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बैकुंठपुर@ सामान्य सीट…दावेदार अनेक,‘चेहरा’ अब भी तलाश में!

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  • बैकुंठपुर की सामान्य सीट पर सियासी शतरंज,पुराने चेहरों से ज्यादा नए नामों पर नजर…
  • 20 साल बाद सामान्य वर्ग के पुरुष दावेदारों के लिए खुला मौका,कांग्रेस-भाजपा में पुराने चेहरों के साथ नए नामों पर मंथन
  • कांग्रेस में बड़े चेहरों की दूरी,आशीष यादव-राजीव गुप्ता के नाम चर्चा में…भाजपा में प्रशांत गुप्ता,कमलेश शर्मा और अमित श्रीवास्तव पर नजर
  • वार्ड आरक्षण के बाद बदले स्थानीय समीकरण,टिकट के लिए अंदरूनी कवायद तेज…निर्दलीय मैदान में उतरने की चर्चाओं ने बढ़ाई बेचैनी
  • सामान्य मुक्त सीट ने खोल दिए दावेदारी के रास्ते,अब भाजपा-कांग्रेस के सामने चेहरे पर सहमति बनाने की चुनौती
  • 20 साल बाद सामान्य सीट ने खोले सियासी दरवाजे,दावेदारों की कतार लंबी…लेकिन भाजपा-कांग्रेस को अब भी ‘सर्वमान्य चेहरा’ तलाश


-रवि सिंह-
बैकुंठपुर,30 सितम्बर 2026 (घटती-घटना)।
नगर पालिका परिषद बैकुंठपुर के आगामी चुनाव ने शहर की राजनीतिक फिजा को धीरे-धीरे गर्म करना शुरू कर दिया है,वार्ड आरक्षण की प्रक्रिया पूरी होने और अध्यक्ष पद के लिए सामान्य अनारक्षित मुक्त स्थिति सामने आने के बाद अब राजनीतिक दलों के भीतर संभावित चेहरों को लेकर मंथन तेज हो गया है,सामान्य सीट ने अध्यक्ष पद के लिए दावेदारी का दायरा जरूर बढ़ा दिया है,लेकिन इसके साथ ही भाजपा और कांग्रेस दोनों के सामने सबसे बड़ा सवाल यह खड़ा हो गया है कि आखिर ऐसा कौन-सा चेहरा मैदान में उतारा जाए,जिसे केवल पार्टी संगठन का समर्थन ही नहीं,बल्कि शहर के अलग-अलग वर्गों में भी व्यापक स्वीकार्यता मिल सके।
बैकुंठपुर की राजनीति में इस समय सबसे अधिक चर्चा दावेदारों की संख्या की नहीं, बल्कि ‘सर्वमान्य चेहरे’ की हो रही है,पुराने राजनीतिक चेहरों के साथ नए नाम भी सामने आ रहे हैं,कोई संगठन के सहारे अपनी दावेदारी मजबूत करने में जुटा है तो कोई सामाजिक और व्यक्तिगत संपर्क को आधार बना रहा है। कुछ नामों को लेकर समर्थकों की सक्रियता दिखाई दे रही है,तो कुछ संभावित दावेदार अभी पार्टी के निर्णय का इंतजार करते नजर आ रहे हैं,हालांकि अभी किसी भी दल ने अध्यक्ष पद के प्रत्याशी की अधिकृत घोषणा नहीं की है। इसलिए सामने आ रहे नामों को फिलहाल स्थानीय राजनीतिक चर्चाओं और संभावित दावेदारियों के रूप में ही देखा जाना चाहिए।
