नई दिल्ली,31 जनवरी २०२६। विदेश मंत्री डॉ. एस. जयशंकर ने शनिवार को कहा कि वैश्विक व्यवस्था में जारी मंथन का सबसे स्पष्ट प्रभाव मध्य पूर्व (पश्चिम एशिया) में दिखाई दे रहा है और इसका असर भारत पर भी पड़ता है। उन्होंने कहा कि क्षेत्र में हो रहे परिवर्तन भारत और अरब देशों के बीच संबंधों के लिए अत्यंत प्रासंगिक हैं। डॉ. जयशंकर यहां आयोजित दूसरी भारत-अरब विदेश मंत्रियों की बैठक को संबोधित कर रहे थे। अपने उद्घाटन वक्तव्य में उन्होंने कहा कि राजनीति, अर्थव्यवस्था, प्रौद्योगिकी और जनसांख्यिकी जैसे कारकों के कारण वैश्विक व्यवस्था में व्यापक परिवर्तन हो रहा है, जिसका सीधा प्रभाव पश्चिम एशिया में देखने को मिल रहा है। विदेश मंत्री ने कहा कि बीते कुछ वर्षों में मध्य पूर्व में कई महत्वपूर्ण घटनाक्रम हुए हैं, जिनकी गूंज क्षेत्र से बाहर तक सुनाई दी है।
उन्होंने गाजा की स्थिति का विशेष उल्लेख करते हुए कहा कि इसे लेकर अंतरराष्ट्रीय समुदाय की गहरी चिंता रही है। उन्होंने अक्टूबर 2025 में आयोजित शर्म अल-शेख शांति शिखर सम्मेलन और इसके बाद नवंबर 2025 में पारित संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के प्रस्ताव 2803 का भी जिक्र किया। डॉ. जयशंकर ने कहा कि गाजा संघर्ष को समाप्त करने की व्यापक योजना को आगे बढ़ाना आज एक साझा वैश्विक प्राथमिकता बन चुकी है। इसके अलावा उन्होंने सूडान,यमन,लेबनान, लीबिया और सीरिया की स्थितियों को भी क्षेत्रीय स्थिरता के लिए गंभीर चुनौती बताया। भारत सहित सभी संबंधित देशों का साझा हित शांति, स्थिरता और समृद्धि की ताकतों को मजबूत करने में निहित है। आतंकवाद पर कड़ा रुख अपनाते हुए विदेश मंत्री ने कहा कि आतंकवाद सभी रूपों में एक साझा खतरा है और सीमा-पार आतंकवाद पूरी तरह अस्वीकार्य है। उन्होंने कहा कि आतंकवाद के खिलाफ शून्य सहनशीलता को एक सार्वभौमिक मानक बनाया जाना चाहिए।
भारत-अरब संबंधों पर प्रकाश डालते हुए डॉ. जयशंकर ने कहा कि भारत के लीग ऑफ अरब स्टेट्स (एलएएस) के सभी देशों के साथ मजबूत साझेदारी है, जिनमें से कई रणनीतिक स्तर तक पहुंच चुकी हैं। उन्होंने कहा कि ऊर्जा, व्यापार, प्रवासी भारतीय, खाद्य और स्वास्थ्य सुरक्षा जैसे क्षेत्रों में दोनों पक्ष एक-दूसरे के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। विदेश मंत्री ने बताया कि भारत-अरब सहयोग मंच 2026-28 के लिए सहयोग के नए एजेंडे पर विचार करेगा, जिसमें डिजिटल, अंतरिक्ष, स्टार्ट-अप, नवाचार, आतंकवाद-रोधी सहयोग और संसदीय आदान-प्रदान जैसे समकालीन विषयों को शामिल करने का प्रस्ताव है। उन्होंने हाल ही में भारत-अरब चैंबर ऑफ कॉमर्स, इंडस्ट्री एंड एग्रीकल्चर के शुभारंभ का भी उल्लेख किया। डॉ. जयशंकर ने विश्वास व्यक्त किया कि बैठक के दौरान होने वाली चर्चाएं परिणामोन्मुखी होंगी और भारत-अरब संबंधों को नई मजबूती प्रदान करेंगी।
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