- चुनाव में जिस उंगली की स्याही से सरकार बनती है,उसी जनता की आवाज सत्ता तक पहुंचते-पहुंचते
- इतनी कमजोर क्यों हो जाती है?
- तीन साल पूरे होने में करीब दो महीने शेष, फिर भी सवाल वही…कमियां दिखाने वालों की सुनवाई होगी या व्यवस्था को ढकने का खेल जारी रहेगा?
- तीन साल पूरे होने में अब लगभग दो महीने
- शेष—जिस भरोसे और बदलाव की उम्मीद में
- जनता ने सत्ता सौंपी,अब उसी भरोसे की
- कसौटी पर सरकार और प्रशासन
-न्यूज डेस्क-
लोकतंत्र में सत्ता किसी की निजी जागीर नहीं होती, सरकार किसी राजनीतिक दल की स्थायी संपत्ति नहीं होती और प्रशासन किसी व्यक्ति के इशारे पर चलने वाली व्यवस्था नहीं हो सकता, लोकतंत्र में सत्ता का वास्तविक मालिक नागरिक है, उसकी उंगली पर लगी स्याही सरकार बनाती भी है और समय आने पर सत्ता परिवर्तन का रास्ता भी खोलती है, फिर आज सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या हमारी राजनीति इस मूल सत्य को भूलती जा रही है? क्या अब लोकतंत्र में एक ऐसी व्यवस्था आकार ले रही है जिसमें जनता चुनाव तक सबसे महत्वपूर्ण होती है,लेकिन सरकार बनते ही सत्ता स्वयं सबसे महत्वपूर्ण हो जाती है? जिस जनता के भरोसे सरकार बनती है, क्या उसी जनता की भावनाओं को बाद में राजनीतिक सुविधा के अनुसार समझा और इस्तेमाल किया जाने लगता है? यह सवाल केवल किसी एक सरकार या दल का नहीं है, पिछले कई वर्षों में अलग-अलग सरकारों के कामकाज को लेकर ऐसे सवाल उठते रहे हैं, जनता जब एक व्यवस्था से निराश होती है तो दूसरी को मौका देती है, वह केवल चेहरे नहीं बदलती, बल्कि अपनी उम्मीद एक जगह से हटाकर दूसरी जगह रखती है,और यही किसी नई सरकार की सबसे बड़ी जिम्मेदारी होती है।
पुरानी सरकार से टूटा
भरोसा नई सरकार को सौंपा गया था…
छत्तीसगढ़ में भी सत्ता परिवर्तन केवल राजनीतिक आंकड़ों का परिणाम नहीं था,उसके पीछे जनता की अपनी अपेक्षाएं और बदलाव की आकांक्षाएं थीं,लोगों ने सोचा कि अब परिस्थितियां बदलेंगी,प्रशासन में कसावट आएगी, काम अधिक ईमानदारी से होंगे,भ्रष्टाचार पर कार्रवाई होगी, सरकारी खजाने की रक्षा होगी,अधिकारियों की जवाबदेही तय होगी,जनता की शिकायतों को गंभीरता से लिया जाएगा, और यदि व्यवस्था में कोई कमी सामने आएगी तो उसे दबाया नहीं जाएगा, बल्कि सुधारा जाएगा, लेकिन आज मौजूदा सरकार के तीन साल पूरे होने में अब लगभग दो महीने शेष हैं,यह समय केवल उपलब्धियां गिनाने का नहीं है,यह उस भरोसे की कसौटी का समय भी है, जिसके सहारे जनता ने सत्ता सौंपी थी,अब जनता यह पूछ सकती है कि लगभग तीन वर्षों के सफर में प्रशासनिक कसावट कितनी आई? भ्रष्टाचार पर कार्रवाई कितनी प्रभावी हुई? शिकायतों पर कितनी गंभीरता दिखाई गई? ट्रांसफर-पोस्टिंग की व्यवस्था कितनी पारदर्शी हुई? और जिन मामलों में पत्रकारों,जागरूक नागरिकों या आम लोगों ने कमियां सामने रखीं,उनमें कितने मामलों में निष्पक्ष जांच और सुधार दिखाई दिया?