सामान्य सीट ने खोले दावेदारी के कई रास्ते-अध्यक्ष पद सामान्य अनारक्षित मुक्त होने के बाद इस बार किसी विशेष आरक्षित वर्ग तक दावेदारी सीमित नहीं है,यही वजह है कि लंबे समय से स्थानीय राजनीति में सक्रिय सामान्य वर्ग के पुरुष नेताओं के लिए यह चुनाव खास महत्व रखता है, वहीं ओबीसी वर्ग से भी संभावित दावेदार अपनी राजनीतिक जमीन तलाश रहे हैं,सामान्य सीट होने से राजनीतिक दलों के सामने विकल्प बढ़े हैं, लेकिन विकल्प बढ़ना अपने आप में समाधान नहीं है,असली चुनौती यह है कि पार्टी किस नाम पर सहमति बनाएगी,नगर पालिका चुनाव में प्रत्याशी का व्यक्तिगत जनसंपर्क,शहर के अलग-अलग हिस्सों में उसकी पहुंच, वार्ड स्तर की समस्याओं की समझ और संगठन के साथ तालमेल जैसे विषय सीधे चुनावी चर्चा का हिस्सा बनते हैं,यही वजह है कि इस बार टिकट चयन केवल पार्टी के भीतर किसी एक गुट की पसंद का विषय नहीं रह सकता,संभावित दावेदारों के समर्थक अपने-अपने स्तर पर माहौल बनाने में जुट सकते हैं,जबकि पार्टी नेतृत्व को सभी समीकरणों को संतुलित करना होगा।
कांग्रेस में बड़े चेहरों की दूरी से बदला समीकरण-विपक्षी कांग्रेस के सामने अध्यक्ष पद का चेहरा तय करने की चुनौती कम नहीं है, सामान्य वर्ग से आने वाले कई चर्चित नामों को लेकर चर्चा तो है,लेकिन सभी चेहरे चुनावी मैदान में उतरने की स्थिति में दिखाई नहीं दे रहे हैं,कांग्रेस जिलाध्यक्ष प्रदीप गुप्ता सामान्य वर्ग के प्रमुख राजनीतिक चेहरों में शामिल हैं,लेकिन आपके द्वारा दी गई स्थानीय राजनीतिक जानकारी के अनुसार वे अपने पिछले राज नीतिक रिकॉर्ड के कारण फिलहाल चुनावी दौड़ से दूर बताए जा रहे हैं,इसी तरह अजय सिंह, बृजवासी तिवारी,आशीष डाबरे और दीपक गुप्ता जैसे सामान्य वर्ग के कई नाम राजनीतिक हलकों में जाने-पहचाने हैं,लेकिन फिलहाल इन्हें अध्यक्ष पद की टिकट दौड़ में सक्रिय दावेदार के रूप में नहीं देखा जा रहा है,इसका परिणाम यह है कि कांग्रेस के सामने सामान्य सीट होने के बावजूद संभावित चेहरों की तस्वीर उतनी सीधी नहीं है,पार्टी के पास नाम हैं,लेकिन उनमें से कौन वास्तव में चुनाव लड़ना चाहता है और किस नाम को संगठन स्वीकार करता है,यह अभी खुला सवाल है।
आशीष यादव ‘लल्ला’ की दावेदारी, गुटीय समीकरण सबसे बड़ी चुनौती– ओबीसी वर्ग से आने वाले आशीष यादव ‘लल्ला’ कांग्रेस के भीतर अध्यक्ष पद की दावेदारी को लेकर सक्रिय बताए जा रहे हैं, नगर पालिका के वर्तमान उपाध्यक्ष होने के कारण उनके पास नगर पालिका की राजनीति का प्रत्यक्ष अनुभव भी है और इसी आधार पर उनकी दावेदारी को स्थानीय राजनीतिक चर्चाओं में स्थान मिल रहा है,लेकिन उनके सामने चुनौती भी कम नहीं है। स्थानीय राज नीतिक चर्चाओं में कांग्रेस के भीतर गुटीय समीकरणों को उनकी दावेदारी के रास्ते में एक महत्वपूर्ण कारक माना जा रहा है। यह चर्चा भी है कि बड़े नेताओं का समर्थन उन्हें किस स्तर तक मिलता है,यह टिकट चयन में अहम भूमिका निभा सकता है,हालांकि यह केवल राजनीतिक चर्चा है और पार्टी के अधिकृत निर्णय के बिना किसी भी दावेदारी को अंतिम नहीं माना जा सकता,फिर भी यह स्पष्ट है कि सामान्य मुक्त सीट ने आशीष यादव लल्ला जैसे ओबीसी वर्ग के दावेदार के लिए भी अध्यक्ष पद की दौड़ में बने रहने का रास्ता खुला रखा है।
