- बैकुंठपुर में कांग्रेस का चेहरा कौन? नगरपालिका की कुर्सी के साथ 2028 की बिसात भी…
- नगरपालिका की कुर्सी पर किसका चेहरा? कांग्रेस में दावेदार कम, अंदरखाने सियासी हलचल तेज
- बैकुंठपुर में कांग्रेस का टिकट किसे? अशोक की दूरी,आशीष की दावेदारी और अंबिका के नाम पर मंथन…
- नगरपालिका चुनाव या विधानसभा की तैयारी? बैकुंठपुर कांग्रेस में चेहरे को लेकर बढ़ा सियासी पेच
- कांग्रेस में अध्यक्ष पद का चेहरा कौन? बैकुंठपुर नगरपालिका से तय हो सकती है आगे की सियासी दिशा
- अशोक ने बनाई दूरी,आशीषों ने बढ़ाई दावेदारी,अंबिका के नाम पर भी चर्चा…कांग्रेस में कौन बनेगा चेहरा?
- बैकुंठपुर नगरपालिका में कांग्रेस का ‘चेहरा’ तलाश रही पार्टी,दावेदारी से ज्यादा रणनीति पर नजर…
- इस बार पार्षद नहीं,जनता चुनेगी अध्यक्ष…बैकुंठपुर में कांग्रेस के चेहरे पर सबसे बड़ा सियासी सवाल
-रवि सिंह-
बैकुंठपुर,25 सितम्बर 2026 (घटती-घटना)। कोरिया जिले का नगरीय निकाय चुनाव इस बार काफी दिलचस्प होने वाला है, दिलचस्प इसलिए भी कि भारतीय जनता पार्टी और कांग्रेस दोनों ही ऐसे चेहरे पर दावा खेलना चाह रही हैं,जिस पर जनता भरोसा करे और जीत पार्टी की झोली में आ जाए,लेकिन बैकुंठपुर नगरपालिका में कांग्रेस के लिए यह चुनाव सिर्फ अध्यक्ष की कुर्सी तक सीमित नहीं दिखाई दे रहा,अध्यक्ष पद के चेहरे के बहाने पार्टी के भीतर आगामी विधानसभा चुनाव की बिसात भी बिछती नजर आ रही है। कांग्रेस में दावेदारों की संख्या भले ही बहुत ज्यादा नहीं है, लेकिन अंदरखाने की हलचल काफी ज्यादा है,हर नाम के साथ अलग राजनीतिक गणित जुड़ा हुआ है, किसी की नजर नगरपालिका पर है तो किसी की नजर आगामी विधानसभा पर, किसी के पास स्थानीय निकाय का अनुभव है तो किसी के पास दो दशक का संगठनात्मक अनुभव,किसी के पास विधायक के रूप में काम करने का अनुभव है तो किसी के सामने पिछले विधानसभा चुनाव का परिणाम है,और इस बार चुनाव की व्यवस्था बदल जाने से यह पूरा गणित और भी महत्वपूर्ण हो गया है, पिछली बार जनता ने पार्षद चुने थे और उन्हीं पार्षदों ने अध्यक्ष चुना था, इस बार जनता सीधे नगरपालिका अध्यक्ष चुनेगी,यही सबसे बड़ा फर्क है और यही फर्क इस चुनाव में उम्मीदवारों के चयन से लेकर पूरी चुनावी रणनीति तक को बदलने वाला है, पिछले चुनाव में कांग्रेस के 11,भाजपा के 7 और दो निर्दलीय पार्षद चुने गए थे,इसके बावजूद अध्यक्ष पद कांग्रेस के हाथ नहीं आया, अध्यक्ष पद के चुनाव में बराबरी की स्थिति बनी और पर्ची से भाजपा की नविता शिवहरे अध्यक्ष बनीं,लेकिन इस बार ऐसा कोई राजनीतिक गणित नहीं होगा,अब अध्यक्ष किसी पार्षद के वोट से नहीं,सीधे जनता के वोट से बनेगा, यानी इस बार पार्टी के लिए उम्मीदवार का चेहरा पहले से कहीं ज्यादा महत्वपूर्ण है।
