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सूरजपुर@ 13 हजार क्विंटल की कमी के बाद 35 हजार क्विंटल की तेजी,संयोग या संकेत?

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  • 13 दिनों में 35 हजार क्विंटल की खरीदी-कृषि उपलब्धि या ‘भ्रष्टाचार एक्सप्रेस’ की रफ्तार?
  • धान खेतों में नहीं,फाइलों में उगा शिवप्रसादनगर का चौंकाने वाला सच
  • शिवप्रसादनगर में धान नहीं,आंकड़े दौड़ रहे हैं,कागजों में भरपूर धान, जमीन पर सन्नाटा
  • धान खरीदी का सबसे रहस्यमय केंद्र बना शिवप्रसादनगर,जांच हुई तो फटेगा बड़ा घोटाला!
  • खेत सूने,चट्टा भरी! खरीदी आंकड़ों ने बढ़ाई प्रशासन की मुश्किल
  • एक केंद्र,कई सवालः धान कम और आंकड़े आसमान पर
  • 35 हजार क्विंटल 13 दिन में — कृषि या करामात?
  • धान खरीदी या ‘डिजिटल खेती’? शिवप्रसादनगर मॉडल चर्चा में


-ओंकार पाण्डेय-
सूरजपुर,24 जनवरी 2026(घटती-घटना)।
कहते हैं भारत कृषि प्रधान देश है, लेकिन सूरजपुर जिले का शिवप्रसादनगर धान खरीदी केंद्र यह साबित करने पर तुला है कि अब देश आंकड़ा प्रधान बन चुका है — जहां खेतों से धान नहीं,सीधे फाइलों से क्विंटल निकल रहे हैं। यहां बालियां नहीं बढ़ रहीं,लेकिन खरीदी का ग्राफ रोज नया रिकॉर्ड बना रहा है। जिले के सबसे चर्चित इस धान खरीदी केंद्र में एक बार फिर खरीदी के आंकड़ों ने गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं,रकबा बढ़ाने और सत्यापन प्रक्रिया के बाद महज 13 दिनों में 35,000 क्विंटल धान खरीदी दर्ज की गई,जिसने प्रशासन से लेकर किसान संगठनों तक को चौंका दिया है,सबसे बड़ा सवाल यही है क्या केवल दो चट (स्टैक) में 35 हजार क्विंटल धान रखना संभव है?
पहले भी सामने आ चुकी है भारी कमी
उल्लेखनीय है कि इससे पहले जब यहां लगभग 65,000 क्विंटल खरीदी दर्शाई गई थी,तब दैनिक घटती-घटना द्वारा यह सवाल उठाया गया था कि इतनी खरीदी के अनुरूप धान भौतिक रूप से समिति में मौजूद नहीं है,बाद में हुई जांच में 13,000 क्विंटल से अधिक धान की कमी भी पाई गई थी। उस समय लगा था कि अब व्यवस्था सुधरेगी,लेकिन इसके उलट जांच के कुछ ही दिनों बाद रिकॉर्ड गति से खरीदी दर्ज होना कई संदेहों को जन्म दे रहा है।
दो महीने में 65 हजार,13 दिन में 35 हजार क्विंटल खरीदी!
सूत्रों के अनुसार लगभग दो महीनों में 65,000 क्विंटल खरीदी,और अब केवल 13 दिनों में 35,000 क्विंटल यह तब है,जब अधिकांश किसान पहले ही अपना धान बेच चुके हैं। गांवों में न ट्रॉलियां दिखाई दे रही हैं,न खेतों में धान शेष है।,यही कारण है कि यह अचानक आई आवक प्राकृतिक नहीं बल्कि कृत्रिम आंकड़ा वृद्धि मानी जा रही है।
नियमों के विपरीत चट्टा में भराव
सरकारी मानकों के अनुसार एक चट्टा में अधिकतम 5,000 बोरी धान,एक बोरी का मानक वजन 40.700 किलो,इस आधार पर एक चट में लगभग 2,000 क्विंटल धान ही संभव है,तो फिर सवाल उठता है दो चट्टा में 35,000 क्विंटल कैसे आ गया? क्या चट्टा अब रबर की बनने लगी हैं? क्या बोरियां हवा में तैरने लगी हैं? या फिर धान अब डिजिटल रूप में आने लगा है?