राजीव गुप्ता के नाम की भी सुनाई देने लगी चर्चा-कांग्रेस के संभावित चेहरों के बीच राजीव गुप्ता के नाम की चर्चा अब सुनाई देने लगी है,सामान्य वर्ग से आने वाले राजीव गुप्ता का नाम सामने आने से कांग्रेस की संभावित दावेदारी के समीकरण और व्यापक हो गए हैं, फिलहाल उनके नाम को लेकर भी कोई आधिकारिक निर्णय सामने नहीं आया है,लेकिन सामान्य सीट के बाद नए चेहरों का सामने आना यह संकेत जरूर देता है कि कांग्रेस के भीतर अध्यक्ष पद के लिए विकल्पों पर विचार का दौर चल रहा है,राजीव गुप्ता के नाम की चर्चा के साथ कांग्रेस में यह सवाल भी महत्वपूर्ण होगा कि पार्टी पुराने राजनीतिक समीकरणों पर भरोसा करती है या नए चेहरे को मौका देकर अलग संदेश देने की कोशिश करती है।
आफताब अहमद की निर्दलीय राह की चर्चा-कांग्रेस से निष्कासन के बाद आफताब अहमद का नाम अध्यक्ष पद की चर्चा में अलग कारण से सामने आ रहा है,स्थानीय राजनीतिक चर्चा के अनुसार वे पार्टी से अलग होने के बाद निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में चुनाव मैदान में उतरने की इच्छा रखते हैं,यदि वे निर्दलीय चुनाव लड़ते हैं तो कांग्रेस के लिए यह अलग तरह की राजनीतिक चुनौती बन सकती है,हालांकि अभी यह केवल संभावित राजनीतिक स्थिति है और अंतिम निर्णय आफताब अहमद को ही लेना होगा,नगर पालिका चुनाव में निर्दलीय प्रत्याशी का असर केवल पार्टी के वोट समीकरण तक सीमित नहीं होता,स्थानीय पहचान रखने वाला उम्मीदवार अपने व्यक्तिगत संपर्क के आधार पर अलग राजनीतिक आधार बनाने का प्रयास कर सकता है, इसलिए कांग्रेस के लिए टिकट वितरण के साथ-साथ संभावित असंतुष्टों को साथ रखने की रणनीति भी महत्वपूर्ण होगी।
भाजपा के सामने भी टिकट को लेकर असमंजस-सत्तारूढ़ भाजपा के सामने भी अध्यक्ष पद के टिकट को लेकर स्थिति अभी साफ नहीं है,सामान्य सीट होने के कारण भाजपा में भी कई नाम चर्चा में हैं और प्रत्येक नाम अपने-अपने राजनीतिक समीकरण के साथ सामने आ रहा है,जिला महामंत्री पंकज गुप्ता का नाम संगठन में महत्वपूर्ण होने के बावजूद फिलहाल चुनावी मैदान से दूर बताया जा रहा है,इसके बाद सामान्य वर्ग से मनोज गुप्ता और शारदा गुप्ता के नाम टिकट की कोशिशों को लेकर चर्चा में हैं,हालांकि स्थानीय राजनीतिक चर्चाओं में इन नामों की स्वीकार्यता को लेकर अलग-अलग राय सामने आ रही है, किसी भी प्रत्याशी की वास्तविक स्वीकार्यता का निष्कर्ष व्यापक जनमत या सर्वेक्षण के बिना निकालना उचित नहीं होगा,भाजपा के सामने भी वही चुनौती है—किस चेहरे को टिकट दिया जाए और टिकट के बाद संगठन को किस तरह एकजुट रखा जाए।
