगतान से पहले कौन-सा परीक्षण किया जाता है? और आमसभा में सदस्यों को संस्था के महत्वपूर्ण वित्तीय निर्णयों की जानकारी किस तरह दी जाती है? यदि इन सवालों का रिकॉर्ड के आधार पर जवाब मिल जाता है तो विवाद का बड़ा हिस्सा समाप्त हो सकता है।
शिवप्रसादनगर के बाद सोनपुर—क्या दोनों मामलों की वित्तीय प्रक्रिया भी जांचेगी व्यवस्था?-शिवप्रसादनगर समिति के बचत खाते से बड़े पैमाने पर भुगतान को लेकर पहले से सवाल उठते रहे हैं,अब सोनपुर समिति में भी भुगतान और कार्यवाही पंजी को लेकर सवाल सामने आए हैं,ऐसे में यह जरूरी होगा कि दोनों मामलों को एक-दूसरे से जोड़कर आरोप लगाने के बजाय अलग-अलग दस्तावेजी जांच की जाए,सोनपुर के लिए देखा जाए कि किस तारीख को कितना भुगतान हुआ, किस कर्मचारी को कितना भुगतान हुआ,किस अवधि का भुगतान हुआ,किस प्रस्ताव के आधार पर हुआ,किसने भुगतान स्वीकृत किया, किसने चेक जारी किया,और क्या उच्च कार्यालय की अनुमति आवश्यक थी,यदि प्रत्येक भुगतान के पीछे वैध दस्तावेज मौजूद हैं तो स्थिति स्पष्ट हो जाएगी।
अब ‘नई पंजी’ ही सबसे बड़ा दस्तावेजी सवाल- पूरे मामले में सबसे ज्यादा चर्चा यदि किसी चीज की है तो वह है—बार-बार नई कार्यवाही पंजी का संधारण,एक संस्था में बैठक की कार्यवाही का रिकॉर्ड व्यवस्थित और क्रमबद्ध होना चाहिए,ऐसे में यदि अलग-अलग महत्वपूर्ण बैठकों के लिए नई पंजी सामने आती है तो उसका औचित्य स्पष्ट होना चाहिए, क्यों नई पंजी? किस आदेश से? किस तारीख से? कितने पन्ने? किसने प्रमाणित की? पुरानी पंजी में अंतिम कार्यवाही क्या थी? नई पंजी में पहली कार्यवाही क्या है? दोनों के बीच क्रम कहां जुड़ता है? ये छोटे सवाल नहीं हैं क्योंकि भविष्य में किसी विवाद या जांच में यही पंजी संस्था के निर्णयों का प्राथमिक रिकॉर्ड बन सकती है।
अब किसानों की मांग— ‘पहले पंजी दिखाओ, फिर आमसभा करो ‘– 30 सितंबर की घटना से एक बात स्पष्ट दिखाई देती है कि सदस्य अब केवल मौखिक जवाब से संतुष्ट होने के बजाय दस्तावेज देखना चाहते हैं,और यही किसी भी सहकारी संस्था के लिए स्वस्थ प्रक्रिया है,यदि समिति का रिकॉर्ड सही है तो उसे सामने आने देना चाहिए, यदि भुगतान सही हैं तो उनका विवरण सदस्यों को दिया जाना चाहिए,यदि कर्मचारी की नियुक्ति वैध है तो नियुक्ति दस्तावेज प्रस्तुत होने चाहिए, यदि पुनर्नियुक्ति वैध है तो उसका आदेश सामने आना चाहिए,यदि वेतन भुगतान नियमसम्मत है तो संबंधित स्वीकृति और गणना बताई जानी चाहिए,दस्तावेज सामने आएंगे तो आरोप और तथ्य अलग-अलग हो जाएंगे।
अब विभाग के सामने पांच बड़े सवाल
पहला-सोनपुर समिति की 30 सितंबर की वार्षिक साधारण आमसभा किस कारण स्थगित हुई और अगली बैठक कब होगी?
दूसरा-संस्था की मूल कार्यवाही पंजी कितनी हैं और बार-बार नई पंजी संधारित करने का आधार क्या था?
तीसरा-विवादित कर्मचारी की मूल नियुक्ति, पुनः नियुक्ति और वेतन भुगतान से जुड़े सभी दस्तावेजों का परीक्षण किस अधिकारी ने किया?
चौथा-16 सितंबर को श्यामलाल सिंह के त्यागपत्र की वर्तमान स्थिति क्या है और उसके बाद उनके द्वारा किए गए पत्राचार अथवा भुगतान संबंधी कार्यवाही किस अधिकार के तहत हुई?
पांचवां-समिति के बचत खाते से कर्मचारियों को किए गए भुगतान का स्वतंत्र वित्तीय परीक्षण कब होगा?
सोनपुर की आमसभा ने फिलहाल बैठक रोकी है, सवाल नहीं-30 सितंबर की आमसभा भले ही स्थगित हो गई हो, लेकिन इससे सवाल खत्म नहीं हुए हैं, बल्कि अब सवाल और स्पष्ट हो गए हैं, पंजी कहां है? नई पंजी क्यों बनी? कार्यवाहक सचिव क्यों नियुक्त हुआ? विवादित कर्मचारी को किस आदेश से वापस रखा गया? बर्खास्तगी अथवा अनुपस्थिति अवधि का भुगतान किस आधार पर हुआ? उच्च कार्यालय की अनुमति ली गई या नहीं? 16 सितंबर के त्यागपत्र के बाद श्यामलाल सिंह की अधिकारिक स्थिति क्या थी? और सबसे बड़ा सवाल— ‘जब संस्था की वार्षिक आमसभा में ही सदस्य रिकॉर्ड मांग रहे हैं और रिकॉर्ड के अभाव में बैठक स्थगित करनी पड़ रही है, तो आखिर सहकारिता में पारदर्शिता का हिसाब कौन देगा? सोनपुर में अब अगली आमसभा सिर्फ बैठक नहीं होगी—वह कार्यवाही पंजी, नियुक्ति प्रक्रिया और भुगतान के पूरे हिसाब की परीक्षा होगी।
पहले नई पंजी, फिर कार्यवाहक सचिव, फिर कर्मचारी की वापसी-सदस्यों ने मांगा पूरा हिसाब
सोनपुर समिति में पहले से विवादित रहे कर्मचारी की पुनः नियुक्ति को लेकर भी आमसभा में सवाल उठाए गए, सदस्यों की मांग बताई जा रही है कि यह स्पष्ट किया जाए कि कर्मचारी की मूल नियुक्ति कब और किस प्रक्रिया के तहत हुई थी? क्या पद स्वीकृत था? क्या नियुक्ति के लिए विज्ञापन जारी किया गया था? क्या आवेदन मंगाए गए थे? क्या चयन प्रक्रिया हुई थी? क्या नियुक्ति आदेश जारी हुआ था? क्या बोर्ड की अनुमति थी? और सबसे महत्वपूर्ण—कर्मचारी को दोबारा कार्य पर रखने से पहले उसकी मूल नियुक्ति से जुड़े सभी दस्तावेजों का परीक्षण किया गया था या नहीं? यदि दस्तावेजों की जांच की गई थी तो उन्हें आमसभा के सामने रखने में समस्या नहीं होनी चाहिए, यदि जांच नहीं हुई थी तो फिर विवादित नियुक्ति को आधार बनाकर दोबारा कार्य पर रखने का निर्णय किस आधार पर हुआ, यह सवाल और गंभीर हो जाता है।


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