एक धान — कई किसानों का सत्यापन!
सबसे चौंकाने वाला आरोप यह है कि एक ही ट्रॉली या ढेर के धान के साथ अलग-अलग किसानों के कई फोटो खींचकर सत्यापन किया जा रहा है,अर्थात धान वही रहता है किसान बदल जाते हैं इस तरह पोर्टल पर खरीदी बढ़ जाती है,लेकिन जमीन पर धान उतना होता ही नहीं, स्थानीय लोग इसे व्यंग्य में ‘एक धान — अनेक किसान योजना’ कह रहे हैं।
बोरियों का वजन घटाकर संख्या बढ़ाने का तरीका-
सूत्रों के अनुसार समिति के जिम्मेदारों ने नया तरीका अपनाया है मानक वजनः 40.700 किलो,वास्तविक वजनः 35-38 किलो, कम वजन की बोरियां बनाकर—बोरियों की संख्या बढ़ाई जाती है, कागजों में क्विंटल पूरा दिखा दिया जाता है यदि भविष्य में जांच केवल बोरी गिनती पर हुई,तो वास्तविक धान की भारी कमी आसानी से छिपाई जा सकती है।
धान माफिया-समिति-प्रबंधन गठजोड़ के आरोप-
स्थानीय सूत्रों का आरोप है कि समिति प्रबंधन,धान खरीदी प्रभारी और स्थानीय धान माफिया आपसी तालमेल से यह पूरा खेल संचालित कर रहे हैं, यह भी चर्चा है कि ‘ऊपर तक पैसा पहुंचने’ की धारणा के कारण कार्रवाई का भय लगभग समाप्त हो चुका है।
11 करोड़ का घोटाला संभव- पर जांच करेगा कौन?
सूत्रों का दावा है कि यदि इस धान खरीदी केंद्र की निष्पक्ष,स्वतंत्र और दबाव-मुक्त जांच कराई जाए, तो अकेले इसी केंद्र से 11 करोड़ रुपये तक का घोटाला सामने आ सकता है — इतना कि पूरे जिले का आंकड़ा भी छोटा पड़ जाए, सूत्रों के अनुसार अंदरूनी सोच बेहद चिंताजनक है— ‘करोड़ों कमा लो, 20-25 लाख खर्च कर जमानत करा लेंगे, यही कारण है कि भ्रष्टाचार अब डर के साथ नहीं, पूरे आत्मविश्वास के साथ किया जा रहा है।
प्रशासनिक जांच की उठी मांग ग्रामीणों,किसानों और जनप्रतिनिधियों द्वारा मांग की जा रही है कि…
पूरे खरीदी केंद्र का भौतिक सत्यापन कराया जाए, बोरी वजन,चट्टा संख्या व ऑनलाइन डेटा का मिलान हो,पूर्व में सामने आई कमी के लिए जिम्मेदारों पर कार्रवाई की जाए क्योंकि यदि समय रहते जांच नहीं हुई,तो सरकारी धान खरीदी व्यवस्था से किसानों का भरोसा पूरी तरह टूट सकता है।
प्रशासन मौन क्यों?
सबसे बड़ा प्रश्न यही है 13 हजार क्विंटल की कमी पहले ही सामने आ चुकी,अब अचानक खरीदी विस्फोटक गति से बढ़ी,नियमों के विरुद्ध धान का चट्टा भरे जा रहे हैं,किसान मौके पर मौजूद नहीं फिर भी कोई विशेष जांच नहीं,कोई निलंबन नहीं,कोई एफआईआर नहीं क्या प्रशासन सिर्फ आंकड़े देख रहा है या जानबूझकर आंखें मूंदे बैठा है?
यह केवल एक खरीदी केंद्र की कहानी नहीं…
यह पूरी धान खरीदी व्यवस्था पर उठता गंभीर सवाल है, यदि आज शिवप्रसादनगर को नहीं रोका गया, तो कल यही मॉडल पूरे जिले में दोहराया जाएगा,यह रिपोर्ट जनहित में उपलब्ध दस्तावेजों, स्थानीय तथ्यों व सूत्रों के आधार पर तैयार की गई है। प्रशासनिक पक्ष प्राप्त होने पर उसे भी समान रूप से प्रकाशित किया जाएगा।


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