जिस उंगली ने सरकार बनाई,
उसे कठपुतली मत समझिए…
लोकतंत्र का शायद सबसे सुंदर दृश्य वह होता है जब एक साधारण नागरिक मतदान केंद्र से अपनी उंगली पर स्याही लगाकर बाहर निकलता है,उस एक उंगली में सरकार बनाने की ताकत होती है,उसी उंगली से मुख्यमंत्री की सत्ता का रास्ता बनता है,उसी से विधायक चुने जाते हैं, उसी से राजनीतिक दल सत्ता में पहुंचते हैं,लेकिन चुनाव समाप्त होते ही यदि वही नागरिक सरकारी कार्यालय में अपनी समस्या लेकर घंटों खड़ा रहे,अधिकारी उसकी बात न सुनें और जनप्रतिनिधि तक पहुंचना कठिन हो जाए तो लोकतंत्र के सामने सवाल खड़ा होता है,जिस उंगली ने आपको सत्ता दी,उसी नागरिक को व्यवस्था की कठपुतली कैसे बनाया जा सकता है? जनता ने सरकार चुनी है, अपना मालिक नहीं,जनता ने प्रतिनिधि चुने हैं,शासक नहीं,और जनता ने पांच साल के लिए जिम्मेदारी सौंपी है, अपनी आवाज नहीं।
लोकतंत्र का चौथा स्तंभ आखिर किसलिए है?
यहीं लोकतंत्र के चौथे स्तंभ की जिम्मेदारी शुरू होती है, पत्रकारिता का काम सरकार बनाना नहीं है,सरकार गिराना भी नहीं है,पत्रकारिता का काम उस जगह सवाल खड़ा करना है जहां व्यवस्था सवाल पैदा करती है,सहकारिता में कमी है तो उसे सामने लाना पत्रकारिता है,स्वास्थ्य व्यवस्था में गड़बड़ी है तो सवाल उठाना पत्रकारिता है, शिक्षा व्यवस्था में अनियमितता है तो उसे सामने रखना पत्रकारिता है,सरकारी खरीद में संदेह है तो दस्तावेज मांगना पत्रकारिता है, किसी योजना में जनता का पैसा खर्च हुआ और जमीन पर परिणाम दिखाई नहीं दिया तो उसका हिसाब मांगना पत्रकारिता है,यही भूमिका जागरूक नागरिक की भी है, जब कोई पत्रकार या जागरूक नागरिक सरकार को बताता है कि ‘यहां कमी है’,तो वह जरूरी नहीं कि सरकार का विरोध कर रहा हो, वह सरकार को वह चीज दिखा रहा है जो संभवतः ऊपर बैठे लोगों तक पहुंच नहीं रही, ऐसे में सत्ता की जिम्मेदारी होनी चाहिए कि वह कमी की जांच करे।
कहीं ऐसा तो नहीं-नीचे गड़बड़ी
करो और ऊपर पकड़ मजबूत कर लो?
लोकतंत्र के लिए इससे अधिक खतरनाक संस्कृति शायद ही कोई होगी कि नीचे स्तर पर अनियमितता पैदा करने वाला व्यक्ति ऊपर के सत्ता या प्रशासनिक तंत्र में अपनी पहुंच मजबूत कर ले और फिर उसी पहुंच को अपना कवच बना ले,यदि ऐसा होने लगे तो ईमानदार अधिकारी क्या करेगा? जागरूक नागरिक क्या करेगा? पत्रकार क्या करेगा? शिकायतकर्ता क्या करेगा? क्योंकि उसे लगेगा कि जिसकी शिकायत वह ऊपर लेकर जा रहा है,वही व्यक्ति उससे पहले ऊपर अपनी पहुंच बना चुका है,यहीं शासन की निष्पक्षता की असली परीक्षा होती है,सरकार को यह स्पष्ट संदेश देना चाहिए कि सत्ता तक पहुंच किसी के लिए जांच से बचने का पासपोर्ट नहीं हो सकती।
सरकारी खजाना किसी
की कमाई का रास्ता नहीं…