अशोक जायसवाल…कांग्रेस के पास मजबूत चेहरा,लेकिन नगरपालिका से दूरी-कांग्रेस के भीतर बैकुंठपुर में जो मजबूत चेहरा माना जाता है,उनमें अशोक जायसवाल का नाम सबसे पहले आता है,आगामी विधान सभा चुनाव में उन्हें विधायक प्रत्याशी के प्रबल दावेदार के रूप में देखा जा रहा है,अशोक जायसवाल नगरपालिका की राजनीति से भी अनजान नहीं हैं,वे स्वयं एक बार नगरपालिका चुनाव लड़ चुके हैं और दूसरी बार अपनी पत्नी को नगरपालिका चुनाव लड़वा चुके हैं,यानी लगातार दो नगरपालिका चुनावों में उनकी प्रत्यक्ष भागीदारी रही है,इसके बावजूद इस बार उन्होंने नगरपालिका चुनाव से दूरी बना ली है और चुनाव लड़ने की मंशा से इनकार कर दिया है, यही बात कांग्रेस के अंदर सबसे ज्यादा चर्चा का विषय बन रही है, जिस चेहरे को आगामी विधानसभा के लिए मजबूत माना जा रहा है,वही चेहरा नगरपालिका चुनाव से बाहर क्यों है? क्या अशोक जायसवाल सीधे विधानसभा की तैयारी करना चाहते हैं? क्या वे नगरपालिका की राजनीति में लगातार दो बार भागी दारी के बाद अब अगली राजनीतिक पारी विधानसभा के लिए देख रहे हैं? या फिर पार्टी की अंदरूनी रणनीति में नगरपालिका और विधानसभा के चेहरों को अलग-अलग रखा जा रहा है? इन सवालों का जवाब फिलहाल सामने नहीं है,लेकिन उनका चुनाव से पीछे हटना कांग्रेस के लिए अध्यक्ष पद का चेहरा तय करने की चुनौती जरूर बढ़ा रहा है।
अंबिका सिंहदेव…नाम आते ही नगरपालिका से विधानसभा तक पहुंच जाता है सवाल-चौथा और सबसे पेचीदा नाम है पूर्व विधायक अंबिका सिंहदेव का,अंबिका सिंहदेव विधायक रह चुकी हैं,उनके पास विधानसभा का अनुभव है और पार्टी ने उन्हें पहले भी विधानसभा चुनाव में मौका दिया है,लेकिन उनके राजनीतिक सफर में एक तरफ 2018 की जीत है तो दूसरी तरफ 2023 का विधानसभा परिणाम भी है,2023 में भाजपा के भैयालाल राजवाड़े को 66,866 वोट मिले, जबकि अंबिका सिंहदेव को 41,453 वोट मिले,जीत का अंतर 25,413 वोट रहा,यही परिणाम अब उनकी आगामी राजनीतिक भूमिका को लेकर होने वाली चर्चाओं में बार-बार सामने आता है,लेकिन सवाल सिर्फ 2023 की हार का नहीं है,सवाल यह भी है कि क्या अंबिका सिंहदेव के पास अब भी उतना ही स्थानीय जनाधार है,जितना एक मजबूत विधानसभा दावेदार के लिए जरूरी माना जाता है? आपके दिए राजनीतिक आकलन के मुताबिक,उनके सामने अपनी ही पार्टी के लोगों के साथ भरोसे का सवाल और आम जनता के बीच सीधे संपर्क का सवाल भी है, यही वजह है कि कांग्रेस के भीतर यह चर्चा हो सकती है कि आगामी विधानसभा में जनता उन्हें किस रूप में स्वीकार करेगी,यह निष्कर्ष किसी सर्वे के सत्यापित परिणाम के रूप में नहीं, बल्कि स्थानीय राजनीतिक चर्चा और आपके दिए आकलन के रूप में देखा जाना चाहिए।
अंबिका सिंहदेव के सामने दो रास्ते—विधानसभा या नगरपालिका?
