- भाजपा में टिकट की कतार लंबी,कुर्सी एक-बैकुंठपुर में किसे मिलेगा नेतृत्व का मौका?
- बैकुंठपुर में भाजपा का अगला चेहरा कौन? ‘पुराने भरोसे’ और ‘नई पीढ़ी’ के बीच घमासान…
- दावेदार दो दर्जन,टिकट एकः बैकुंठपुर में भाजपा के सामने सबसे बड़ा सियासी फैसला…
- पटना के बाद बैकुंठपुर में भाजपा का नया प्रयोग? युवा चेहरों ने बढ़ाई टिकट की दावेदारी
- बैकुंठपुर भाजपा में नेतृत्व परिवर्तन की आहट! युवाओं ने पुराने चेहरों के सामने खड़ी की चुनौती…
- अध्यक्ष पद के लिए दावेदारों की लंबी कतार,50 से कम उम्र के चेहरों ने बढ़ाई दावेदारी,पटना का चुनाव भाजपा को दे चुका है नए चेहरों का संकेत
-रवि सिंह-
बैकुंठपुर,26 सितम्बर 2026 (घटती-घटना)। कोरिया जिले के जिला मुख्यालय बैकुंठपुर में प्रस्तावित दिसंबर 2026 का नगर पालिका चुनाव भाजपा के लिए सामान्य निकाय चुनाव से कहीं अधिक महत्वपूर्ण माना जा रहा है,राज्य की सत्ता में भाजपा की वापसी के बाद यह चुनाव शहर में पार्टी के जनाधार,संगठन की पकड़ और सरकार के प्रति स्थानीय मतदाताओं के रुझान को परखने का बड़ा अवसर होगा, लेकिन चुनाव मैदान में उतरने से पहले ही भाजपा के सामने एक ऐसा सवाल खड़ा हो गया है,जिसका जवाब टिकट वितरण के साथ मिलेगा…क्या पार्टी बैकुंठपुर में नेतृत्व की कमान नई पीढ़ी के हाथों में सौंपेगी या फिर वर्षों से राजनीति और संगठन में सक्रिय पुराने चेहरों पर ही भरोसा जताएगी? बैकुंठपुर नगर पालिका अध्यक्ष पद के लिए इस बार सामान्य सीट होने से दावेदारी का दायरा काफी व्यापक हो गया है, राजनीतिक हलकों में भाजपा से कई नामों की चर्चा चल रही है,इनमें लंबे समय से राजनीति में सक्रिय वरिष्ठ नेताओं के साथ-साथ अपेक्षाकृत युवा चेहरे भी अपनी दावेदारी मजबूत करने में जुटे हैं,अगस्त 2026 की स्थानीय राजनीतिक रिपोर्टों में शैलेश शिवहरे, भानु पाल,शारदा प्रसाद गुप्ता,कमलेश शर्मा और प्रशांत गुप्ता सहित कई नाम चर्चा में बताए गए हैं,पार्टी ने अभी अधिकृत प्रत्याशी घोषित नहीं किया है,यही स्थिति भाजपा के लिए अवसर भी है और चुनौती भी।
सवाल सिर्फ टिकट का नहीं,अगली पीढ़ी को नेतृत्व सौंपने का है-बैकुंठपुर की भाजपा राजनीति में इस समय एक बात खास तौर पर चर्चा में है इस बार अवसर युवाओं को मिलना चाहिए,50 वर्ष से कम उम्र के कई संभावित दावेदारों के बीच यह भावना दिखाई दे रही है कि संगठन के लिए लंबे समय से काम करने वाले कार्यकर्ताओं को अब चुनावी नेतृत्व में भी अवसर मिलना चाहिए,उनका तर्क है कि यदि युवाओं को बूथ,मंडल, संगठनात्मक अभियान,सामाजिक कार्यक्रम और पार्टी की विभिन्न गतिविधियों में लगातार जिम्मेदारियां दी जा रही हैं, तो नगरपालिका जैसे बड़े चुनाव में नेतृत्व का अवसर भी मिलना चाहिए,यह मांग केवल उम्र के आधार पर टिकट की मांग नहीं है,इसके पीछे एक राजनीतिक तर्क भी है की बैकुंठपुर बदल रहा है और शहर के मतदाता भी बदल रहे हैं,ऐसे में क्या नेतृत्व का चेहरा भी बदलना चाहिए? यही सवाल भाजपा के सामने है।