सरकारी खजाने का एक-एक रुपया जनता का है,वह किसी सरकार,मंत्री,अधिकारी,ठेकेदार या प्रभावशाली व्यक्ति का निजी धन नहीं है,जनता टैक्स देती है,उसी पैसे से सड़क बनती है,अस्पताल चलता है,विद्यालय चलता है, योजनाएं बनती हैं, सरकारी खरीद होती है,विकास कार्य होते हैं,इसलिए जहां भी सरकारी धन के दुरुपयोग की आशंका है,वहां सवाल उठाना सरकार विरोध नहीं है,यह जनता के पैसे का हिसाब मांगना है,और यदि पत्रकार सरकारी खजाने को हो रहे संभावित नुकसान की ओर ध्यान दिलाता है तो सरकार को पत्रकार से नाराज होने के बजाय खजाने की रक्षा करनी चाहिए।
सहकारिता से स्वास्थ्य और
शिक्षा तक-सवाल इसलिए उठे कि सुधार हो…
पत्रकारों ने सहकारिता के मामलों पर सवाल उठाए, स्वास्थ्य व्यवस्था की कमियां सामने रखीं, शिक्षा व्यवस्था पर प्रश्न किए,विभिन्न सरकारी विभागों की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाए,इन सवालों का उद्देश्य यह नहीं होना चाहिए कि किसी को व्यक्तिगत रूप से निशाना बनाया जाए,मूल उद्देश्य यह है कि जनता को बेहतर व्यवस्था मिले,लेकिन यदि बार-बार कमियां सामने आने के बाद भी ठोस संज्ञान दिखाई न दे तो पत्रकार भी पूछेगा और जनता भी…आखिर कार्रवाई क्यों नहीं? और यदि कार्रवाई नहीं हुई तो क्या कारण है? क्या शिकायत में तथ्य नहीं थे? तो सरकार बताए, क्या जांच हुई? तो उसकी स्थिति बताए,क्या कोई दोषी नहीं मिला? तो निष्कर्ष सामने रखे, लेकिन चुप्पी संदेह को खत्म नहीं करती,चुप्पी संदेह को बढ़ाती है।
प्रशासन सत्ता के इशारे पर नहीं,कानून से चले
सरकार और प्रशासन के संबंध की मर्यादा लोकतंत्र के लिए बेहद महत्वपूर्ण है,सरकार नीति तय करती है, प्रशासन उसे कानून के अनुसार लागू करता है,लेकिन यदि प्रशासन राजनीतिक इशारे समझने लगे तो व्यवस्था कमजोर होती है,यदि ट्रांसफर-पोस्टिंग प्रशासनिक आवश्यकता के बजाय प्रभाव का खेल बन जाए तो अधिकारियों को भी संदेश जाता है कि काम से ज्यादा महत्वपूर्ण संबंध हैं,यदि कोई अधिकारी राजनीतिक सुविधा के लिए उपयोगी है तो वह सुरक्षित और यदि कोई असुविधाजनक है तो उसका स्थानांतरण—ऐसी धारणा भी प्रशासनिक मनोबल के लिए नुकसानदेह है, सरकार को ऐसी हर धारणा को अपने काम से गलत साबित करना चाहिए,क्योंकि प्रशासनिक कसावट आदेश से नहीं, निष्पक्षता से आती है।
सबसे खतरनाक भ्रम—बहुमत
ही जनसमर्थन का स्थायी प्रमाण है…
बहुमत सरकार बनाने का अधिकार देता है,लेकिन वह पांच साल के लिए जनता की बिना शर्त स्वीकृति नहीं देता,जनता हर दिन सरकार का मूल्यांकन करती है,उसके लिए सरकार का मतलब केवल मुख्यमंत्री और मंत्री नहीं हैं,तहसील का कर्मचारी भी सरकार है, पटवारी भी सरकार है, अस्पताल का सिस्टम भी सरकार है,स्कूल की व्यवस्था भी सरकार है, पुलिस थाना भी सरकार है, जिला कार्यालय भी सरकार है,जब आम आदमी इन व्यवस्थाओं से परेशान होता है तो वह यह नहीं कहता कि केवल अधिकारी खराब है,वह कहता है सरकार में सुनवाई नहीं है,यही कारण है कि नीचे स्तर की हर प्रशासनिक विफलता अंततः ऊपर बैठी सत्ता के खाते में जाती है।
तीन साल पूरे होने में दो
महीने-अब प्रचार नहीं,परिणाम की कसौटी
