बेमेतरा में सरगुजा के साहित्यकारों ने छोड़ी छाप,श्याम कश्यप ‘बेचैन’ और भोला प्रसाद मिश्र ‘अनाम’ हुए सम्मानित
-संवाददाता-
अंबिकापुर,29 सितम्बर 2026 (घटती-घटना)। ‘माटी के भाखा मा हृदय के स्पंदन बसे रहिथे…’इसी भाव के साथ बेमेतरा में आयोजित छत्तीसगढ़ राजभाषा आयोग के 10वें प्रांतीय सम्मेलन में सरगुजा की साहित्यिक और भाषाई पहचान प्रदेश के मंच पर प्रमुखता से सामने आई। 26 और 27 सितंबर को हुए दो दिवसीय सम्मेलन में प्रदेशभर से 500 से अधिक भाषाविद् और साहित्यकार शामिल हुए। सरगुजिहा, कुड़ुख,सादरी,कोरवा,पंडो,नगेसिया सहित विभिन्न आंचलिक और जनजातीय भाषाओं पर हुए विमर्श ने छत्तीसगढ़ की भाषाई विविधता को एक साथ मंच दिया।
सम्मेलन के उद्घाटन सत्र में सरगुजा के वरिष्ठ साहित्यकार श्याम कश्यप ‘बेचैन’ और भोला प्रसाद मिश्र ‘अनाम’ को मुख्य अतिथि दुर्ग सांसद विजय बघेल ने छत्तीसगढ़ राजभाषा आयोग के अध्यक्ष एवं राज्य मंत्री दर्जा प्राप्त प्रभात मिश्र की उपस्थिति में राज्य स्तरीय साहित्यिक सम्मान से सम्मानित किया। सरगुजा की माटी में रची गई साहित्यिक कृतियों को मिले इस सम्मान को अंचल के साहित्यिक योगदान की महत्वपूर्ण पहचान के रूप में देखा गया। श्याम कश्यप ‘बेचैन’ लंबे समय से कविता, गीत और गजल के क्षेत्र में सक्रिय हैं। देश के विभिन्न साहित्यिक मंचों और कवि सम्मेलनों में उन्होंने अपनी रचनाओं के माध्यम से सरगुजा की पहचान को सामने रखा है। वहीं भोला प्रसाद मिश्र ‘अनाम’ की साहित्यिक कृतियों को भी राज्य स्तरीय सम्मान मिलने से सरगुजा के साहित्यिक योगदान को प्रांतीय मंच पर नई पहचान मिली।
श्रीश मिश्र के व्याख्यान में सामने आई सरगुजिहा की भाषाई पहचान : सम्मेलन के छठवें सत्र में प्रादेशिक बोलियों और आंचलिक अभिव्यक्तियों पर विशेष चर्चा हुई। इसमें सरगुजा से पहुंचे साहित्यकार श्रीश मिश्र ने सरगुजिहा और छत्तीसगढ़ी के बीच भाषाई साम्य और जुड़ाव पर व्याख्यान दिया। उन्होंने सरगुजिहा की शब्द-संपदा, बोलचाल और लोक अभिव्यक्तियों के माध्यम से उत्तर छत्तीसगढ़ की भाषाई पहचान को सामने रखा। इसी सत्र में डॉ. ईशा बेला लकड़ा ने सरगुजा संभाग की प्रमुख जनजातीय भाषा कुड़ुख पर अपना वक्तव्य दिया। चर्चा में कोरवा, पंडो, नगेसिया और सादरी जैसी भाषाओं-बोलियों के संरक्षण और संवर्धन की जरूरत भी सामने आई। बस्तर की भाषाई विविधता को भी मंच मिला। शकुंतला तरार ने हल्बी भाषा में वक्तव्य देकर वहां की सांस्कृतिक परंपरा और भाषाई विरासत को अभिव्यक्ति दी। हल्बी, गोंडी और भतरी सहित विभिन्न जनजातीय भाषाओं की उपस्थिति ने सम्मेलन को व्यापक भाषाई स्वरूप दिया। विलुप्ति की ओर बढ़ रही कमार जनजाति की भाषा के संरक्षण और उत्थान पर भी सम्मेलन में गंभीर चर्चा हुई। इस दौरान आयोग के अध्यक्ष प्रभात मिश्र ने जनजातीय सभ्यता, संस्कृति और भाषाओं के संरक्षण की आवश्यकता पर जोर दिया तथा मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय के नेतृत्व वाली राज्य सरकार की ओर से किए जा रहे प्रयासों का उल्लेख किया।
एआई और डिजिटल माध्यम से सहेजी जाएगी लोकभाषाओं की विरासत : सम्मेलन में यह सवाल भी प्रमुखता से उठा कि तेजी से बदलते डिजिटल दौर में आंचलिक बोलियों और लोकभाषाओं को आने वाली पीढि़यों तक कैसे पहुंचाया जाए। लोककथाओं, पारंपरिक शब्दावली और भाषाई अभिव्यक्तियों के डिजिटल दस्तावेजीकरण पर जोर दिया गया। डॉ. अंकुर शुक्ला (अंकुर विनोद ‘खावर’) द्वारा प्रस्तुत एआईआधारित ‘छत्तीसगढ़ राजभाषा गीत एवं गान’ के प्रदर्शन ने तकनीक और भाषा के मेल की संभावनाओं को सामने रखा। इससे सरगुजिहा,कुड़ुख,कमार और कोरवा जैसी भाषाओं के डिजिटल संरक्षण और दस्तावेजीकरण की संभावनाओं पर भी चर्चा को आधार मिला। मुख्य अतिथि दुर्ग सांसद विजय बघेल ने छत्तीसगढ़ी को संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल कराने के संकल्प को दोहराया। वहीं ‘पुरखा के सुरता’ सत्र में डॉ. चितरंजन कर की अध्यक्षता में छत्तीसगढ़ के पुरोधा साहित्यकारों और उनके योगदान को याद किया गया। कार्यक्रम में बेमेतरा विधायक दीपेश साहू और पूर्व विधायक अवधेश सिंह चंदेल ने भी भाषाई विकास से जुड़े विषयों पर अपने विचार रखे। दो दिनों तक चले सम्मेलन में सरगुजा के साहित्यकारों को मिला सम्मान और सरगुजिहा-कुड़ुख समेत जनजातीय भाषाओं पर हुआ विमर्श अंचल के लिए खास आकर्षण रहा। सम्मेलन ने यह संदेश भी दिया कि छत्तीसगढ़ की भाषाई पहचान केवल एक भाषा तक सीमित नहीं है, बल्कि अलग-अलग अंचलों की बोलियों, जनजातीय भाषाओं और लोक परंपराओं से मिलकर बनी व्यापक सांस्कृतिक विरासत है।
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