पटना नगर पंचायत का चुनाव भाजपा के लिए बना आईना-बैकुंठपुर में भाजपा के सामने सबसे दिलचस्प उदाहरण जिले की ही नगर पंचायत पटना का है,फरवरी 2025 में हुए पटना नगर पंचायत चुनाव में भाजपा की गायत्री सिंह अध्यक्ष निर्वाचित हुईं, उन्हें 1,293 मत मिले,जबकि निकटतम प्रमुख प्रतिद्वंद्वी को 1,184 मत प्राप्त हुए,15 वार्डों में कांग्रेस ने 8,भाजपा ने 5 और निर्दलीयों ने 2 वार्ड जीते,भाजपा ने पटना में अध्यक्ष पद के लिए गायत्री सिंह को अधिकृत प्रत्याशी बनाया था,भाजपा ने इस चुनाव में जीत हासिल की, लेकिन वार्डों का परिणाम पार्टी के लिए एक महत्वपूर्ण राजनीतिक संकेत भी लेकर आया—अध्यक्ष पद की जीत अपने आप में पूरी परिषद पर कब्जे की गारंटी नहीं है, यही बात बैकुंठपुर में भाजपा को समझनी होगी।
पटना की जीत का श्रेय सिर्फ पार्टी लहर को देना आसान,लेकिन असली संदेश उम्मीदवार चयन में-भाजपा के लिए पटना का चुनाव इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि स्थानीय स्तर पर पार्टी के प्रत्याशी चयन और चुनावी प्रबंधन ने यह दिखाया कि अपेक्षाकृत नए चेहरों को भी अवसर देकर चुनाव जीता जा सकता है,लेकिन बैकुंठपुर में पटना के परिणाम को हूबहू दोहराना संभव नहीं है,दोनों निकायों का आकार, मतदाता संरचना, राजनीतिक इतिहास और स्थानीय समीकरण अलग हैं,फिर भी पटना का चुनाव भाजपा को एक सवाल जरूर देता है क्या हर चुनाव में पुराने नाम ही जरूरी हैं,या सही समय पर नया चेहरा भी पार्टी को जीत दिला सकता है? यही सवाल अब बैकुंठपुर के टिकट चयन के केंद्र में है।
पुराने नेताओं की दावेदारी को भी नजरअंदाज करना आसान नहीं-यहां यह भी महत्वपूर्ण है कि युवाओं के बढ़ते दबाव के बीच भाजपा अपने वरिष्ठ नेताओं के अनुभव को अचानक दरकिनार कर दे,यह भी आसान फैसला नहीं होगा,कई वरिष्ठ दावेदार वर्षों से संगठन के लिए काम कर रहे हैं,उनके पास वार्ड स्तर से लेकर शहर और पार्टी संगठन तक का अनुभव है,ऐसे नेताओं का तर्क स्वाभाविक है कि नगरपालिका चुनाव केवल युवाओं के उत्साह से नहीं,बल्कि संगठन,प्रबंधन और चुनावी अनुभव से भी जीता जाता है,यानी भाजपा के सामने दो मजबूत तर्क हैं,युवाओं का तर्क—अब अवसर हमारा,वरिष्ठों का तर्क—अनुभव को नजरअंदाज कर जोखिम क्यों? इन दोनों के बीच संतुलन बनाना भाजपा नेतृत्व के लिए सबसे कठिन काम होगा।
पार्षदों के टिकट में भी दिखेगा भाजपा का मूड-अध्यक्ष पद से भी अधिक महत्वपूर्ण भाजपा के लिए वार्ड प्रत्याशियों का चयन हो सकता है,यदि अध्यक्ष पद पर युवा चेहरा उतार दिया गया,लेकिन पार्षद पदों पर पुराने चेहरों का दबदबा कायम रहा तो पार्टी के भीतर उठ रहे ‘नई पीढ़ी को अवसर’ के सवाल का जवाब अधूरा रह जाएगा,वहीं यदि भाजपा बड़ी संख्या में नए चेहरों को वार्डों में उतारती है तो यह साफ संदेश होगा कि पार्टी बैकुंठपुर में स्थानीय नेतृत्व की नई टीम तैयार करना चाहती है,इसलिए अध्यक्ष के साथ पार्षद प्रत्याशियों की सूची भी भाजपा की रणनीति को पढ़ने का महत्वपूर्ण दस्तावेज होगी।