मौजूदा सरकार के तीन साल पूरे होने में अब लगभग दो महीने शेष हैं,यह वह समय है जब सरकार को भी अपने काम का गंभीर आत्ममूल्यांकन करना चाहिए, जनता ने जिस भरोसे से सरकार बनाई थी,उसका कितना सम्मान हुआ? प्रशासन कितना जवाबदेह बना? भ्रष्टाचार पर कितनी निर्णायक कार्रवाई हुई? जिन मामलों को मीडिया ने सामने रखा,उनमें कितनों पर जांच हुई? जिन अधिकारियों और व्यवस्थाओं पर सवाल उठे,उनमें क्या सुधार हुआ? सरकारी खजाने को बचाने के लिए क्या कदम उठे? ट्रांसफर-पोस्टिंग की व्यवस्था कितनी निष्पक्ष बनी? और सबसे महत्वपूर्ण क्या जनता आज महसूस करती है कि उसकी सरकार उसकी सुन रही है? इन सवालों का उत्तर सरकारी विज्ञापन तय नहीं करेगा,इनका उत्तर जनता का अनुभव तय करेगा।
सत्ता के पास ताकत है,
लेकिन जनता के पास समय है…
सत्ता के पास कुर्सी है,प्रशासन है,संसाधन हैं, संगठन है, निर्णय लेने की शक्ति है,लेकिन जनता के पास एक ऐसी ताकत है जिसका इस्तेमाल वह हर दिन नहीं करती,वह है उसका लोकतांत्रिक निर्णय,जनता कई बार तुरंत प्रतिक्रिया नहीं देती,वह समय का इंतजार करती है,देखती है, समझती है,तुलना करती है,याद रखती है, और फिर अपना निर्णय देती है,इसीलिए जनता की चुप्पी को कमजोरी समझना किसी भी सत्ता की सबसे बड़ी राजनीतिक भूल हो सकती है।
कमी दिखाने वाले को नहीं, कमी पैदा करने वाले को देखिए
सरकार के लिए रास्ता बहुत सीधा है,पत्रकार कमी दिखाए तो उसकी जांच कीजिए,जागरूक नागरिक शिकायत करे तो सुनिए,दस्तावेज सामने आएं तो परीक्षण कीजिए, आरोप गलत हो तो तथ्य रखिए,आरोप सही हो तो कार्रवाई कीजिए,सरकारी खजाने को नुकसान हो रहा हो तो रोकिए, अधिकारी दोषी हो तो जिम्मेदारी तय कीजिए,राजनीतिक संरक्षण की धारणा बने तो पारदर्शिता से उसे तोडि़ए, यही सुशासन की पहली कसौटी है,कमी दिखाने वाले से लड़ने में ऊर्जा खर्च करने के बजाय कमी पैदा करने वाले से जवाब मांगिए।
जनता ने सरकार चुनी है,अपनी भावनाएं गिरवी नहीं रखीं- लोकतंत्र में जनता पांच साल के लिए अपना मालिक नहीं चुनती,वह अपना प्रतिनिधि चुनती है,सरकार को शासन का अधिकार मिलता है,मनमानी का नहीं, प्रशासन को कानून लागू करने की शक्ति मिलती है,किसी के इशारे पर चलने की नहीं,और सत्ता को जनता का भरोसा मिलता है,उसकी भावनाओं के साथ खेलने का अधिकार नहीं,आज मौजूदा सरकार के तीन साल पूरे होने में करीब दो महीने शेष हैं तो यह सवाल और अधिक महत्वपूर्ण हो जाता है जिस उम्मीद के साथ जनता ने पुरानी व्यवस्था से अपना भरोसा हटाकर नई सरकार को सौंपा था, क्या उस उम्मीद की रक्षा हुई? इसका उत्तर सत्ता स्वयं नहीं दे सकती, इसका उत्तर जनता देगी।
अंत में सत्ता से सिर्फ इतना—जनता सब देख रही है- कुर्सी आज है,कल किसी और की होगी,पद आज है, कल कोई दूसरा उस पर बैठेगा,अधिकारी आज प्रभावशाली है,कल स्थान बदल जाएगा,राजनीतिक समीकरण आज अनुकूल हैं,कल बदल सकते हैं, लेकिन जनता का अनुभव नहीं बदलता,उसे याद रहता है कि उसकी शिकायत किसने सुनी,किसने टाल दी,किसने भ्रष्टाचार पर कार्रवाई की,किसने आंखें बंद कर लीं, किसने सरकारी खजाने की रक्षा की,और किसने कमियां सामने आने के बाद भी उन्हें ढकने दिया,इसलिए सत्ता