राष्ट्रीय पर्वों के मंच से बदली कोरिया जिले की प्रशासनिक कार्यशैली
कुर्सियों से सम्मान तक : कोरिया जिले में राष्ट्रीय पर्वों की बदली राजनीतिक संस्कृति
कांग्रेस शासन में अपमान का आरोप, भाजपा सरकार में समन्वय और मर्यादा की मिसाल
लेख by रवि सिंह- राष्ट्रीय पर्व केवल औपचारिक आयोजन नहीं होते, बल्कि ये लोकतंत्र की आत्मा, प्रशासनिक मर्यादा और जनप्रतिनिधियों के सम्मान की सबसे बड़ी कसौटी होते हैं, जब पूरा देश 15 अगस्त और 26 जनवरी जैसे अवसरों पर तिरंगे के नीचे एकजुट होता है, तब मंच पर बैठने की व्यवस्था, अतिथियों का सम्मान और प्रशासनिक व्यवहार जनता के सामने सत्ता की वास्तविक तस्वीर प्रस्तुत करता है, कोरिया जिले में बीते कुछ वर्षों के राष्ट्रीय पर्व आयोजनों को यदि गहराई से देखा जाए, तो यह साफ नजर आता है कि सरकार बदलते ही मंचों की संस्कृति, कुर्सियों का महत्व और प्रशासन का रवैया पूरी तरह बदल गया है, यही कारण है कि आज राष्ट्रीय पर्वों के मंच केवल समारोह नहीं, बल्कि राजनीतिक कार्यसंस्कृति की तुलना का केंद्र बन गए हैं, कांग्रेस शासनकाल में जहां राष्ट्रीय पर्वों के मंच अपमान, असंतोष और टकराव का प्रतीक बन गए थे, वहीं भाजपा सरकार के दो वर्षों में वही मंच समरसता, मर्यादा और सहयोग का उदाहरण बनते नजर आ रहे हैं, लोकतंत्र में सत्ता परिवर्तन केवल राजनीतिक बदलाव नहीं होता, बल्कि यह कार्यसंस्कृति को सुधारने का अवसर भी होता है, कोरिया जिले में राष्ट्रीय पर्वों की बदली हुई यह तस्वीर इसी परिवर्तन की कहानी कहती है जहां कभी कुर्सियां भारी थीं, आज सम्मान भारी है।
जब कांग्रेस की सरकार थी — मंच बनते थे विवाद का कारण- पूर्ववर्ती कांग्रेस शासनकाल में, विशेषकर बैकुंठपुर विधानसभा क्षेत्र में, राष्ट्रीय पर्वों के आयोजन अक्सर विवादों में घिरे रहते थे, गणतंत्र दिवस और स्वतंत्रता दिवस जैसे गरिमामय अवसर भी सत्ताधारी दल के भीतर असंतोष और नाराजगी का मंच बन जाया करते थे, उस दौर में कई ऐसे दृश्य सामने आए जब सत्ताधारी कांग्रेस के ही नेता और कार्यकर्ता मंचों पर अपेक्षित सम्मान से वंचित रहे, कई कार्यक्रमों में कांग्रेस नेताओं की कुर्सियां मंच से हटा दी गईं या उन्हें अंतिम पंक्तियों में बैठाया गया, कुछ अवसरों पर नेताओं को कुर्सियों से उठाकर नीचे बैठने को मजबूर किया गया, नाराज कार्यकर्ताओं ने सार्वजनिक रूप से जमीन पर बैठकर विरोध भी दर्ज कराया, ये घटनाएं केवल व्यक्तिगत अपमान नहीं थीं, बल्कि उन्होंने राष्ट्रीय पर्वों की गरिमा पर भी प्रश्नचिह्न खड़े किए।
प्रशासनिक संरक्षण और राजनीतिक असंतुलन- कांग्रेस शासनकाल की सबसे अधिक आलोचना इस बात को लेकर हुई कि जिन अधिकारियों पर नेताओं को अपमानित करने के आरोप लगे, उन्हें तत्कालीन विधायक का संरक्षण प्राप्त रहा, राजनीतिक हलकों में यह चर्चा आम थी कि जो अधिकारी कांग्रेस नेताओं को कुर्सियों से उठाते थे, जिन्हें मंच व्यवस्था में मनमानी करने की छूट थी, वही अधिकारी विधायक की नजर में “कुशल और अनुशासित” माने जाते थे, इसका परिणाम यह हुआ कि पार्टी कार्यकर्ताओं में निराशा और आक्रोश लगातार बढ़ता चला गया। कई वरिष्ठ नेताओं ने इसे अपमान की राजनीति बताया, जबकि कार्यकर्ताओं ने इसे अपने ही शासन में उपेक्षा का प्रतीक माना।