यहीं से नगरपालिका चुनाव कांग्रेस के लिए और अधिक महत्वपूर्ण हो जाता है, एक राजनीतिक संभावना यह है कि यदि कांग्रेस अंबिका सिंहदेव को फिर से सक्रिय राजनीतिक भूमिका देना चाहती है तो बैकुंठपुर नगरपालिका अध्यक्ष का चुनाव उनके लिए एक रास्ता बन सकता है, क्यों? क्योंकि उन्होंने अब तक विधानसभा जैसे बड़े चुनाव लड़े हैं, लेकिन स्थानीय निकाय का प्रत्यक्ष चुनाव नहीं लड़ा है, नगरपालिका चुनाव उन्हें छोटे और सीधे स्थानीय चुनाव का अनुभव दे सकता है,यह चुनाव वार्ड-वार्ड की राजनीति है,यह घर-घर संपर्क का चुनाव है,यह स्थानीय समस्याओं पर सीधे जवाब देने का चुनाव है, और सबसे महत्वपूर्ण—इस बार अध्यक्ष का चुनाव सीधे जनता करेगी,ऐसे में यदि अंबिका सिंहदेव नगरपालिका अध्यक्ष पद के लिए मैदान में उतरती हैं और जीतती हैं तो उन्हें शहर की राजनीति में दोबारा सक्रिय होने का अवसर मिल सकता है, इसके बाद वह नगरपालिका के जरिए शहर में अपना जनसंपर्क मजबूत कर सकती हैं और आगे विधानसभा की राजनीति के लिए अपनी जमीन तैयार कर सकती हैं,यही वह राजनीतिक सोच है, जिसकी वजह से कांग्रेस के भीतर अंबिका सिंहदेव को नगरपालिका अध्यक्ष पद का चेहरा बनाने की चर्चा महत्वपूर्ण हो जाती है।
क्या नगरपालिका चुनाव अंबिका सिंहदेव के लिए राजनीतिक पुनर्निर्माण का रास्ता बन सकता है?-यदि कांग्रेस शहर को एकजुट करने की रणनीति बनाती है तो अंबिका सिंहदेव को नगरपालिका अध्यक्ष पद का चेहरा बनाने के पीछे एक तर्क यह भी हो सकता है कि उन्हें फिर से जनता के बीच सक्रिय भूमिका दी जाए,विधानसभा चुनाव में मिली हार के बाद सीधे अगले विधानसभा चुनाव की तरफ जाने के बजाय नगरपालिका जैसे स्थानीय चुनाव के माध्यम से शहर में काम करने का अवसर मिलना उनके लिए अलग राजनीतिक स्थिति पैदा कर सकता है, जीत की स्थिति में उनके पास नगरपालिका सरकार चलाने का अनुभव होगा,शहर के मुद्दों पर सीधे काम करने का मौका होगा,वार्ड स्तर पर संगठन को सक्रिय करने का अवसर होगा,और जनता के साथ रोजमर्रा के संपर्क का राजनीतिक आधार बनेगा,यानी नगरपालिका चुनाव उनके लिए केवल चुनाव नहीं,बल्कि राजनीतिक वापसी की जमीन भी बन सकता है,लेकिन यहां भी अंतिम फैसला जनता का ही होगा।
लेकिन सर्वे ने बदल दिया तो पूरा गणित?
कांग्रेस यदि आगामी विधानसभा और लोकसभा चुनावों में सर्वे को टिकट चयन का महत्वपूर्ण आधार बनाती है तो पुराने चेहरों की राजनीति के सामने नई चुनौती खड़ी हो सकती है,शहर मतदाताओ के अनुसार कांग्रेस इस बार सर्वे में सामने आने वाले नामों को अधिक महत्व देने की दिशा में आगे बढ़ रही है,ऐसी स्थिति में सवाल यह होगा कि अंबिका सिंहदेव सर्वे में कहां रहती हैं, संभव है कि अंतिम सूची में उनका नाम हो,लेकिन यदि सर्वे की प्राथमिकता शीर्ष नामों को दी जाती है तो उनकी स्थिति पर सवाल खड़े होंगे,और यहीं कांग्रेस के सामने सबसे बड़ा विरोधाभास है, यदि सर्वे को महत्व देना है तो पुराने टिकटों का आधार कितना निर्णायक होगा? अंबिका सिंहदेव को पहले भी दो बार विधानसभा का टिकट मिल चुका है, यदि आगे भी टिकट उसी राजनीतिक परंपरा के आधार पर तय होता है, तो फिर सर्वे में सामने आने वाले नए चेहरों की भूमिका कमजोर हो जाएगी, इसलिए इस बार कांग्रेस के टिकट चयन पर सबसे ज्यादा नजर रहेगी, सर्वे जीतेगा या पुराना राजनीतिक समीकरण? यह सवाल केवल अंबिका सिंहदेव का नहीं, कांग्रेस के हर संभावित दावेदार का है।
