- बाल संरक्षण बना मजाकःचाइल्ड लाइन मौजूद,फिर भी सड़कों पर मासूम…
- कागजों में सुरक्षा,सड़कों पर बच्चेः सूरजपुर में बाल संरक्षण व्यवस्था ध्वस्त
- जब बचपन भीख मांगे और सिस्टम खामोश रहे…
- बाल संरक्षण की पोल खुली,सड़कों पर मजबूर मासूम…
- सूचना के बाद भी कार्रवाई शून्यःसूरजपुर में चाइल्ड लाइन की लचर हकीकत
- बचपन संकट में,जिम्मेदार बेखबरःसूरजपुर में बाल सुरक्षा व्यवस्था ठप्प…
सूरजपुर,29 जनवरी 2026 (घटती-घटना)। सूरजपुर जिले में बाल संरक्षण की जमीनी हकीकत शासन-प्रशासन के तमाम दावों को खुली चुनौती देती नजर आ रही है। कागजों में बच्चों की सुरक्षा,पुनर्वास और अधिकारों को लेकर योजनाओं की लंबी सूची मौजूद है, लेकिन धरातल पर हालात इसके बिल्कुल विपरीत हैं। जिले की सड़कों,चौराहों और सार्वजनिक स्थलों पर आज भी मासूम बच्चे कटोरा हाथ में लेकर भीख मांगते दिखाई दे रहे हैं, यह दृश्य न केवल प्रशासनिक विफलता को उजागर करता है, बल्कि यह भी सवाल खड़ा करता है कि जब जिला कार्यक्रम अधिकारी, बाल संरक्षण इकाई और चाइल्ड लाइन जैसे जिम्मेदार विभाग मौजूद हैं, तब यह बचपन आखिर किसके भरोसे छोड़ा गया है?
बाल संरक्षण व्यवस्था केवल कागजों तक सीमित
सरकार द्वारा बच्चों को शोषण, बाल श्रम और भिक्षावृत्ति से बचाने के लिए जिला बाल संरक्षण इकाई, जिला कार्यक्रम अधिकारी, चाइल्ड लाइन सेवा,किशोर न्याय अधिनियम, बाल कल्याण समिति जैसी मजबूत व्यवस्थाएं बनाई गई हैं,लेकिन सूरजपुर जिले में यह पूरी प्रणाली फाइलों और बैठकों से आगे नहीं बढ़ पा रही।
तस्वीरों ने खोली पोल
हाल ही में सामने आई तस्वीरों में साफ देखा गया कि छोटे-छोटे बच्चे रेलवे स्टेशन, बस स्टैंड, बाजार क्षेत्र,धार्मिक स्थलों पर खुलेआम भीख मांग रहे हैं,ये बच्चे न तो स्कूल में हैं, न किसी पुनर्वास केंद्र में,और न ही प्रशासन की निगरानी में, यह स्थिति तब और गंभीर हो जाती है जब पता चलता है कि इन मामलों की जानकारी संबंधित अधिकारियों को दी गई थी।
सूचना के बाद भी सिर्फ खानापूर्ति
पत्रकारों द्वारा जब इस गंभीर विषय की जानकारी चाइल्ड लाइन और विभागीय अधिकारियों को दी गई,तो दबाव में टीम को मौके पर भेजा गया, लेकिन प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार टीम ने केवल मौके पर पहुंचकर औपचारिक पूछताछ की,बच्चों को रेस्क्यू नहीं किया गया, किसी तरह की काउंसलिंग नहीं हुई, पुनर्वास की कोई कार्ययोजना नहीं बनी कुछ समय बाद टीम लौट गई और हालात जस के तस बने रहे,यह पूरी प्रक्रिया ‘दिखावे की कार्रवाई’ से अधिक कुछ नहीं मानी जा रही।
