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बैकुंठपुर @पैर पर पैर नहीं, संस्कार पर संकट है, सत्ता की नज़दीकी या संस्कारों से दूरी?

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  • पद नहीं, संस्कार बड़ा होता है: जब अहंकार मर्यादा पर भारी पड़ने लगे
  • कलेक्टर कार्यालय में कुर्सी नहीं, सोच बेनकाब हुई,शिष्टाचार पर सवाल उठा तो भड़का अहंकार
  • मर्यादा की याद दिलाई गई, तो नेता बनने का दावा आहत हो गया
  • आलोचना से असहज नई पीढ़ी की राजनीति, कुर्सी मिली, पर मर्यादा छूट गई
  • नेता कहलाना आसान, नेतृत्व निभाना कठिन,शिष्टाचार पर सवाल उठे तो बौखलाहट क्यों?
  • जब प्रशासनिक गरिमा के सामने अहंकार बैठ जाए,
  • पद नहीं, संस्कार बड़ा होता है: जब अहंकार मर्यादा पर भारी पड़ने लगे
  • कलेक्टर कार्यालय में वायरल वीडियो ने युवा राजनीति की समझ और सार्वजनिक मर्यादा पर खड़े किए गंभीर सवाल

-रवि सिंह-
बैकुंठपुर, 27 जनवरी 2026 (घटती-घटना)। समाज केवल कानून से नहीं चलता, वह संस्कारों से चलता है, संस्कार वही होते हैं जो यह सिखाते हैं कि कहाँ कैसे बैठना है, किससे कैसे बोलना है और किस स्थान की क्या मर्यादा है, यही संस्कार मनुष्य को भीड़ से अलग पहचान देते हैं,एक समय था जब परिवार,विद्यालय और समाज—तीनों मिलकर व्यक्ति के भीतर यह चेतना पैदा करते थे कि हर स्थान समान नहीं होता,घर,विद्यालय,सार्वजनिक मंच,न्यायालय और प्रशासनिक कार्यालय—हर जगह का व्यवहार अलग होता है,यही अंतर सभ्यता और असभ्यता के बीच की रेखा खींचता है,परंतु आज का दौर ठीक इसके विपरीत खड़ा दिखाई देता है,आज यदि कोई शिष्टाचार की बात करता है, मर्यादा की याद दिलाता है या सार्वजनिक व्यवहार पर प्रश्न उठाता है,तो उसे सुधार की सलाह नहीं बल्कि व्यक्तिगत दुश्मनी समझ लिया जाता है, ऐसा प्रतीत होता है मानो जिसने कमी बता दी,उसने बहुत बड़ा अपराध कर दिया हो, यह प्रकशित खबर न किसी व्यक्ति के खिलाफ है,न किसी राजनीतिक दल के विरुद्ध,यह बहस केवल उस मानसिकता के खिलाफ है,जहाँ कुर्सी मर्यादा से बड़ी हो जाए,जहाँ आलोचना को अपमान समझ लिया जाए,और जहाँ पद से पहले अहंकार आ जाए,शिष्टाचार कमजोरी नहीं, लोकतंत्र की सबसे बड़ी ताकत है,जो इसे समझता है,वही वास्तव में बड़ा नेता बनता है।
क्या है पूरा मामला?- हाल ही में सोशल मीडिया पर एक वीडियो तेजी से वायरल हुआ, जिसमें एक 27 वर्षीय युवक जो स्वयं को भारतीय जनता पार्टी का नेता बताता है, जिला कलेक्टर से मुलाकात के दौरान पैर पर पैर चढ़ाकर बैठे हुए दिखाई दे रहा है, यह वीडियो स्वयं युवक द्वारा अपने सोशल मीडिया अकाउंट पर साझा किया गया था, मुलाकात किस विषय पर थी, यह स्पष्ट नहीं हो सका, किंतु दृश्य सामने आते ही आमजन के बीच यह प्रश्न उठने लगा कि क्या जिला कलेक्टर कार्यालय सामान्य बैठक स्थल है? क्या जिले के सर्वोच्च प्रशासनिक अधिकारी के समक्ष ऐसा आचरण उचित है? क्या हर स्थान पर एक जैसा व्यवहार मर्यादा के अनुरूप होता है? जनता ने देखा, चर्चा हुई और आलोचना स्वाभाविक रूप से सामने आई, खबर उसी आलोचना की अभिव्यक्ति थी।
क्यों चुभती है मर्यादा की बात?– क्योंकि कमी मानना आत्ममंथन मांगता है, और आत्ममंथन वही कर सकता है जिसकी परवरिश में संस्कार रहे हों, यदि बचपन में यह नहीं सिखाया गया कि कौन-सा स्थान क्या महत्व रखता है, किस पद के सामने कैसा आचरण अपेक्षित है, और शक्ति से बड़ा संयम होता है तो व्यक्ति को यही लगता है कि कुर्सी पर बैठना ही सम्मान है, भले ही वह कुर्सी किसी भी जगह क्यों न हो।