ओबीसी से भानु पाल मैदान में, शैलेश शिवहरे ने बनाई दूरी-भाजपा की संभावित दावेदारी में ओबीसी वर्ग से शैलेश शिवहरे का नाम पहले चर्चा में रहा है,लेकिन उपलब्ध जानकारी के अनुसार वे काफी पहले ही नगर पालिका चुनाव लड़ने से मना कर चुके हैं,वहीं भानु पाल चुनावी मैदान में सक्रिय बताए जा रहे हैं,इसका मतलब यह है कि भाजपा के भीतर भी सामान्य वर्ग के साथ ओबीसी वर्ग से संभावित चेहरे को लेकर विकल्प मौजूद हैं, अंतिम फैसला संगठन के स्तर पर ही होगा, इसलिए वर्तमान समय में किसी भी नाम को टिकट का दावेदार मानना राजनीतिक चर्चा से आगे की बात होगी।
पुराने चेहरों के सामने जनसंपर्क की कसौटी-बैकुंठपुर के नगर पालिका चुनाव में पुराने राजनीतिक चेहरों की चर्चा के साथ उनके जनसंपर्क और जनता के बीच सक्रियता का मुद्दा भी उठ रहा है,नगर पालिका चुनाव की प्रकृति ही ऐसी है कि मतदाता का प्रत्याशी से सीधा संपर्क महत्वपूर्ण होता है, विधानसभा या लोकसभा चुनावों की तुलना में नगर पालिका के मुद्दे बेहद स्थानीय होते हैं, सड़क,नाली,सफाई,पेयजल,स्ट्रीटलाइट, यातायात,विकास कार्य और वार्ड की छोटी-बड़ी समस्याएं सीधे मतदाता के सामने होती हैं,इसलिए राजनीतिक चर्चाओं में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि कौन-सा दावेदार नियमित रूप से जनता के बीच रहा और कौन केवल चुनाव के समय सक्रिय दिखाई देता है, लेकिन किसी नेता की स्वीकार्यता अथवा जनता से दूरी के बारे में अंतिम निष्कर्ष व्यापक सर्वेक्षण के बिना नहीं निकाला जा सकता।
वार्ड आरक्षण ने भी बदल दिए स्थानीय समीकरण-अध्यक्ष पद के साथ-साथ बैकुंठपुर नगर पालिका के 20 वार्डों का आरक्षण भी तय हो चुका है। इससे पार्षद पद के संभावित प्रत्याशियों के सामने स्थिति पहले से स्पष्ट हो गई है,किस वार्ड में सामान्य, ओबीसी,एससी,एसटी या महिला आरक्षण है, इसके आधार पर अब पार्टियों को वार्डवार उम्मीदवारों की रणनीति बनानी होगी,जिन नेताओं ने अपने पुराने वार्ड से चुनाव लड़ने की तैयारी की थी, नमें से कुछ के लिए आरक्षण अनुकूल हो सकता है,जबकि कुछ को दूसरे राजनीतिक विकल्प तलाशने पड़ सकते हैं, वार्ड आरक्षण का असर अध्यक्ष पद के समीकरण पर भी अप्रत्यक्ष रूप से पड़ेगा, क्योंकि अध्यक्ष पद की राजनीति और पार्षद पद की राजनीति नगर पालिका चुनाव में एक-दूसरे से पूरी तरह अलग नहीं रहती।
सामान्य सीट ने बढ़ाया मुकाबले का दायरा-इस बार सामान्य मुक्त सीट होने के कारण अध्यक्ष पद की दावेदारी अब केवल किसी एक सामाजिक समीकरण तक सीमित नहीं है,सामान्य वर्ग के पुराने राजनीतिक चेहरों से लेकर नए सामाजिक और संगठनात्मक चेहरों तक कई नाम सामने आ रहे हैं, कांग्रेस में जहां बड़े चेहरों की दूरी के बीच नए समीकरण तलाशे जा रहे हैं,वहीं भाजपा में कई सामान्य वर्ग के संभावित दावेदारों के बीच संगठन के निर्णय का इंतजार है, दोनों दलों के सामने एक समान चुनौती है—किसे टिकट दिया जाए और टिकट के बाद पार्टी को एकजुट कैसे रखा जाए।