कोरिया जिला क्यों बना अपवाद- जानकारों का मानना है कि यह स्थिति पूरे प्रदेश में समान नहीं थी, कई जिलों में कांग्रेस शासनकाल के दौरान भी राष्ट्रीय पर्व शांतिपूर्ण ढंग से संपन्न होते रहे, किंतु कोरिया जिले की बैकुंठपुर विधानसभा इस मामले में अपवाद बनी रही, यहां हर राष्ट्रीय पर्व से पहले मंच व्यवस्था को लेकर चर्चाएं, आशंकाएं और तनाव का माहौल बन जाता था, यही कारण रहा कि यह विषय वर्षों तक स्थानीय राजनीति में चर्चा का केंद्र बना रहा।
2023 के बाद बदली तस्वीर- वर्ष 2023 में प्रदेश में सत्ता परिवर्तन हुआ और भाजपा की सरकार बनी, इसके साथ ही कोरिया जिले में शासकीय आयोजनों की कार्यशैली में भी स्पष्ट बदलाव नजर आने लगा, पिछले दो वर्षों में स्वतंत्रता दिवस,गणतंत्र दिवस,शासकीय सम्मान समारोह,सांस्कृतिक एवं प्रशासनिक कार्यक्रम लगातार आयोजित हुए, किंतु इन आयोजनों में वह पुराना तनाव दिखाई नहीं दिया।
मंच पर दिखा सामंजस्य- भाजपा सरकार के कार्यकाल में राष्ट्रीय पर्वों के मंचों पर निर्वाचित जनप्रतिनिधियों, संगठन पदाधिकारियों, वरिष्ठ व कनिष्ठ कार्यकर्ताओं सभी को सम्मानजनक स्थान मिलता दिखाई दिया, मंच भले ही बड़ा हो या सीमित, कुर्सियों की संख्या चाहे अधिक हो या कम — किसी को अपमानित किए जाने या हटाए जाने की शिकायत सामने नहीं आई, राजनीतिक दृष्टि से यह परिवर्तन अत्यंत महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
प्रशासन वही, लेकिन दृष्टिकोण नया- यह कहना भी उचित नहीं होगा कि प्रशासनिक तंत्र पूरी तरह बदल गया है, अधिकारी वही हैं, व्यवस्था वही है और नियम भी लगभग समान हैं, फिर भी अंतर साफ दिखाई देता है, आज प्रशासन यह समझने लगा है कि “राष्ट्रीय पर्व केवल सरकारी कार्यक्रम नहीं, बल्कि जनप्रतिनिधियों और जनता के आत्मसम्मान से जुड़े आयोजन हैं, इसी सोच के कारण मंचों पर व्यवहार संयमित, संवादपूर्ण और मर्यादित नजर आने लगा है।
भाजपा की कार्यसंस्कृति बनी आधार- भाजपा सरकार के दो वर्षों में संगठनात्मक अनुशासन भी स्पष्ट रूप से सामने आया है, जहां आंतरिक मतभेद संभव हैं, वहीं उन्हें मंचों तक नहीं आने दिया गया, सार्वजनिक बयानबाजी से परहेज रखा गया, प्रशासनिक आयोजनों को राजनीतिक प्रदर्शन का मंच नहीं बनने दिया गया, राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यही अनुशासन राष्ट्रीय पर्वों को विवाद से दूर रखने का सबसे बड़ा कारण बना।
पहले कुर्सियां भारी थीं, अब सम्मान- पूर्ववर्ती सरकार के दौर में यह आम धारणा बन गई थी कि मंचों पर कुर्सियां नेताओं के सम्मान से अधिक महत्वपूर्ण हो गई थीं, आज स्थिति इसके ठीक विपरीत दिखाई देती है, अब कुर्सियां केवल बैठने का साधन हैं, जबकि सम्मान भावना प्राथमिकता बन चुका है इसी बदलाव ने कार्यकर्ताओं के भीतर आत्मविश्वास और सहभागिता की भावना को मजबूत किया है।
कार्यकर्ताओं में बढ़ा मनोबल- भाजपा शासनकाल में आयोजनों के दौरान कार्यकर्ताओं के चेहरों पर उत्साह साफ देखा जा सकता है, वरिष्ठ कार्यकर्ताओं का कहना है कि मंच पर बैठने का स्थान केवल औपचारिक नहीं, बल्कि वह वर्षों की सेवा का सम्मान होता है, आज यह सम्मान मिलने से संगठन के भीतर सकारात्मक ऊर्जा का संचार हुआ है।
राजनीतिक संदेश भी स्पष्ट- कोरिया जिले में राष्ट्रीय पर्वों के मंचों से उभरता यह परिवर्तन केवल प्रशासनिक नहीं, बल्कि राजनीतिक संदेश भी देता है, यह बताता है कि सत्ता का मूल्य व्यवहार से तय होता है, शासन का प्रभाव मंचों से झलकता है, और सम्मान की राजनीति ही स्थायित्व लाती है।

कोरिया छत्तीसगढ़
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