टिकट जितना आसान नहीं, टिकट के बाद बगावत रोकना उससे बड़ा काम- भाजपा के सामने सबसे बड़ी राजनीतिक चुनौती केवल योग्य उम्मीदवार चुनने की नहीं है, सबसे बड़ी चुनौती टिकट के बाद असंतोष रोकने की होगी,जब दो दर्जन के करीब नाम चर्चा में हों और टिकट केवल एक को मिलना हो,तो बाकी दावेदारों को साथ रखना अपने आप में राजनीतिक कौशल की परीक्षा होगी, जिसे टिकट नहीं मिला,यदि वह पार्टी के अधिकृत प्रत्याशी के लिए काम करता है तो दावेदारी की पूरी प्रक्रिया पार्टी की ताकत बनेगी, लेकिन यदि असंतोष खुलकर सामने आता है, बगावत होती है या समर्थक निष्कि्रय होते हैं तो बड़ी दावेदारी भी चुनावी कमजोरी में बदल सकती है। इसलिए भाजपा को केवल ‘कौन जीत सकता है’नहीं देखना होगा,बल्कि यह भी देखना होगा कि ‘किसके पीछे पार्टी पूरी तरह एकजुट हो सकती है।’
‘ट्रिपल इंजन’ के नारे की असली परीक्षा स्थानीय स्तर पर-केंद्र और राज्य में भाजपा की सत्ता के बाद स्थानीय निकाय चुनावों में पार्टी के लिए ‘ट्रिपल इंजन’ का राजनीतिक संदेश महत्वपूर्ण हो जाता है, बैकुंठपुर नगर पालिका में भाजपा की जीत होने पर पार्टी यह तर्क रख सकती है कि केंद्र, राज्य और स्थानीय निकाय में तीनों स्तरों पर एक ही राजनीतिक व्यवस्था होने से विकास कार्यों में बेहतर समन्वय संभव होगा,लेकिन मतदाता के लिए सवाल केवल सरकारों के एक दल का होने का नहीं होगा,शहर का मतदाता पूछेगा— सड़क कैसी है?नाली कैसी है?पानी की व्यवस्था कैसी है? सफाई कैसी है? बाजार और यातायात की स्थिति क्या है? नगरपालिका की सेवाएं कितनी बेहतर हुईं? इसलिए भाजपा के लिए सत्ता का लाभ तभी वोट में बदल सकेगा, जब उम्मीदवार इन स्थानीय सवालों का जवाब देने में सक्षम होगा।
युवा चेहरा उतारा तो भाजपा को क्या मिलेगा?-यदि भाजपा 50 वर्ष से कम उम्र के किसी युवा चेहरे को मैदान में उतारती है तो पार्टी को कई राजनीतिक लाभ मिल सकते हैं,पहला—नई पीढ़ी के मतदाताओं में उत्साह, दूसरा—पुराने राजनीतिक समीकरणों से बाहर निकलने का संदेश,तीसरा—पार्टी में नेतृत्व परिवर्तन की शुरुआत का संकेत,चौथा—भविष्य के लिए स्थानीय नेतृत्व की नई टीम तैयार करने का अवसर,लेकिन इसके साथ जोखिम भी होगा,यदि युवा उम्मीदवार के पास पर्याप्त संगठनात्मक अनुभव नहीं हुआ या वार्ड स्तर पर मजबूत नेटवर्क नहीं बना पाया तो केवल ‘नया चेहरा’ होना चुनाव जीतने के लिए पर्याप्त नहीं होगा।
पुराने चेहरे को मौका दिया तो पार्टी को क्या मिलेगा?-दूसरी ओर अनुभवी उम्मीदवार को टिकट देने पर संगठन को तैयार नेटवर्क,पुराने कार्यकर्ताओं से संपर्क और चुनावी प्रबंधन का लाभ मिल सकता है,लेकिन इसके साथ पार्टी को यह भी देखना होगा कि वह चेहरा शहर के वर्तमान मतदाता के साथ कितना जुड़ा है, क्योंकि चुनाव में केवल पार्टी का पुराना कार्यकर्ता वोट नहीं देता,युवा, महिला, व्यापारी,कर्मचारी,नए मतदाता,मध्यम वर्ग और वे लोग भी मतदान करते हैं जो किसी पार्टी के स्थायी मतदाता नहीं हैं,यही वर्ग चुनाव का परिणाम बदल सकता है।
बैकुंठपुर में भाजपा के सामने सबसे बड़ा राजनीतिक प्रयोग-
दिसंबर 2026 का बैकुंठपुर नगरपालिका चुनाव भाजपा के लिए इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि पार्टी के पास एक साथ तीन चीजें हैं सत्ता, संगठन और दावेदारों की बड़ी संख्या,अब देखना यह है कि पार्टी इन तीनों को चुनावी ताकत में कैसे बदलती है,यदि टिकट चयन में व्यापक स्वीकार्यता,युवा ऊर्जा और संगठनात्मक अनुभव का संतुलन बैठ गया तो भाजपा मजबूत स्थिति में उतर सकती है, लेकिन यदि टिकट का फैसला किसी एक गुट या चेहरे के पक्ष में जाता दिखाई दिया और बाकी दावेदारों को साथ नहीं रखा गया तो यही लंबी दावेदारी पार्टी के लिए परेशानी भी बन सकती है।