दिसंबर के प्रस्तावित चुनाव से पहले चौक-चौराहों पर चुनावी चर्चा-नगर पालिका चुनाव दिसंबर 2026 में प्रस्तावित बताए जा रहे हैं,चुनाव का अंतिम कार्यक्रम और दोनों दलों की अधिकृत प्रत्याशी सूची अभी सामने नहीं आई है,इसके बावजूद शहर में चुनावी चर्चा शुरू हो चुकी है,चौक-चौराहों से लेकर राजनीतिक बैठकों तक संभावित अध्यक्षों और पार्षद प्रत्याशियों के नामों पर चर्चा हो रही है,हर राजनीतिक समूह अपने हिसाब से संभावित चेहरे तलाश रहा है,आने वाले समय में जैसे-जैसे पार्टी के भीतर टिकट को लेकर बैठकें और चर्चाएं आगे बढ़ेंगी,वैसे-वैसे कुछ नाम मजबूत चर्चा में आएंगे और कुछ नाम पीछे हटेंगे।
अब असली सवाल…दावेदार कितने नहीं,चेहरा कौन?-बैकुंठपुर नगर पालिका चुनाव में फिलहाल सबसे बड़ा सवाल यह नहीं है कि अध्यक्ष पद के कितने दावेदार हैं,सवाल यह है कि भाजपा और कांग्रेस अंतिम दौर में किस चेहरे पर भरोसा जताती हैं,कांग्रेस के सामने प्रदीप गुप्ता,अजय सिंह,बृजवासी तिवारी, आशीष डाबरे और दीपक गुप्ता जैसे सामान्य वर्ग के बड़े नामों के चुनावी मैदान से दूर रहने की चर्चा है,आशीष यादव लल्ला ओबीसी वर्ग से दावेदारी कर रहे हैं,राजीव गुप्ता के नाम की चर्चा शुरू हुई है,वहीं कांग्रेस से निष्कासन के बाद आफताब अहमद के निर्दलीय मैदान में उतरने की संभावित चर्चा भी अलग राजनीतिक समीकरण बना सकती है,भाजपा में पंकज गुप्ता के चुनाव से दूर बताए जाने के बीच मनोज गुप्ता,शारदा गुप्ता,सीए प्रशांत गुप्ता,कमलेश शर्मा और अमित श्रीवास्तव जैसे नाम चर्चा में हैं,ओबीसी वर्ग से भानु पाल की सक्रियता बताई जा रही है,जबकि शैलेश शिवहरे पहले ही चुनाव से दूरी की बात कह चुके हैं,इन तमाम नामों के बीच अभी किसी को आधिकारिक प्रत्याशी मानना जल्दबाजी होगी,सामान्य सीट ने दावेदारों की कतार जरूर लंबी कर दी है, लेकिन टिकट की अंतिम दौड़ में कौन टिकेगा, यह आने वाले दिनों में साफ होगा,और यही बैकुंठपुर नगर पालिका चुनाव की सबसे दिलचस्प राजनीतिक तस्वीर है…एक सामान्य सीट,कई संभावित चेहरे,बदलते वार्ड समीकरण और दोनों प्रमुख दलों के सामने एक ही चुनौती—ऐसा चेहरा चुनना,जिसे संगठन के साथ शहर भी स्वीकार कर सके।
कांग्रेसः-आशीष यादव ‘लल्ला’। राजीव गुप्ता। प्रदीप गुप्ता। अजय सिंह । बृजवासी तिवारी। आशीष डाबरे। दीपक गुप्ता। आफताब अहमद (संभावित निर्दलीय)