को जनता की चुप्पी से भ्रमित नहीं होना चाहिए,जनता चुप है तो इसका अर्थ यह नहीं कि वह देख नहीं रही,जनता बोल नहीं रही तो इसका अर्थ यह नहीं कि वह समझ नहीं रही, जनता सड़क पर नहीं है तो इसका अर्थ यह नहीं कि उसके भीतर सवाल नहीं हैं,वह देख रही है, समझ रही है, हिसाब रख रही है,और अपने समय का इंतजार कर रही है, क्योंकि लोकतंत्र में आखिरी फैसला कुर्सी नहीं करती—जनता करती है,और शायद सत्ता के लिए सबसे जरूरी बात यही याद रखना है—जनता ने सरकार चुनी थी,अपना मालिक नहीं।
कमियां बताने वालों से सवाल क्यों, कमियां पैदा करने वालों से जवाब क्यों नहीं?
आज सबसे बड़ा सवाल यही है,पत्रकार ने कमी दिखाई,जागरूक नागरिक ने शिकायत की,दस्तावेज सामने आए, सरकारी धन के उपयोग पर सवाल उठा,विभागीय कार्यप्रणाली पर सवाल खड़ा हुआ,तो इसके बाद क्या होना चाहिए? जांच…तथ्यों की पड़ताल…जिम्मेदारी तय करना,और यदि शिकायत सही है तो कार्रवाई,यदि शिकायत गलत है तो दस्तावेजों के साथ उसका खंडन,यही स्वस्थ लोकतांत्रिक व्यवस्था है,लेकिन यदि किसी मामले में कमी सामने आने के बाद कमी को दूर करने के बजाय उसे ढकने,सवाल को कमजोर करने या संबंधित लोगों को संरक्षण मिलने की धारणा पैदा हो,तो मामला गंभीर हो जाता है,क्योंकि तब संदेश यह नहीं जाता कि सरकार ने कमी सुधारी,संदेश यह जाता है कि व्यवस्था ने सवाल से निपटने का रास्ता खोज लिया।
क्या हमारी दिखाई कमी किसी के लिए ‘सेटिंग’ का रास्ता बन रही है?
यह सवाल कड़वा जरूर है,लेकिन पूछा जाना चाहिए,यदि पत्रकार किसी विभाग में गड़बड़ी की ओर सरकार का ध्यान आकर्षित करता है और बाद में उसी व्यवस्था से जुड़े लोगों के प्रभावशाली होने की चर्चा शुरू हो जाए,तो जनता क्या सोचेगी? यदि कार्रवाई की उम्मीद थी और उसकी जगह नजदीकियां बढ़ती दिखाई दें तो क्या संदेश जाएगा? क्या पत्रकार द्वारा दिखाई गई कमी सुधार का माध्यम बनी? या उस कमी ने संबंधित लोगों को यह बता दिया कि अब उन्हें ऊपर तक अपनी व्यवस्था मजबूत करनी है? यहीं से ‘सेटिंग’ और संरक्षण की धारणा पैदा होती है, ऐसी धारणा सही है या गलत, इसे साबित करने का सबसे अच्छा तरीका पारदर्शी जांच और कार्रवाई है, यदि आरोप गलत है तो सरकार तथ्य सामने रखे, लेकिन यदि शिकायत सही है तो दोषी चाहे कितना भी प्रभावशाली क्यों न हो,कार्रवाई होनी चाहिए, यही सुशासन है।
जो सवाल बने उसे निपटा दो-यह राजनीति नहीं हो सकती
यदि कोई व्यक्ति सत्ता के लिए असुविधाजनक सवाल उठाता है तो उसे विरोधी मान लेना आसान है, लेकिन लोकतंत्र में सवाल पूछने वाला दुश्मन नहीं होता,पत्रकार सवाल पूछे तो वह दुश्मन नहीं, जागरूक नागरिक शिकायत करे तो वह दुश्मन नहीं,कर्मचारी अनियमितता बताए तो वह दुश्मन नहीं, विपक्ष सवाल करे तो वह भी लोकतांत्रिक प्रक्रिया का हिस्सा है,जो सरकार आलोचना सुन सकती है, वही अपनी कमियां सुधार सकती है, और जो केवल प्रशंसा सुनना चाहती है, वह धीरे-धीरे वास्तविकता से दूर होती जाती है।
जनता चुप है, लेकिन क्या वह कुछ देख नहीं रही?