और अगर अंबिका को नगरपालिका में उतार दिया गया तो?- यही वह स्थिति है,जिसमें कांग्रेस एक साथ कई राजनीतिक लक्ष्य साध सकती है,अंबिका सिंहदेव को नगरपालिका अध्यक्ष पद पर उतारना उन्हें शहर में सक्रिय करेगा,उन्हें स्थानीय निकाय का अनुभव देगा,उन्हें जनता के बीच रोजाना काम करने का अवसर देगा,और यदि वह जीतती हैं तो कांग्रेस के पास शहर में एक अनुभवी राजनीतिक चेहरा होगा,यही कारण है कि अंबिका सिंहदेव का बैकुंठपुर नगरपालिका चुनाव लड़ना कुछ लोगों के लिए आगामी विधानसभा की तुलना में अधिक व्यावहारिक राजनीतिक विकल्प के रूप में देखा जा रहा है,लेकिन इसका दूसरा पहलू भी है,यदि वे नगरपालिका चुनाव हारती हैं तो उनकी राजनीतिक स्थिति पर नई चर्चा शुरू होगी,इसलिए यह फैसला जितना बड़ा अवसर है, उतनी ही बड़ी राजनीतिक परीक्षा भी।
पिछली बार पार्षदों का खेल था,इस बार जनता का फैसला- यही इस चुनाव का सबसे बड़ा फर्क है, पिछली बार कांग्रेस के 11 पार्षद जीते थे और भाजपा के 7,इसके बावजूद अध्यक्ष कांग्रेस का नहीं बन पाया,क्रॉस वोटिंग के बाद मुकाबला बराबरी पर पहुंचा और पर्ची से भाजपा की नविता शिवहरे अध्यक्ष बनीं,उस समय अध्यक्ष पद के लिए पार्षदों का गणित सबसे महत्वपूर्ण था,इस बार वह गणित नहीं है, इस बार जनता सीधे अध्यक्ष चुनेगी, अब किसी पार्षद को अपने पक्ष में करने से अध्यक्ष नहीं बनेगा,अब किसी पार्षद की नाराजगी से अध्यक्ष पद का चुनाव नहीं पलटेगा,अब बराबरी होने पर पर्ची निकलने का इंतजार नहीं होगा,अब सीधे जनता के वोट गिने जाएंगे,और इसलिए इस बार अध्यक्ष पद का उम्मीदवार ही पूरे शहर में पार्टी का सबसे बड़ा चेहरा होगा।
यही वजह है कि कांग्रेस के सामने टिकट से ज्यादा चेहरे की चुनौती-कांग्रेस को इस बार ऐसा उम्मीदवार चाहिए जो केवल पार्टी के भीतर स्वीकार्य न हो,बल्कि पूरे शहर में जनता के सामने खड़ा हो सके,उसे अपने वार्ड से बाहर निकलकर पूरे नगरपालिका क्षेत्र में जाना होगा,उसे हर वर्ग से संपर्क करना होगा, उसे अपने पुराने राजनीतिक रिकॉर्ड का जवाब देना होगा, उसे शहर की समस्याओं पर बात करनी होगी,और जनता को यह भरोसा दिलाना होगा कि नगरपालिका की कमान उसके हाथ में सुरक्षित रहेगी,इसलिए इस बार किसी नेता का केवल पार्टी में मजबूत होना पर्याप्त नहीं होगा,उसे जनता में भी मजबूत दिखाई देना होगा,यही वजह है कि कांग्रेस के भीतर अध्यक्ष पद का चेहरा तय करना इस बार सबसे कठिन फैसला हो सकता है।
अंदरखाने नगरपालिका, निशाने पर विधानसभा- बैकुंठपुर की राजनीति में इस समय सबसे दिलचस्प बात यही है कि सामने नगरपालिका चुनाव है,लेकिन चर्चा विधानसभा की हो रही है,अशोक जायसवाल की विधानसभा दावेदारी की चर्चा है, अंबिका सिंहदेव की भविष्य की भूमिका पर सवाल हैं,आशीष यादव नगरपालिका के अनुभव के साथ दावेदारी कर रहे हैं, आशीष डाबरे करीब 20 साल के राजनीतिक अनुभव के साथ संगठन के फैसले का इंतजार कर रहे हैं,इन सबके बीच कांग्रेस को एक ऐसा चेहरा चुनना है जो सिर्फ चुनाव लड़े नहीं,बल्कि पूरे शहर को अपने पीछे खड़ा कर सके।