भाजपाः- प्रशांत गुप्ता। मनोज गुप्ता। शारदा गुप्ता। कमलेश शर्मा । अमित श्रीवास्तव। भानु पाल। शैलेश शिवहरे (चुनाव से दूरी की चर्चा) सबसे अहम राजनीतिक सवाल- दावेदारों की लंबी सूची के बीच दोनों दलों के सामने चुनौती केवल टिकट देने की नहीं, बल्कि ऐसे चेहरे पर सहमति बनाने की है जिसके साथ संगठन और स्थानीय कार्यकर्ताओं को एकजुट किया जा सके।
20 साल बाद सामान्य वर्ग के पुरुषों के लिए अवसर की चर्चा
बैकुंठपुर नगर पालिका अध्यक्ष पद के सामान्य अनारक्षित मुक्त होने के बाद सबसे ज्यादा चर्चा इस बात की है कि सामान्य वर्ग के पुरुष दावेदारों के लिए यह अवसर कितना महत्वपूर्ण है,स्थानीय जानकारों के बीच नगर पालिका आरक्षण के चक्रीय क्रम को लेकर यह चर्चा है कि इस बार सामान्य मुक्त सीट के बाद आगे अलग-अलग वर्गों के लिए आरक्षण का क्रम आएगा, इसी राजनीतिक गणना के आधार पर यह बात भी कही जा रही है कि ऐसी सामान्य मुक्त सीट दोबारा आने में लगभग 20 साल लग सकते हैं और अगला अवसर 2046 के आसपास बन सकता है, यह भविष्य की आरक्षण व्यवस्था को लेकर स्थानीय राजनीतिक गणना है,जिसे अभी अंतिम सरकारी स्थिति के रूप में नहीं देखा जा सकता। लेकिन इसी चर्चा ने वर्तमान चुनाव को सामान्य वर्ग के उन पुरुष नेताओं के लिए महत्वपूर्ण बना दिया है, जो लंबे समय से नगर की राजनीति में सक्रिय हैं और अध्यक्ष पद की दौड़ में उतरने की इच्छा रखते हैं, यानी इस बार की सामान्य सीट केवल एक चुनावी आरक्षण श्रेणी नहीं,बल्कि कई राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं के लिए एक बड़ा अवसर बनकर सामने आई है।
प्रशांत गुप्ता ने शुरू किया चुनावी अभियान
भाजपा के संभावित नए चेहरों में सीए प्रशांत गुप्ता का नाम तेजी से चर्चा में आया है, उपलब्ध जानकारी के अनुसार उन्होंने चुनावी गतिविधियां शुरू कर दी हैं,सामान्य सीट होने के बाद ऐसे नए चेहरों के लिए राजनीतिक अवसर बढ़े हैं। प्रशांत गुप्ता की सक्रियता को इसी राजनीतिक पृष्ठभूमि में देखा जा रहा है,हालांकि चुनावी अभियान शुरू करना और पार्टी का आधिकारिक टिकट मिलना दो अलग-अलग बातें हैं,यही वजह है कि अभी भाजपा के भीतर संभावित दावेदारों के नामों को लेकर अंतिम तस्वीर का इंतजार करना होगा।
कमलेश शर्मा और अमित श्रीवास्तव भी संभावित चेहरे
प्रेस क्लब अध्यक्ष कमलेश शर्मा का नाम भी अध्यक्ष पद की संभावित दावेदारी में चर्चा में है, फिलहाल वे पार्टी के निर्णय का इंतजार कर रहे हैं,वहीं अमित श्रीवास्तव भी अपने लिए राजनीतिक संभावना तलाश रहे हैं,दोनों नामों के सामने आने से भाजपा में सामान्य वर्ग से संभावित दावेदारों का दायरा और बढ़ गया है,अब सवाल यह है कि पार्टी संगठन किस नाम को राजनीतिक रूप से अधिक उपयुक्त मानता है। चुनाव में व्यक्तिगत संपर्क,संगठनात्मक सक्रियता, सामाजिक समीकरण और पार्टी के भीतर स्वीकार्यता जैसे कई पहलू टिकट के समय चर्चा में आ सकते हैं।


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