सत्ता को सबसे बड़ी भूल यह नहीं करनी चाहिए कि जनता की चुप्पी को सहमति समझ लिया जाए, हर नागरिक सड़क पर नहीं उतरता,हर आदमी सोशल मीडिया पर नहीं लिखता,हर ग्रामीण कलेक्टर कार्यालय नहीं पहुंचता,हर कर्मचारी खुलकर नहीं बोल सकता,हर व्यापारी सत्ता से टकराना नहीं चाहता, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि वे कुछ देख नहीं रहे, जनता देख रही है—किसकी शिकायत पर कार्रवाई हुई,किसकी फाइल दब गई,किस अधिकारी का स्थानांतरण हुआ,कौन प्रभावशाली बना रहा, किसके खिलाफ दस्तावेज आए,किसे संरक्षण मिलने की चर्चा हुई,किस पत्रकार ने सवाल उठाया और सरकार ने उस सवाल पर क्या किया, जनता बोल नहीं रही हो सकती है,लेकिन वह हिसाब जरूर रख रही है।
भावनाओं से खेलकर सत्ता चल सकती है,भरोसा नहीं…
राजनीति में भावना की अपनी भूमिका होती है,लोग उम्मीद से वोट देते हैं,विश्वास से सरकार चुनते हैं,लेकिन उसी भावना को यदि केवल चुनावी संसाधन समझ लिया जाए तो परिणाम खतरनाक होते हैं,जनता को बार-बार भावनाओं से बांधकर वास्तविक समस्याओं से दूर नहीं रखा जा सकता, क्योंकि अंततः किसान को खेत देखना है,युवा को रोजगार चाहिए, बीमार को इलाज चाहिए,बच्चे को शिक्षा चाहिए, ग्रामीण को सड़क चाहिए, परिवार को पानी और बिजली चाहिए,और नागरिक को भ्रष्टाचार मुक्त व्यवस्था चाहिए,इन जरूरतों का जवाब भावना नहीं, शासन देता है।
घटती घटना के कुछ धारदार सवाल
- जिस उंगली ने सत्ता बनाई,उसी की आवाज क्यों दबने लगी?
- सत्ता जनता की है,भावनाओं से खेलने का अधिकार किसे?
- तीन साल की दहलीज पर सत्ता से बड़ा सवाल—जनता कहां है?
- कमियां बताईं तो सुधार नहीं,उन्हें ढकने का खेल क्यों?
- सवाल उठे तो कार्रवाई क्यों नहीं,‘सेटिंग’ की चर्चा क्यों?
- जनता ने बदलाव चुना था,व्यवस्था का पुराना खेल नहीं
- कुर्सी बदली,क्या शासन की कार्यसंस्कृति भी बदली?
- पत्रकारों ने आईना दिखाया,सत्ता ने चेहरा क्यों नहीं देखा?
- सरकारी खजाना जनता की अमानत,फिर हिसाब से परहेज क्यों?
- जनता चुप है,लेकिन सब देख रही है
- सत्ता के तीन साल,सवालों का हिसाब कौन देगा?
- लोकतंत्र में जनता मालिक,सत्ता सिर्फ जिम्मेदारी
- कमी दिखाने वालों से सवाल क्यों,कमी करने वालों से जवाब क्यों नहीं?
- भावनाओं से सत्ता मिल सकती है,भरोसा नहीं
- कुर्सी की ताकत बड़ी या जनता की उंगली?
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