वरिष्ठों का अनुभव बनाम युवाओं की ऊर्जा
भाजपा के सामने एक तरफ ऐसे नेता हैं जिन्होंने दशकों तक पार्टी और संगठन को समय दिया है,उनके पास कार्यकर्ताओं का नेटवर्क है,चुनावी अनुभव है और शहर के राजनीतिक समीकरणों की गहरी समझ है,दूसरी ओर नई पीढ़ी के दावेदार हैं,जो अपने साथ नई ऊर्जा, नई सोच और शहर के युवाओं से सीधा जुड़ाव होने का दावा कर रहे हैं,इसलिए इस बार टिकट की लड़ाई को केवल वरिष्ठ बनाम युवा के रूप में देखना भी पर्याप्त नहीं होगा,असल सवाल होगा की कौन सा चेहरा भाजपा के वोट को बढ़ा सकता है? कौन सा उम्मीदवार पार्टी के पारंपरिक मतदाताओं के साथ-साथ नए मतदाताओं को भी अपने साथ जोड़ सकता है? कौन सा चेहरा व्यक्तिगत स्तर पर इतना स्वीकार्य है कि पार्टी के बाहर का मतदाता भी उसके पक्ष में मतदान करने को तैयार हो? और सबसे महत्वपूर्ण की कौन सा उम्मीदवार टिकट न मिलने वाले बाकी दावेदारों को भी अपने साथ लेकर चल सकता है?
अध्यक्ष पद की दौड़ में दो दर्जन के आसपास नाम,टिकट एक
बैकुंठपुर में अध्यक्ष पद को लेकर दावेदारों की संख्या बढ़ती जा रही है, सामान्य सीट होने के कारण इस बार राजनीतिक,सामाजिक,व्यापारिक और संगठनात्मक पृष्ठभूमि वाले कई लोग अपनी संभावनाएं तलाश रहे हैं,स्थानीय राजनीतिक रिपोर्टों में भाजपा के संभावित चेहरों के रूप में शैलेश शिवहरे,भानु पाल,अनिल खटिक,पंकज गुप्ता और शारदा प्रसाद गुप्ता के नाम पहले से चर्चा में हैं,वहीं प्रशांत गुप्ता की संभावित दावेदारी की चर्चा ने भी समीकरणों को और व्यापक किया है,हालांकि इन सभी नामों को पार्टी की आधिकारिक दावेदारी या टिकट का संकेत मानना अभी उचित नहीं होगा,यानी फिलहाल बैकुंठपुर में सबसे बड़ी भीड़ चुनाव मैदान में नहीं,टिकट की कतार में दिखाई दे रही है।
अब असली सवाल…भाजपा बैकुंठपुर में क्या प्रयोग करेगी?
क्या पार्टी दशकों से नेतृत्व करते आ रहे चेहरों में से किसी एक पर फिर भरोसा करेगी? क्या 50 वर्ष से कम उम्र के किसी युवा चेहरे को मौका देकर नई राजनीतिक पारी की शुरुआत करेगी? क्या पटना नगर पंचायत के चुनाव से मिले संकेत को बैकुंठपुर में भी आजमाएगी? या फिर अनुभव और संगठनात्मक पकड़ को प्राथमिकता देकर पुराने नेतृत्व के साथ ही आगे बढ़ेगी? फिलहाल भाजपा ने अपने पत्ते नहीं खोले हैं, लेकिन दावेदारों की बढ़ती संख्या और युवाओं की बढ़ती सक्रियता ने यह साफ कर दिया है कि बैकुंठपुर में इस बार टिकट सिर्फ एक व्यक्ति का चयन नहीं होगा—यह भाजपा के अगले कई वर्षों के स्थानीय नेतृत्व की दिशा भी तय कर सकता है,क्योंकि दिसंबर में जनता सिर्फ अध्यक्ष नहीं चुनेगी, भाजपा के उस चेहरे पर भी फैसला सुनाएगी जिसे पार्टी बैकुंठपुर के भविष्य का चेहरा बनाकर मैदान में उतारेगी, और शायद यही वजह है कि बैकुंठपुर में चुनाव से पहले सबसे बड़ा चुनाव भाजपा के भीतर ही शुरू हो चुका है—‘पुराने भरोसे’ और ‘नई पीढ़ी’ के बीच।
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