दिखावे की टीम,जमीनी परिणाम शून्य : स्थानीय लोगों का कहना है कि चाइल्ड लाइन की टीम समय पर नहीं पहुंचती, कई बार फोन रिसीव तक नहीं करती, कार्रवाई की फाइल बाद में ‘निपटा दी जाती है, परिणाम यह कि बच्चे फिर उसी चौराहे पर, उसी कटोरे के साथ नजर आने लगते हैं।
विवादों के घेरे में जिला कार्यक्रम अधिकारी
जिला कार्यक्रम अधिकारी की कार्यशैली पहले से ही विवादों में रही है। पूर्व में भी उन पर लापरवाही, निरीक्षण में उदासीनता, शिकायतों की अनदेखी जैसे गंभीर आरोप लगते रहे हैं, हालांकि जिले में पर्याप्त कर्मचारी,निर्धारित बजट, वाहन व संसाधन मौजूद होने के बावजूद, कार्रवाई का अभाव साफ तौर पर प्रशासनिक उदासीनता को दर्शाता है।
चाइल्ड लाइन बनी ‘सफेद हाथी’
बाल सुरक्षा के लिए बनाई गई 00 चाइल्ड लाइन सेवा आज जिले में सिर्फ बोर्ड और पोस्टर तक सीमित है,हकीकत में इसका उपयोग नाममात्र का है, कई मामलों में सूचना देने के घंटों बाद टीम पहुंचती है, तब तक बच्चे गायब हो जाते हैं, दलाल सक्रिय हो जाते हैं, सच्चाई दबा दी जाती है,यह स्थिति विभागीय लापरवाही के साथ संभावित मिलीभगत की ओर भी इशारा करती है।
बाल भिक्षावृत्ति : अपराध लेकिन कार्रवाई शून्य…
किशोर न्याय अधिनियम के तहत बाल भिक्षावृत्ति अपराध है,बच्चों से भीख मंगवाना दंडनीय है, दोषियों पर एफआईआर का प्रावधान है,लेकिन सूरजपुर जिले में इन नियमों का पालन शायद ही होता नजर आता है,आज तक कितने बच्चों को रेस्क्यू किया गया? कितनों का पुनर्वास हुआ? कितने मामलों में एफआईआर दर्ज हुई? इन सवालों के स्पष्ट जवाब विभाग के पास नहीं हैं।
प्रशासन से तीखे सवाल-
अब सवाल सिर्फ बच्चों के नहीं, बल्कि प्रशासनिक जवाबदेही के हैं…
जिला कार्यक्रम अधिकारी की निगरानी में यह सब कैसे हो रहा है?
सूचना मिलने के बाद भी कार्रवाई क्यों नहीं होती?
क्या बच्चों की सुरक्षा से बड़ा कोई और काम है?
क्या लापरवाह अधिकारियों पर कभी जिम्मेदारी तय होगी?
नागरिकों ने की कलेक्टर से हस्तक्षेप की मांग
मामले की गंभीरता को देखते हुए अब जिले के सामाजिक संगठनों,जागरूक नागरिकों,अभिभावकों,पत्रकारों ने कलेक्टर से सीधे हस्तक्षेप, स्वतंत्र जांच और जिम्मेदार अधिकारियों पर कठोर कार्रवाई की मांग की है।
सवाल सिस्टम पर,जवाब अब जरूरी
सूरजपुर में सड़कों पर भीख मांगते बच्चे प्रशासन के लिए सिर्फ आंकड़ा नहीं, बल्कि संवेदनशीलता की सबसे बड़ी परीक्षा हैं, यदि बच्चों की सुरक्षा के लिए बने विभाग ही अपनी जिम्मेदारियों से मुंह मोड़ लें, तो यह केवल लापरवाही नहीं, बल्कि सिस्टम की विफलता है, अब देखना यह है कि क्या प्रशासन इस मामले को गंभीरता से लेकर दोषियों पर कार्रवाई करेगा, या फिर यह खबर भी अन्य फाइलों की तरह दफन होकर रह जाएगी।
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