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संपादकीय@क्या यूजीसी कानून देश को फिर भटका रहा है?

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क्या सरकार देश को एकजुट करने में असफल हो चुकी है?
क्या अब सत्ता का रास्ता केवल विभाजन की राजनीति से ही खोजा जा रहा है?
संपादकीय | देश एक बार फिर उबाल पर है, बहस तेज है, सड़कों पर विरोध है, विश्वविद्यालयों में असंतोष है और सोशल मीडिया से लेकर संसद तक एक ही सवाल गूंज रहा है, क्या सरकार ने यूजीसी कानून लाकर देश को एक बार फिर असल मुद्दों से भटका दिया है? भारत का इतिहास गवाह है कि जब-जब देश बेरोजगारी, महंगाई, शिक्षा, स्वास्थ्य और किसानों जैसे मूल सवालों से जूझता रहा है, तब-तब राजनीति ने किसी न किसी ऐसे विषय को सामने ला दिया, जिसने समाज को आपस में उलझा दिया, कभी धर्म बहस का केंद्र बना, कभी जाति, कभी राष्ट्रवाद और अब शिक्षा व्यवस्था, यूजीसी कानून को लेकर चल रही मौजूदा बहस केवल एक शैक्षणिक सुधार की बहस नहीं रह गई है, बल्कि यह सत्ता, संविधान और लोकतंत्र की दिशा को लेकर बड़ा सवाल बन चुकी है, यूजीसी कानून केवल शिक्षा से जुड़ा विषय नहीं है, यह उस सोच का प्रतीक है, जहाँ संवाद की जगह टकराव, और समाधान की जगह राजनीति को प्राथमिकता दी जा रही है, देश को आज जंग नहीं, समाधान चाहिए, देश को बहस नहीं, विश्वास चाहिए, और सबसे ज़रूरी देश को ऐसे कानून चाहिए जो लोगों को जोड़ें, न कि बाँटें।
असल मुद्दों से ध्यान हटाने का पुराना राजनीतिक तरीका- आज देश के सामने कई गंभीर प्रश्न खड़े हैं, युवाओं को रोजगार नहीं मिल रहा, प्रतियोगी परीक्षाएं बार-बार विवादों में हैं, शिक्षा महंगी होती जा रही है, विश्वविद्यालय संसाधनों की कमी से जूझ रहे हैं, किसान अपनी उपज के दाम के लिए आंदोलनरत हैं, आम आदमी महंगाई से त्रस्त है, इन सबके बीच सरकार का ध्यान यदि इन मुद्दों के समाधान की बजाय ऐसे कानूनों पर केंद्रित हो जाए, जो देश को दो ध्रुवों में बांट दें, तो स्वाभाविक रूप से संदेह पैदा होता है, राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि जब सरकारें असहज स्थिति में होती हैं, तब वे भावनात्मक मुद्दों को हवा देती हैं ताकि जनता का ध्यान मूल प्रश्नों से हट जाए, यूजीसी कानून को लेकर उठता विवाद भी उसी रणनीति की ओर इशारा करता प्रतीत होता है।
शिक्षा सुधार या नियंत्रण की कोशिश?- सरकार का तर्क है कि यूजीसी कानून शिक्षा में गुणवत्ता, एकरूपता और पारदर्शिता लाएगा, लेकिन विरोध करने वालों का कहना है कि यह कानून विश्वविद्यालयों की स्वायत्तता को कमजोर करता है और शिक्षा व्यवस्था को अत्यधिक केंद्रीकरण की ओर ले जाता है, भारत का संविधान शिक्षा को समवर्ती सूची में रखता है, जिसमें केंद्र और राज्यों दोनों की भूमिका तय की गई है, लेकिन नए कानून को लेकर यह आशंका प्रबल हो गई है कि राज्यों के अधिकार सीमित होंगे और विश्वविद्यालयों की स्वतंत्र निर्णय क्षमता समाप्त होती जाएगी, जब शिक्षा पर नियंत्रण बढ़ता है, तो सवाल केवल प्रशासनिक नहीं रह जाता, बल्कि वैचारिक स्वतंत्रता पर भी असर पड़ता है, यही कारण है कि शिक्षाविद्, छात्र संगठन और कई राज्य सरकारें इस कानून पर पुनर्विचार की मांग कर रही हैं।
कानून व्यवस्था पर दोहरा मापदंड क्यों?- यह प्रश्न आज देश के हर जागरूक नागरिक के मन में है  यदि किसी व्यक्ति के एक बयान से कानून-व्यवस्था बिगड़ जाए, तो उस पर तुरंत कार्रवाई होती है, लेकिन जब सरकार के किसी निर्णय से पूरा देश सड़कों पर उतर आए, आंदोलन हों, रेलें रुके, शहर बंद हों तब सरकार पर कोई जवाबदेही क्यों नहीं तय होती? क्या संविधान केवल जनता के लिए है? या सरकार को हर निर्णय लेने का असीमित अधिकार प्राप्त है? इतिहास गवाह है कि कई बार सरकारों के गलत फैसलों ने देश को आंदोलनों की आग में झोंका है, लेकिन उन फैसलों की जिम्मेदारी कभी तय नहीं हुई।संविधान पर उठते सवाल- सबसे चिंताजनक बात यह है कि लगातार ऐसे कानून लाए जा रहे हैं जिन पर संविधान की भावना से टकराने के आरोप लगते हैं, धीरे-धीरे लोगों के मन में यह प्रश्न उठने लगा है क्या संविधान सर्वोपरि है, या सत्ता की इच्छा? जब कानून जनता को जोड़ने के बजाय तोड़ने लगें, जब नीतियाँ विश्वास के बजाय अविश्वास पैदा करें, तो लोकतंत्र कमजोर होता है।देश को बाँटने की राजनीति- आज देश फिर एक नई बहस में उलझ गया है, यूजीसी कानून की आड़ में कहीं धर्म की राजनीति शुरू हो गई, कहीं जातियों के बीच तनाव बढ़ रहा है, कहीं छात्रों को राजनीतिक मोहरा बनाया जा रहा है नतीजा यह है कि देश फिर दो हिस्सों में बँटता नजर आ रहा है, जबकि असल मुद्दे महंगाई, रोजगार, शिक्षा की गुणवत्ता और आर्थिक असमानता पीछे छूटते जा रहे हैं।

रवि सिंह
कोरिया छत्तीसगढ़

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