अब असली सवाल—कांग्रेस किसे मैदान में उतारेगी?- बैकुंठपुर नगरपालिका चुनाव में कांग्रेस के सामने फिलहाल चार प्रमुख राजनीतिक चेहरे दिखाई दे रहे हैं—
अशोक जायसवाल-मजबूत स्थानीय चेहरा,आगामी विधानसभा के प्रबल दावेदारों में नाम,लेकिन नगरपालिका चुनाव से दूरी।
आशीष यादव उर्फ लाला-वर्तमान नगरपालिका उपाध्यक्ष, स्थानीय निकाय का अनुभव और दमखम के साथ दावेदारी।
आशीष डाबरे — छात्र राजनीति से शुरुआत, करीब 20 साल का राजनीतिक अनुभव और संगठन में लंबी सक्रियता।
अंबिका सिंहदेव — पूर्व विधायक, विधानसभा का अनुभव, 2023 में 25,413 मतों से हार और अब शहर की राजनीति में दोबारा सक्रिय होने की संभावित राह, चारों के सामने अलग-अलग परिस्थितियां हैं, चारों का राजनीतिक रास्ता अलग है,और चारों के नाम के साथ कांग्रेस की आगे की राजनीति का अलग-अलग गणित जुड़ा हुआ है।
फैसला चाहे जिसका हो,इस बार परीक्षा सीधे जनता की होगी- बैकुंठपुर नगरपालिका में इस बार सबसे बड़ा बदलाव चुनाव प्रक्रिया का है, पिछली बार जनता ने पार्षद चुने थे और पार्षदों के राजनीतिक समीकरण से अध्यक्ष बना था,इस बार जनता पार्षद भी चुनेगी और अध्यक्ष भी सीधे चुनेगी, इसलिए इस बार न सिर्फ राजनीतिक दलों को,बल्कि दावेदारों को भी अपनी रणनीति बदलनी होगी, अब अध्यक्ष का चुनाव बंद कमरे के राजनीतिक समीकरण से नहीं होगा,अब फैसला घर-घर की दस्तक,जनता के भरोसे और सीधे वोट से होगा, और कांग्रेस के लिए यही सबसे बड़ा सवाल है कि वह जनता के सामने कौन सा चेहरा रखती है, क्योंकि इस बार अध्यक्ष पद का उम्मीदवार सिर्फ नगरपालिका अध्यक्ष बनने की लड़ाई नहीं लड़ेगा,वह बैकुंठपुर शहर में कांग्रेस के अगले राजनीतिक अध्याय का चेहरा भी बन सकता है, यही कारण है कि बैकुंठपुर नगरपालिका चुनाव की तारीख और प्रत्याशियों के ऐलान से पहले ही कांग्रेस के भीतर राजनीतिक हलचल तेज है, नगरपालिका की कुर्सी सामने है,लेकिन अंदरखाने विधानसभा की बिसात बिछ रही है, अब देखना यह है कि कांग्रेस इस बिसात पर किसे आगे करती है, किसे पीछे करती है और किस चेहरे के हाथ में बैकुंठपुर शहर की अगली राजनीतिक कमान देने का फैसला करती है, अंतिम फैसला संगठन करेगा, लेकिन इस बार जीत-हार की मुहर सीधे बैकुंठपुर की जनता लगाएगी।
आशीष यादव उर्फ लाला—दमखम के साथ दावेदारी, लेकिन भरोसा किसका?-
अशोक जायसवाल के बाद कांग्रेस में जो नाम मजबूती से सामने आता है, वह है वर्तमान नगरपालिका उपाध्यक्ष आशीष यादव उर्फ लाला का, आशीष यादव दमखम के साथ अध्यक्ष पद की दावेदारी ठोक रहे हैं, मौजूदा नगरपालिका उपाध्यक्ष होने के कारण उनके पास स्थानीय निकाय की राजनीति का प्रत्यक्ष अनुभव भी है, परिषद की कार्यप्रणाली, वार्डों की राजनीति और शहर की स्थानीय समस्याओं से उनका सीधा जुड़ाव रहा है, इस बार जब अध्यक्ष का चुनाव सीधे जनता करेगी, तो यह अनुभव उनके लिए राजनीतिक आधार बन सकता है, लेकिन कांग्रेस के भीतर असली सवाल यही है की क्या पार्टी आशीष यादव पर भरोसा करेगी? क्या संगठन उन्हें पूरे शहर का चेहरा मानकर मैदान में उतारेगा? क्या उनके नाम पर कांग्रेस के सभी गुट एक साथ खड़े होंगे? या फिर अध्यक्ष पद के टिकट को लेकर अंदरखाने कोई दूसरा समीकरण तैयार होगा? यही असमंजस फिलहाल कांग्रेस के भीतर दिखाई दे रहा है, क्योंकि प्रत्यक्ष चुनाव में अध्यक्ष प्रत्याशी को सिर्फ अपने समर्थकों का नहीं, पूरे शहर का चुनाव लड़ना है, इसलिए पार्टी को यह देखना होगा कि जिस व्यक्ति को टिकट दिया जाए, उसके साथ संगठन के साथ-साथ जनता का कितना जुड़ाव है।