मुद्दा कुर्सी नहीं, सोच का है- यह बहस इस बात की नहीं थी कि कुर्सी पर बैठना गलत है या नहीं, बहस इस बात की थी कि क्या हर जगह एक जैसा आचरण उचित होता है? क्या कलेक्टर कार्यालय चाय की दुकान है? क्या जिले के सर्वोच्च प्रशासनिक पद की गरिमा व्यक्तिगत आराम से छोटी है? घर में बैठने का तरीका अलग होता है, दोस्तों के बीच अलग, अकेले कमरे में अलग, और न्यायिक या प्रशासनिक अधिकारी के समक्ष पूरी तरह अलग, यही अंतर व्यक्ति के भीतर मौजूद संस्कार को उजागर करता है, यदि वही युवक शांत मन से अपना ही वीडियो देखे, तो शायद उसे भी समझ आए कि यह केवल “पैर रखने” का प्रश्न नहीं था—यह संवेदनशीलता, समझ और मर्यादा का प्रश्न था।
जब आलोचना असहनीय बन जाए– खबर प्रकाशित होने के बाद जो प्रतिक्रिया सामने आई, वह इस पूरे विषय का सबसे गंभीर पहलू बन गई, आलोचना स्वीकार करने के बजाय युवक ने सोशल मीडिया पर ऐसा वक्तव्य दिया जिसमें पत्रकारों पर व्यक्तिगत आरोप लगाए गए, भाषा की मर्यादा लांघी गई, धमकी और अहंकार स्पष्ट झलका, स्वयं को “अलग टाइप का नेता” घोषित किया गया, यह प्रतिक्रिया बताने के लिए पर्याप्त थी कि समस्या वीडियो में नहीं, सोच में है, जिस लहजे में लिखा गया, वह स्वयं यह दर्शाता है कि राजनीति अभी परिपम्ता से बहुत दूर है।
सोशल मीडिया से अख़बार तक पहुंची बहस- वीडियो वायरल होने के बाद इस विषय पर सोशल मीडिया में तीखी प्रतिक्रियाएँ सामने आईं, इसी क्रम में समाचार पत्र में प्रकाशित विश्लेषणात्मक खबर शिष्टाचार बनाम दिखावा: क्या सत्ता की निकटता मर्यादा से ऊपर हो गई है?” ने पूरे मामले को और व्यापक बहस में बदल दिया, खबर में किसी व्यक्ति विशेष पर आरोप नहीं, बल्कि सार्वजनिक पदों की गरिमा और व्यवहार की मर्यादा पर सवाल उठाए गए थे।
नेता होने का दावा, पर पद का उत्तर नहीं- युवक ने यह भी कहा कि अधिकारी से मिलना कोई अपराध नहीं है, निश्चित रूप से नहीं, लेकिन सवाल यह है कि वे किस पद की हैसियत से मिले? संगठन में उनका अधिकृत दायित्व क्या है? क्या वे निर्वाचित प्रतिनिधि हैं? या किसी संवैधानिक जिम्मेदारी का निर्वहन कर रहे थे? यदि कोई विधायक, सांसद या मंत्री कलेक्टर से चर्चा करता है, तो वह प्रशासनिक परामर्श कहलाता है, लेकिन यदि कोई स्वयंभू “नेता” बिना स्पष्ट पद, जिम्मेदारी और जनादेश के बैठक करे, तो सवाल उठना स्वाभाविक है, सवाल पूछना अपराध नहीं होता।
पत्रकारिता पर आरोप — हताशा की उपज- अपने बचाव में युवक द्वारा पत्रकारों को लिफाफाखोर, आरटीआई के नाम पर ब्लैकमेल करने वाला, कार्यालयों में हाथ जोड़कर खड़ा रहने वाला बताया गया, ये आरोप न केवल गंभीर हैं बल्कि बिना किसी प्रमाण के लगाए गए हैं, यदि ऐसा कोई तथ्य मौजूद है तो उसे सक्षम मंच पर प्रस्तुत किया जाना चाहिए, सोशल मीडिया पर गुस्से में उछाले गए आरोप सच्चाई नहीं बन जाते, पूरी पत्रकार बिरादरी को एक ही तराजू में तौल देना स्वयं उस मानसिकता को उजागर करता है जो आलोचना सहन नहीं कर पाती।
भाषा ही असली पहचान होती है- राजनीति में व्यक्ति को उसके कपड़ों से नहीं, शब्दों से पहचाना जाता है, शब्द बताते हैं संस्कार कितने गहरे हैं, सत्ता सिर पर चढ़ी है या जिम्मेदारी मन में है, और व्यक्ति नेता बनने आया है या केवल दिखावे के लिए राजनीति कर रहा है, जब आलोचना के उत्तर में संयम नहीं, बल्कि धमकी दिखाई दे—तो वही व्यवहार पूरे विवाद का निष्कर्ष स्वयं लिख देता है।
सवाल गलत नहीं थे- यह लेख किसी व्यक्ति के विरुद्ध नहीं था, यह किसी पार्टी के विरुद्ध नहीं था, यह केवल उस सोच के विरुद्ध था जिसमें पद से पहले अहंकार आता है, कुर्सी मर्यादा से बड़ी हो जाती है, और आलोचना को दुश्मनी मान लिया जाता है, शिष्टाचार कमजोरी नहीं, शक्ति की पहचान है, जो उसे समझ लेता है, वही वास्तव में बड़ा बनता है, और जो उसे ठुकरा देता है—वह चाहे जितना ऊँचा बोले, भीतर से उतना ही छोटा दिखाई देता है।


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