आशीष डाबरे—छात्र संघ से शुरू हुई राजनीति, करीब 20 साल का अनुभव-
तीसरा बड़ा नाम आशीष डाबरे का है, आशीष डाबरे राजनीति के पुराने चेहरे हैं, छात्र संघ के समय से राजनीति कर रहे हैं और उनका राजनीतिक अनुभव करीब 20 साल का हो चुका है, राजनीति के साथ संगठन में भी उन्होंने लंबा समय बिताया है, यानी अनुभव के मामले में उनके सामने कोई कमी नहीं है, लेकिन उनके सामने भी अपनी तरह का राजनीतिक असमंजस है, अंदरखाने की चर्चा यह है कि यदि टिकट के लिए बहुत ज्यादा जोर लगाया गया और संगठन के भीतर के कुछ लोगों को यह पसंद नहीं आया, तो आगे चलकर नुकसान अपने ही संगठन के लोगों से हो सकता है, राजनीति में यह कोई नई बात नहीं है, टिकट की लड़ाई कई बार चुनाव से पहले ही संगठन के भीतर रिश्तों और समीकरणों को बदल देती है, इसी वजह से आशीष डाबरे ने भी काफी हद तक फैसला पार्टी के ऊपर छोड़ रखा है, पार्टी क्या तय करती है, वही अंतिम होगा, यानी लगभग दो दशक के राजनीतिक अनुभव के बावजूद वे टिकट की लड़ाई को टकराव में बदलने के बजाय संगठन के निर्णय का इंतजार कर रहे हैं।
अशोक जायसवाल को फिर नगरपालिका में उतारने की चर्चा क्यों?-
अब बात आती है सबसे अलग राजनीतिक संभावना की, यदि कांग्रेस के भीतर अंबिका सिंहदेव के लिए आगामी विधानसभा का रास्ता तैयार करने की रणनीति बनती है तो अशोक जायसवाल की भूमिका पर भी सवाल उठेगा, क्योंकि अशोक जायसवाल को आगामी विधानसभा के लिए मजबूत दावेदार माना जा रहा है, ऐसे में अंदरखाने यह राजनीतिक चर्चा भी हो सकती है कि यदि अशोक जायसवाल को किसी रणनीति के तहत फिर से नगरपालिका अध्यक्ष का चुनाव लड़ाया जाए तो उनकी विधानसभा दावेदारी पर असर पड़ सकता है, यहां दो संभावनाएं बनती हैं, यदि वे नगरपालिका चुनाव जीतते हैं तो उनकी स्थानीय राजनीतिक पकड़ और मजबूत होगी, यदि परिणाम उनके पक्ष में नहीं रहता तो वही परिणाम उनकी भविष्य की विधानसभा दावेदारी पर राजनीतिक चर्चा का आधार बन सकता है, इसलिए उन्हें नगरपालिका में उतारना या न उतारना भी सिर्फ नगरपालिका का फैसला नहीं होगा।
एक टिकट से कई लोगों का भविष्य तय हो सकता है-
यही बैकुंठपुर नगरपालिका चुनाव का सबसे बड़ा राजनीतिक पहलू है, यदि आशीष यादव को टिकट मिलता है तो यह स्थानीय निकाय के अनुभव को प्राथमिकता देने का संदेश होगा, यदि आशीष डाबरे को टिकट मिलता है तो संगठन और लंबे राजनीतिक अनुभव को महत्व मिलने की बात कही जाएगी, यदि अंबिका सिंहदेव को टिकट मिलता है तो इसे शहर की राजनीति में उनकी वापसी और भविष्य की राजनीतिक जमीन तैयार करने की रणनीति से जोड़कर देखा जाएगा, और यदि किसी रणनीति के तहत अशोक जायसवाल को मैदान में उतारा जाता है तो इसे उनकी विधानसभा दावेदारी के संदर्भ में भी देखा जाएगा, यानी नाम किसी एक का होगा, लेकिन असर कई नेताओं की राजनीति पर पड़ेगा।
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